a gift for teej in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | तीज का सिंधारा

Featured Books
Categories
Share

तीज का सिंधारा

आज तनु अपनी दोस्त प्रीति से मिलने उसके घर गई थी। बहुत दिनों बाद दोनों दोस्त मिलीं थीं। एक दूसरे को देख दोनों खुशी से चहकते हुए गले मिली। प्रीति अपना घर दिखाने लगी तनु को। अपने बेडरूम में पहुंचकर प्रीति अपना सामान दिखाने लगी जो उसके मायके से आया था हरियाली तीज पर। कही कहीं इस भेंट उपहार को सिंधारा भी कहते हैं। तनु को सब बहुत बढ़िया लगा। थोड़ी देर बाद तनु अपने घर लौट आई।
शाम का समय था। पक्षी अपने घर लौट रहे। आकाश में काले बादल छाए हुए थे। लेकिन बरस नहीं रहे थे। जैसी उमस भरी थी बाहर वातावरण में वैसी ही उमस भरी बेचैनी तनु के मन में हो रही थी। खिड़की के पर्दे खोल वो अपनी डायरी पेन उठा लिखने लगी अपना दर्द पन्नों पर।

कोई मुझे लालची समझे या स्वार्थी, पर अपेक्षा हो ही जाती है, एक उम्मीद होती है अपनों से। मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है, भगवान का दिया सबकुछ है पर कभी-कभी मन करता है मेरे पापा मुझे कुछ दें, मुझे अपनेपन का एहसास कराएं। आज फेसबुक पर अपने चचेरे भाई-भाभी की फोटो देखी, कैप्शन में नीचे लिखा था - 'बुआ के घर सिंधारा लेकर जा रहे हैं'। दिल में एक टीस सी उठी, मुझे तो कोई सिंधारा नहीं भेजता। कल प्रीति के घर गई थी और वो भी मुझे अपने मायके से आया सिंधारा दिखा रही थी। काश मुझे भी कोई भेजता सिंधारा।मेरे मम्मी-पापा, भाई किसी को मेरी याद नहीं आती। कोई मुझे गलत ना समझे, मैं अपने मायके से कुछ लेना नहीं चाहती, बस एक परायापन सा फील होता है। पिंकी (चचेरी बहन) उसकी तो मम्मी भी नहीं है फिर भी उसके पापा को याद रहती है सारी रस्में। एक मैं हूँ, मेरे घरवाले तो शादी करके जैसे भूल ही गए। मेरी सास भी हर तीज पर, हर रक्षा-बंधन पर अपने बेटों को जबरदस्ती भेजती हैं अपनी बेटी के घर। चाहे उन्हें याद न हो, या जाना न चाहें, पर अपनी बहन के घर तीनों बेटे पहुँच जाते हैं। एक मेरे भाई हैं, उन्हें कभी मेरी याद नहीं आती। एक टीस होती है सीने में। मैं खुद ही कहती हूँ किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, अपना फर्ज निभाना चाहिए, फिर भी ना जाने क्यूँ कोई उम्मीद रखती हूँ अपने मायके से। क्या पता मैं ही गलत हूँ, कोई मजबूरी भी तो हो सकती है मम्मी-पापा की। बस पेंशन ही तो मिलती है उन्हें 9000 रु। ऐसे में अपना खर्चा ही मुश्किल है, बेटियों को कहाँ से दें। पर मुझे उनसे कुछ लेना नहीं है, बस यूं ही आँख भर आई सोचकर मुझे कोई सिंधारा क्यूँ नहीं भेजता।  

कभी-कभी मन करता है पूछूँ अपनी मम्मी से, क्या तुम्हें सच में याद नहीं आती अपनी बेटियों की। मेरी छोटी बहन मुझसे ज्यादा समझदार है, उसे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, कि कोई उससे बात करे या ना करे, बुलाए या ना बुलाए। फिर मैं क्यूँ ये सब सोच रही हूँ। मुझे भी यथार्थवादी होना चाहिए, मेरी ही गलती है किसी से कोई उम्मीद करती ही क्यूँ हूँ। मैं ऐसी क्यूँ हूँ! मैं सबसे प्यार और अपनेपन की उम्मीद करती ही क्यूँ हूँ। मेरी देवरानी भी मुझे समझाती है जब मैं दुखी होती हूँ कि ससुराल में कोई मुझसे प्यार नहीं करता, कोई मुझसे बात नहीं करता, वो भी यही कहती है, तो तुम उनके बारे में सोचती ही क्यों हो जब उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता तो तुम्हें क्यूँ पड़ता है। मैं तो नहीं सोचती यह सब।" तो क्या मैं ही फालतू सोचती रहती हूँ।  

मेरी मम्मी की भी क्या गलती जब उनकी कोई सुनता ही नहीं है। वो आज तक अपने लिए आवाज नहीं उठा पाई। उन्हें अपना निर्णय लेने की आजादी कहां है।वो तो ऐसे ही खुश हैं अपनी जिंदगी में उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं, कोई उम्मीद नहीं। कोई इच्छा नहीं, कोई सपना नहीं। वो दुनिया में शायद पहली ऐसी शख्स हैं जिसकी जिन्दगी में कोई 'काश' नहीं। वरना सबकी जिन्दगी में एक 'काश' तो रहता ही है।  

मुझे अपने मायके से बहुत सारी शिकायतें हैं। ईर्ष्या होती है मुझे और लड़कियों को देखकर, उनके मायके से बॉन्डिंग को देखकर। जैसा कहानियों, फिल्मों में पढ़ा-देखा वैसा नहीं है मेरा मायका। कुछ अजीब ही है। प्यार तो सब करते हैं, पर जताना नहीं आता, मेरे पापा मुझे प्यार तो करते हैं पर गुस्से में कुछ भी बोल देते हैं, पता नहीं कैसा प्यार है उनका, कभी बच्चों की तारीफ नहीं की, हमेशा सपोर्ट तो किया पर डांटकर। एक मम्मी हैं, उनका दिमाग इतना कमजोर हो चुका है, उन्हें अपना ही होश नहीं रहता, औरों को क्या पूछें? नहीं नहीं ऐसा नहीं है। मैं ये क्या सोच रही हूं। मेरे मम्मी पापा तो सबसे अच्छे हैं।
किसी से अपनी तुलना नहीं करते। सबकी परिस्थिति अलग होती है। सिंधारा नहीं देते तो क्या मुझे प्यार तो करते हैं।
अब तनु का मन शांत हो गया है। डायरी लिखने का सबसे बड़ा फायदा है यह डिप्रैशन नहीं होता है। मन की सारी बातों को डायरी के पन्नों पर लिखो और खाली कर दो बेकार की बातों से। बाद में चाहे खुद ही फाड़कर फेंक दो पूरी आजादी।
तनु ने अपनी डायरी बंद की और खिड़की से बाहर झांकने लगी। अब उसके दिल में कोई काश नहीं था। खुश थी वो डायरी लिखकर अपनी। बाहर वातावरण बहुत सुहाना था। हल्की बारिश हो रही थी। ठंडी हवाएं चलने लगी थीं। तनु बारिश को देखती रहती है और बारिश तनु को प्यार से सहलाती हुई बरस रही है।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 

---