Mr. & Ms. Fake
Episode 35 – Room 17
रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे।
सिंह हाउस के बाहर रिया की कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
सान्वी खिड़की के पीछे खड़ी उसे देख रही थी।
कुछ ही सेकंड बाद आर्यवीर उसके पास आकर खड़ा हो गया।
"चलें?"
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"लेकिन एक बात..."
"क्या?"
"आज कोई हीरो बनने की कोशिश मत करना।"
आर्यवीर ने भौंह उठाई।
"मैं?"
"हाँ, तुम।"
"तुम्हारे साथ रहते-रहते मैं समझ गया हूँ कि मुसीबत जहाँ हो, तुम वहीं पहुँच जाती हो।"
सान्वी ने उसे घूरा।
"बहुत मजाक सूझ रहा है?"
"थोड़ा।"
"तो ठीक है।"
सान्वी ने उसकी जैकेट उठाई और उसकी तरफ फेंक दी।
"ये पहनो।"
आर्यवीर ने जैकेट पकड़ी।
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात हमें जासूसी करनी है।"
आर्यवीर हँस पड़ा।
"तुम्हें देखकर कोई जासूस नहीं, स्कूल की शरारती लड़की लगेगी।"
सान्वी ने आँखें सिकोड़ लीं।
"और तुम?"
"मैं?"
"तुम तो वैसे भी शक्ल से ही खड़ूस लगते हो।"
आर्यवीर ने गंभीर चेहरा बनाया।
"चलो।"
सान्वी मुस्कुराते हुए उसके पीछे चल दी।
रिया का पीछा
आर्यवीर ने अपनी कार कुछ दूरी पर रोक दी।
रिया की कार आगे निकल गई।
सान्वी ने तुरंत कहा—
"वो निकल गई!"
"पता है।"
"तो चलो!"
"अगर हम बहुत पास गए तो उसे शक हो जाएगा।"
सान्वी सीट पर बेचैनी से बैठी थी।
"तुम बहुत धीरे चला रहे हो।"
"जासूसी में धैर्य चाहिए।"
"मेरे पास नहीं है।"
"मुझे पता है।"
कुछ देर बाद सान्वी ने देखा कि रिया की कार एक बड़े होटल के सामने जाकर रुकी।
उसने तुरंत कहा—
"यही है।"
होटल के बाहर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
THE ROYAL HOTEL
आर्यवीर ने कार पार्क की।
दोनों नीचे उतरे।
सान्वी ने धीरे से पूछा—
"हम अंदर कैसे जाएँगे?"
आर्यवीर ने कहा—
"मेरे साथ रहो।"
"तुम्हारा प्लान क्या है?"
"अंदर जाकर पता चलेगा।"
सान्वी ने उसे देखा।
"मतलब तुम्हारे पास कोई प्लान है ही नहीं?"
"बिल्कुल नहीं।"
सान्वी ने माथा पकड़ लिया।
"भगवान..."
आर्यवीर हँस पड़ा।
दोनों अंदर पहुँचे।
रिया रिसेप्शन पर कुछ बात कर रही थी।
फिर वह लिफ्ट की तरफ बढ़ी।
आर्यवीर और सान्वी भी उसके पीछे चले।
लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने ही वाले थे कि सान्वी ने दौड़कर अपना हाथ बीच में कर दिया।
दरवाज़ा खुला।
वह अंदर घुसी।
आर्यवीर पीछे आया।
लिफ्ट में सिर्फ़ चार लोग थे—
रिया।
आर्यवीर।
सान्वी।
और एक बुजुर्ग आदमी।
सान्वी ने अपना चेहरा थोड़ा नीचे कर लिया।
लेकिन अचानक रिया पीछे मुड़ी।
सान्वी ने तुरंत आर्यवीर का हाथ पकड़ लिया और उसके कंधे पर सिर रख दिया।
रिया ने उन्हें देखा।
कुछ पल तक घूरती रही।
फिर लिफ्ट का दरवाज़ा खुला।
रिया बाहर निकल गई।
सान्वी ने राहत की साँस ली।
आर्यवीर ने धीरे से पूछा—
"अब मेरा हाथ छोड़ोगी?"
सान्वी ने नीचे देखा।
वह अभी भी उसका हाथ पकड़े हुए थी।
"ओह..."
उसने तुरंत छोड़ दिया।
आर्यवीर मुस्कुराया।
"तुम्हें डर लग रहा था?"
"नहीं।"
"तो मेरा हाथ क्यों पकड़ा?"
