प्रतीकोपासना :- इंद्रिय-निरोध से आत्मज्योति तक
भाग २ : भीतर की ओर मुड़ती साधना
प्रतीकोपासना के पहले चरण में साधक अपने ही प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। पहले अपने प्रतिबिंब का दर्शन, फिर आकाश में उसी प्रतीक को देखने का अभ्यास और निरंतर साधना के द्वारा हृदयाकाश में स्वप्रतीक के भान की बात कही गई है। इस प्रकार साधना धीरे-धीरे बाहरी दृश्य से भीतर के अनुभव की ओर बढ़ती है।
अब शिवसंहिता इसी साधना को एक और गहरे स्तर पर ले जाती है। यहाँ साधक को अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर स्थिर करने की एक विशेष योग-विधि बताई जाती है। इसके साथ वायु-निरोध का अभ्यास जुड़ता है और आगे आत्मा के ज्योतिरूप दर्शन की बात सामने आती है।
१. बाहरी प्रतीक से भीतर की साधना
प्रतीकोपासना का प्रारंभ बाहरी प्रतिबिंब से हुआ था, लेकिन साधना का लक्ष्य केवल बाहरी प्रतिबिंब को देखते रहना नहीं है। जब साधक लगातार स्वप्रतीक का अभ्यास करता है, तो उसका ध्यान धीरे-धीरे भीतर की ओर स्थिर होने लगता है।
यहीं से साधना का स्वरूप बदलता है।
अब साधक को केवल किसी दृश्य को देखने पर निर्भर नहीं रहना है, बल्कि अपनी इंद्रियों की गति को रोककर चित्त को भीतर स्थिर करना है। इसके लिए शिवसंहिता एक विशेष प्रक्रिया का वर्णन करती है जिसमें कान, आँखें, नासारंध्र और मुख को बंद करने की बात कही गई है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य साधक को बाहरी इंद्रिय-विषयों से हटाकर अंतर्मुख करना है।
जब आँखें बाहर के दृश्य नहीं देखतीं, कान बाहरी ध्वनियों से हटते हैं, नासिका और मुख की गतिविधि को भी नियंत्रित किया जाता है, तब साधक का ध्यान बाहरी संसार से हटकर भीतर की ओर जाने लगता है।
२. इंद्रियों को बंद करने की विधि
शिवसंहिता इस साधना के लिए शरीर की उंगलियों की एक निश्चित स्थिति बताती है।
दोनों अंगूठों से दोनों कान बंद किए जाते हैं। दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों आँखों को बंद किया जाता है। दोनों मध्यमा उंगलियों से दोनों नासारंध्रों को बंद किया जाता है। इसके बाद अनामिका और कनिष्ठिका उंगलियों से मुख को बंद करने की बात कही गई है।
इस प्रकार साधक अपने शरीर के प्रमुख बाहरी इंद्रिय-द्वारों को बंद करता है।
यहाँ केवल शारीरिक क्रिया ही महत्वपूर्ण नहीं है। इसका संबंध साधना की उस दिशा से है जिसमें चेतना को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर स्थिर किया जाता है।
बाहर की ओर देखने पर आँखों को दृश्य मिलते हैं। बाहर की ओर सुनने पर कानों को ध्वनियाँ मिलती हैं। गंध, स्वाद और अन्य इंद्रिय-विषय भी मन को लगातार अपने-अपने क्षेत्र में ले जाते हैं।
लेकिन जब साधक इन बाहरी मार्गों को रोककर भीतर स्थिर होने का अभ्यास करता है, तो उसका ध्यान बाहरी विषयों से हटने लगता है।
३. वायु का निरोध
इंद्रिय-निरोध के साथ शिवसंहिता मारुत अर्थात् वायु के निरोध की बात करती है।
साधक इस प्रकार इंद्रियों को रोककर वायु का निरोध करता है और इसका बार-बार अभ्यास करता है। यहाँ श्वास और प्राण की गति को नियंत्रित करने का योगिक पक्ष सामने आता है।
इसका उद्देश्य केवल श्वास को रोकना नहीं, बल्कि साधक के चित्त को अधिक स्थिर अवस्था की ओर ले जाना है।
