पात्र-
डुग्गी वाला
नागारिक
अजय
रश्मि
विभा
रहीम
सुकुल
त्रिवेणीनाथ
बनवारी
एक बालक
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अंक- 1
(चौराहे का एक दृश्य । एक तरफ डुग्गी पीटने वाला डुग्गी पीटता हुआ प्रवेश करता है।)
डुग्गीवाला- कल से इस पूरे षहर में कोई नशा नहीं करेगा.....कल से इस पूरे षहर में कोई भी आदमी नशा नही करेगा।
नागरिक-(प्रवेश कर)क्यों भाई.....किस बात के लिए डुग्गी पीट रहे हो?
डुग्गीवाला- (अनसुना करता हुआ) कल से इस पूरे षहर में कोई भी आदमी नशा नहीं करेगा।
नागरिक- (डुग्गीवाले को झकझोरता हुआ) अरे कुछ हमारी भी सुनोगे या.....
डुग्गीवाला-(हँसते हुए) मेरे लिए सुनना मना है। मैं केवल सुनाता हूँ,
सुनने के लिए सारी जनता है। क्या तुम जनता नहीं हो?
नागरिक-ठीक कहते हो। इस देश में कोई केवल सुनता है और कोई सुनाता है। सुनने वाले बोलते नहीं, बोलने वाले सुनते नहीं। ऐसा ही है अपना देश......
डुग्गीवाला- मैं देश के बारे में नहीं जानता। मैं केवल डुगडुगी जानता हूँ......कल से इस पूरे षहर में कोई भी आदमी नशा नहीं करेगा।
नागरिक- मैं पूछ रहा था?
डुग्गीवाला- (झल्लाता हुआ) क्या पूछ रहे थे?
नागरिक- यही कि हमारे सम्मुख प्रबुद्ध दर्शक बैठे हैं। ये कुछ देखना चाहते हैं कुछ नाटक-वाटक।
डुग्गीवाला- नाटक? नाटक-वाटक नहीं। मै केवल डुग्गीपीटता हूँ। केवल आदेश पालन....कल से इस पूरे षहर में कोई भी आदमी नशा नहीं करेगा।
नागरिक- अरे! क्या कहते जा रहे हो तुम। ये गली-कूचे की मधुशालाएँ कहाँ जायेंगी और हमारे ये दर्शक भी एक-आध घूँट चढ़ाकर ही आए होगें और तुम चिल्ला रहे हो......।
डुग्गीवाला- मानता हूँ तुम्हारे दर्शक भोले हैं। इनके सामने कुछ भी होता रहे चिल्लाते नहीं। किसी की हत्या हो जाय। इनसें कोई मतलब नहीं। दहेज के लोभ में यदि किसी लड़की को जला दिया जाय तो भी इनकी रगों में खून नहीं दौड़ता। किसी को दो जून रोटी न मिले तो और किसी के कुत्ते भी मक्खन-टोस्ट से जलपान करें इससे इन्हें क्या लेना देना। ये बड़े सरल हैं सचमुच भोले......कहो तो इनकी स्तुति कर लूँ।
नागरिक- नहीं-नहीं स्तुति नहीं। मैं कह रहा था......
डुग्गीवाला- क्या?
नागरिक- यही कि तुम्हारी डुगडुगी कोई अर्थ रखती है?
डुग्गीवाला- अर्थ? इस देश में किसी चीज का कोई अर्थ है? यहाँ अर्थ केवल सत्ता है। चेहरा देखकर रंग बदलना यहाँ आम है।
नागरिक- यह बताओ?
डुग्गीवाला- क्या?
नागरिक- तुम्हारा ऐलान बासी क्यों लगता है। तुम्हें कुछ ताजा ऐलान करना चाहिए।
डुग्गीवाला- हम सेवक हैं। दो जून की रोटी के लिए डुग्गी पीटते हैं। बासी और ताज़ा में भेंद करना हमारे अधिकार में नहीं है? ठीक ही कहा बासी और ताजा में फ़र्क करना (हँसता है) कल से इस पूरे षहर में कोई भी आदमी नशा नहीं करेगा। (ऐलान करते हुए निकल जाता है। नागरिक चलने को होता है तब तक नशे में धुत एक नवयुवक हाथ में पुड़िया लिए हुए लड़खड़ाते नागरिक से भिड़ जाता है)
अजय- बस एक पुड़िया....खाओगे? बिल्कुल स्वर्ग उतर आएगा। देखो मैं रंभा उर्वशी के देश पहुँच गया हूँ....बस एक पुड़िया. ....।
(नेपथ्य से डुग्गी वाले का ऐलान सुनाई पड़ता है।)
नागरिक- सुनते हो?
