**भाग सोलह: अजनबी राहें और वो अनजान आँखें**वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता, चाहे दिल में कितनी ही गहरी चोट क्यों न लगी हो। देखते ही देखते छह महीने गुज़र चुके थे। इन छह महीनों में मौसम बदले, कॉलेज के सेमेस्टर बदले, और बदल गईं उन दो दिलों की ज़िदंगियां जो कभी एक-दूसरे के बिना सांस लेने से भी डरती थीं। हवेली के उस बंद कमरे का तूफ़ान अब शांत हो चुका था। पल्लवी शारीरिक रूप से बिल्कुल ठीक हो गई थी। उसने कॉलेज जाना फिर से शुरू कर दिया था, वह हंसती थी, दोस्तों से बातें करती थी, लेकिन उस हंसी में कोई जान नहीं थी। उसकी उन बड़ी-बड़ी, खूबसूरत आँखों की वो चमक, जो कभी कबीर को देखते ही दोगुनी हो जाती थी, अब हमेशा के लिए गायब हो चुकी थी। उसकी आँखों में अब सिर्फ एक ठहरा हुआ, गहरा खालीपन था, जैसे किसी ने उसकी रूह को ही अंदर से खामोश कर दिया हो।दूसरी तरफ, कबीर आज भी उसी शिवाजी कॉलोनी के कमरे में रहता था। उसने इन छह महीनों में खुद को काम और पढ़ाई में इस कदर झोंक दिया था कि उसे सांस लेने की भी फुरसत न मिले। उसने पल्लवी के बारे में सोचना छोड़ने का नाटक तो बखूबी सीख लिया था, पर जब भी रात को बारिश होती, उसका हाथ अनजाने में ही अपनी दाईं कलाई को सहलाने लगता था।छह महीने बाद, आख़िरकार वो दिन आया जब इन दोनों की किस्मत एक बार फिर एक-दूसरे के सामने आकर टकराई। शहर के सबसे बड़े 'सिटी ऑडिटोरियम' में इंटर-कॉलेज यूथ फेस्टिवल का आयोजन था। पूरे शहर के बड़े-बड़े कॉलेजों के छात्र वहां जमा थे। चारों तरफ रंग-बिरंगी लाइटें, गूंजता हुआ म्यूज़िक और हज़ारों की भीड़ थी। पल्लवी अपने कॉलेज की तरफ से फ्रंट रो (पहली लाइन) में वीआईपी सीट्स पर बैठी थी। उसने हल्के नीले रंग का एक बेहद खूबसूरत डिज़ाइनर सूट पहना था। बाल सलीके से खुले थे, पर चेहरे पर एक अजीब सी बेरुखी थी। रोहन उसके बिल्कुल बगल में बैठा था और लगातार उसे हंसाने की कोशिश कर रहा था।तभी ऑडिटोरियम के मुख्य दरवाज़े से वॉलंटियर्स की एक टीम अंदर दाखिल हुई, जो स्टेज मैनेजमेंट का काम देख रही थी। उस टीम के सबसे आगे जो शख्स चल रहा था, उसे देखते ही रोहन की बातें बीच में ही रुक गईं। काले रंग की सिंपल टी-शर्ट, मुड़ी हुई आस्तीनें, और वही पुरानी बेपरवाह चाल—वो कबीर था। कबीर स्टेज के पास आकर रुक गया और फाइलों को चेक करने लगा। तभी अचानक, न जाने किस अनजानी कशिश की वजह से, कबीर की निगाहें घूमीं और सीधा सामने वीआईपी रो में बैठी पल्लवी से जा टकराईं।कबीर का दिल एक सेकंड के लिए सीने में ठहर गया। छह महीने बाद वो अपनी 'छोटे दिमाग वाली' को देख रहा था। पल्लवी पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थी, लेकिन कबीर की तेज़ नज़रों ने पल भर में भांप लिया कि पल्लवी की उन आँखों में अब वो पुरानी चमक नहीं थी। वो आँखें बिल्कुल सूनी थीं। कबीर के सीने में एक कचोट उठी। उसने बहुत मुश्किल से अपने चेहरे के भावों को सख्त किया और वहीं खड़ा रहा।तभी पल्लवी की नज़रें भी कबीर पर पड़ीं। पूरे ऑडिटोरियम का शोर पल्लवी के कानों में बिल्कुल बंद हो गया। सामने कबीर खड़ा था... वही कबीर जिसने छह महीने पहले उसके पवित्र प्यार को रईसी का घमंड कहकर पैरों तले कुचल दिया था। पल्लवी के अंदर जज़्बातों का एक भयंकर सैलाब उठा, उसका दिल चाहा कि वो रो पड़े, लेकिन अगले ही पल उसके स्वाभिमान (Self-respect) ने उसके आंसुओं का रास्ता रोक दिया। उसने अपनी मुट्ठियां कसीं, एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर बर्फ जैसी ठंडक ओढ़ ली।