सामान्य अवस्था में शरीर की श्वास चलती रहती है और उसके साथ मन की गतिविधियाँ भी बनी रहती हैं। विचार आते-जाते रहते हैं, ध्यान एक विषय से दूसरे विषय पर जाता रहता है। लेकिन योग-अभ्यास में श्वास और चित्त के संबंध को ध्यान में रखते हुए वायु-निरोध को साधना का एक महत्वपूर्ण अंग बनाया गया है।
इसलिए यहाँ इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
साधक बाहर के द्वारों को रोकता है, वायु को नियंत्रित करता है और चित्त को भीतर की ओर स्थिर करने का अभ्यास करता है।
४. आत्मज्योति का दर्शन
शिवसंहिता इस अभ्यास के बाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभव का वर्णन करती है।
जब योगी इस प्रकार अभ्यास करता है, तब वह अपने आत्मा को ज्योतिरूप में देखने की बात कही गई है।
यहाँ साधना की दिशा और अधिक सूक्ष्म हो जाती है।
पहले साधक ने अपने शरीर के प्रतिबिंब को देखा था।
फिर उसी प्रतीक को आकाश में देखने का अभ्यास किया।
फिर स्वप्रतीक के हृदयाकाश में भान की बात आई।
अब इंद्रियों को रोककर और वायु का निरोध करके साधक को आत्मा के ज्योतिरूप दर्शन की बात बताई जा रही है।
इस प्रकार प्रतीकोपासना का केंद्र धीरे-धीरे बाहरी रूप से हटकर उस आंतरिक ज्योति की ओर जाता है जिसे ग्रंथ आत्मा के रूप में वर्णित करता है।
५. आत्मतेज का अनुभव
अगले श्लोक में शिवसंहिता उस तेज का वर्णन करती है जिसे साधक स्थिर और निराकुल चित्त से देखता है।
यदि वह इस आत्मतेज को क्षणमात्र भी देख लेता है, तो उसे सभी पापों से मुक्त होकर परम गति प्राप्त होने का फल बताया गया है।
यहाँ “क्षणमात्र” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। ग्रंथ अनुभव की अवधि को लंबा नहीं करता, बल्कि उस दर्शन की महत्ता पर बल देता है।
अर्थात् साधना में मुख्य बात केवल लंबे समय तक किसी अनुभव को बनाए रखना नहीं है। यहाँ आत्मतेज के दर्शन को ही अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
इस अवस्था में साधक का चित्त निराकुल होना चाहिए अर्थात् भीतर की अशांति और चंचलता से मुक्त तथा स्थिर।
इसलिए इससे पहले की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य भी स्पष्ट होता है। इंद्रियों को रोकना, वायु को नियंत्रित करना और मन को भीतर स्थिर करना इन सबके द्वारा साधक अपने चित्त को उस स्थिरता के योग्य बनाता है जिसमें आत्मज्योति के दर्शन की बात कही गई है।
६. निरंतर अभ्यास का महत्व
लेकिन शिवसंहिता यहाँ भी केवल एक अनुभव का वर्णन करके रुकती नहीं।
अगले चरण में फिर से निरंतर अभ्यास की बात आती है।
जो योगी लगातार इस अभ्यास में लगा रहता है और जिसका चित्त शुद्ध होता जाता है, वह सभी देहादि को भूलकर आत्मा से अभिन्न होने की अवस्था को प्राप्त करता है।
यहाँ “देहादि को विस्मृत करना” शरीर के अस्तित्व को नकारना नहीं है। साधना के संदर्भ में इसका अर्थ देह को ही अपने अंतिम स्वरूप के रूप में मानने की भावना से ऊपर उठना है।
साधक की पहचान केवल शरीर, इंद्रियों और बाहरी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। उसका चित्त उस आत्मस्वरूप में स्थिर होने की दिशा में बढ़ता है जिसे इस ग्रंथ में पहले आत्मज्योति के रूप में वर्णित किया गया था।
इसीलिए इस चरण का केंद्र दर्शन से अभिन्नता की ओर जाता है।
पहले साधक आत्मज्योति को देखता है।
फिर निरंतर अभ्यास से उसी आत्मस्वरूप में अभिन्न होने की बात कही जाती है।
७. प्रतीकोपासना से आत्मस्वरूप तक
अब यदि इस पूरे चरण को पहले भाग से जोड़कर देखें, तो साधना का क्रम और स्पष्ट हो जाता है।