अजय- जो ऐलान हो रहा है।
(नेपथ्य से पुनःऐलान)
अजय- ऐं, पूरे षहर में नशा बन्दी....हुँह.....कितना अशोभनीय ऐलान.....इस देश में युवाओं की कौन कहे युवतियाँ भी नशे की पकड़ में आ चुकी हैं।....हुँह....नशाबन्दी कहो मित्र ठीक कहता हूँ न?
नागरिक- ठीक!.....न......।
अजय- क्या? मैं अजय? ठीक नहीं कहता? तुम्हें षायद पता नहीं कि तुम किससे टकरा रहे हो?
नागरिक- षायद नहीं।
अजय- याद रखो अजय की बात को कोई काटता नहीं, कोई यह हिम्मत नहीं कर सकता कि.......
नागरिक- अजय बाबू आपकी साँस तेज है, थोड़ा आराम कर लो।
(अजय को सहारा देकर बैठाता है किन्तु वह बार-बार खड़ा होने का प्रयास करता है।)
नागरिक- अजय बाबू आप नशा छोड़ क्यों नहीं देते?
अजय- नशा छोड़ दूँ?
नागरिक- हाँ-हाँ, अवश्य।
अजय- तुम बड़े सरल हो मित्र। तुम्हें देश-दुनिया की खबर नहीं। तुमने सही प्रश्न नहीं किया न!
नागरिक- सही प्रश्न?
अजय- हाँ!हाँ सही प्रश्न। मैं क्यों और कैसे नशेबाज बन गया?
नागरिक- मुझे इसकी आवश्यकता नहीं।
अजय- (मुँह बिचकाते हुए) तुम्हें इसकी आवश्यकता नहीं। देश की युवा पीढ़ी गर्त में चली जाय या बचे तुम्हें इससे क्या लेना देना।
नागरिक- नहीं...नहीं। मैं चाहता हुँ कि युवा पीढ़ी गर्त में न गिरे। (आकाश की ओर देखने लगता है।)
अजय- आकाश की ओर देखो और बैठे रहो। कुछ पैसे दे सकोगे?
नागरिक- क्या करोगे?
अजय- मेरे पास एक ही पुड़िया है। मैं कल का भी जुगाड़ करना चाहता हूँ। यदि कुछ दे सको तो.....
नागरिक- लेकिन कल से तो पूरे षहर में नशा बन्दी लागू हो रही है।
अजय- (ठठाकर हँसता है) हुँह....नशा बन्दी.....यह सरकारी ऐलान है न। नशाबन्दी से पीना बन्द नहीं होगा। लोग पियेंगे....चोरी छिपे पियेंगे.....दूना दाम देंगे....होगा बस इतना ही।
नागरिक- लोग नशा करना नहीं छोड़ेगे। यही कहना चाहते हो न?
अजय- हाँ....लेकिन इसी के साथ यह भी कि लोग नहीं चाहते कि युवा पीढ़ी नशा छोड़ दे.....तुम्हारे कर्णधार भी......।
नागरिक- क्यों? षासन ने ऐलान किया है। बड़े बुजुर्ग दौड़ रहे हैं और तुम कहते हो कि.....
अजय- सब धोखा है मित्र! जो इस देश के ठेकेदार हैं वे यही चाहते हैं कि युवा पीढ़ी उनके इशारों पर नाचती रहे। वह उनके स्वार्थ पूर्ण क्रिया-कलापों पर प्रश्न चिह्न न लगा सके।ऐसा कब हो सकता है? नशे में धुत आदमी दूसरों के संकेत पर दुम हिलाता है.....वह नशा चाहे किसी प्रकार का हो। आज के षँहशाह केवल यही चाहते हैं कि...।
नागरिक- और तुम हो कि जानबूझ कर अपने को गर्त में गिरा रहे हो?
