सुबह के सात बज रहे थे।
चंदनगढ़ की सुबह दिल्ली जैसी नहीं थी।
दिल्ली की सुबह शोर के साथ जागती है, लेकिन यहाँ सुबह बिना किसी आवाज़ के उतरती थी। इतनी खामोशी थी कि लगता था जैसे पूरा कस्बा अब भी नींद में हो।
अवंतिका की आँख खुली तो कमरे में हल्की-सी धूप परदों से छनकर अंदर आ रही थी।
वह धीरे से उठकर बैठ गई।
अचानक उसे रात की वह आवाज़ याद आई...
"अवंतिका..."
उसने सिर झटक दिया।
"शायद सपना था..." उसने खुद से कहा।
लेकिन एक चीज़ सपना नहीं थी।
वह मैसेज।
उसने तुरंत अपना फोन उठाया और स्क्रीन ऑन की।
मैसेज अब भी वहीं था।
"काली कोठी में मत आना।"
अवंतिका कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रही।
मतलब... यह सब सच था।
कुछ देर बाद वह नीचे नाश्ते के लिए पहुँची।
मेहर पहले से ही टेबल पर बैठी पोहा खा रही थी। चेहरे पर वही हमेशा वाली मुस्कान थी। बाल करीने से बंधे हुए थे और ऐसा लग रहा था जैसे उसे रात भर बहुत अच्छी नींद आई हो।
लेकिन चोटू की हालत बिल्कुल उलटी थी।
उसकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे और वह दोनों हाथों से चाय का कप ऐसे पकड़े बैठा था, जैसे वही उसका आख़िरी सहारा हो।
अवंतिका उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
"क्या हुआ? तू ठीक है?"
चोटू ने बिना कुछ छिपाए जवाब दिया,
"नहीं..."
"क्यों? क्या हुआ?"
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसके चेहरे पर साफ़ डर दिखाई दे रहा था।
"रात को... मेरे कमरे में कोई था।"
मेहर ने खाते-खाते हाथ रोक दिया।
"क्या मतलब?"
चोटू ने एक गहरी साँस ली।
"करीब दो बजे मेरी नींद खुली। पूरे कमरे में अजीब-सी ठंड थी। इतनी ठंड कि मई के महीने में राजस्थान में होना नामुमकिन है। मैंने कंबल भी ओढ़ लिया... लेकिन ठंड कम ही नहीं हुई।"
"फिर?"
"मैंने कमरे के कोने में देखा..."
वह कुछ पल के लिए चुप हो गया।
"...वहाँ कोई खड़ा था।"
टेबल पर एकदम सन्नाटा छा गया।
"कौन?" अवंतिका ने धीरे से पूछा।
"पता नहीं। बस एक परछाई थी। बिल्कुल चुप... हिल भी नहीं रही थी।"
उसकी आवाज़ काँपने लगी।
"मैंने तुरंत हनुमान चालीसा पढ़नी शुरू कर दी... और कुछ देर बाद..."
"और?"
"वह... धीरे-धीरे गायब हो गया।"
कुछ पल तक तीनों में से कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मेहर ने धीरे से कहा,
"हो सकता है तूने नींद में देखा हो।"
चोटू ने तुरंत सिर हिला दिया।
"नहीं। मैं पूरी तरह जाग रहा था। मैंने खुद को चुटकी भी काटी थी।"
उसने अपना गाल दिखाया।
वहाँ सचमुच हल्का-सा लाल निशान बना हुआ था।
अवंतिका ने गौर से वह निशान देखा।
फिर उसने अपना फोन निकाला और दोनों को रात वाला मैसेज दिखा दिया।
चोटू की आँखें फैल गईं।
मेहर ने फोन लेकर पूरा मैसेज पढ़ा, फिर धीरे से फोन वापस रख दिया।
अब उसके चेहरे पर भी मुस्कान नहीं थी।
"तो... बात सच में गंभीर है।"
अवंतिका ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
मेहर कुछ पल सोचती रही।
फिर बोली,
"तो अब क्या करेंगे? वापस दिल्ली चलें?"
अवंतिका कुछ सेकंड चुप रही।
फिर उसने पूरी दृढ़ता से कहा,
"नहीं..."