सान्वी ने कहा—
"जासूसी के लिए।"
"अच्छा।"
"हाँ।"
"तो अगली बार भी पकड़ सकती हो।"
सान्वी ने उसे घूरा।
"चुप।"
Room 17
रिया सातवीं मंजिल पर पहुँची।
कॉरिडोर के अंत में एक दरवाज़ा था।
उस पर लिखा था—
17
रिया ने आसपास देखा।
फिर उसने वही छोटी चाबी निकाली।
चाबी ताले में लगी।
क्लिक।
दरवाज़ा खुल गया।
रिया अंदर चली गई।
कुछ सेकंड बाद...
आर्यवीर और सान्वी भी वहाँ पहुँच गए।
सान्वी ने फुसफुसाकर पूछा—
"क्या करें?"
आर्यवीर ने दरवाज़े की तरफ देखा।
"इंतजार।"
"कितनी देर?"
"जब तक वो बाहर न आए।"
"और अगर घंटों लगी?"
"तो—"
सान्वी ने उसकी बात काट दी।
"मैं नहीं बैठने वाली।"
वह दरवाज़े के पास गई।
आर्यवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुको।"
"क्यों?"
"अंदर कोई और हो सकता है।"
सान्वी ने धीरे से कहा—
"तो हम क्या करें?"
आर्यवीर ने आसपास देखा।
कॉरिडोर के दूसरे छोर पर एक छोटा सर्विस रूम था।
"वहाँ से शायद कमरे का दूसरा रास्ता हो।"
सान्वी की आँखें चमक उठीं।
"तुम सच में जासूस हो!"
आर्यवीर मुस्कुराया।
"अब विश्वास हुआ?"
"थोड़ा।"
दोनों सर्विस कॉरिडोर से अंदर पहुँचे।
एक छोटा दरवाज़ा Room 17 की पिछली तरफ खुलता था।
आर्यवीर ने दरवाज़ा थोड़ा खोला।
अंदर रिया किसी आदमी से बात कर रही थी।
सान्वी ने उसे देखा।
"ये कौन है?"
आर्यवीर ने पहचानते ही आँखें सिकोड़ लीं।
"समर का आदमी।"
सान्वी का चेहरा गंभीर हो गया।
रिया कह रही थी—
"मुझे ये फाइल चाहिए।"
वह आदमी बोला—
"फाइल तुम्हें मिल जाएगी।"
"लेकिन बदले में?"
रिया ने कहा—
"मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए।"
"क्या?"
"सान्वी की जिंदगी से आर्यवीर।"
सान्वी का चेहरा उतर गया।
लेकिन आर्यवीर ने उसका हाथ दबा दिया।
उसने इशारे से कहा—
शांत।
अंदर आदमी ने एक काला बैग टेबल पर रखा।
"इसमें वो चीज़ है जिसे तुम ढूँढ़ रही हो।"
रिया ने बैग खोला।
अंदर पुरानी फाइल थी।
रिया ने पहला पन्ना पढ़ा।
उसके चेहरे पर हैरानी आ गई।
"ये..."
आदमी ने कहा—
"हाँ।"
"ये सान्वी के जन्म की असली रिपोर्ट है।"
सान्वी की धड़कन रुक गई।
रिया ने फाइल का पन्ना पलटा।
"लेकिन इसमें पिता का नाम खाली है।"
आदमी मुस्कुराया।
"क्योंकि वो नाम जानबूझकर मिटाया गया था।"
रिया ने पूछा—
"किसने?"
आदमी ने धीरे से कहा—
"अमन ने।"
सान्वी की आँखों से आँसू निकल आए।
"पापा ने?"
आर्यवीर ने उसे शांत रहने का इशारा किया।
अंदर आदमी आगे बोल रहा था—
"अमन जानता था कि अगर असली नाम सामने आया..."
"तो समर उसे और बच्ची दोनों को खत्म कर देगा।"
रिया ने पूछा—
"तो असली पिता कौन है?"
आदमी चुप रहा।
फिर उसने फाइल से एक पुराना कागज़ निकाला।
उस पर सिर्फ़ एक नाम था।
RAJVEER MALHOTRA
रिया स्तब्ध रह गई।
"लेकिन..."
"राजवीर तो समर का बड़ा भाई था।"
आदमी ने कहा—
"था।"
"और उसकी मौत?"
"वो मौत नहीं थी।"
रिया ने उसकी तरफ देखा।
"क्या मतलब?"
आदमी ने धीमे से कहा—
"राजवीर जिंदा है।"
सान्वी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने आर्यवीर की तरफ देखा।
"तो मेरे पिता..."
आर्यवीर ने तुरंत उसके कंधे पकड़ लिए।
"अभी कुछ तय मत करो।"
लेकिन तभी...
