Beyond Infinity - 6 in Hindi Thriller by Shivam Dalvadi books and stories PDF | अनंत के उस पार - 6

Featured Books
Categories
Share

अनंत के उस पार - 6

कागज़ की उम्र
सुबह की धुंधली रोशनी जब तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर फैली, तब मीरा वहीं बैठी हुई थी।

उसके काँपते हाथों में कागज़ का वह छोटा सा, पीला टुकड़ा अब भी दबा हुआ था। रात की वह नीली रोशनी अब गायब हो चुकी थी, दरवाज़े के नीचे की दरार में अब सिर्फ़ सुबह का स्लेटी अँधेरा भरा हुआ था, और तीसरी मंज़िल की लकड़ी से किसी के चलने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।

सब कुछ इतना शांत था मानो रात को जो कुछ हुआ, वह केवल मीरा के थके हुए दिमाग का एक भयावह सपना था।

लेकिन मीरा के हाथ में मौजूद वह कागज़ का टुकड़ा कोई सपना नहीं था। उस पर नीली स्याही से लिखे दो शब्द "सो जाओ" सुबह के मद्धम उजाले में भी साफ़ चमक रहे थे। स्याही में एक अजीब सी ताज़गी थी, जैसे किसी ने अभी कुछ मिनट पहले ही फ़ाउंटेन पेन की नोक से उन शब्दों को कागज़ पर उकेरा हो।

मीरा धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरी। उसका पूरा शरीर दर्द कर रहा था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे, और गले में एक सूखापन जमा था। उसने कागज़ के उस टुकड़े को सँभालकर अपनी कोट की जेब में रखा, जहाँ आर्यन की डायरी पहले से मौजूद थी।

आज उसे किसी भी हाल में सच के करीब पहुँचना था। अगर नीलगढ़ का पुलिस प्रशासन और यह कस्बा आर्यन की मौत को एक साधारण दुर्घटना मानकर दबाना चाहता था, तो मीरा उन्हें ऐसा नहीं करने देने वाली थी।

सुबह के आठ बज रहे थे जब मीरा शर्मा हवेली से बाहर निकली।

नीलगढ़ का बाज़ार अभी पूरी तरह सोकर नहीं उठा था। सड़कों पर कोहरे की एक मोटी परत बिछी हुई थी, जो दुकानों के टिन के छज्जों से पानी बनकर टपक रही थी। रास्ते में मिले दो-चार स्थानीय दुकानदारों ने मीरा को देखा, लेकिन किसी ने उससे बात करने की हिम्मत नहीं की। उनकी निगाहों में एक अजीब सी दूरी और डर था बिल्कुल वैसा ही डर जैसा लोग किसी ऐसे इंसान को देखकर महसूस करते हैं जो किसी छूत की बीमारी या किसी भयानक श्राप की ज़द में हो।

नीलगढ़ का पुलिस थाना अंग्रेज़ों के ज़माने की एक पुरानी, लाल ईंटों वाली इमारत में स्थित था। इमारत के चारों तरफ़ चीड़ के ऊँचे पेड़ खड़े थे, और उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी।

जब मीरा थाने के अंदर पहुँची, तो वहाँ की हवा में पुरानी फाइलों, गीली खाकी और बीड़ी के धुएँ की महक तैर रही थी।

थानेदार इंस्पेक्टर वीरेंद्र रावत अपने लकड़ी के बड़े दफ़्तर में बैठे हुए थे। उनके सामने मेज़ पर चाय का एक गिलास और कुछ कागज़ात बिखरे हुए थे। पचास के करीब पहुँच रहे रावत का शरीर भारी था, सिर के बाल सफ़ेद हो चुके थे, और उनकी आँखों में हमेशा एक ऐसी थकान तैरती रहती थी जो सालों की बेबसी से पैदा होती है।

जब उन्होंने मीरा को थाने के दरवाज़े पर देखा, तो उनके हाथ में थमा चाय का गिलास एक पल के लिए हवा में थम गया।

"मैडम मीरा?" रावत ने चौंककर कहा। उन्होंने अपनी टोपी मेज़ पर रखी और सीधे होकर बैठ गए। "आप इतनी सुबह यहाँ? आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। आपको अभी घर पर आराम करना चाहिए था।"

"मैं यहाँ आराम करने नहीं आई हूँ, इंस्पेक्टर साहब," मीरा ने सीधी आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में रात भर की थकान के बावजूद एक धार थी। वह बिना पूछे मेज़ के सामने रखी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गई।

रावत ने एक ठंडी साँस भरी। उन्होंने अपने चश्मे को साफ़ किया और मीरा की तरफ़ देखा। "देखिए मैडम, मैं समझ सकता हूँ कि आप किस मानसिक स्थिति से गुज़र रही हैं। आर्यन जी की मौत का दुख..."

