book name ( वो लड़की जो कभी)chapter 1 in Hindi Motivational Stories by kanta books and stories PDF | वो लड़की जो कभी - Chapter 6-7

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वो लड़की जो कभी - Chapter 6-7

अध्याय 6 — अनजान पाठक का पत्र

बरसात का मौसम था।

खिड़की के शीशे पर गिरती बारिश की बूँदें जैसे कोई धीमा संगीत बजा रही थीं। रुहिका अपनी डायरी के पन्ने पलट रही थी। पिछले कुछ महीनों में उसने कई कहानियाँ लिखी थीं, लेकिन उन्हें दुनिया तक पहुँचाने का साहस अभी भी नहीं जुटा पाई थी।

उसी दोपहर डाकिया घर के बाहर रुका।

"रुहिका बिटिया... तुम्हारे नाम एक पत्र आया है।"

वह चौंक गई।

उसके नाम पत्र?

उसने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया। उस पर भेजने वाले का नाम नहीं था।

धीरे-धीरे उसने पत्र खोला।

अंदर साफ़ और सधे हुए अक्षरों में लिखा था—

«"प्रिय लेखिका,

शायद आप मुझे नहीं जानतीं। मैं भी आपको नहीं जानता। लेकिन पिछले महीने आपकी एक छोटी-सी कहानी स्थानीय पत्रिका में पढ़ी। उस कहानी में आपने लिखा था कि 'उम्मीद कभी शोर नहीं करती, वह चुपचाप दिल में जलती रहती है।'

मैं कई दिनों से अपने जीवन की कठिनाइयों से हार मानने लगा था। आपकी कहानी पढ़कर पहली बार लगा कि शायद मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।

इसलिए धन्यवाद।

लिखना मत छोड़िए।

— आपका एक अनजान पाठक"»

रुहिका ने पत्र कई बार पढ़ा।

उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।

उसे पहली बार समझ आया कि शब्द केवल कागज़ पर नहीं लिखे जाते, वे लोगों के जीवन में भी उतर जाते हैं।

उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—

"आज मुझे मेरी पहली कमाई मिली है। यह पैसे नहीं, किसी के विश्वास का उपहार है।"

उस शाम उसने डूबते सूरज को देखा और मन ही मन मुस्कुराई।

उसे लगा, शायद उसकी मंज़िल प्रसिद्ध होना नहीं है।

शायद उसकी मंज़िल उन दिलों तक पहुँचना है, जो अँधेरे में भी एक छोटी-सी रोशनी तलाश रहे हैं।

उसी रात उसने अपनी अगली कहानी का पहला वाक्य लिखा—

"जब इंसान अपने दर्द को छिपाना छोड़ देता है, तभी उसकी कहानी दूसरों की ताक़त बनती है।"

उसे नहीं पता था कि यही कहानी उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाली है...अध्याय 7 — पहला कदम

रात के ग्यारह बज चुके थे।

पूरा घर गहरी नींद में था। आँगन में रखा मिट्टी का दीपक बुझ चुका था। बस रुहिका के कमरे की खिड़की से आती चाँदनी और मेज़ पर रखी छोटी-सी टेबल लैंप की रोशनी उसके साथ जाग रही थी।

उसने अपनी डायरी बंद की और धीरे से अलमारी से एक पुराना डिब्बा निकाला। उसमें उसकी अब तक की लिखी हुई कहानियाँ रखी थीं—कुछ अधूरी, कुछ पूरी, कुछ आँसुओं से भीगी हुई।

वह हर कहानी को ऐसे छू रही थी जैसे कोई माँ अपने बच्चों का चेहरा सहलाती है।

उसने खुद से पूछा,
"क्या ये कहानियाँ हमेशा इसी डिब्बे में बंद रहेंगी?"

कुछ पल बाद उसने मोबाइल उठाया। बहुत देर तक स्क्रीन को देखती रही। उसके हाथ काँप रहे थे। उसे डर था—अगर लोगों को उसकी बातें पसंद न आईं तो?

लेकिन फिर उसे अपनी माँ की आवाज़ याद आई—

"डर हमेशा दरवाज़े पर खड़ा रहेगा, बेटी। फैसला तुम्हें करना है कि दरवाज़ा खोलना है या नहीं।"

रुहिका ने गहरी साँस ली।

उसने अपनी पहली कहानी टाइप करनी शुरू की।

हर शब्द के साथ उसकी धड़कन तेज़ होती जा रही थी।

आख़िर में उसकी उँगली "प्रकाशित करें" वाले बटन पर आकर रुक गई।

कुछ क्षण...

फिर उसने आँखें बंद कीं और बटन दबा दिया।

स्क्रीन पर एक छोटा-सा संदेश उभरा—

"आपकी कहानी सफलतापूर्वक प्रकाशित हो गई है।"

रुहिका कुछ देर तक मोबाइल को देखती रही। बाहर सब कुछ पहले जैसा ही था—वही रात, वही चाँद, वही हवा।

लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।

उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—

"आज मैंने दुनिया को अपनी कहानी नहीं सुनाई... आज मैंने अपने डर को पहली बार हराया है।"

उसे नहीं पता था कि अगले दिन उसकी कहानी पढ़ने वाला पहला पाठक उसकी ज़िंदगी में एक ऐसी शुरुआत करेगा, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी...