शक्ति ने दूर जाती हुई उस बस की तरफ आख़िरी बार देखा, फिर अलिशा की ओर मुड़ी।
"तुम उस आदमी का पीछा करो। पता करो वो कहाँ जाता है और किससे मिलता है।"
अलिशा ने तुरंत सिर हिलाया।
"जी दीदी।"
अलिशा उसी दिशा में आगे बढ़ गई।
शक्ति की नज़र अब शिवानी पर थी।
उसके मन में कई सवाल उठ रहे थे।
वह शिवानी के साथ चलने लगी!
कुछ देर बाद शक्ति ने सहजता से पूछा—
"वैसे... उस दिन तुम्हारे साथ तो बहुत लोग थे। आज तुम अकेली?"
शिवानी सब्ज़ियाँ देखते हुए बोली—
"हाँ, अक्सर मेरे भाई काम में busy रहते हैं। और आज कामाक्षी के पेट में दर्द था... उसे लड़कियों वाली problem हो गई थी, तो मैंने उसे ज़्यादा force नहीं किया। बस खुद ही आ गई।"
शक्ति ने कुछ नहीं कहा।
वह दूसरी तरफ़ ध्यान से देख रही थी, जैसे आसपास कुछ ढूँढ़ रही हो।
शिवानी अभी भी सब्ज़ियाँ खरीदने में व्यस्त थी।
कुछ पल बाद उसने पूछा— "शिवानी, एक बात बोलूँ?"
"हाँ, बोलिए।"
शक्ति का स्वर गंभीर हो गया।
"समय ठीक नहीं है। इसलिए आगे से अकेली मत आया करो। घर से किसी को साथ लेकर आया करो।"
शिवानी ने नासमझी से उसकी तरफ देखा।
"अरे... सब्ज़ियाँ ही तो लेनी थीं, इसलिए बस चली आई।"
शक्ति ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसके मन का शक कम होने के बजाय और बढ़ गया था।
शिवानी ने सब्ज़ियाँ खरीदीं और फिर सड़क किनारे खड़े होकर घर जाने के लिए auto देखने लगी।
कुछ देर बाद एक auto रुक गया।
शिवानी ने अपना address बताया और फिर शक्ति की तरफ मुड़ी।
"शक्ति, आप भी चलिए ना। मेरी family आपसे मिलकर बहुत खुश होगी।"
शक्ति ने तुरंत मना किया।
"नहीं, तुम चली जाओ। मुझे अभी—"
वह रुक गई उसके दिमाग में अचानक एक बात आई।
अगर उस आदमी का connection सच में इसी इलाके से है...
तो क्या शिवानी भी उसके निशाने पर हो सकती है?
शक्ति ने एक पल के लिए शिवानी को देखा।
फिर बिना ज्यादा कुछ कहे बोली—
"ठीक है। चलती हूँ। तुम्हारे साथ…
शिवानी मुस्कुरा दी।
दोनों auto में बैठ गईं और Auto आगे बढ़ गया।
लेकिन शक्ति की नज़र रास्ते पर ही थी।
उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
क्या वो आदमी सच में भाग रहा था... या उसे किसी और के पीछे भेजा गया था?
जैसे ही auto आगे बढ़ा, शक्ति ने चुपचाप अपने फोन में कुछ type किया और फिर उसने फोन अपनी पैंट की जेब में रख लिया।
वह बाहर देखते हुए शिवानी की बातें ध्यान से सुनने लगी।
शिवानी मुस्कुराते हुए बोली—
"वैसे बनारस में आकर ना, एक अलग ही सुकून मिलता है। मैं हमेशा छुट्टियों में यहीं आती हूँ।"
शक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।
"तो मतलब तुम लोग यहाँ नहीं रहते?"
"अरे नहीं दीदी। बात ये है कि मेरी माँ इसी शहर की हैं। उनकी एक बहुत अच्छी दोस्त भी यहीं की थीं। दोनों का बचपन इसी शहर में बीता था। फिर मेरी माँ की शादी राजस्थान में मेरे पापा से हो गई और उनकी दोस्त की शादी मेरे पापा के best friend से। उन्हीं की बेटी की शादी मेरे भाई से हुई।"
शक्ति उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी और बीच-बीच में हल्का मुस्कुरा भी रही थी।
कुछ पल बाद शक्ति ने धीमे स्वर में कहा—
"चलो, अच्छा है... अक्सर वही दोस्ती बरकरार रहती है जहाँ रिश्तों में कोई मतलब नहीं होता। जहाँ ये नहीं देखा जाता कि तुम मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक outsider हो... बस ये देखा जाता है कि अगर मेरे दोस्त को मेरी ज़रूरत है, तो मुझे उसके पास रहना चाहिए। बाकी दुनिया का क्या है..."