कबीर धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ पल्लवी की सीट के बिल्कुल पास आकर खड़ा हो गया। उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं, पर वो अपनी उसी पुरानी, रुखी आवाज़ में बोला, "पल्लवी... कैसी हो?"कबीर की वो भारी आवाज़, जिसने कभी पल्लवी के वजूद में करंट दौड़ा दिया था, आज जब पल्लवी के कानों से टकराई, तो पल्लवी के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई। पल्लवी ने बहुत ही आहिस्ता से अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी सूनी और अजनबी आँखों ने कबीर को ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे सामने कोई बिल्कुल अनजान इंसान खड़ा हो। उसके होंठों पर एक बहुत ही औपचारिक और ठंडी मुस्कान आई।"सॉरी... आप कौन हैं? मैं आपको जानती हूँ क्या?"पल्लवी के मुँह से निकले ये शब्द कबीर के सीने के पार किसी ज़हरीले तीर की तरह निकल गए। कबीर वहीं बुत बन गया। उसे उम्मीद थी कि पल्लवी उसे देखकर गुस्सा करेगी, नफरत दिखाएगी या शायद रोने लगेगी। लेकिन पल्लवी ने तो उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया था। उसने कबीर के अस्तित्व को ही एक पल में मिटा दिया था।"पल्लवी... ये क्या मज़ाक है? मैं कबीर हूँ," कबीर की आवाज़ में पहली बार एक हल्की सी घबराहट और लड़खड़ाहट साफ सुनाई दी।पल्लवी ने अपनी भौहें बहुत ही अजीब अंदाज़ में सिकोड़ीं, जैसे वो सचमुच किसी अजनबी से बात कर रही हो। उसने पास बैठे रोहन की तरफ देखा, "रोहन, ये जेंटलमैन कौन हैं? क्या ये हमारे कॉलेज से हैं? मुझे याद नहीं आ रहा।"रोहन कबीर और पल्लवी के बीच के इस भयंकर तनाव को देख रहा था। वो घबरा गया। "पल्लवी... ये कबीर है... हमारा दोस्त...""ओह, शायद कोई पुराना क्लासमेट रहा होगा," पल्लवी ने रोहन की बात काटते हुए बहुत ही उदासीन लहज़े में कहा। फिर उसने वापस कबीर की तरफ देखा, उसकी आँखों में अब रत्ती भर भी कोई जज़्बात नहीं थे। "आई एम सॉरी मिस्टर कबीर, छह महीने पहले मेरा एक छोटा सा एक्सीडेंट हुआ था, शायद उसके बाद से मैं कुछ फालतू और गैर-ज़रूरी यादें अपने दिमाग में नहीं रखती। अगर आपको कोई काम न हो, तो प्लीज़ मुझे डिस्टर्ब मत कीजिए। मुझे शो देखना है।"इतना कहकर पल्लवी ने अपना रुख स्टेज की तरफ कर लिया, जैसे कबीर वहां खड़ा ही न हो। कबीर वहीं सन्नाटे में खड़ा रह गया। पल्लवी का यह रूप उसने सपने में भी नहीं सोचा था। उसने पल्लवी से कहा था कि वो उसे अपने दिमाग से निकाल दे, और पल्लवी ने वही किया। लेकिन आज जब उसने पल्लवी की आँखों में खुद के लिए वो 'अजनबीपन' देखा, तो कबीर को एहसास हुआ कि दिल टूटने का असली दर्द क्या होता है। कबीर ने जो दर्द छह महीने पहले पल्लवी को दिया था, आज पल्लवी ने बिना एक आंसू बहाए, वही दर्द सूद समेत कबीर को लौटा दिया था। कबीर भारी कदमों से पीछे हटा और उस भीड़ में कहीं खो गया, जबकि पल्लवी की आँखें स्टेज को देख रही थीं, और उनके कोनों से एक अदृश्य आँसू बहने को तड़प रहा था जिसे उसने अपनी पलकों के पीछे ही कैद कर लिया था।