पीछे से एक आवाज़ आई—
"तुम दोनों यहाँ क्या कर रहे हो?"
दोनों पलटे।
समर सामने खड़ा था।
उसकी आँखों में गुस्सा था।
रिया भी पीछे मुड़ी और सान्वी को देखकर चौंक गई।
"तुम?"
आर्यवीर सान्वी के सामने आकर खड़ा हो गया।
समर ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा—
"मुझे पता था तुम दोनों यहाँ तक पहुँचोगे।"
आर्यवीर ने पूछा—
"तो ये सब जाल था?"
समर हँसा।
"कुछ हिस्सा।"
"लेकिन एक बात सच है।"
उसने सान्वी की तरफ देखा।
"तुम्हारे पिता के बारे में जो तुम जानती हो..."
"वो पूरा सच नहीं है।"
सान्वी ने काँपती आवाज़ में पूछा—
"राजवीर कौन है?"
समर की मुस्कान गायब हो गई।
कुछ पल बाद उसने कहा—
"तुम्हारा पिता।"
सान्वी की आँखें फैल गईं।
आर्यवीर भी स्तब्ध रह गया।
"क्या?"
समर ने कहा—
"हाँ।"
"राजवीर मल्होत्रा तुम्हारा असली पिता है।"
सान्वी पीछे हट गई।
उसकी आँखों के सामने सब धुंधला होने लगा।
लेकिन तभी...
समर ने एक और बात कही—
"और आर्यवीर के पिता जानते थे कि राजवीर जिंदा है।"
आर्यवीर का चेहरा कठोर हो गया।
"तुम झूठ बोल रहे हो।"
समर ने कहा—
"तो अपने पिता की पुरानी तिजोरी खोल लेना।"
"वहाँ तुम्हें उसका सबूत मिल जाएगा।"
अचानक होटल की लाइट बंद हो गई।
चारों तरफ अंधेरा छा गया।
सान्वी घबरा गई।
"आर्यवीर!"
"मैं यहीं हूँ।"
उसने उसका हाथ पकड़ लिया।
अंधेरे में किसी ने फाइल उठाई।
फिर भागने की आवाज़ आई।
लाइट वापस आई।
समर गायब था।
रिया भी गायब थी।
और टेबल पर सिर्फ़ एक पन्ना पड़ा था।
आर्यवीर ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
"राजवीर मल्होत्रा — Alive."
नीचे एक पता था।
"Old Malhotra Estate."
सान्वी ने काँपते हुए पूछा—
"हम वहाँ जाएँगे?"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"लेकिन इस बार..."
उसने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
"तुम अकेली नहीं जाओगी।"
सान्वी ने उसकी आँखों में देखा।
"अगर वहाँ मेरे पिता हुए तो?"
आर्यवीर ने कहा—
"तो तुम्हें तुम्हारा परिवार मिल जाएगा।"
"और अगर वो नहीं हुए?"
आर्यवीर ने धीरे से कहा—
"तो मैं फिर भी तुम्हारे साथ रहूँगा।"
सान्वी ने उसकी बाँह पकड़ ली।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"तुम जानते हो ना..."
"क्या?"
"मुझे अब तुमसे डर नहीं लगता।"
आर्यवीर मुस्कुराया।
"मुझे भी नहीं।"
सान्वी ने पूछा—
"किससे?"
"तुमसे।"
सान्वी ने उसे घूरा।
"बहुत मजाकिया हो।"
आर्यवीर हँस पड़ा।
लेकिन दोनों के बीच का ये छोटा-सा पल ज्यादा देर नहीं टिक सका।
क्योंकि होटल के बाहर...
एक काली कार में बैठा एक आदमी उन्हें देख रहा था।
उसने फोन लगाया।
"वे निकल चुके हैं।"
दूसरी तरफ से सवाल आया—
"क्या उन्हें राजवीर के बारे में पता चल गया?"
उस आदमी ने कहा—
"हाँ।"
कुछ पल खामोशी रही।
फिर दूसरी तरफ से आवाज़ आई—
"तो अब उसे वापस लाने का समय आ गया है।"
"किसे?"
जवाब आया—
"राजवीर मल्होत्रा को।"
और उसी रात...
शहर से कई किलोमीटर दूर एक सुनसान हवेली में...
एक आदमी ने अपनी आँखें खोलीं।
उसकी मेज पर सान्वी की बचपन की तस्वीर रखी थी।
उसने तस्वीर को हाथ में लिया।
आँखों में आँसू थे।
और उसके होंठों से सिर्फ़ एक शब्द निकला—
"सान्वी..."
क्रमशः...