उसने दोनों की तरफ देखा।
"आज हम काली कोठी जाएँगे।"
चोटू ने दोनों आँखें बंद कर लीं और आसमान की तरफ हाथ जोड़ दिए।
"हे बजरंगबली... अब सब आपके भरोसे।"
काली कोठी कस्बे से लगभग दो किलोमीटर दूर थी।
तीनों पैदल ही वहाँ की ओर चल पड़े।
रास्ता पूरी तरह कच्चा था। कहीं रेत, कहीं छोटे-बड़े पत्थर। दोनों तरफ सूखे पेड़ खड़े थे, जिनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ किसी मरे हुए हाथ की तरह आसमान की ओर फैली हुई थीं।
हवा बिल्कुल नहीं चल रही थी।
धूप तेज़ थी, लेकिन उसमें गर्माहट नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सिर्फ़ शरीर को जला रही हो।
चोटू ने एक हाथ में कैमरा पकड़ रखा था और दूसरे हाथ में हनुमान चालीसा।
घर से निकलते समय ही उसने ऐलान कर दिया था,
"यह मेरे हाथ से पूरे रास्ते नहीं छूटेगी।"
इस बार किसी ने उससे बहस नहीं की।
रास्ते में उन्हें एक भी इंसान दिखाई नहीं दिया।
अवंतिका को बार-बार ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे कोई उनके पीछे-पीछे चल रहा हो।
वह कई बार पलटकर देखती...
लेकिन हर बार पीछे सिर्फ़ सुनसान रास्ता और सूखे पेड़ ही दिखाई देते।
तभी मेहर अचानक रुक गई।
"अवंतिका... ज़रा इन पेड़ों को देख।"
अवंतिका ने ध्यान से देखा।
राजस्थान में सूखे पेड़ होना कोई नई बात नहीं थी, लेकिन इन पेड़ों में कुछ अजीब था।
हर पेड़ की शाखाएँ एक ही दिशा में झुकी हुई थीं...
सीधे काली कोठी की तरफ।
जैसे कोई अदृश्य ताकत उन्हें अपनी ओर खींच रही हो।
"शायद हवा की वजह से..." अवंतिका ने कहा।
चोटू ने तुरंत जवाब दिया,
"लेकिन हवा तो चल ही नहीं रही।"
अवंतिका ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
वह सही कह रहा था।
आसपास एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था।
फिर ये शाखाएँ एक ही दिशा में कैसे झुकी थीं?
कुछ देर बाद काली कोठी सामने दिखाई देने लगी।
तीनों के कदम अपने-आप रुक गए।
फोटो में हवेली डरावनी लग रही थी...
लेकिन सामने से वह उससे कहीं ज़्यादा भयावह थी।
काले पत्थरों से बनी वह विशाल हवेली समय के साथ और भी डरावनी हो चुकी थी। दीवारों पर काई जमी थी, ऊँची-ऊँची दीवारें आसमान को छूती हुई लग रही थीं। तीन मंज़िलों में फैली हवेली की हर खिड़की बंद थी।
सामने लोहे का विशाल दरवाज़ा था, जिस पर मोटी जंग जम चुकी थी।
हवेली के चारों ओर फैली ज़मीन भी अजीब थी।
न वहाँ घास उगी थी...
न रेत थी...
बस काली, सूखी मिट्टी।
मेहर ने धीमे से कहा,
"यहाँ कुछ भी नहीं उगता क्या?"
अवंतिका ने चारों तरफ देखते हुए जवाब दिया,
"लगता तो ऐसा ही है..."
"लेकिन क्यों?"
इस सवाल का जवाब तीनों में से किसी के पास नहीं था।
चोटू ने कैमरा उठाया।
"मैं यहीं से फोटो ले लेता हूँ... अंदर जाने का मेरा बिल्कुल मन नहीं है।"
अवंतिका उसकी तरफ मुड़ी।
"पहले अंदर देखते हैं।"
"दीदी..."
"चल।"
चोटू ने भगवान का नाम लिया और मजबूरी में उनके पीछे चल पड़ा।
लोहे का दरवाज़ा बंद था...
लेकिन उस पर ताला नहीं लगा था।
अवंतिका ने धीरे से हाथ रखा।
दरवाज़ा बर्फ़ की तरह ठंडा था।
मई की तपती गर्मी में इतना ठंडा लोहा...
