पल्लवी के मुँह से निकली उस कांपती हुई आवाज़—"मेरा हाथ छोड़ दो"—के बाद, सड़क के उस किनारे पर छाई खामोशी कुछ सेकंड और ठहरी। फिर अचानक, ग्रुप के सबसे शरारती लड़के, रोहन ने एक ज़ोरदार नकली खांसी की।"अरे भाई कबीर, क्या बात है! एकदम साउथ की फिल्मों वाले हीरो की तरह एंट्री मारी है तूने आज। बेचारे बाइक वाले की तो रूह ही कांप गई होगी तेरी ये शक्ल देखकर!" रोहन के इतना कहते ही, वहां मौजूद सारे दोस्तों का वो दबा हुआ ठहाका एक साथ फूट पड़ा।उस हंसी ने उस भारी, दमघोंटू और अजीब सी नर्वसनेस को एक झटके में हवा कर दिया। पल्लवी ने तुरंत अपनी कलाई कबीर की पकड़ से आज़ाद कर ली, लेकिन उसकी कलाई पर कबीर की उंगलियों की वो सख्त गर्माहट अब भी एक अदृश्य निशान की तरह छपी हुई थी। पल्लवी का चेहरा अभी भी सुर्ख लाल था, और वह अपनी नज़रों को दोस्तों से बचाते हुए अपने दुपट्टे के किनारे को उंगलियों में लपेटने लगी।दोस्तों की इस हंसी-मज़ाक के बीच कबीर के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया। वह बस हल्का सा मुस्कुराया और वापस कार के बोनट से टिक कर खड़ा हो गया, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो। कुछ देर तक दोस्तों के बीच इधर-उधर की बातें, कॉलेज के किस्से और पुरानी यादों का दौर चलता रहा, लेकिन पल्लवी का दिमाग अब वहां नहीं था। वह शारीरिक रूप से वहां खड़ी ज़रूर थी, पर मानसिक रूप से वह बार-बार उसी एक पल में जा रही थी जब कबीर ने उसे झटके से अपनी तरफ खींचा था।धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा था और आसमान में नारंगी रंग बिखरने लगा था।"चलो भाई लोगों, अब चला जाए। अँधेरा हो रहा है," एक दोस्त ने अपनी बाइक की चाबी उंगली पर घुमाते हुए कहा। "फिर मिलेंगे जल्दी। बाय कबीर, बाय पल्लवी!"एक-एक करके सभी दोस्त एक-दूसरे से गले मिले, हाथ मिलाए और अपनी मंज़िलों की तरफ बढ़ने लगे। अब वहां सिर्फ कबीर, पल्लवी और उसकी वो शानदार सफेद कार ही बची थी।पल्लवी ने कार का दरवाज़ा खोला, लेकिन अंदर बैठने से पहले उसने एक बार मुड़कर कबीर को देखा। कबीर अपनी पुरानी, मटमैले रंग की बुलेट का स्टैंड हटा रहा था।"बाय कबीर..." पल्लवी की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। वह मन ही मन चाहती थी कि कबीर उसे रोके, कोई बात करे, या कम से कम एक बार मुड़कर उसी गहराई से देखे जैसे उसने कुछ देर पहले देखा था।कबीर ने बुलेट को किक मारी। इंजन की एक भारी और दमदार आवाज़ ने सड़क के शोर को चीर दिया। उसने पल्लवी की तरफ देखा, एक बहुत ही साधारण, कैज़ुअल सी मुस्कान दी और अपना सिर हिलाते हुए बोला, "बाय। ध्यान से ड्राइव करना... छोटे दिमाग वाली।"बिना कोई और पल गंवाए, कबीर ने क्लच छोड़ा और उसकी बुलेट ट्रैफिक की उस भीड़ में कहीं खो गई। पल्लवी वहीं खड़ी, तब तक उस लाल टेल-लाइट को देखती रही, जब तक वह पूरी तरह ओझल नहीं हो गई। उसने एक गहरी और ठंडी सांस ली और कार में बैठ गई।कार का एसी पूरी तेज़ी से चल रहा था, लेकिन पल्लवी को अंदर से एक अजीब सी बेचैन करने वाली गर्मी महसूस हो रही थी। उसने स्टीयरिंग व्हील को पकड़ा, लेकिन उसका बायां हाथ बार-बार फिसलकर अपनी उसी दाईं कलाई पर चला जाता, जहाँ कबीर ने उसे जकड़ा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो कबीर का हाथ अभी भी वहीं पर मौजूद है।कुछ देर बाद, पल्लवी की कार शहर के सबसे पॉश इलाके, 'ग्रीन पार्क एस्टेट' के एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुकी। वॉचमैन ने तुरंत गेट खोल दिया। एक शानदार, शाही अंदाज़ वाली हवेली के पोर्टिको में कार रुकी। पल्लवी एक बेहद रईस और बड़े खानदान की इकलौती बेटी थी। घर के अंदर इटैलियन मार्बल का फर्श, छत से लटकते विशाल झूमर और महंगी कलाकृतियां उसकी अथाह दौलत की गवाही दे रहे थे।