द मिस्टीरियस क्वीन (The Mysterious Queen)
अध्याय 2: राठौर परिवार का छुपा हुआ सच
भाग 1
सुबह के पाँच बजे थे।
नई उम्मीद अनाथ आश्रम के बगीचे में हल्की धुंध फैली हुई थी। बाकी बच्चे अभी सो रहे थे, लेकिन आरुषि हमेशा की तरह जाग चुकी थी।
वह रोज़ की तरह दौड़ लगा रही थी। दौड़ पूरी करने के बाद उसने योग किया, फिर मार्शल आर्ट्स की प्रैक्टिस। आश्रम की दूसरी लड़कियाँ उसे देखकर हैरान होती थीं।
"दीदी, आपको ये सब किसने सिखाया?" एक छोटी बच्ची, परी, ने पूछा।
आरुषि मुस्कुराई।
"ज़िंदगी सबसे बड़ी टीचर होती है, परी।"
लेकिन सच कुछ और था...
हर रात, जब पूरा आश्रम सो जाता था, आरुषि अपने कमरे में छिपाकर रखे लैपटॉप पर घंटों काम करती थी। साइबर सिक्योरिटी, डिजिटल सिस्टम, नई टेक्नोलॉजी, भाषाएँ, मनोविज्ञान—वह लगातार सीखती रहती थी। किसी ने उसे औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया था; उसने अपनी मेहनत से खुद को तैयार किया था।
माधवी माँ दूर खड़ी उसे देख रही थीं।
उन्होंने मन ही मन कहा—
"बेटी... तुम जितना सच के करीब जाओगी, उतना ही खतरा बढ़ेगा।"
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उधर...
राठौर ग्रुप के मुख्यालय की 60वीं मंज़िल पर आरव राठौर मीटिंग रूम में बैठा था।
देश की सबसे बड़ी कंपनियों के अधिकारी उसके सामने बैठे थे, लेकिन कमरे में ऐसी खामोशी थी कि किसी की साँसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
आरव ने बिना किसी की तरफ देखे कहा—
"जिस प्रोजेक्ट की जानकारी लीक हुई है, उसके पीछे कौन है?"
कोई जवाब नहीं आया।
उसने मेज़ पर एक फाइल रखी।
"मेरी कंपनी में गद्दारों के लिए सिर्फ एक मौका होता है।"
अचानक एक कर्मचारी खड़ा हुआ।
"सर... मुझसे गलती हुई है।"
आरव ने सिर्फ एक बार उसकी तरफ देखा।
"गलती और गद्दारी में फर्क होता है।"
उसके बाद उसने अपने सुरक्षा प्रमुख से कहा—
"इन्हें कंपनी से निकाल दो।"
बस इतना ही।
कोई गुस्सा नहीं... कोई चिल्लाना नहीं...
यही वजह थी कि लोग आरव राठौर से डरते थे।
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उसी समय...
आरव का निजी सहायक, कबीर, अंदर आया।
"सर... आरुषि आज शहर के पुराने रिकॉर्ड ऑफिस जाने वाली है।"
आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।
"वह अपने जन्म का रिकॉर्ड ढूँढना चाहती है..."
कबीर ने सिर हिलाया।
"क्या हम उसे रोक दें?"
आरव ने कुछ पल सोचा।
"नहीं... लेकिन उसकी सुरक्षा पर नज़र रखो। उसे पता भी नहीं चलना चाहिए कि कोई उसकी रक्षा कर रहा है।"
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दोपहर...
आरुषि पुराने रिकॉर्ड ऑफिस पहुँची।
सैकड़ों पुरानी फाइलों के बीच वह अपने जन्म से जुड़ा कोई सुराग ढूँढ रही थी।
एक बुज़ुर्ग कर्मचारी ने पूछा—
"बेटी, किसकी फाइल चाहिए?"
"लगभग बीस साल पहले किसी नवजात बच्ची के मिलने का रिकॉर्ड।"
बुज़ुर्ग ने काफी देर तक रिकॉर्ड देखे।
फिर अचानक उनका चेहरा बदल गया।
"अजीब बात है..."
"क्या हुआ?"
"उस साल का पूरा रिकॉर्ड... गायब है।"
आरुषि का दिल धड़क उठा।
"गायब? कैसे?"
"किसी ने कई साल पहले सारी फाइलें निकाल ली थीं।"
तभी पीछे से किसी ने धीरे से कहा—
"क्योंकि कुछ सच कागज़ों पर नहीं रहने दिए जाते।"
आरुषि तुरंत पीछे मुड़ी...
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ एक काला लिफाफा पड़ा था।
उसने उसे खोला।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में एक पाँच साल की बच्ची थी...
और उसके गले में बिल्कुल वैसा ही लॉकेट था जैसा आरुषि के पास था।
तस्वीर के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"राठौर परिवार से सवाल मत पूछो... वहाँ जवाब नहीं, सिर्फ खामोशी मिलती है।"
आरुषि ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।
अब उसे यकीन हो चुका था...
उसका अतीत राठौर परिवार से जुड़ा है।
लेकिन कैसे?
और उसी समय...
शहर के किसी अंधेरे कमरे में एक अनजान व्यक्ति सीसीटीवी स्क्रीन पर आरुषि को देख रहा था।
उसने धीमे से कहा—
"वह सच के बहुत करीब पहुँच गई है... अब खेल शुरू होगा।"
उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।
अध्याय 2 जारी रहेगा...
भाग 2 में: आरुषि पहली बार राठौर मेंशन पहुँचेगी, जहाँ उसकी मुलाकात आरव से दोबारा होगी और एक ऐसा चेहरा सामने आएगा जो उसे देखकर सन्न रह जाएगा।