Swarnim Raaj Ka Rahasya in Hindi Thriller by Kahaniyon Ki lahar books and stories PDF | स्वर्णिम राज्य का रहस्य - अध्याय 5

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स्वर्णिम राज्य का रहस्य - अध्याय 5


कौशल राज की विशाल राजसभा में, जब स्वर्णिम राज से लाई गई एक-से-एक सुंदर और बेशकीमती भेंटों को प्रस्तुत किया गया, तो वहाँ बैठे सभी मंत्री और दरबारी आश्चर्यचकित रह गए।

किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि महारानी सुलोचना, राजकुमार अक्षतयम के लिए इतनी ढेरों और भव्य भेंटें भेजेंगी। कक्ष में रखी उन अनमोल वस्तुओं की चमक हर किसी की आँखों को चौंधिया रही थी।

सभी भेंटों का प्रदर्शन पूरा होने के बाद, दूत जी ने आदरपूर्वक आगे बढ़कर रानी सुलोचना जी का भेजा हुआ वह महत्वपूर्ण पैगाम पढ़ना शुरू किया।

जैसे ही दूत जी ने पैगाम पढ़ा और सबने सुना कि महारानी सुलोचना ने इस रिश्ते को पक्का करने और एक भव्य समारोह में शामिल होने के लिए पूरे राजपरिवार को निमंत्रण भेजा है, तो महाराज भविष्यण चंद्र का चेहरा गर्व और प्रसन्नता से खिल उठा।

महाराज भविष्यन चंद्र ने गंभीर और गूँजती हुई आवाज में उत्तर दिया, "हमें रानी सुलोचना जी के ये सारे भेंट और पैगाम सहर्ष स्वीकार हैं। हम आने वाले एक दिवस पश्चात में ही स्वर्णिम राज के लिए रवाना होंगे। इसके लिए राजमहल में सभी आवश्यक तैयारियाँ तुरंत शुरू करवा दी जाएं और यात्रा का प्रबंध पुख्ता किया जाए।"

महाराज ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए सभा को बताया, "हम रानी अवंतिका, हमारे पुत्र राजकुमार अक्षतयम, गुरुवर गुरु आचार्य और हमारे वीर सैनिकों के दल के साथ स्वर्णिम राज के लिए प्रस्थान करेंगे।

जब तक हम इस यात्रा पर रहेंगे और जब तक हम वापस नहीं लौट आते, तब तक राज्य का सारा कारोबार और प्रशासनिक जिम्मेदारी बड़े राजकुमार अक्षयजीत संभालेंगे।"

पिता का यह आदेश मिलते ही, राजकुमार अक्षयजीत ने अपने स्थान से उठकर पूरी दृढ़ता और सम्मान के साथ सिर झुकाया और बोले, "जी महाराज, जैसी आपकी आज्ञा। आप पूरी तरह निश्चिंत होकर स्वर्णिम राज जाइए, आपकी अनुपस्थिति में राज का सारा कारोबार और व्यवस्थाएं हम पूरी निष्ठा से संभालूँगा।"

महाराज भविष्यण चंद्र ने संतोष की मुस्कान के साथ कहा, "हमें आपसे यही उम्मीद थी, राजकुमार अक्षयजीत।"

इसके बाद महाराज ने घोषणा की, "आज की यह बैठक यहीं समाप्त होती है।"

इतना कहकर राजा भविष्यन चंद्र अपने आसन से उठे और राजसभा से बाहर निकल गए, और उनके ठीक पीछे-पीछे राजकुमार अक्षय्यतम भी गंभीर कदमों से चल पड़े।

महाराज भविष्यण चंद्र सीधे अपने कक्ष में जा पहुँचे। उनके पीछे-पीछे राजकुमार अक्षतयम भी कक्ष के द्वार पर आकर रुक गए।

