DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 1 Scene 5.

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 1 Scene 5.

"इस दरगाह में अगरबत्ती जलाकर जो भी मन्नते मानोगी वो पूरी हो जाएगी बेटा। मालूम नही तुम किस वजह से परेशान हो मगर मेरी बात मानकर देखो तुम्हे सुकून मिलेगा।" एक दरगाह में अम्हेल को मज़ार के पास उदास खड़ा देखकर वहां के पीर बाबा ने उसकी तरफ बढ़कर उसे अगरबत्ती थमाते हुए बताया

"मैं ज़रूर करूंगी।" उसे थामकर वो आगे बढ़ गई। पास में खड़ा एक नौजवान काफ़ी देर से अम्हेल की तरफ़ ध्यान दिए खड़ा था, अम्हेल के जाते ही वो पीर बाबा की तरफ बढ़ गया

"बाबा, क्या आप इस लड़की को जानते है?"

"नाजाने कौन है मगर काफ़ी दिन से यहीं है, कुछ देर के लिए जाती है मगर फिर यहीं आ जाती है, मज़ार को पकड़े खड़ी रहती है फिर चली जाती है।"  उसे बताकर बाबा किसी और तरफ चले गए मगर ये नौजवान अम्हेल की तरफ निगाह किए खड़ा रहा और जब वो अगरबत्ती जलाकर बाहर की तरफ़ जाने लगी तो इसने उसकी तरफ़ जाकर उसका हाथ पकड़कर चलते हुए कहा

"मैं चाहता तो नही हूं की मैं तुम्हे अपने साथ लेकर जाऊं लेकिन मैं तुम्हे यहां इस हालात में छोड़ भी नही सकता इसलिए तुम मेरे साथ चलो।" इस नौजवान के साथ जो इसका साथी था, इसे हैरत से देखने लगा। अम्हेल बिना किसी सवाल उसके साथ चली गई।

"कैसा अजीब ख़्वाब था, और... हम बिना किसी सवाल अजनबी के साथ क्यूं जाने लगे, वो था कौन?" घबराकर अम्हेल कि आंख खुल गई जिसमें ख़्वाब से जुड़े कई सवाल नज़र आने लगे, सवालों के जवाबों को तलाश करते हुए उसकी नज़र माहम पर पड़ गई

"जाग गई आपी तुम, डेढ़ घंटे से सो रही हो, अच्छा है जाग गई वरना हम जगा ही देते अब, चाय लाएं है तुम्हारे लिए।" बिस्तर पर प्याली रखते हुए माहम ने चाय की तरफ इशारा किया।

"डेढ़ घंटे से सो रहे हैं हम...?"

"हां, और तुमने फिर से कोई अजीबो ग़रीब ख़्वाब देखा है ना?"

"हां देखा तो, वो बहुत अजीब था, समझ नही आया।"

"इस बार ऐसा क्या देखा?"

"रहने दो, सब धुंधला धुंधला सा याद है इसलिए सही से बता भी नही पाएंगे।" बात को बदलते हुए अम्हेल ने पूछा "कमरा तुमने साफ़ करवाया क्या?"

"सोना से करवाया। अच्छा आपी मुझे बताओ की सुबह क्या हुआ था जिसकी वजह से इतना कुछ हुआ हवेली में?"

"कुछ ख़ास नहीं, हमने उन्हें बताया कि नवाब साहब कितनी ग़ैर मुनासिब क़िस्म की हरकतें करते चले आ रहे थे जिसकी वजह से वो सब हमसे ही नाराज़ हो गए।" अम्हेल का मिज़ाज बदलने के लिए माहम ने बात बदल दिया

"बाहर देखो शाम का मौसम कितना ख़ुबसूरत हो गया है, शायद अब रात तक बारिश आ जाए।"

"बदलते मौसम...?
बदलते मौसम गवाह है कि कहीं ज़ुल्म हो रहा है,
अश्क़ बार हो रहे हैं बादल, उजाला भी रो रहा है।"
अम्हेल किन्ही ख्यालों में उदासी से कमरे के बाहर बादलों को देखने लगी

