Bandh Lifafa - 5 in Hindi Thriller by Digant J Patel books and stories PDF | बंद लिफाफा - 5

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बंद लिफाफा - 5

अब समय आ गया है राज से पड़दा उठने का

लोहे का दरवाज़ा बंद हो चुका था।
पूरा तहख़ाना सन्नाटे में डूबा हुआ था।
अनिकेत की नज़र सामने खड़े आदमी पर टिकी थी।
वही चेहरा...
वही मुस्कान...
आदित्य राय।
जिसे दुनिया तीस साल पहले मर चुका मान चुकी थी।
आदित्य ने सफ़ेद लिफाफा अनिकेत की ओर बढ़ाया।
"इसे खोलो..."
इस बार लिफाफे पर कोई चेतावनी नहीं थी।
सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—
"सच।"
अनिकेत ने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।
अंदर एक डीएनए रिपोर्ट थी।
ऊपर दो नाम लिखे थे—

आदित्य राय
अनिकेत मल्होत्रा (आर्यन)

रिपोर्ट के नीचे लिखा था—
"पिता-पुत्र संबंध – 99.99% सत्यापित।"
अनिकेत कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया।
"तो... आप सच में मेरे पिता हैं?"
आदित्य की आँखों में आँसू आ गए।
"हाँ..."
"लेकिन पूरी कहानी अभी बाकी है।"
आदित्य ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।
"तीस साल पहले 'द सर्कल' सिर्फ़ एक गुप्त संगठन नहीं था।"
"हम ऐसे अपराधियों की गुप्त जानकारी इकट्ठा करते थे, जिन्हें कानून कभी पकड़ नहीं सकता था।"
"लेकिन..."
"धीरे-धीरे कुछ लोग लालच में आ गए।"
"उन्होंने न्याय की जगह सत्ता चुन ली।"
"मैंने विरोध किया..."
"और उसी दिन मुझे मारने का फैसला कर लिया गया।"
"फिर मेरा क्या हुआ?" अनिकेत ने पूछा।
आदित्य ने जवाब दिया—
"तुम उस रात सिर्फ़ तीन महीने के थे।"
"मैं तुम्हें लेकर भाग रहा था।"
"लेकिन उन्होंने हमारा पीछा किया।"
"तुम्हारी माँ..."
आदित्य की आवाज़ भर्रा गई।
"...उन्होंने अपनी जान देकर तुम्हें बचाया।"
"मैंने तुम्हें कबीर को सौंप दिया।"
"और तुम्हारी नई पहचान बना दी गई—अनिकेत मल्होत्रा।"
अनिकेत की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसी समय...
पीछे से ताली बजने की आवाज़ आई।
ठक... ठक... ठक...
दोनों ने पीछे देखा।
दरवाज़ा खुल चुका था।
अंदर...
इंस्पेक्टर राघव खड़े थे।
लेकिन...
वे अकेले नहीं थे।
उनके पीछे लगभग दस हथियारबंद लोग खड़े थे।
सबके कंधे पर वही निशान था—
THE CIRCLE
अनिकेत ने राहत की साँस ली।
"सर!"
लेकिन...
राघव मुस्कुराए नहीं।
उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पिस्तौल निकाली...
और...
सीधे आदित्य की ओर तान दी।
अनिकेत चिल्लाया—
"सर! आप क्या कर रहे हैं?"
राघव की आवाज़ ठंडी थी।
"तीस साल से मैं इसी पल का इंतज़ार कर रहा था।"
अनिकेत हैरान रह गया।
"मतलब?"
राघव आगे बढ़े।
"मैं कभी इस केस की जाँच नहीं कर रहा था..."
"मैं तो शुरू से ही..."
"...द सर्कल का सदस्य था।"
आदित्य ने गहरी साँस ली।
"मुझे पता था..."
"एक दिन तुम अपना असली चेहरा दिखाओगे।"
अनिकेत को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।
जिस इंसान पर उसने सबसे ज़्यादा भरोसा किया...
वही दुश्मन निकला।
राघव हँसते हुए बोले—
"रोहन..."
"कबीर..."
"और बाकी सब..."
"उनकी मौतें हादसे नहीं थीं।"
"मैंने करवाई थीं।"
अनिकेत की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"तुम इंसान नहीं हो..."
राघव मुस्कुराए।
"इतिहास..."
"हमेशा विजेता लिखते हैं।"
तभी...
आदित्य ने धीरे से अनिकेत की ओर देखा।
और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"जब मैं इशारा करूँ... तो भाग जाना।"
अनिकेत कुछ समझ पाता...
उससे पहले...
आदित्य ने अपनी जेब से एक छोटा-सा धुएँ का कैप्सूल निकाला...
और ज़मीन पर फेंक दिया।
धड़ाम!
पूरा तहख़ाना धुएँ से भर गया।
गोलियों की आवाज़ गूँज उठी।
धाँय! धाँय! धाँय!
अनिकेत कुछ भी नहीं देख पा रहा था।
अचानक...
किसी ने उसका हाथ पकड़कर ज़ोर से खींचा।
वह एक गुप्त सुरंग में गिर पड़ा।
पीछे से भारी दरवाज़ा बंद हो गया।
जब धुआँ छँटा...
अनिकेत ने देखा...
सामने खड़ा व्यक्ति...
आदित्य नहीं था।
वह एक महिला थी...
करीब पचास साल की।
उसने अपना हुड हटाया...
और बोली—
**"अगर ज़िंदा रहना है..."
"तो मुझ पर भरोसा करो।"
अनिकेत ने घबराकर पूछा—
"आप... कौन हैं?"
महिला की आँखें भर आईं।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
**"मैं..."
"तुम्हारी माँ हूँ।"