"आर्यन की मौत दुर्घटना नहीं थी, इंस्पेक्टर," मीरा ने उनकी बात काटते हुए कहा।

रावत का चेहरा एक पल के लिए सख्त हो गया। उन्होंने अपने आस-पास देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोले, "मैडम, डॉ. सक्सेना की शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आ गई है। उनके फेफड़ों में पानी भले ही कम मिला हो, लेकिन मौत की वजह डूबने से हुई सांस की रुकावट ही बताई गई है। यह एक अभावी दुर्घटना थी। झील का वो कोना बहुत खतरनाक है..."

"और यह?" मीरा ने अपनी जेब से वह पीला कागज़ का टुकड़ा निकाला और रावत की मेज़ पर रख दिया।

रावत ने अविश्वास से उस कागज़ के टुकड़े को देखा। "यह क्या है?"

"यह कागज़ मुझे कल रात मिला," मीरा ने रावत की आँखों में आँखें डालते हुए कहा। "हवेली की तीसरी मंज़िल से। वह मंज़िल जो बीस सालों से बंद है, जिस पर भारी पीतल का ताला लगा है। कल रात उस बंद कमरे में कोई चल रहा था। वहाँ से नीली रोशनी आ रही थी। और जब मैंने दरवाज़ा खटखटाया, तो उस बंद दरवाज़े के नीचे से यह कागज़ बाहर खिसक कर आया।"

रावत ने कुछ पल के लिए मीरा को ऐसे देखा जैसे वह किसी पागलखाने से भागी हुई मरीज़ को देख रहे हों। लेकिन फिर, उनकी नज़र उस कागज़ के टुकड़े पर पड़ी।

रावत ने अनिच्छा से अपना हाथ बढ़ाया और उस कागज़ को उठा लिया।

जैसे ही रावत की उँगलियों ने उस कागज़ को छुआ, उनके चेहरे के भाव बदलने लगे। उन्होंने कागज़ को अपनी आँखों के पास लाकर देखा। फिर उन्होंने अपनी दराज़ से एक आवर्धक लेंस (magnifying glass) निकाला और कागज़ के रेशों का मुआयना करने लगे।

कमरे में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी के टिक-टिक करने की आवाज़ आ रही थी।

रावत के चेहरे से पसीना छूटने लगा था। उनकी आँखें उस कागज़ के टुकड़े पर जम चुकी थीं।

"यह... यह कैसे हो सकता है?" रावत के मुँह से फुसफुसाहट निकली।

"क्या हुआ इंस्पेक्टर?" मीरा ने पूछा।

रावत ने आवर्धक लेंस नीचे रखा और काँपते हाथों से कागज़ को मेज़ पर रख दिया। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

"मैडम..." रावत की आवाज़ में एक अजीब सी थराहट थी। "यह कागज़ साधारण नहीं है। इस कागज़ का जो वॉटरमार्क और इसके रेशे (fibers) हैं... यह उस तरह का कागज़ है जो १९७० और ८० के दशक में सरकारी महकमों में इस्तेमाल होता था। यह कागज़ कम से कम ४० साल पुराना है।"

मीरा की साँस थम गई। ४० साल पुराना?

"और स्याही?" मीरा ने पूछा।

"वही तो सबसे बड़ी पहेली है," रावत ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा। "कागज़ ४० साल पुराना है, लेकिन इस पर जो नीली स्याही से लिखा गया है... उस स्याही का सॉल्वेंट अभी तक पूरी तरह से सूखा भी नहीं है! यह लिखावट मुश्किल से कुछ घंटे पुरानी है! ४० साल पुराने खाली कागज़ पर आज रात ताज़ी स्याही से लिखा गया है... और वह भी एक ऐसे कमरे के अंदर से जो बीस साल से बंद है?"

रावत ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया। वे एक अनुभवी पुलिस अफ़सर थे, उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में सैकड़ों अपराध देखे थे, लेकिन यह बात भौतिक विज्ञान और तर्कशास्त्र के नियमों से परे थी।

"अब आप क्या कहेंगे, इंस्पेक्टर?" मीरा ने मेज़ पर झुकते हुए कहा। "क्या यह भी मेरी मानसिक भ्रांति है? क्या ४० साल पुराना कागज़ अपने आप ताज़ी स्याही से लिखकर बंद दरवाज़े के नीचे से बाहर आ सकता है? आर्यन ने अपनी डायरी में लिखा था कि नीलगढ़ में समय सीधी रेखा में नहीं चलता! यहाँ परतें हैं, इंस्पेक्टर!"

जैसे ही मीरा के मुँह से शब्द 'परतें' निकला, रावत ने झटके से अपना चेहरा ऊपर उठाया। उनकी आँखों में एक भयानक डर और चेतावनी का भाव तैर रहा था।

"खामोश!" रावत अचानक फुसफुसाए। उन्होंने मुड़कर थाने के दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ दो सिपाही बाहर खड़े बीड़ी पी रहे थे। रावत ने अपनी आवाज़ को इतना धीमा कर लिया कि सिर्फ़ मीरा ही सुन सके। "मैडम, इस शब्द का इस्तेमाल दोबारा मत कीजिएगा। कभी नहीं!"

