राधे राधे! 🦚
"मैं नहीं आई थी तुम्हारी ज़िंदगी में... वो तुम थे जो मेरे पास आए थे! वो तुम थे जिसने मुझे एहसास दिलाया था कि प्यार क्या होता है, और अब... अब मुझसे यूँ मुँह मोड़ रहे हो?"
लड़की की आँखें रोते-रोते सुर्ख लाल हो चुकीं थीं। आवाज़ में इतना दर्द था कि पत्थर भी पिघल जाए। लेकिन सामने खड़े उस शख्स पर जैसे कोई असर ही नहीं हुआ। उसने लड़की की तड़प और उन लाल आँखों को पूरी तरह इग्नोर करते हुए, चीखकर कहा—
"मुझे नहीं पता वो क्या था, क्यों था! कुछ नहीं जानता मैं! बस इतना जानता हूँ कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं। सो जस्ट लीव मी अलोन!"
"नहीं!"
अचानक मेज पर सर रखे सो रही उस लड़की की आँखें खुल गईं। वह झटके से उठकर बैठ गई। उसका पूरा शरीर बुरी तरह काँप रहा था, माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था मानो सीने से बाहर आ जाएगा। उसने बिना वक्त गँवाए काँपते हाथों से मेज पर रखा पानी का गिलास उठाया और गटागट होंठों से लगा लिया।
पानी गले से नीचे उतरा, पर दिल की बेचैनी वहीं की वहीं थी। दिमाग में अभी भी वही खौफनाक सपना घूम रहा था। नहीं, वह सिर्फ एक सपना नहीं था... वह उसकी ज़िंदगी की वो हकीकत थी जिसने उसे अंदर तक तोड़ दिया था।
सामने ही मेज पर हनुमान जी की एक छोटी सी सौम्य प्रतिमा रखी थी। लड़की ने नम आँखों से हाथ जोड़े, अपना सिर उनके चरणों के आगे झुकाया और रुँधे हुए गले से बोली, "हे अंजनी पुत्र... हे कष्टों को हरने वाले देव! मुझे इन सारे ख्यालों, इस ओवरथिंकिंग से दूर कर दो प्रभु। आखिर किस चीज़ की सज़ा दे रहे हो मुझे? तीन साल हो गए हैं... तीन लंबे साल! पर आज भी वो सब सोचकर मेरी रूह काँप जाती है।"
उसके आँसू अब उसकी पलकों की क़ैद तोड़कर बह निकले थे। उसने सिसकते हुए आगे कहा, "सब तो बोलते हैं कि मूव ऑन हो जाएगा... करियर पर फोकस करो, ये करो, वो करो... पर नहीं हो पा रहा है मुझसे! मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही हूँ भगवन... मैं हार रही हूँ।"
इतना बोलते-बोलते वह लड़की फफक-फफक कर रो पड़ी। उसकी आवाज़ में छिपा वो असहनीय दर्द कमरे की दीवारों से टकराकर गूँजने लगा। उस गहरी, शांत रात में उसकी सिसकियों ने जैसे पूरे माहौल को एक अजीब से ग़म में डुबो दिया था। रोते-रोते, अपनी ही बेबसी से लड़ते-लड़ते वह कब दोबारा गहरी नींद के आगोश में चली गई, उसे खुद पता नहीं चला।
ग़ालों पर आँसुओं के सूख चुके निशान वैसे ही पड़े रहे... पर अफ़सोस, उस बंद कमरे में उन निशानों को देखने वाला, उस दर्द को बाँटने वाला वहाँ कोई नहीं था।
अगली सुबह, सूरज की तपती किरणें खिड़की के पर्दों को चीरती हुई कमरे में फैल चुकी थीं। दिन चढ़ आया था, पर वह अब भी बेसुध सी बेड पर सोई हुई थी। रात की थकान और मानसिक तनाव ने जैसे उसकी पूरी ऊर्जा सोख ली थी।
तभी अचानक सन्नाटे को चीरती हुई उसके फोन की रिंगटोन पूरे कमरे में गूँज उठी।
त्रिंग... त्रिंग... त्रिंग...
नींद के भारीपन में उसने करवट बदली और तकिये को कान पर दबा लिया। उसने पहली बार में कॉल पिक नहीं किया, मन ही मन सोचा कि सामने वाला खुद ही थक-हारकर कॉल काट देगा। लेकिन सामने वाला भी कम ज़िद्दी नहीं था। एक बार कटने के बाद, फोन दोबारा ज़ोर-शोर से बजने लगा। फिर तीसरी बार... फिर चौथी बार। लगातार बजती घंटी ने उसके सब्र का बांध तोड़ दिया।
थक-हारकर, बिना स्क्रीन पर नाम देखे, उसने चिढ़ते हुए फोन उठाया और कान से लगाकर भारी आवाज़ में कहा, "हैलो..."