अपने पुत्र को देखकर महाराज ने उन्हें भीतर आने के लिए बोला।

महाराज भविष्यण चंद्र अपने शाही पलंग में बैठकर बोले। "बैठिए रजकुमार अक्षतयम और बताइए क्या कहने आए हैं? आप।"
राजकुमार अक्षतयम अपने पिता के समक्ष बैठ कर उत्तर देते बोले।"यदि पिता श्री अगर हम यह विवाह के लिए मना कर दे आपको ।" 
बेटा श्री यह निर्णय आप यहां नहीं कर सकते । क्योंकि बिना राजकुमारी नेत्रा से मिले बिना उन्हें देखें आप उनके रिश्ते के लिए मना नहीं कर सकते ।
 अगर उनसे मिलने के बाद भी आपको वह पसंद नहीं आई, तब आप यह रिश्ते के लिए मना कर सकते हैं। 

लेकिन उससे पहले हम आपकी एक बात भी नहीं सुनने वाले । अब आप यहां से जा सकते हैं।" महाराज भविष्यण चंद्र ने कठोरता से राजकुमार को आदेश दिया। 

राजकुमार अक्षतयम अपने पिता श्री की बात सुनकर चुपचाप उनके कक्ष से बाहर चले गए। राजकुमार अक्षतयम चलते चलते सोचने लगे कि अब वह कुछ नहीं कर सकते। उन्हें आपका स्वर्णिम राज्य जाने की तैयारी करनी पड़ेगी। वह चुपचाप अपने कक्ष में चले गए।

( एक दिवस बीत गया )

स्वर्णिम राज्य को रवाना होने के सारी तैयारियां स्वयं महाराज भविष्य चंद्र ने  खुद देखी।" रानी साहिबा  आपकी सभी तैयारियां हो गई ? "राजा साहब ने रानी साहिबा से पूछा ।

 जी! महाराज सभी तैयारियां कुशल मंगल से हो गई है। शगुन की सारी वस्तुएं हमारी सबसे बड़ी नांव में रखवा दी गई है।  रानी अवंतिका ने अपनी बात खत्म कर दी और एक बार अपने राज्य से निकलने से पहले सारी वस्तुएं देखने लगी ।

 क्योंकि उन्हें अपने राज्य से  स्वर्णिम राज्य की ओर जाने वाली नदी से जाना था। राजा भविष्यण चंद्र ने शगुन की सारी वस्तुएं ध्यान से देखी और अन्य तीन नांवो  को स्वयं देखा क्योंकि उनका सफर बेहद ही लंबा था और सब की सुरक्षा देखना उनका दायित्व था। सभी अपनी अपनी नांव में सवार हो गए।

एक नाव में राजा रानी। दूसरे नाव में राजकुमार अक्षतयम और शाही गुरु आचार्य सवार थे। तीसरी नांव में अन्य सेवक सवार थे और एक नांव जो सबसे बड़ी थी जिसमें शगुन सारी वस्तुएं रखी थी और वस्तुओं की सुरक्षा करने के लिए  कुछ सैनिक थे। महाराज ने सभी लोगों से विदा लिया और स्वर्णिम राज की ओर रवाना हो गए ।


स्वर्णिम राज्य में पहुंचने के लिए सभी को चार से पांच दिवस लगने थे। इसलिए सभी सफर का आनंद लेते जा रहे थे। क्योंकि राजा रानी बहुत हंसमुख स्वभाव के थे, 

इसलिए आराम से अपने सफ़र का आनंद ले कर जा रहे थे। वहीं दूसरी ओर राजकुमार अक्षतयम चुपचाप किसी ओर ही सोच में खोए हुए थे।

 वह बस  यही सोच रहें थे कि वह इस रिश्ते को कैसे मना कर। उन्होंने बस यही सोचा कि वह राजकुमारी नेत्रा को देखते ही उन्हें मना कर देंगे और उनसे क्षमा मांग लेंगे। 

बस उन्हें अपनी यही सोच में अडिग रहना था । सभी अपनी नांव में सवार चले जा रहे थे।    
  
              क्या ? राजकुमार अक्षतयम राजकुमारी नेत्रा को विवाह के लिए मना कर पाएंगे। जानने के लिए आगे पढ़ते रहिए "स्वर्णिम राज्य का रहस्य अध्याय 6 ..
 
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