यह बिल्कुल सामान्य नहीं था।
उसने धीरे से धक्का दिया।
क्रीईईक...
भारी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुल गया।
उसकी गूँज पूरे मैदान में फैल गई।
तीनों कुछ पल वहीं खड़े रह गए।
अंदर घना अँधेरा था।
बाहर की धूप जैसे हवेली की चौखट पार ही नहीं कर पा रही थी।
अवंतिका ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
सफेद रोशनी धीरे-धीरे सामने फैली।
अंदर एक बड़ा-सा आँगन था।
पत्थर का टूटा हुआ फर्श...
जगह-जगह जाले...
और दीवारों पर बनी पुरानी पेंटिंग्स।
सभी पेंटिंग्स में औरतें थीं।
अलग-अलग कपड़े...
अलग-अलग मुद्राएँ...
लेकिन एक बात सबमें एक जैसी थी।
किसी का भी चेहरा नहीं था।
जहाँ चेहरा होना चाहिए था...
वहाँ सिर्फ़ खुरचे हुए निशान थे।
अवंतिका पास जाकर झुकी।
"किसी ने जानबूझकर इनके चेहरे मिटाए हैं... देखो, खरोंच के निशान अभी भी साफ़ दिखाई दे रहे हैं।"
मेहर ने हैरानी से पूछा,
"लेकिन ऐसा किसने किया होगा?"
अवंतिका ने धीमे स्वर में कहा,
"और सबसे बड़ा सवाल... क्यों?"
तीनों धीरे-धीरे आगे बढ़े।
अंदर तीन रास्ते थे।
एक बाईं तरफ...
एक दाईं तरफ...
और एक बिल्कुल सामने।
"कोई भी अलग नहीं होगा।" अवंतिका ने साफ़ शब्दों में कहा।
चोटू ने तुरंत सिर हिलाया।
"बिल्कुल नहीं।"
वे सीधे वाले रास्ते पर बढ़ गए।
सामने एक बड़ा हॉल था।
पुरानी कुर्सियाँ...
एक भारी लकड़ी की मेज़...
दीवार पर टंगा विशाल आईना...
हर चीज़ पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।
लेकिन तभी अवंतिका की नज़र मेज़ पर गई।
वह बिल्कुल साफ़ थी।
जैसे अभी-अभी किसी ने उसे कपड़े से पोंछा हो।
अवंतिका ने हाथ रखकर देखा।
सचमुच...
धूल का एक कण भी नहीं था।
मेहर हैरानी से बोली,
"अगर यहाँ कोई नहीं आता... तो यह मेज़ साफ़ कैसे है?"
अवंतिका कुछ बोल ही रही थी कि अचानक उसका पैर किसी चीज़ से टकराया।
उसने टॉर्च नीचे की।
धूल पर छोटे-छोटे नंगे पैरों के निशान बने हुए थे।
और सबसे अजीब बात...
वे बिल्कुल ताज़ा लग रहे थे।
अवंतिका घुटनों के बल बैठ गई।
"ये निशान पुराने नहीं हैं... अभी-अभी बने हैं।"
मेहर की आवाज़ काँप गई।
"मतलब... यहाँ कोई है?"
अवंतिका ने टॉर्च की रोशनी उन निशानों पर डाली।
वे बाईं तरफ वाले अँधेरे रास्ते की ओर जा रहे थे।
"उधर..."
वह धीरे से बोली।
"नहीं।"
चोटू लगभग चिल्ला पड़ा।
"दीदी... प्लीज़ उधर मत जाइए।"
"क्यों?"
"इन निशानों को ध्यान से देखिए..."
अवंतिका ने फिर गौर से देखा।
और तभी उसकी साँस अटक गई।
वे साधारण पैरों के निशान नहीं थे।
हर दो निशानों के बीच का फासला असामान्य रूप से ज़्यादा था।
ऐसा लग रहा था...
जैसे कोई चल नहीं रहा था...
बल्कि ज़मीन से थोड़ा ऊपर तैरते हुए आगे बढ़ रहा हो।
तीनों की नज़र उसी अँधेरे रास्ते पर टिक गई।
और तभी...
अंदर से एक धीमी-सी आवाज़ सुनाई दी।
एक औरत...
जो बहुत धीमे स्वर में कुछ गुनगुना रही थी।