"क्यों?" मीरा ने हार नहीं मानी। "आप डर रहे हैं, इंस्पेक्टर! आप जानते हैं कि नीलगढ़ में कुछ गलत हो रहा है। आप जानते हैं कि आर्यन की मौत कोई दुर्घटना नहीं थी। उसे मारा गया है... या उसे किसी और परत में धकेल दिया गया है!"

"बस कीजिए, मीरा जी!" रावत कुर्सी से खड़े हो गए। उनका चेहरा गुस्से और बेबसी से लाल हो चुका था। "मैं एक पुलिस अफ़सर हूँ! मैं परतों, भूतों और अलौकिक शक्तियों की कहानियों पर केस दर्ज नहीं कर सकता! कानून सबूत माँगता है, और मेरे पास सबूत के नाम पर सिर्फ़ एक डूबने से हुई मौत की रिपोर्ट है!"

"और आपका भाई?" मीरा ने अचानक कहा।

रावत अपनी जगह पर जम गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके खुले ज़ख्म पर तेज़ाब डाल दिया हो।

"अर्जुन..." मीरा ने रावत की आँखों में झाँकते हुए कहा। "२००४ में आपका भाई अर्जुन भी इसी तरह नील झील में डूबा था ना? उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी फेफड़ों में पानी नहीं मिला था! उसके चेहरे पर भी वही अस्वाभाविक मुस्कान थी! क्या आप अपने भाई की मौत को भी एक साधारण दुर्घटना मानते हैं, इंस्पेक्टर?"

रावत के हाथ मेज़ के किनारों पर इतनी कसकर जम गए कि उनकी नसें उभर आई थीं। उनकी आँखों में आँसू छलक आए, लेकिन उन्होंने उन्हें बहने नहीं दिया। उनके सीने से एक भारी, दर्दभरी साँस निकली।

"अर्जुन चला गया, मैडम..." रावत ने टूटी हुई आवाज़ में कहा। "मैंने उसे ढूँढने की बहुत कोशिश की। मैंने इस थाने की हर फाइल खँगाल मारी, मैंने झील का एक-एक कोना छान मारा... लेकिन मुझे क्या मिला? सिर्फ़ सन्नाटा। नीलगढ़ एक ऐसा दलदल है, मीरा जी, जहाँ आप जितना हाथ-पैर मारेंगे, उतना ही गहराई में धँसते चले जाएँगे।"

रावत ने मेज़ से अपनी पुलिस की टोपी उठाई और उसे अपने सिर पर रख लिया। उन्होंने अपनी वर्दी की सिलवटों को ठीक किया, जैसे खुद को एक अफ़सर के ढोल में वापस ढालने की कोशिश कर रहे हों।

"मैं आज शाम तक आर्यन जी की मौत की अंतिम क्लोजर रिपोर्ट (Closure Report) फ़ाइल कर रहा हूँ," रावत ने अपनी आवाज़ को कठोर बनाते हुए कहा, हालाँकि उनकी आँखों का दर्द छुप नहीं पा रहा था। "केस को आधिकारिक रूप से दुर्घटना मानकर बंद किया जा रहा है।"

"आप ऐसा नहीं कर सकते!" मीरा चीखी। "यह अन्याय है!"

"यह अन्याय नहीं है, मैडम... यह इस कस्बे में ज़िंदा रहने का एकमात्र तरीका है," रावत ने मीरा की तरफ़ देखे बिना कहा। वे अपनी मेज़ से हटे और थाने के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगे।

दरवाज़े की चौखट पर पहुँचकर रावत एक पल के लिए रुके। उन्होंने पीछे मुड़कर मीरा को देखा एक अकेली, टूटती हुई औरत जो सच की खातिर पूरी दुनिया से लड़ने के लिए तैयार खड़ी थी।

रावत के चेहरे पर एक गहरा, असीम अफ़सोस छा गया। उन्होंने बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा:

"एक सलाह दे रहा हूँ, मैडम... शर्मा हवेली की चाबियाँ उठाइए और आज ही दिल्ली लौट जाइए। रोहन को फोन कीजिए और यहाँ से निकल जाइए। क्योंकि..."

रावत रुके। बाहर चीड़ के पेड़ों से हवा टकराने की एक खौफ़नाक सरसराहट गूँजी।

"...क्योंकि मैडम, इस कस्बे में कुछ सवाल कभी नहीं पूछने चाहिए। और जो उन सवालों के जवाब ढूँढने निकलता है, यह कस्बा उसका नाम भी अपने इतिहास से मिटा देता है।"

इतना कहकर इंस्पेक्टर रावत थाने से बाहर निकल गए।

मीरा उस खाली दफ़्तर में अकेली खड़ी रही। खिड़की के बाहर, दूर नील झील का पानी उस धुंधले उजाले में एक बार फिर अस्वाभाविक रूप से चमक रहा था।