अनिकेत कुछ पल तक उस महिला को देखता रहा।
उसकी आँखों में आँसू थे...

लेकिन दिमाग़ मानने को तैयार नहीं था।
"नहीं..."
"मेरी माँ तो तीस साल पहले मर चुकी थीं।"
महिला मुस्कुराई।
"यही कहानी सबको सुनाई गई थी।"
उसने अपने गले से एक छोटा-सा लॉकेट निकाला।
उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।
तीन महीने का एक बच्चा...
उसे गोद में लिए एक महिला...
और बगल में खड़ा आदित्य राय।
अनिकेत के हाथ काँपने लगे।
वह वही तस्वीर थी...
जिसकी आधी प्रति उसे लॉकर 307 में मिली थी।
महिला बोली—
"मैं तुम्हारी माँ, नैना राय हूँ।"
"और तुम्हारे पिता ने मुझे मरा हुआ घोषित कर दिया..."
"ताकि द सर्कल मुझे ढूँढ न सके।"
उसी समय...
सुरंग के बाहर ज़ोरदार धमाका हुआ।
पूरी ज़मीन हिल गई।
महिला ने कहा—
"समय नहीं है।"
"आदित्य उन्हें ज़्यादा देर तक रोक नहीं पाएँगे।"
वे दोनों सुरंग के अंत तक भागे।
वहाँ एक पुराना कंट्रोल रूम था।
बीच में एक बड़ा सर्वर...
सैकड़ों हार्ड ड्राइव...
और लाल बत्ती से चमकता एक कंप्यूटर।
स्क्रीन पर लिखा था—