इतना कहते-कहते शक्ति अचानक चुप हो गई।
उसकी नज़र खिड़की के बाहर टिक गई।
चेहरे की मुस्कान गायब हो चुकी थी।
आँखों में हल्की-सी नमी उतर आई थी।
शिवानी उसकी तरफ देख रही थी, लेकिन शक्ति का ध्यान कहीं और था...
जैसे उसकी कही हुई बात सिर्फ़ शिवानी के लिए नहीं, बल्कि उसके अपने अतीत के किसी ऐसे रिश्ते के लिए थी, जिसे वह आज भी अपने भीतर कहीं संभालकर बैठी थी।
तभी अचानक auto रुक गया।
शक्ति ने बाहर देखा। दो लड़के सड़क किनारे खड़े थे। उन्होंने ही auto को रुकने का इशारा किया था।
दोनों बिना एक पल गँवाए auto में चढ़ गए और उनके बैठते ही auto फिर चल पड़ा।
शक्ति को कुछ अजीब लगा।
उसे उन दोनों से डर नहीं लगा, लेकिन शिवानी को लेकर उसकी चिंता जरूर बढ़ गई।
शक्ति ने एक पल के लिए अपना हाथ पेट के पास रखा, फिर तुरंत वापस खींच लिया और सामने देखने लगी।
वही दोनों लड़के आपस में तेज़ आवाज़ में बनारसी लहजे में बात कर रहे थे।
"अरे भाई, काहे फिकर करता है? वो लड़की नहीं तो कोई और सही। लड़कियों की कमी है का हमारे लिए?"
शिवानी ने उनकी बात सुनी तो असहज होकर अपना चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया।
लेकिन शक्ति बिल्कुल शांत बैठी थी।
उसकी नज़र बाहर थी, मगर कान उन दोनों की हर बात पर थे।
वह बिना कुछ कहे उनकी बातें ध्यान से सुन रही थी।
उसे महसूस हो रहा था कि इन दोनों की बातचीत महज़ एक संयोग नहीं थी।
दोनों लड़के अचानक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
उनकी नज़रें बार-बार शक्ति और शिवानी की तरफ उठ रही थीं। शिवानी ने उनकी निगाहों का पीछा किया तो वह असहज हो गई और तुरंत सब्ज़ियों से भरा अपना बैग अपने आगे कर लिया।
उनमें से एक लड़के ने उसे देखकर आँख मारी।
शिवानी ने शक्ति का हाथ जोर से पकड़ा।
कुछ दूर जाने के बाद शिवानी ने बाहर देखा और अचानक बोली—
"भैया, ये रास्ता तो मेरी घर की तरफ नहीं जाता। आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं।”
Auto वाला चुप रहा और गाड़ी आगे बढ़ाता रहा।
शिवानी ने घबराकर फिर कहा—
"भैया, आपको शायद रास्ता नहीं पता है। ये रास्ता यहाँ से मेरे घर की तरफ़ नहीं जाता।"
शक्ति ने तुरंत auto वाले की तरफ देखा।
अब उसकी आँखों में शक साफ़ था।
कुछ पल बाद शक्ति ने सीधे auto वाले से कहा—
"भैया, auto रोकना।"
शिवानी ने एक बार उसकी तरफ देखा।
लेकिन auto वाला ऐसे चुप रहा, जैसे उसने शक्ति की बात सुनी ही न हो।
शक्ति को अब auto वाले पर भी शक होने लगा।
उसने दोबारा कहा—
"मैंने कहा auto रोको।"
कोई जवाब नहीं आया।
शक्ति की आवाज़ इस बार और सख्त हो गई।
"तुम्हें सुनाई नहीं देता? कहा ना, auto रोको!"
