Raaz - Part 9 in Hindi Horror Stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | Raaz - Part 9

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Raaz - Part 9

सुबह के पाँच बजे थे।

चंदनगढ़ की सुबह बाकी जगहों जैसी नहीं थी। न अज़ान की आवाज़, न मंदिर की घंटियाँ। यहाँ सुबह बिना किसी शोर के धीरे-धीरे उतरती थी, मानो ख़ामोशी को भी जगाने से डरती हो।

अवंतिका पूरी रात नहीं सोई थी।

वह बिस्तर पर बैठी नोटबुक खोले बस एक ही बात सोचती रही—माँ... सुमित्रा शर्मा। 

वही माँ जो हमेशा कहती थीं कि उनका बचपन उत्तर प्रदेश में बीता था। वही माँ जो बचपन में उसे एक अनजानी-सी धुन सुनाकर सुलाती थीं। और वही माँ, जिनकी आँखों में उस दिन एक अजीब-सा डर उतर आया था, जब छोटी-सी अवंतिका ने अपनी बाईं आँख के पास बने तिल के बारे में पूछा था।

उसे वह पल साफ़ याद आया।

"माँ, यह तिल क्यों है मेरी आँख के पास?"

सुमित्रा ने कुछ पल उसे देखा, फिर मुस्कुराकर उसके बाल सहलाए।

"यह तेरी खूबसूरती का निशान है, बेटा।"

उस समय अवंतिका को वह मुस्कान बिल्कुल सामान्य लगी थी। लेकिन आज याद करने पर उसे एहसास हुआ कि उस मुस्कान के पीछे कहीं न कहीं एक अनकहा डर छिपा था।

अब उसे जवाब चाहिए थे।

उसने तुरंत अपने नाना, रामप्रसाद राठौड़, का नंबर मिलाया। सुबह का समय था, इसलिए उम्मीद थी कि वे जाग चुके होंगे।

दो रिंग के बाद कॉल उठ गई।

"हाँ बेटा?" उधर से नाना की आवाज़ आई

"नाना... मैं अवंतिका।"

"अरे बेटा! इतनी सुबह? सब ठीक तो है?"

"हाँ... मैं एक असाइनमेंट के सिलसिले में राजस्थान आई हूँ। अभी चंदनगढ़ में हूँ।"

दूसरी तरफ़ अचानक सन्नाटा छा गया।

"नाना...?"

कुछ पल बाद उनकी धीमी आवाज़ सुनाई दी।

"तू... चंदनगढ़ क्यों गई?"

अवंतिका ने बिना घुमाए सीधा सवाल पूछा।

"माँ यहीं की रहने वाली थीं... है ना?"

कुछ देर ख़ामोशी रही।

आख़िरकार नाना ने भारी साँस लेकर कहा,

"हाँ... तेरी माँ का जन्म यहीं हुआ था।"

अवंतिका का दिल एक पल को जैसे रुक गया।

"फिर उन्होंने मुझसे झूठ क्यों कहा? हमेशा यही कहा कि वह उत्तर प्रदेश से हैं।"

"क्योंकि वह उस जगह से अपना हर रिश्ता तोड़ देना चाहती थीं। उन्होंने बहुत मुश्किल से वह सब पीछे छोड़ा था।""लेकिन क्यों?"

"यह बात फोन पर नहीं हो सकती, बेटा।"

"प्लीज़ नाना..."

इस बार उनकी आवाज़ में घबराहट साफ़ थी।

"अवंतिका, मेरी बात ध्यान से सुन। जितनी जल्दी हो सके वहाँ से निकल जा। तेरी माँ ने जो किया था, वह सिर्फ़ तुझे बचाने के लिए किया था। अगर तू वहीं रुकी रही, तो उनकी सारी कोशिश बेकार हो जाएगी।"

अवंतिका की धड़कन तेज़ हो गई।

"माँ ने क्या किया था?"

कुछ पल चुप रहने के बाद नाना ने धीमे स्वर में कहा,

"उन्होंने... एक वादा किया था।"

"किससे?"

लेकिन इस बार कोई जवाब नहीं आया।

"बस वहाँ से चली जा... यही तेरी माँ की आख़िरी इच्छा थी।"

और कॉल कट गई।

अवंतिका काफी देर तक फोन हाथ में लिए बैठी रही।

एक वादा...

लेकिन किससे?

उसकी नज़र अनायास खिड़की से बाहर चली गई। दूर धुंध के बीच काली कोठी दिखाई दे रही थी। 

सूरज निकलने के बावजूद हवेली के ऊपर वही अजीब-सा साया पसरा हुआ था।

करीब सात बजे तीनों नाश्ते की मेज़ पर मिले। अवंतिका ने पूरी बातचीत उन्हें बता दी।

मेहर कुछ देर सोचती रही।

"अगर तेरी माँ ने सच में किसी से वादा किया था... तो क्या वह श्यामला हो सकती है?"

"या फिर रानी चंद्रावती?" चोटू बोला।

दोनों उसकी तरफ़ देखने लगे।

"अगर तेरी माँ ने कोई वादा किया था और वह पूरा नहीं हुआ, तो हो सकता है श्यामला अब वही वादा तुझसे पूरा करवाना चाहती हो," चोटू ने कहा।

अवंतिका ने गहरी साँस ली।

"यह सिर्फ़ एक संभावना है।"

"लेकिन काफ़ी डरावनी संभावना है।" मेहर बोली।

चोटू ने धीरे से सिर हिलाया।

"और शायद... यही सच भी हो।"

नाश्ते के बाद अवंतिका सीधे वीर की किताबों की दुकान पर पहुँची।

वीर हमेशा की तरह एक पुरानी किताब पढ़ रहा था।

"मुझे आपसे कुछ पूछना है।" अवंतिका ने कहा।

वीर ने किताब बंद कर दी।

"बैठिए।"