THE CIRCLE – CENTRAL ARCHIVE

नैना बोली—

"यहीं सबूत हैं..."
"पिछले तीस साल के।"
"हर हत्या..."
"हर रिश्वत..."
"हर नेता..."
"हर अधिकारी..."
"सबका सच।"
अनिकेत समझ गया...
यही वह राज़ था जिसके लिए लोग मर रहे थे।
अचानक...
दरवाज़ा टूट गया।
धड़ाम!
इंस्पेक्टर राघव अंदर आए।
उनके पीछे हथियारबंद लोग।
और...
उनके बीच खड़े थे—
आदित्य राय।
उनके हाथ बँधे हुए थे।
चेहरे पर चोटों के निशान थे।
राघव मुस्कुराया।
"भागकर कहाँ जाओगे?"
"यह खेल यहीं खत्म होगा।"
आदित्य ने अनिकेत की ओर देखा...
और पहली बार मुस्कुराए।
"बेटा..."
"डरना मत।"
राघव कंप्यूटर की ओर बढ़ा।
"तीस साल की मेहनत..."
"आज हमेशा के लिए मिट जाएगी।"
जैसे ही उसने कीबोर्ड पर हाथ रखा...
आदित्य ज़ोर से चिल्लाए—
"अनिकेत... अभी!"
अनिकेत ने बिना एक पल गँवाए...
कंप्यूटर के बगल में लगा लाल स्विच दबा दिया।
पूरे कमरे में सायरन बज उठा।
स्क्रीन चमकने लगी।
एक संदेश दिखाई दिया—

DATA UPLOADING...

राघव चीखा—
"नहीं!"
"इसे बंद करो!"
लेकिन देर हो चुकी थी।
आदित्य मुस्कुराए।
"तीस साल पहले..."
"मैंने एक सुरक्षा प्रणाली बनाई थी।"
"अगर कोई इस सिस्टम को नष्ट करने की कोशिश करेगा..."
"तो सारे सबूत दुनिया भर के मीडिया और जाँच एजेंसियों तक अपने-आप पहुँच जाएँगे।"
स्क्रीन पर संख्या बढ़ने लगी।

20%...
45%...
72%...

राघव ने गुस्से में पिस्तौल निकाली...
और आदित्य पर गोली चला दी।
धाँय!
गोली आदित्य के सीने में लगी।
वे ज़मीन पर गिर पड़े।
अनिकेत चीख उठा—
"पापा!"
आदित्य ने आख़िरी बार उसकी तरफ़ देखा।
कमज़ोर आवाज़ में बोले—
**"बंद लिफाफा..."
"...कभी मौत का संदेश नहीं था..."
"वह... सच को सही समय तक सुरक्षित रखने का तरीका था..."
**"अगर लोग उसे पहले खोल देते..."
"...तो सच भी मर जाता..."
इतना कहकर...
आदित्य की आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
उसी क्षण...
कंप्यूटर स्क्रीन पर लिखा आया—

UPLOAD COMPLETE – 100%

पूरे देश में...
न्यूज़ चैनलों पर...
जाँच एजेंसियों के सर्वरों पर...
और दुनिया भर के पत्रकारों के पास...
द सर्कल के सारे राज़ पहुँच चुके थे।

राघव घुटनों के बल बैठ गया।
उसका खेल खत्म हो चुका था।
कुछ ही मिनटों में...
बाहर से पुलिस के सायरन सुनाई देने लगे।
छह महीने बाद...
अनिकेत अपने घर की बालकनी में बैठा था।
दुनिया बदल चुकी थी।
द सर्कल के सैकड़ों सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे।
कई बड़े नाम बेनकाब हो चुके थे।
उसके सामने टेबल पर वही...
सफेद लिफाफा रखा था।
अब वह खाली था।
अनिकेत ने मुस्कुराते हुए उसे आग में डाल दिया।
लिफाफा धीरे-धीरे जलने लगा।
राख हवा में उड़ गई।
उसी समय...
उसे अपने पिता की आख़िरी बात याद आई—

"सच को छिपाना पाप है... लेकिन सही समय से पहले खोल देना... कभी-कभी उससे भी बड़ा पाप होता है।"
अनिकेत आसमान की ओर देखने लगा।
उसे लगा...

जैसे कहीं दूर...

उसके माता-पिता मुस्कुरा रहे हों।

समाप्त

सीख

झूठ चाहे कितनी भी मज़बूत दीवारें बना ले, सच अगर ज़िंदा रहे तो एक दिन उन दीवारों को गिरा ही देता है। कभी-कभी धैर्य ही सच का सबसे बड़ा रक्षक होता है।