अजय- नहीं जानबूझ कर मैं अपने को गर्त में नहीं गिरा रहा। मुझे उन ठेकेदारों ने ही गर्त में गिराया है जिनके हित देश और समाज हित से भिन्न हैं। मैं अब उससे निकल नहीं पा रहा हूँ। आदत कितनी खराब चीज़ है इसे आप जानते ही होगे।
नागरिक- किन्तु आप तो प्रबुद्ध हैं, पढ़े-लिखे हैं।
अजय- (हँस पड़ता है।) पढ़ा है और लिखा भी।
देखते हो वह इमली का पेड़ जिसके नीचे बैठकर मैंने पढ़ा है। बैठने के लिए टाट नहीं। अध्यापक भी कभी-कभार आते और डंडे से पीट कर रख देते। हम लोग डन्डे की मार से चुप रहते। नकल कर पास होता गया। मैं स्नातक हूँ किन्तु एक पन्ना भी सही लिख नहीं सकता। यह किसने किया है? यह तुमने किया है मित्र तुमने। तुम देश के प्रबुद्ध नागरिक बनते हो न.....।
(नागरिक को पकड़कर झकझोरता है।)
इच्छा होती है तुम्हारा गला घोट दूँ। मैं तो उस अध्यापक को भी ढूँढ रहा हूँ जिसने मुझे पुर्जियाँ पहुँचाई थी और उसकी भी जिसने नम्बर बढ़वाने के लिए मुझसे रूपये लिए थे। तब मैं
अबोध था। दूसरों के इशारे पर नाचता था.....।
नागरिक- और अब.....अब तो तुम समर्थ हो।
अजय- समर्थ? इस षब्द से इस देश को बड़ी चिढ़ है। कुछ लोगों को लगता है कि यदि इस देश के बच्चे समर्थ हो गए, सही ढँग से सोचने-विचारने लगे तो उनकी गद्दियाँ छिन जायँगी। इसीलिए मित्र, इसी लिए.....यह शड्यंत्र रचा जा रहा है कि हम समर्थ न हो सकें। अब मैं अनुभव कर रहा हूँ। गलत रास्ते से रोकने वाले उस अध्यापक को हमने क्या नहीं कहा? पर अब.....।
नागरिक- तब तो तुम्हें नशाबन्दी में षामिल हो जाना चाहिए।
अजय- मैंने कब कहा कि मुझे नहीं होना चाहिए किन्तु मैं इतना जानता हूँ कि जिस दिन मुझे यह पुड़िया नहीं मिलेगी, मैं तड़प-तड़प कर मरने लगूँगा....और तब.....तुम भी बचा नहीं सकोगे। (पुड़िया दिखाते हुए) यह पुड़िया ही मेरा ज़िन्दगी है......अजय की ज़िन्दगी तो अब इसी .....पुडिया में कैद है।.....ऐसे में तुम्हीं बताओ क्या मैं इस नशे को छोड़ सकता हूँ?
नागरिक- नहीं अजय....जो कुछ हो गया उसे भूल जाओ। हम पूरी कोशिश करेंगे कि तुम्हें इस नशे से मुक्ति मिल जाय।
अजय- अब मुक्ति कहाँ? लोग मुझे ढकेल रहे हैं और तुम.....(कहते कहते अर्ध निद्रित-सा लेट जाता है।)
नागरिक- यही है इस देश की युवा पीढ़ी जिसके बल पर हम इस देश को बदलना चाहते हैं पर इसमें दोश क्या इसी का है?(अजय की बहन रश्मि तेजी से प्रवेश करती है।)
रश्मि- कत्तई नहीं। इसमें इसी का दोश कैसे हो सकता है ताऊ जी? आप तो बहुत दूर तक सोचते हैं। यह मेरा भाई है। कुछ मेरी भी सुनेंगे आप?
नागरिक- जरूर सुनूँगा बेटी। सुनने और समझने के लिए ही षायद पैदा हुआ हूँ। कहो? क्या कहना चाहती हो?
रश्मि- अभी आप कह रहे थे इस देश की युवा पीढ़ी के बारे में षायद।
नागरिक- हाँ, मैं दर्शकां से बात कर रहा था। ये लोग बड़े भोले हैं। कुछ भी समझना नहीं चाहते।
रश्मि- जिस घर में मैं रहती हूँ मैं ही जानती हूँ। माँ का निधन होने पर सारी जिम्मेदारी मुझी पर तो आ पड़ी है । किस किस की रखवाली करूँ। ताऊ जी? यहाँ तो हर चेहरे के अन्दर एक नया चेहरा उभरता है बिल्कुल बेमेल चेहरा।
नागरिक- ठीक कहती हो बेटी।
रश्मि- कहने को मेरे पिता हैं किन्तु षाम को आठ बजते ही षराब की बोतल उनकी मेज पर पहुँच जानी चाहिए। चाहे उस बोतल से गिलास में ढालने का काम रश्मि को ही क्यों न करना पड़े। उन्हें उस षराब की सुर्खी से मतलब है रश्मि या अजय से नहीं।अपराध मेरा है जो मैं ऐसे घर में जन्मी जहाँ घर नहीं है। एक छत के नीचे रह लेने से ही घर नहीं बनता। ताऊ जी मैं कहाँ का दर्द ले बैठी? आखिर आप कुछ अपनी भी तो कहें।
नागरिक- मुझे क्या कहना है बेटी? मैं युवा पीढ़ी को बड़ी आशा भरी दृश्टि से देख रखा था। अब भी देख रहा हूँ लेकिन. .....
