Part 1
दुनिया में दो तरह की डरावनी कहानियाँ होती हैं।
एक, जिन्हें लोग खुद बना लेते हैं...
और दूसरी, जिनके बारे में लोग इसलिए बात करना छोड़ देते हैं क्योंकि वे सच होती हैं।
आरोही शर्मा ने कभी नहीं सोचा था कि शहर के सबसे पुराने सेंट हेलेना गर्ल्स हॉस्टल में उसका पहला दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन जाएगा।
हॉस्टल शहर से थोड़ा दूर, घने पेड़ों के बीच बना हुआ था। दिन में देखने पर वह एक सामान्य चार मंज़िला इमारत लगता था, लेकिन शाम होते ही उसकी दीवारों पर पड़ती परछाइयाँ उसे किसी वीरान हवेली जैसा बना देती थीं।
ऑटो से उतरकर आरोही ने अपना सामान नीचे रखा और हॉस्टल की तरफ देखा।
तभी उसकी नज़र चौथी मंज़िल की एक खिड़की पर जाकर रुक गई।
बाकी सभी खिड़कियाँ खुली थीं...
सिर्फ़ वही एक खिड़की बंद थी।
उसके मोटे सफ़ेद परदे बिल्कुल भी नहीं हिल रहे थे, जबकि तेज़ हवा चल रही थी।
"नई स्टूडेंट हो?"
पीछे से किसी ने आवाज़ दी।
आरोही ने मुड़कर देखा।
करीब साठ-पैंसठ साल का एक बूढ़ा चौकीदार लोहे के गेट के पास खड़ा था।
उसकी आँखें थकी हुई थीं, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वह बहुत कुछ जानता हो।
"जी।"
चौकीदार ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसने देखा कि आरोही चौथी मंज़िल की तरफ देख रही है, उसकी मुस्कान गायब हो गई।
वह धीरे से बोला—
"ऊपर ज़्यादा मत देखा करो बिटिया..."
आरोही हँस पड़ी।
"क्यों?"
चौकीदार कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
"हर सवाल का जवाब पहले दिन नहीं मिलना चाहिए।"
इतना कहकर वह बिना पीछे देखे चला गया।
आरोही को उसकी बात अजीब तो लगी, लेकिन उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
हॉस्टल के अंदर का माहौल बिल्कुल अलग था।
कहीं लड़कियाँ हँस रही थीं...
कहीं कोई अपने घर वीडियो कॉल कर रही थी...
कहीं नए दोस्त बन रहे थे।
वार्डन मिसेज़ डिसूज़ा ने सभी नई लड़कियों को हॉल में बुलाया।
"कुछ नियम हैं..."
उन्होंने कहा।
"रात नौ बजे के बाद कोई बाहर नहीं जाएगा।
छत पर जाना मना है।
और..."
उन्होंने कुछ पल रुककर सबकी तरफ देखा।
"चौथी मंज़िल पर कोई नहीं जाएगा।"
पूरा हॉल शांत हो गया।
एक लड़की ने हाथ उठाकर पूछा—
"मैम... वहाँ क्या है?"
वार्डन ने बिना भाव बदले जवाब दिया—
"रिनोवेशन चल रहा है।"
बस इतना कहकर उन्होंने बात बदल दी।
लेकिन आरोही ने गौर किया...
हर सीनियर लड़की ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
जैसे सबको सच्चाई पता हो...
पर कोई बोलना नहीं चाहता।
शाम तक आरोही अपने कमरे में आ चुकी थी।
उसकी रूममेट का नाम नैना था।
वह बहुत हँसमुख और बातूनी लड़की थी।
कुछ ही देर में दोनों अच्छी दोस्त बन गईं।
कपड़े अलमारी में रखते हुए आरोही ने मुस्कुराकर पूछा—
"सच-सच बताना...
चौथी मंज़िल वाली कहानी क्या है?"
नैना के चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।
उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
फिर धीमी आवाज़ में बोली—
"तुमने रूम नंबर 407 का नाम सुना है?"
"नहीं..."
"मत सुनना।"
आरोही हँस पड़ी।
"अरे... हर हॉस्टल में ऐसी भूतों वाली कहानी होती है।"
नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"ये कहानी नहीं है।"
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर नैना बोली—
"पंद्रह साल पहले तीन लड़कियाँ उस कमरे में गई थीं..."
"फिर?"
"वापस सिर्फ़ दो लौटी थीं।"
आरोही की हँसी धीरे-धीरे गायब हो गई।
"तीसरी?"
नैना ने सिर झुका लिया।
"आज तक नहीं मिली।"
"शायद भाग गई होगी..."
"पुलिस ने भी यही कहा था..."
नैना ने धीरे से कहा।
"लेकिन..."
वह रुक गई।
"हर साल...
उसी तारीख़ को...
रूम नंबर 407 के बाहर किसी के चलने की आवाज़ सुनाई देती है।"
उसी समय...
ठक... ठक...
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
दोनों डरकर उछल पड़ीं।
दरवाज़ा खोला तो सामने दूसरी लड़की चार्जर माँगने आई थी।
दोनों ने राहत की साँस ली।
लेकिन आरोही ने पहली बार देखा...
नैना के हाथ काँप रहे थे।
उस रात तेज़ बारिश शुरू हो गई।
बिजली कई बार गई और आई।
करीब...
रात के 2 बजकर 17 मिनट।
अचानक आरोही की नींद खुल गई।
किसी सपने से नहीं...
बल्कि...
किसी के चलने की आवाज़ से।
ठक...
ठक...
ठक...
जैसे कोई हॉस्टल के गलियारे में धीरे-धीरे चल रहा हो।
आवाज़ उनके कमरे के बाहर आकर रुक गई।
आरोही ने साँस रोक ली।
कुछ सेकंड तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।
फिर...
टक...
दरवाज़े पर सिर्फ़ एक हल्की-सी दस्तक हुई।
आरोही ने हिम्मत करके दरवाज़े की छोटी-सी झिरी से बाहर देखा।
बाहर...
कोई नहीं था।
उसने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला।
ठंडी हवा का झोंका अंदर आया।
पूरा गलियारा खाली था।
लेकिन...
सीढ़ियों के पास...
गीले पैरों के निशान बने हुए थे।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई बारिश में भीगकर अभी-अभी ऊपर गया हो।
आरोही जाने क्यों उन निशानों के पीछे चल पड़ी।
एक...
दो...
तीन...
सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते वह चौथी मंज़िल तक पहुँच गई।
वहाँ पूरा अँधेरा था।
गलियारे के आखिर में...
एक दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
उस पर धूल जमी थी...
लेकिन नंबर साफ़ दिखाई दे रहा था।
407
तभी...
उस कमरे के अंदर से किसी लड़की की बहुत धीमी आवाज़ आई—
"तुम आ ही गई..."