प्रारंभ में साधक अपने प्रतिबिंब को देखता है।
फिर उस प्रतिबिंब को आकाश में देखने का अभ्यास करता है।
फिर प्रतीक का भान हृदयाकाश में होने लगता है।
अब इंद्रियों को बंद किया जाता है।
वायु का निरोध किया जाता है।
चित्त को भीतर स्थिर किया जाता है।
और फिर आत्मा को ज्योति के रूप में देखने की बात आती है।
इस प्रकार प्रतीक साधना का अंतिम लक्ष्य नहीं है। वह साधक को भीतर की ओर ले जाने वाला आधार है।
बाहरी प्रतिबिंब से आरंभ हुई साधना अब उस आंतरिक ज्योति तक पहुँच रही है जिसे ग्रंथ आत्मस्वरूप से जोड़ता है।
८. प्रतीकोपासना और मुक्ति
शिवसंहिता इस साधना को मुक्ति से भी जोड़ती है।
निरंतर अभ्यास से जब साधक का चित्त भीतर स्थिर होता है और उसे अपने स्वरूप का अनुभव होने लगता है, तब मुक्ति की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
इससे प्रतीकोपासना का महत्व और स्पष्ट होता है।
यदि इसे केवल किसी विशेष दृश्य को देखने की तकनीक मान लिया जाए, तो इस पूरे प्रसंग का आधा अर्थ ही सामने आएगा। वास्तव में ग्रंथ इसे एक ऐसे योग-अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करता है जो क्रमशः साधक को बाहरी अनुभव से भीतर के आत्मानुभव की ओर ले जाता है।
प्रतीक यहाँ एक आधार है।
अभ्यास उस आधार को स्थिर करता है।
इंद्रिय-निरोध साधक को बाहरी विषयों से हटाता है।
वायु-निरोध चित्त को अधिक स्थिर करने में सहायक चरण बनता है।
आत्मज्योति का दर्शन साधना को और सूक्ष्म स्तर पर ले जाता है।
और निरंतर अभ्यास साधक को आत्मस्वरूप की ओर ले जाता है।
९. इस चरण का मूल क्रम
इस पूरे भाग को यदि एक क्रम में रखा जाए, तो साधना इस प्रकार आगे बढ़ती है
इंद्रियों का निरोध → वायु का निरोध → चित्त की स्थिरता → आत्मज्योति का दर्शन → आत्मतेज का अनुभव → निरंतर अभ्यास → देहादि के भाव से ऊपर उठना → आत्मा से अभिन्न होने की अवस्था।
यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है अभ्यास फिर से केंद्र में है।
प्रतीक के दर्शन में अभ्यास आवश्यक था।
हृदयाकाश में उसके भान के लिए अभ्यास आवश्यक था।
अब आत्मज्योति के अनुभव और आत्मस्वरूप में स्थिरता के लिए भी निरंतर अभ्यास आवश्यक है।
अर्थात् शिवसंहिता की इस साधना में अनुभव चाहे जितना महत्वपूर्ण हो, साधना की रीढ़ निरंतर अभ्यास ही है।
१०. अगले चरण की ओर
अब तक प्रतीकोपासना साधक को बाहरी प्रतिबिंब से भीतर की आत्मज्योति तक ले आई है। लेकिन शिवसंहिता में यह यात्रा अभी पूरी नहीं होती।
इसके बाद साधना का एक और सूक्ष्म चरण सामने आता है नाद।
निरंतर अभ्यास से साधक के भीतर नाद उत्पन्न होने की बात कही गई है। इस नाद के भी अलग-अलग स्वरूपों का वर्णन किया गया है भृंग, वेणु, वीणा, घंटानाद और मेघगर्जन के समान ध्वनियाँ।
लेकिन यहाँ नाद को केवल सुनने की बात नहीं है। साधक को अपने चित्त को उस नाद में स्थिर करना है। जब चित्त नाद में रमण करता है, तब बाहरी विषयों का विस्मरण और चित्त के शांत होने की अवस्था बताई जाती है।
इस प्रकार प्रतीकोपासना की यात्रा अब आत्मज्योति से नाद और नाद से लय की ओर बढ़ने वाली है।
अगले भाग में इसी नाद-साधना को विस्तार से समझेंगे नाद का क्रम, उसमें मन को स्थिर करने का अर्थ, चित्त के लय की अवस्था और इसके बाद चिदाकाश में विलय का वर्णन।
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