Run Or Hide? - 7 in Hindi Thriller by silent script books and stories PDF | Run Or Hide? - 7

Featured Books
Categories
Share

Run Or Hide? - 7

19 साल का विक्रम तालाब के किनारे खड़ा था। वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, पीछे से आवाज़ आई—"भौ... भौ!"

‎यह उसका पालतू कुत्ता था। वह अपनी पूंछ हिलाते हुए विक्रम को देख रहा था, जैसे कह रहा हो—रुक जाओ।

लेकिन विक्रम इतना थक चुका था कि उसने उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। एक गहरी सांस लेकर, विक्रम ने तालाब के ठंडे पानी में छलांग लगा दी।
‎कुत्ता तालाब के किनारे दौड़ने लगा। पानी में हलचल हो रही थी और विक्रम धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। उस बेज़ुबान जानवर को और कुछ नहीं सूझ रहा था, वह बस लगातार भौंक रहा था, क्योंकि उसे नहीं पता था कि विक्रम को उस मौत के मुंह से कैसे बाहर निकाले।

‎ठीक उसी वक़्त, उसी रास्ते से नैतिक अपनी साइकिल पर घर लौट रहा था। अचानक नैतिक के कानों में कुत्ते के चीखने जैसी भौंकने की आवाज़ पड़ी।

कुछ अजीब महसूस होने पर नैतिक ने साइकिल मोड़ी और तालाब की तरफ़ बढ़ा।
‎वहाँ पहुँचते ही उसकी रूह कांप गई। तालाब के बीचों-बीच पानी में कोई डूब रहा था!

‎नैतिक ने साइकिल गिराई और सीधे तालाब के ठंडे पानी में कूद गया। वह तैरता हुआ तेज़ी से विक्रम तक पहुँचा, उसे मजबूती से पकड़ा और पूरी ताकत लगाकर घसीटते हुए किनारे पर ले आया।

‎विक्रम को पानी में गए अभी मुश्किल से दो-तीन मिनट ही हुए थे, इसलिए उसके फेफड़ों में ज़्यादा पानी नहीं गया था। वह सिर्फ पूरी तरह भीग चुका था और हांफ रहा था।

लेकिन जैसे ही उसे होश आया कि वह बच गया है, उसका दर्द गुस्से में बदल गया।
‎वह झटके से उठा और बोला "क्यों बचाया मुझे?! मैं इतनी मुश्किल से हिम्मत जुटाकर अंदर गया था! क्यों आए तुम?!"

‎नैतिक गुस्से में चिल्लाया, "तुम पागल हो गए हो क्या? अपनी जान दे रहे हो? एक बार भी अपने मम्मी-पापा के बारे में नहीं सोचा जो घर पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होंगे?"

‎विक्रम की आँखों में आंसू आ गए, पर आवाज़ में एक कड़वाहट थी, "मेरे मम्मी-पापा इस दुनिया में नहीं हैं! और अगर वो ऊपर से मुझे देख भी रहे होंगे, तो अच्छा ही होता ना कि मैं उनके पास चला जाता! पर तुम्हें दूसरों के मामले में टांग अड़ाने की आदत है क्या?"

‎विक्रम की बात सुनकर नैतिक का गुस्सा एकदम शांत हो गया। उसने नरमी से कहा, "मुझे माफ़ कर दो... मैं तुम्हारे माता-पिता के बारे में नहीं जानता था। पर एक बार उसे देखो..."

नैतिक ने बैठे कुत्ते की तरफ़ इशारा किया, जो अब भी कांप रहा था और  "यह बेज़ुबान तुम्हारे लिए कितना तड़प रहा था। अगर अपने लिए नहीं, तो एक बार इसके बारे में तो सोच लेते।"

‎विक्रम ने अपने कुत्ते को देखा, जो गीली आँखों से उसे निहार रहा था। विक्रम के पास कोई जवाब नहीं था।
‎नैतिक ने आसमान की तरफ़ देखा और बात बदलते हुए कहा, "चलो, शाम हो गई है। तुम्हें घर जाना चाहिए। तुम्हारा घर कहाँ है?"

‎विक्रम ने धीमे से जवाब दिया, "यहीं पास में ही है।"
‎"चलो, तुम मेरी साइकिल पर पीछे बैठो, हम दोनों साथ चलते हैं," नैतिक ने अपनी साइकिल उठाते हुए कहा।

‎विक्रम बिना कुछ बोले उसकी साइकिल पर पीछे बैठ गया। रास्ते में विक्रम ने पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है? वैसे, मेरा नाम विक्रम है।"

‎"मैं नैतिक हूँ," उसने पैडल मारते हुए मुस्कुराकर कहा।
‎विक्रम को बहुत हैरानी हो रही थी। नैतिक उससे इस तरह एकदम नॉर्मल बात कर रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। न कोई हमदर्दी का नाटक, न कोई जजमेंट... जैसे विक्रम कोई आम लड़का हो। इस नॉर्मल बर्ताव ने विक्रम के जख्मों पर जैसे मरहम का काम किया।

‎कुछ दूर जाकर विक्रम बोला, "मेरा घर आ गया... वो सामने ही है।"
‎नैतिक ने साइकिल रोकी। विक्रम नीचे उतरा।

‎नैतिक ने उसकी तरफ़ देखा और कहा, "ओह अच्छा! तुमसे मिलकर ख़ुशी हुई, विक्रम।"
‎ये सुनकर विक्रम के  चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

‎नैतिक अपनी साइकिल बढ़ाते हुए पीछे मुड़ा और हाथ हिलाकर बोला, "फिर मिलेंगे!" और वह अंधेरे में ओझल हो गया। विक्रम वहीं खड़ा उसे देखता रहा, अपने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरते हुए।

