चाय की एक मशहूर दुकान के सामने, शहर की व्यस्त सड़क पर गाड़ियों का शोर अपने चरम पर था। वहाँ खड़ी एक सफेद सेडान कार के बोनट से पीठ टिकाए कबीर खड़ा था। उसकी सादी सूती शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं। चेहरे पर वही चिर-परिचित शांत और बेपरवाह सा भाव था। उसके आस-पास दोस्तों का पूरा झुंड आबाद था, जो किसी पुरानी बात पर ज़ोरदार ठहाके लगा रहा था।उसी भीड़ के एक कोने में पल्लवी खड़ी थी। हवा की एक लहर उसकी घुंघराली लटों को उड़ाकर उसके चेहरे पर डाल रही थी, लेकिन उसका ध्यान इस ओर बिल्कुल नहीं था। उस पूरे शोरगुल के बीच पल्लवी जैसे एक अलग ही शांत दुनिया में थी।उसकी निगाहें बिना पलक झपकाए सिर्फ कबीर पर टिकी थीं। कबीर जब भी हँसता, पल्लवी की उंगलियां अनजाने में ही अपनी कुर्ती के कोने को मरोड़ने लगतीं। उसे न तो सड़क से गुज़रती गाड़ियों के हॉर्न सुनाई दे रहे थे और न ही दोस्तों का वो शोर। उसका पूरा वजूद सिर्फ कबीर के चेहरे, उसके बात करने के अंदाज़ और उसकी उस साधारण सी मुस्कान पर अटका हुआ था। वह पूरी तरह उसकी शख्सियत में खो चुकी थी।तभी पीछे से एक तेज़ रफ़्तार बाइक अचानक लहराती हुई सड़क के किनारे की तरफ मुड़ी। राइडर का संतुलन बिगड़ चुका था और बाइक सीधे पल्लवी की तरफ बढ़ रही थी। कबीर में पूरी तरह खोए होने के कारण पल्लवी को इस मंडराते खतरे का अंदाज़ा तक नहीं हुआ।तभी कबीर की तेज़ नज़रों ने उस बेकाबू होती बाइक को भांप लिया। अगले ही पल, पलक झपकते ही कबीर ने अपना बायां हाथ आगे बढ़ाया, उसकी मज़बूत उंगलियों ने पल्लवी की कलाई को सख्ती से जकड़ा और एक झटके में उसे अपनी तरफ खींच लिया।पल्लवी का शरीर एक भयंकर शॉक के साथ सीधे कबीर के सीने से आकर टकराया। उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। कबीर की उंगलियों की गर्माहट उसकी कलाई की नसों में फैल रही थी। पल्लवी का दिमाग पूरी तरह सुन्न हो चुका था और उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। शहर का सारा शोर जैसे अचानक म्यूट हो गया और उसे सिर्फ अपने कानों में गूंजती अपनी ही बेकाबू धड़कनें सुनाई देने लगीं। उस शॉक और अचानक हुए इस स्पर्श के कारण उसका गोरा चेहरा पूरी तरह सुर्ख हो गया।दोस्तों का वह ठहाका एक झटके में शांत हो गया और पूरे ग्रुप में एक अजीब सी खामोशी छा गई। सभी की निगाहें अब उन दोनों पर टिकी थीं। कुछ दोस्तों ने शरारत भरी नज़रों से एक-दूसरे को देखते हुए दबी हुई मुस्कान के साथ इशारे किए। इस खामोशी ने पल्लवी की घबराहट को और ज़्यादा बढ़ा दिया।कबीर ने उस बाइक वाले को एक गुस्से भरी निगाह से घूरा और फिर पल्लवी की तरफ देखा। उसने उसकी कलाई को आज़ाद करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। कबीर की आँखों में एक गहरी चिंता साफ दिख रही थी, भले ही चेहरे पर वही पुराना बेपरवाह अंदाज़ था। उसने अपने दाएँ हाथ की उंगली उठाई और पल्लवी के माथे पर बहुत ही हल्के से 'टैप' करते हुए अपनी गहरी आवाज़ में कहा:"अपना ध्यान रखा करो... छोटे दिमाग वाली!"इस हल्के मज़ाक और डांट में छुपा हुआ वह गहरा अहसास सीधे पल्लवी के दिल को छू गया। उसका दिल अंदर तक पिघल उठा। लेकिन आस-पास खड़े दोस्तों की उन शरारती और चिढ़ाने वाली नज़रों के भारी दबाव के बीच, पल्लवी के लिए अब कबीर की आँखों में आँखें डालना मुमकिन नहीं था। उसने तुरंत अपनी नज़रें झुकाकर अपने जूतों पर टिका लीं। चेहरे पर छाई उस गहरी शर्म और बेकाबू नर्वसनेस के बीच, पल्लवी के कांपते हुए होंठों से बहुत ही धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ निकली:"हम्म... मेरा हाथ छोड़ दो अब।"