"अब कौन सा सुख़न याद आ गया तुम्हे और इसका मतलब क्या हुआ?" माहम ने उसका ध्यान भटकाने के लिए पूछा
"आह...मेरी बहन शायरी क्या मतलब समझने के लिए किया जाता है?" अम्हेल ने ख़्याल तोड़कर कहा 

"अच्छा छोड़ो, इसी बात पर चाय खत्म करके बग़ीचे चलो मेरे साथ।" माहम ने बचकाने तरीक़े से कहा

"बग़ीचे!" उसने कुछ सोचते हुए कहा "नहीं तुम जाओ, हम फिलहाल यहीं ठीक है।" उसका चेहरा फिर मुरझा चुका था

"अच्छा फिर ठीक है, कोई बात नही अकेले ही चले जाते है हम। तुम आराम करो।" माहम कमरे से निकलने के लिए उठी तभी बाहर से शोर की आवाज़ आने लगी जो धीरे धीरे तेज़ होती गई, उसने झांककर देखा की भाईजान, अम्मीजान और मिबसाम इधर की तरफ़ ही आ रहे हैं, उसने ये मंज़र अम्हेल को बता दिया

"आपी सबलोग इधर ही आ रहे है।" अम्हेल ने ये सुनते ही घबराकर चाय की प्याली फ़ौरन ही वापस रख दिया की नजाने अब क्या परेशानी आ रही है उसके पास और तब सभी कमरे में पहुंच गए।

"हो गई पूरी तुम्हारी ज़िद, आज के आज अब ये सारे क़िस्से यहीं ख़त्म करूंगा मैं।" कमरे में आते ही वाजदान अम्हेल के बाज़ू को पकड़कर उसे खड़ा करते हुए गुस्से से कहने लगा "तुमने जो चाहा वो कर लिया ना? अब मैं तुम्हे ज़्यादा नही सह सकता। अब मैं करूंगा वो जो चाहूंगा।" 

"बस भाईजान ये क्या तरीक़ा अपना रहे है आप अपनी बहन से बात करने का, छोड़िए उसका हाथ।" मिबसाम ने आगे जाकर उसका हाथ छुड़ाना चाहा

"मैने कह दिया, आज बीच में कोई नही आएगा, इस क़दर रुसवाई दिया है इसने हवेली को, इसलिए मैं अब अपना, अम्मी का और इस हवेली का तमाशा और नही बनने दूंगा, हट जाओ तुम।" निगाहों में अंगारा भरे वजदान दोनों को घूरने लगा

"हट जाओ तुम बीच में से।" अम्मीजान आगे आकर मिबसाम को पीछे करके वाजदान का हाथ पकड़कर उसे शांत करने लगीं "तुम भी छोड़ो उसको, चलो बैठो यहां इतना ग़ुस्सा ठीक नही।" 

"नही अम्मी, क्या आपने नही सुना किस तरह की बातें कहीं उन्होंने, वो कहते है हवेली की ये झूठी शानो शौकत किस काम की जब उसमे तहज़ीब ही ना हो, क्या यहां के नामी ग्रामी लोग ऐसे होते हैं?" उसने नवाब के घर की बात याद करके कहा "आज ये क़िस्सा ख़त्म होगा, या इसे हवेली से हटा दें या मुझे जाने दें।" अम्मीजान से अपना हाथ छुड़ाते हुए वाजदान ने उन्हें अपनी बातों के घेरे में लेलेना चाहा "वरना इसे देख देख कर मैं सुर्ख से स्याह हो जाऊंगा।" वाजदान ने दुबारा अम्हेल को पकड़कर ऐलान किया "आज मेरे फैसले के बीच में कोई नहीं आएगा।"

"ये किस तरह की बातें कर रहे हो तुम, अपने गुस्से को ठंडा करो, तुम दोनों हवेली के दो पहलू हो और उसके चले जाने से क्या रुसवा नहीं होगे तुम?" अम्मीजान ने बात संभालने की कोशिश किया मगर जो बात जानबूझ के बिगाड़ी जा रही हो उसे कौन सही कर सकता था भला।

"रास्तों की कोई कमी नहीं होती। अगर ये नहीं हटी तो मैं क़सम खाता हूं मेरा यहां से कोई वास्ता नहीं होगा, अब फ़ैसला आपको ही करना है।" 