‎फिर एक ठंडी सांस लेकर विक्रम अपने घर के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
‎जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने उसकी नानी बैठी थीं। उनकी आँखें दरवाज़े पर ही टिकी थीं और चेहरे पर साफ़ चिंता की लकीरें थीं। वह काफी देर से विक्रम के आने का इंतज़ार कर रही थीं।

विक्रम को देखते ही वह जल्दी से उठकर उसके पास आईं।
‎उन्होंने विक्रम के भीगे हुए कपड़ों और उदास चेहरे को देखा, और बड़े प्यार से उसका हाथ थामकर बोलीं,

"इतनी देर से क्यों आए हो? मैं और तुम्हारे नाना तो बहुत परेशान हो गए थे... कहाँ थे तुम इतनी देर से?"
‎उसे अपनी नानी की बातों से गहरा पछतावा हुआ कि वह अभी कुछ देर पहले क्या खौफनाक कदम उठाने जा रहा था। अगर उसे कुछ हो जाता, तो उसके बूढ़े नाना-नानी का क्या होता?

‎उससे कुछ बोलते नहीं बना। उसने बिना कुछ कहे, नम आँखों से अपनी नानी को कसकर गले लगा लिया और बस इतना ही कह पाया, "मुझे माफ़ कर दो, नानी... मुझे माफ़ कर दो।"







"सर? क्या हुआ सर... सब ठीक तो है ना?"
‎जूनियर ऑफिसर की आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा।
‎नैतिक का ध्यान भटका। उसने खुद को संभाला और नीचे झुककर अपना गिरा हुआ फोन उठाया।

‎"कुछ नहीं... मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ," नैतिक ने अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश करते हुए कहा, लेकिन उसमें एक घबराहट साफ छिप रही थी।
‎नैतिक अपनी कुर्सी पर बेदम सा बैठ गया। उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसका दिमाग तेजी से अतीत और वर्तमान के बीच चक्कर काट रहा था।

‎वह खुद से ही बुदबुदाया, "शायद... शायद उनसे कोई गलतफहमी हुई होगी। विक्रम आखिर ऐसा क्यों करेगा? वह तो एक अच्छा इंसान है... 

‎"पर... क्या वो उस दिन के बाद से कभी सच में वापस आया भी है? नहीं..." नैतिक की उलझन बढ़ती जा रही थी, "आखिर उस दिन क्या हुआ था? वो क्यों गया था वहाँ? कुछ समझ नहीं आ रहा..."
‎इसके बाद नैतिक ने वैदेही, रोनी, रुद्र और तान्या को पुलिस स्टेशन बुलाया। जैसे ही वे सब वहाँ पहुँचे, नैतिक के मन में एक कशमकश चल रही थी। उसने सोचा, 'क्या मुझे इनसे यह बात पूछनी चाहिए?

पर फिर उसने खुद को समझाया कि इस केस में अभी तक कोई दूसरा सबूत नहीं मिला है, इसलिए मन में जो सवाल है, उसे एक बार पूछ ही लेना चाहिए।नैतिक ने पूछा, "क्या आप लोग किसी विक्रम को जानते हो?"

यह सुनते ही सब सोचने लगे। कुछ पल के सन्नाटे के बाद उन्होंने सिर हिला दिया, "नहीं, हम किसी विक्रम को नहीं जानते।"

‎लेकिन ठीक उसी वक्त, नैतिक की तेज़ नज़रों ने पकड़ लिया कि रुद्र के हाव-भाव अचानक बदल गए थे। वह थोड़ा असहज दिख रहा था। नैतिक ने तुरंत उसे टोकते हुए पूछा, "रुद्र, तुम कुछ कहना चाहते हो?"

रुद्र ने हिचकिचाते हुए कहा, "मुझे थोड़ा-थोड़ा याद आ रहा है... हमारा एक क्लासमेट था, जिसका नाम विक्रम था।" यह सुनते ही नैतिक हैरान रह गया! उसने पूछा, "उसके बारे में और बताओ। वह कैसा था? कैसा दिखता था?"

तभी रोनी की बहन तान्या बीच में बोल पड़ीं अरे हाँ! वह... वह तो मेरे भाई रोनी से बहुत जलता था। और हम लोगों से बेवजह चिढ़ता रहता था।" 

यह सुनते ही वैदेही ने तान्या को इशारा कर चुप कराने की कोशिश की।

नैतिक को दाल में कुछ काला लगा। उसने कड़क आवाज़ में कहा, "हमारे पास वक्त नहीं है, जो भी याद है जल्दी-जल्दी बताओ!"

रुद्र ने घबराकर पूछा, "पर आप अचानक उसके बारे में क्यों पूछ रहे हैं?"

नैतिक ने गंभीर होकर बताया, "समीर के गले पर जो निशान है, वह किसी बहुत लंबे-चौड़े इंसान का है। जब हमने तहकीकात की, तो पता चला कि संदिग्धों में से एक इंसान, जिसका नाम विक्रम है, उसके बारे में कुछ पता नहीं चल रहा। वह कई महीनों या शायद सालों से शहर से गायब है।


तभी अचानक नैतिक का फोन बज उठा। स्क्रीन पर साइबर सेल एक्सपर्ट का नाम था। नैतिक ने तुरंत फोन उठाया।

दूसरी तरफ से साइबर एक्सपर्ट ने कहा, "सर, जैसा कि आपने बच्चों के फोन की लोकेशन ट्रेस करने के लिए कहा था... हमें एक घने जंगल की तरफ का सिग्नल मिल रहा है।"

'जंगल' शब्द सुनते ही रुद्र डर के मारे अपनी कुर्सी से गिरते-गिरते बचा और उसके मुँह से निकला, "जंगल?!"नैतिक ने तुरंत रुद्र को पकड़ा और पूछा,