Storeys - Part 52 in Hindi Motivational Stories by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 52

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मंजिले - भाग 52

समय ----------- मंजिले सगरहे की पुष्ट कहानी एक जबरदस्त उड़ान कभी चलते घोड़े को देखो वो किसी को पीठ पर बैठने नहीं देता.. पता कयो.. चलो बताओ,

नहीं बता सकते, उसकी भी दुलतियां खानी पड़ती है फिर कही जा कर मालिक हो पाते हो उसके। ऐसे ही समय है.... बस फर्क इतना है ये हम पर सवार होता है।

समय दुख देता है आपने किये कर्मो का.. हाथ पीछे परम पिता का होता है... सुख का पता दुख के बाद चलता है। अगर सुख मे रहो... तो सोचोगे.. यार थोड़ी तब्दीली हो... बस वो दुख है। "समय के साथ चलने वाले भी कभी कभी बहुत बुरा गिरते है, सहाब " पूछो कयो, मै से ही सब की पोल खुल जाती है... उसका वर्ण किया ही नहीं... मै हुंकार है। मैंने कमजोर को और गरीब कर दिया...." रिक्शा वाले का पसीना निकाल कर उसका मेहनताना ही मार लिया... " बहुत अमीर होंगे तुम। गरीब को और गरीब कयो कर रहे हो।

                         अमीर कजुस कयो होते है... पता किसी को, तो बताओ भी मुझे। उसके अंदर पुशतेनी लहू है, दादे परदादा का... इस लिये dna मिलता है ब्रादरी से। जो बाप ने किया वही लड़का करेगा... ना करे तो सब उसको और ही नजर से देखे गे।

                     समय बलवान है, समय पर ही सब होता है न पहले न बाद मे। सब्र इस से निकल कर आया है जो सब्र करते है वो मीठा पका हुआ खाते है।

मेरा एक मित्र था। थोड़ा सनकी। उसको जीना आता था... कैसे जिया जाये.. गरीब को दुख नहीं, अमीर की ऐसी तैसी पूरी करता था... इंजिनियर था... जिसको जीना आता था वो छोटी उम्र मे चला गया, जिसको जीना कभी आया ही नहीं वो नबे के हो कर गए। इस मे अंतर है... बताऊ... रु काप जाएगी।

                  परमपिता की कुछ बाते गुप्त होती है, ज़ब हम इसे हर किसे के आगे खोल ते है तो वो उसे उठा लेता है... पूछो कैसे.... जो गरीब को भूखा नहीं देखसकता था, उसको घर बना देता, खाना देता, फिर वो दोस्तों मे अक्सर पी कर जीने का ढंग बताता फिरता.. कहता जैसे सकून इसमें है। परम पिता को ऐसी बाते रास नहीं आती... जिसकी तकदीर मे धक्के हो.. उसे घर मिल जाये... वो तो खुश होगा अगर गुप्त रखे कोई, पर जुबा जुबा पे मनोज मनोज होती थी... अगले तीन सालो मे उसने खूब सकून लिया जो अक्सर मिलता नहीं.... पर एक्सीडेंट मे मारा गया.. गरीब फ़टे हाल बहुत रोये.... पर वो बता गया " परमपिता चुप मे विश्वाश करता है। " ये एक जज्बाती वेदना थी। एक सनाटा एक डोर जैसी टूट गयी हो, गरीब उसे मसीहा मानते थे। बस उनकी बस्ती मे एक बुत लग गया मनोज त्रिपाठी का.... मगर वो होता तो शायद वो "मै" मे चला जाता --- इसमें ये नहीं कि पहले मरना अच्छा है या बाद मे, बात सरल साफ ये है उसकी हर बात चुप मे ही रहने दो... बाकी तो काल चक्र है समय ने सब को बाध रखा है... बस यही पे आ कर आदमी हारा सा महसूस करता है। खत्म तो सब ने होना है नयी जीवन शैली के लिये..... ज़ब आपका एक दाना भी खत्म हो जाता है... तो आप परमपिता के पास होते है... ये समय ही निर्धारत करता है। 🚩।

नीरज शर्मा 

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