फ़ैसला अम्मीजान के हाथो में सौंपकर वो शांत हो गया। अम्हेल अपनी नज़रों को अपने हाथो की तरफ़ रखकर बदलते हालात में बदलते चेहरों को सोचती रही, रिश्ते, सत्ता, फ़ैसले और रास्ता सोचती रही, वो जानती थी उसका एक लफ़्ज़ कितना बड़ा तूफ़ान ला सकता है लेकिन जिस तूफ़ान को उसने अपनी झुकी नज़रों से रोक रखा था वो वजदान के ज़रिए ज़ोर पकड़ रहा था इसलिए ये डर उसने छोड़ दिया और अब उसने बोलना लाज़मी समझा, उसे मालूम है उसका भाई गुस्से की शिद्दत में कुछ भी कर गुज़रता है तो इस बार भी ऐसा ही होगा, उसने अपनी छोटी भूरी आंखो से वजदान को घूरना शुरू किया, उसमें उसके लिए चिढ़, नाराज़गी, गुस्सा और शायद कुछ वक़्त के लिए नफ़रत भर गई थी, फिर उसने अम्मीजान के चेहरे को देखा जिसपर दोनों बच्चो के लिए डर, बेबसी, परेशानी दिखी। अपने भाई बहन की लाचारी देखा और आख़िरकार वो बोल पड़ी

"ऐसी हवेली जहां ख़ुद के सरपरस्त हिफाज़त न कर सकें, उसके बाद ऐसा सलूख़, इसमें रहने से बेहतर है की हम, हम क्या कोई भी लावारिसो की तरह रहना पसंद कर लेगा।... यक़ीनन ये पहली दफ़ा नहीं हुआ होगा, पर लोग मरते नहीं हैं, वो जीते हैं और जीतते है।" इसके हर एक लफ्ज़ ने वजदान को दहकता शोला बना दिया, जिसकी वजह से उसने अम्हेल को ज़ोर से गाल पर थप्पड़ रख दिया, उसने अपने गाल पर हाथ रखकर अपने भाई को लाल लाल सुखी आंखो से घूरते हुए कहा

"बस इतना ही? क्या आपको लगता है हम नहीं समझते ये क्यों हो रहा है? क्या हमें नहीं समझ आता क्या सियासतें की गई है इस दिन के लिए।" अम्हेल के मुंह से ये निकलना था के मिबसाम उसे हैरत से देखने लगा "हम ख़ामोश रहे क्योंकि हम इसे झुठलाते रहना चाहते थे।...  जा रहे है हम, आपको कहीं जाने की ज़रूरत नही क्योंकि आपका जाना ये हवेली सहन नही कर सकेगी।" तंज करते हुए अम्हेल ने कहा

अम्हेल जिन बातों को ज़प्त करने की कोशिश कर रही थी, जिस तूफ़ान को शांत रखना चाहती थी, जिस ज्वालामुखी को भड़कने नही देना चाहती थी आज वो सभी अपने तेज पर थे, उसने आगे बढ़ने का फैसला ले लिया ये सोचे बिना की अब आगे क्या होगा। उसने अपनी अलमारी में से अपने सारे पैसे लिए, कुछ किताबें लीं और अपनी चादर ओढ़कर बाबाजान की दी हुई चप्पल पहनकर चली गई।

मिबसाम उसके फैसले की वजह समझ गया मगर वो ये न समझ पाया की वो आगे क्या करने वाली है इसलिए मिबसाम ने कमरे से बाहर उसे रोककर पूछ लिया

"तुम हवेली से कैसे जा सकती हो और कहां जाओगी?"

"दुनिया में ज़मीन की कमी नही है, हम वहीं जा रहे हैं जहां हमारा जाना तय था।"

"इतना कहकर बिना अलविदा लिए वो बे लोस हवेली से चली गई और पीछे से उसको मिबसाम की गूंजती हुई आवाज़ सुनाई दी  "अम्मीजान आप चाहती तो ऐसा कभी न होता।" अम्मी जान शांत रहकर कमरे के दरवाजे और वजदान के बीच ख़ामोशी से बैठी रही।