तभी पीछे बैठे लड़कों में से एक हँसते हुए बोला—
"का हुआ मैडम? बहुत जल्दी है auto रुकवाने की? थोड़ी देर हमसे भी बतिया लीजिए।"
शक्ति ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब कोई घबराहट नहीं थी।
उसने उसी बनारसी लहजे में बेहद शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा—
"ज़रूर... अब हम तुमहीं से बतियाएँगे।"
उसकी बात सुनकर दोनों लड़कों की हँसी अचानक धीमी पड़ गई।
शिवानी ने हैरानी से शक्ति की तरफ देखा।
उसे घबराहट में कुछ समझ नहीं आ रहा था
अब शक्ति की बात सुनकर दोनों लड़कों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
उनमें से एक ने शिवानी की तरफ देखा और उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
शिवानी थोड़ा घबरा गई। दूसरे लड़के ने शक्ति की ओर देखकर आँख मारी और उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
शक्ति का ध्यान एक पल के लिए अपने सामने बैठे लड़के पर गया। तभी दूसरे लड़के ने शिवानी की बाँह पर हाथ रख दिया। शिवानी ने तुरंत उसका हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन उसने झटके से उसके कुर्ते की बाँह फाड़ दी।
शिवानी की चीख निकल गई। उसकी आवाज़ सुनते ही शक्ति की आँखों में एक पल के लिए गुस्सा तैर गया।
उसने अपने सामने बैठे लड़के का हाथ पकड़कर झटके से पीछे मोड़ दिया। लड़का दर्द से चीख उठा। तभी शक्ति ने दूसरे लड़के का बढ़ा हुआ हाथ पकड़ लिया और उसे एक जोरदार धक्का दिया। उसका संतुलन बिगड़ गया और वह ऑटो चालक के ऊपर जा गिरा।
अचानक हुए इस झटके से ऑटो बेकाबू होकर रुक गया।
शक्ति की आँखों में अब गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
"दुबारा कोशिश मत करना।"
शक्ति और शिवानी ऑटो से नीचे उतर गईं। शक्ति ने उस लड़के को, जिसका हाथ उसने पहले मोड़ा था, कॉलर से पकड़कर नीचे खींचा और ज़मीन पर गिरा दिया।
दूसरा लड़का तुरंत शक्ति की तरफ बढ़ा।
शक्ति ने उसका हाथ भी पकड़ लिया और उसे एक तेज़ झटके से पीछे धकेल दिया।
दोनों लड़के घबरा गए।
शक्ति ने बिना समय गँवाए दोनों को auto से नीचे उतार दिया।
वे सड़क पर गिरकर दर्द से कराहने लगे।
शक्ति ने दोनों लड़कों को घूरते हुए कहा—
"अब बताओ... auto क्यों नहीं रुकवा रहे थे?"
शक्ति ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
शक्ति ने उसे ज़मीन पर गिराते ही एक पल के लिए भी अपनी पकड़ ढीली नहीं की। उसकी आँखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
“एक लड़की को अकेला देखकर तुम्हें लगा कि तुम कुछ भी कर सकते हो?”
लड़का उठने की कोशिश करने लगा, लेकिन शक्ति ने उसे वापस रोक दिया।
दूसरे लड़के ने अचानक अपनी बंदूक निकाली और शक्ति की ओर तान दी।
“हम तुम्हें छोड़ेंगे नहीं। तुम जानती नहीं हो, हम किसके आदमी हैं!”
शक्ति ने गुस्से से उसकी ओर देखा और बिना घबराए अपनी बंदूक निकाल ली।
शिवानी की नज़र जैसे ही शक्ति के हाथ में बंदूक पर पड़ी, वह सहम गई।
शक्ति ने बंदूक उसकी ओर तानते हुए सख्त लहज़े में कहा -
“तुम चाहे किसी के भी आदमी हो… लेकिन आज तुम्हारा सामना शक्ति से हुआ है। और मैं तुम्हें इतनी आसानी से नहीं छोड़ूँगी।”
“सच-सच बताओ… किसने भेजा था तुम्हें?"
ऑटो ड्राइवर ने अचानक शक्ति पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन शक्ति पहले ही सतर्क थी। उसने उसके पैर में अपना पैर अड़ाकर उसे नीचे गिरा दिया।
शक्ति झुककर उसकी कॉलर पकड़ते हुए सख्त लहज़े में बोली—
“मुझे तुम पर पहले ही शक हो गया था। इसलिए मैं जानबूझकर तुम्हारे ऑटो में बैठी थी।”
उसने उसकी कॉलर पर पकड़ और मजबूत कर दी।
“अब इन सवालों के जवाब थाने में देना।”
शक्ति ने उनमें से एक को पैर से जोरदार धक्का दिया। उसकी आँखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
“साला… लड़कियों से बदतमीज़ी करता है? चल, अब मैं बताती हूँ कि इसकी सज़ा क्या होती है।”
तभी वहाँ पुलिस की जीप आकर रुकी। जीप से एसीपी विक्रम और अलीशा तुरंत नीचे उतरे। दोनों ने अपनी बंदूकें संभालीं और तेज़ी से उनकी ओर बढ़े।
जानने के लिए पढ़ते रहिए Shakti Ke Shiv...