लेकिन पल्लवी के लिए ये सब महज़ पत्थर और कांच के बेजान टुकड़े थे। वह बिना किसी नौकर से बात किए, सीधे अपने आलीशान कमरे में गई और अपना डिज़ाइनर बैग मखमल के बिस्तर पर फेंक दिया।रात के खाने के समय, डाइनिंग टेबल पर चांदी की कटोरियों में कई तरह के लज़ीज़ पकवान सजे थे। पल्लवी के माता-पिता किसी बिज़नेस डील के बारे में बात करने में व्यस्त थे, लेकिन पल्लवी की नज़रे अपनी प्लेट में रखे खाने पर खालीपन से टिकी थीं। उसके हाथ में कांटा था, जिससे वह बस पास्ता को प्लेट में इधर-उधर घुमा रही थी।"पल्लवी? क्या हुआ बेटा, खाना पसंद नहीं आया?" उसकी माँ ने उसकी खोई हुई स्थिति को देखकर पूछा।"नहीं मॉम... बस भूख नहीं है," पल्लवी ने बहुत धीरे से कहा और अपनी कुर्सी पीछे धकेल कर वापस अपने कमरे में आ गई।वह आईने के सामने खड़ी हुई। उसने अपनी कलाई को अपनी आँखों के सामने उठाया। वहां कोई निशान तो नहीं था, लेकिन वह उस स्पर्श को अपनी रगों में बहते हुए साफ महसूस कर सकती थी। वह जागते, बैठते, पानी पीते, बस कबीर के बारे में ही सोच रही थी। कबीर का वह रफ-टफ अंदाज़, उसकी वह परवाह ना करने वाली आज़ाद फितरत, और मुसीबत के समय उसे बचाने के लिए दिखाई गई वह बिजली जैसी फुर्ती। पल्लवी कबीर के प्यार में पूरी तरह डूब चुकी थी। वह जानती थी कि उसे कबीर की आदत हो गई है, लेकिन वह अपने होठों से कभी यह इज़हार नहीं कर सकती थी। उसे डर था कि अगर उसने अपने दिल की बात कह दी, तो शायद वह उस दोस्ती के हक़ को भी खो देगी जो आज उसके पास है। वह इसी डर और बेशुमार प्यार के बीच उलझी हुई, बिस्तर पर करवटें बदलती रही।दूसरी तरफ, शहर के दूसरे छोर पर 'शिवाजी कॉलोनी' नाम का एक साधारण, लेकिन बहुत ही जीवंत मोहल्ला था। तंग गलियां, बिजली के तारों का जंजाल और घरों से आती छौंक की महक। इन्हीं गलियों को चीरती हुई कबीर की बुलेट एक छोटे, लेकिन साफ-सुथरे घर के सामने आकर रुकी।कबीर ने बुलेट खड़ी की, एक कपड़े से उसकी सीट को साफ किया और घर के अंदर दाखिल हुआ। अंदर एक पुरानी लोहे की अलमारी, एक सूती चादर से ढका तख्त और कोने में खड़खड़ाता हुआ एक कूलर चल रहा था।कबीर ने अपनी शर्ट उतारी और खूंटी पर टांग दी। उसने रसोई में जाकर सीधे स्टील के जग से मुंह लगाकर पानी पिया। पल्लवी की दुनिया के बिल्कुल उलट, कबीर की दुनिया एकदम ज़मीनी और साधारण थी। कबीर का दिल शीशे की तरह साफ था, वह यारों का यार था और हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। लेकिन प्यार, रोमांस और आशिकी जैसे भारी-भरकम शब्द उसकी ज़िंदगी की डिक्शनरी में बहुत पीछे छूट गए थे।वह अच्छी तरह जानता था कि पल्लवी उसे पसंद करती है। पल्लवी की वह 'टुकुर-टुकुर' देखने वाली आदत, उसका छोटी-छोटी बातों पर नर्वस होना, कबीर से कुछ भी छुपा नहीं था। लेकिन कबीर बहुत ही प्रैक्टिकल इंसान था। उसे पता था कि पल्लवी किस दुनिया से आती है और वह खुद किस ज़मीन पर खड़ा है। पल्लवी उसके लिए एक बहुत ही नासमझ, मासूम और प्यारी सी दोस्त थी, जिसकी हिफाज़त करना वह अपनी ज़िम्मेदारी समझता था।कबीर ने अपना फोन उठाया, दोस्तों के ग्रुप में आए दो-चार मीम्स देखे, उन पर हंसा, और फोन को तकिए के नीचे रखकर कूलर की ठंडी हवा के सामने लेट गया। उसे नींद आने में बमुश्किल पांच मिनट लगे। उसके दिमाग में कोई रोमांटिक ख्याली पुलाव नहीं पक रहे थे, ना ही वह पल्लवी की तरह छत को घूरते हुए करवटें बदल रहा था।एक ही शहर, एक ही आसमान, लेकिन दो बिल्कुल अलग दुनिया। एक तरफ पल्लवी की वह आलीशान हवेली थी, जहाँ मखमल के बिस्तर पर लेटी वह लड़की कबीर के ख्यालों में अपनी नींदें उड़ा चुकी थी। और दूसरी तरफ शिवाजी कॉलोनी का वह खड़खड़ाता हुआ कूलर था, जिसकी हवा में कबीर एक गहरी, बेपरवाह और सुकून भरी नींद सो रहा था, इस बात से बिल्कुल अनजान कि कोई अपनी धड़कनों में सिर्फ उसी का नाम जप रहा है।