तभी फोन के उस पार से एक बेहद उत्शुक और जानी-पहचानी आवाज़ आई—"अरे यार मृगाक्षी! डोंट टेल मी तू अभी भी सोई है..." फोन की दूसरी तरफ से आई आवाज़ में हैरानी कम और डाँट ज़्यादा थी।
वह लड़की—जिसका नाम मृगाक्षी था—उसने अपनी भारी और नींद से लथपथ आँखों को मलते हुए चिढ़कर कहा, "सुबह-सुबह इंसान सोया ही रहता है चारवी मैडम! कोई गुनाह नहीं कर दिया मैंने।"
कॉल की दूसरी तरफ खड़ी चारवी ने फोन पर ही अपना मुँह बनाते हुए लाड़ से कहा, "बाबू, जल्दी आजा यार! ड्रेसेस रेडी करनी हैं, आज ही एक बहुत बड़ा ऑर्डर आया है। हमारे पास बिलकुल टाइम नहीं है।"
मृगाक्षी ने एक गहरी साँस छोड़ी। काम का नाम सुनते ही उसकी बची-कुची नींद भी हवा हो गई। उसने बेड से पैर नीचे टिकाते हुए कहा, "ओके... अब काम है तो क्या ही बोलूँ मैं। आ रही हूँ आधा घंटे में।"
कॉल डिस्कनेक्ट करके मृगाक्षी ने फोन साइड में रखा और बिस्तर से उठी। रात के उस भयानक सपने का साया सुबह की इस भागदौड़ में थोड़ा धुंधला ज़रूर हुआ था, पर पूरी तरह गायब नहीं। उसने वाशरुम जाकर अपने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे, जिससे उसकी आँखों की सूजन थोड़ी कम हुई।
अलमारी खोलकर उसने ज़्यादा तामझाम वाले कपड़ों के बजाय एक बेहद सिंपल, हल्के बादामी रंग का कॉटन सूट निकाला और पहन लिया। शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपने लंबे, घने बालों को सुलझाया और फुर्ती से उनकी एक ढीली-ढाली चोटी गूँथ ली। बिना किसी मेकअप के, बस उस सादगी में भी उसकी आँखों की गहराई अलग ही बयाँ हो रही थी।
वह सीधे किचन में गई। सुबह की शुरुआत के लिए उसे इस वक्त किसी भारी चीज़ की नहीं, बल्कि एक कड़क कैफीन की ज़रूरत थी। उसने फटाफट अपने लिए एक कप ब कॉफी बनाई। गरमा-गरम कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ शहर अब पूरी तरह जाग चुका था। कॉफी खत्म करते ही उसने अपना हैंडबैग और गाड़ी की चाबी उठाई, और घर को लॉक करके नीचे पार्किंग की तरफ बढ़ गई।
मृगाक्षी ने अपनी कार स्टार्ट की और शहर की जानी-पहचानी सड़कों पर डाल दी। सुबह का ट्रैफिक धीरे-धीरे बढ़ रहा था, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ रास्ते पर था। करीब बीस मिनट की ड्राइव के बाद, उसकी कार एक बेहद खूबसूरत और सलीके से सजे हुए छोटे से बुटीक के सामने जाकर रुकी।
बुटीक के बाहर एक "विंटेज स्टाइल"का बोर्ड लटका था, जिस पर बड़े प्यारे अक्षरों में नाम लिखा था। कार का इंजन बंद करके मृगाक्षी ने एक पल के लिए शीशे में अपना चेहरा देखा, खुद को मानसिक रूप से काम के लिए तैयार किया, और गहरी साँस लेकर गाड़ी का दरवाज़ा खोला। उसे पता था कि बुटीक के अंदर कदम रखते ही उसे अपनी पर्सनल लाइफ के सारे दर्द और उस पुराने अतीत को बाहर ही छोड़ना होगा।
जैसे ही उसने बुटीक का काँच का दरवाज़ा धकेला, अंदर से कपड़ों की नई सिलाई और फैब्रिक की एक जानी-पहचानी खुशबू उसकी नाक से टकराई। वहाँ काउंटर पर ही चारवी कुछ स्कैच और कपड़ों के थान लिए बेहद बेचैनी से उसका इंतज़ार कर रही थी।
जारी है.........