Room no. 407 - 3 in Hindi Horror Stories by Radha rani Jha books and stories PDF | Room no. 407 - 3

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Room no. 407 - 3

भाग – 3 : "मुझे उसी कमरे में रहना है"
सुबह के आठ बजे थे।
पूरे हॉस्टल में सिर्फ़ एक ही बात हो रही थी—
"नई लड़की के हाथ पर 407 कैसे लिखा आया?"
कोई कह रहा था यह अपशकुन है।
कोई कह रहा था कि अब वह ज़्यादा दिन हॉस्टल में नहीं रहेगी।
लेकिन इन सबसे बिल्कुल अलग...
आरोही अपने बिस्तर पर बैठी मुस्कुरा रही थी।
उसने हथेली पर बने 407 को गौर से देखा और फिर धीरे से अपनी उँगली फेर दी।
"मार्कर भी नहीं है..."
वह बुदबुदाई।
"तो फिर किसी ने लिखा कैसे?"
नैना डरकर बोली,
"तुम... तुम हँस क्यों रही हो?"
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि जितनी डरावनी ये कहानी सुनाई जाती है... उतनी है नहीं।"
"मतलब?"
"मतलब..." उसने पानी की बोतल उठाई, "...या तो कोई हमें बेवकूफ़ बना रहा है... या फिर कोई बहुत बड़ा राज़ छिपा रहा है।"
"और अगर सच में..."
नैना की आवाज़ काँप गई।
"...अगर सच में वहाँ कुछ हुआ तो?"
आरोही ने बिना एक पल सोचे जवाब दिया—
"तो सबसे पहले मैं ही पता लगाऊँगी।"
दोपहर तक हॉस्टल की लगभग हर लड़की आरोही को देखकर फुसफुसा रही थी।
"यही है..."
"इसके हाथ पर नंबर आया था..."
"रात को चौथी मंज़िल चली गई थी..."
आरोही को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।
बल्कि उसे लग रहा था कि जितना लोग डर रहे हैं, उतना ही कोई चाहता है कि सच कभी बाहर न आए।
उसने सबसे पहले हॉस्टल की लाइब्रेरी जाने का फैसला किया।
लाइब्रेरी बहुत पुरानी थी।
लकड़ी की अलमारियाँ, धूल से भरी किताबें और कोने में रखी पुरानी फाइलें...
आरोही वहीं खोजबीन करने लगी।
करीब आधे घंटे बाद उसे एक मोटा-सा रजिस्टर मिला।
उस पर लिखा था—
"Hostel Room Allotment Register – 15 Years Ago."
उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
कमरा 401...
402...
403...
404...
405...
406...
फिर...
407
कमरे के सामने सिर्फ़ तीन नाम लिखे थे।
रिया मल्होत्रा
सान्या मेहरा
नेहा सक्सेना
लेकिन सबसे अजीब बात...
तीनों नामों पर लाल स्याही से एक बड़ा-सा X बना हुआ था।
"ये किसने किया होगा?"
आरोही धीरे से बोली।
तभी...
उसके पीछे किसी ने किताब बंद की।
धप्प!
वह तुरंत पलटी।
लेकिन पीछे कोई नहीं था।
पूरा लाइब्रेरी हॉल खाली था।
शाम को हॉस्टल की वार्डन ने सभी लड़कियों की मीटिंग बुलाई।
"मैं आखिरी बार कह रही हूँ।"
मिसेज़ डिसूज़ा की आवाज़ पहले से ज़्यादा सख्त थी।
"कोई भी चौथी मंज़िल के पास नहीं जाएगा।"
तभी...
आरोही ने हाथ उठा दिया।
"मैम..."
"हाँ?"
"अगर चौथी मंज़िल सिर्फ़ रिनोवेशन में है..."
"तो फिर वहाँ जाने की मनाही क्यों?"
पूरा हॉल उसकी तरफ देखने लगा।
वार्डन कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
"क्योंकि मैंने मना किया है।"
"ये जवाब नहीं है, मैम।"
हॉल में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
वार्डन ने पहली बार गुस्से से कहा—
"आरोही! अपनी हद में रहो।"
आरोही मुस्कुराई।
"सच अक्सर वहीं छिपाया जाता है... जहाँ जाने से सबको रोका जाए।"
इतना कहकर वह अपनी सीट पर बैठ गई।
उस रात...
नैना सो चुकी थी।
लेकिन आरोही जाग रही थी।
उसने अपने बैग से एक छोटा-सा कैमरा, टॉर्च, नोटबुक और मोबाइल निकाला।
"अगर वहाँ सच में कुछ है..."
उसने खुद से कहा,
"...तो आज से हर चीज़ रिकॉर्ड होगी।"
वह डरने नहीं...
सबूत इकट्ठा करने निकली थी।
लेकिन जैसे ही वह कमरे से बाहर निकली...
उसे सामने सफाई करने वाली वही बुज़ुर्ग महिला दिखाई दी।
वह चुपचाप फर्श साफ़ कर रही थी।
आरोही उनके पास गई।
"आंटी... आप इतने सालों से यहाँ हैं ना?"
बुज़ुर्ग महिला ने सिर हिलाया।
"तो आपको रूम 407 के बारे में सब पता होगा।"
महिला ने झाड़ू रोक दी।
कुछ सेकंड तक वह आरोही को देखती रहीं।
फिर धीरे से बोलीं—
"बेटी... अगर सच जानना चाहती हो... तो लोगों की बातें मत सुनो।"
"फिर किसकी सुनूँ?"
महिला की आँखें भर आईं।
उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा—
"उस कमरे की..."
और बिना कुछ बोले वहाँ से चली गईं।
आरोही उन्हें जाते हुए देखती रही।
अब उसे पूरा यकीन हो चुका था।
407 का राज़ किसी भूत से नहीं... इंसानों से जुड़ा है।
उसने उसी रात एक फैसला किया।
एक ऐसा फैसला, जिससे पूरा हॉस्टल उसके खिलाफ़ हो जाता।
वह सबके सामने यह दिखाएगी कि उसके ऊपर किसी आत्मा का असर होने लगा है।
ताकि वार्डन उसे डरकर हॉस्टल से निकालने के बजाय...
उसी कमरे—407—में भेज दें।
क्योंकि उसे यकीन था...
अगर सच कहीं छिपा है...
तो वह उसी कमरे की दीवारों के बीच छिपा है।
आरोही ने चौथी मंज़िल की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कुराई।
"देखते हैं..."
"तुम डराती ज़्यादा हो... या मैं सच ढूँढने में ज़्यादा ज़िद्दी हूँ।"
उसी पल...
चौथी मंज़िल की बंद खिड़की का पर्दा अपने आप थोड़ा-सा हिला।
जबकि बाहर...
हवा बिल्कुल भी नहीं चल रही थी...
क्रमशः...