रश्मि- यही कहना चाहते हैं न, कि देश की युवा पीढ़ी नशे में धुत है। ताऊ जी यह मेरा भाई है। इसे स्नेह नहीं मिला। न माँ की ममता मिली न पिता का प्यार। अध्यापक भी उसे हमेशा झिड़कते ही रहे। सोचो ताऊ जी इसके अन्दर भी एक कोमल हृदय था किसी ने उसे पहचाना नहीं। मैं छोटी थी कुछ कर न पायी और अब मैं जब कुछ करने लायक हुई तो भाई का रास्ता ही बदल चुका था। मैं इसे छोड़ नहीं सकती। एक बहन हूँ। दुनिया इसे कायर कहे तो कहे। ताऊ जी मैं इसे कायर कहने के लिए तैयार नहीं हूँ। जानती हूँ आपके अन्दर भी एक विशाल हृदय छिपा है लेकिन उसने क्या किया? इस देश के बड़े बुजुर्गों ने क्या किया ताऊ जी?
नागरिक- बेटी तुम्हारी अशान्ति मैं अनुभव करता हूँ। एक बेटी जिसका बाप षराब में धुत होकर अनाप-शनाप बकता हो। भाई नशे का शिकार हो। एक बहन का दर्द सब कुछ अनुभव करता हूँ बेटी (हाथ मलते हुए)।
अजय- ऊं....रश्मि तुम? तुम यहाँ कैसे?
रश्मि- एक नशे में धुत भाई को सँभालने के लिए।
अजय- कौन कहता है कि मैं नशा करता हूँ।
रश्मि- सच सच ही है भइया।
अजय- सच है....सच नहीं है।.....हम सबके अन्दर एक और चेहरा है। रश्मि हम तुमसे उसे छिपाना चाहते हैं।
रश्मि- इसीलिए तो सब एक दूसरे से भागते हैं।
अजय- हूँ.....आप मुझे सहारा दे सकेंगे।(नागरिक से)
नागरिक- अवश्य, क्यों नहीं? (सहारा देकर अन्दर ले जाता है रश्मि भी पीछे पीछे जाती है। नागरिक पुनःआ जाता है। चिन्तित मुद्रा में। तब तक आधुनिक वेशभूशा में एक लड़की विभा आ जाती है।)
विभा- हैलो अंकल। गुड मार्निग
नागरिक- गुड मार्निग! कहो कैसी हो?
विभा- फाइन अंकल, कैसे खड़े हैं यहाँ?
नागरिक- बेटी चौराहे भी बहुत कुछ कहते हैं। उसे पढ़ रहे हैं। तुम्हें कहाँ जाना है?
विभा- आज यूथ क्लब में डिबेट है उसी में भाग लेना हैं। हमारे यूथ कितने मार्डन हैं आपको खुशी होनी चाहिए।
नागरिक- जानता हूँ लेकिन उन्हें भारतीय संस्कृति से कोई लगाव नहीं है। ?
विभा- ह्नाट नानसेन्स? आप भी लकीर पीटते हैं, हजारों वर्श पुरानी लकीर। हमको मार्डन होना चाहिए। बिल्कुल मार्डन।
नागरिक- ठीक है....
विभा- च्यूइंगगम खाओगे? अभी अभी लाई हूँ। अंकल इधर कोई यूथ आया था।
नागरिक- हाँ, आया था।
विभा- कितना मार्डन है वो। जानते हैं अंकल डिस्को कितना अच्छा करता है वह। ओ गॉड!
नागरिक- लेकिन विभा पश्चिमीकरण ही आधुनिकीकरण नहीं है। यह पश्चिम का नशा भी आदमी को कहाँ ले जाएगा? तुम्हारे यूथ कहाँ टकरायेंगे? यह भी देखना होगा।
विभा- सच ताऊ जी। क्या आप सच कहते हैं? मैं ज़रा जल्दी में हूँ। हो सकता है अभी लौटूँ भी। तब फिर आप.....।(एक तरफ से वह जाती है और दूसर तरफ से रहीम भागते हुए आता है।)
नागरिक- ओ रहीम कहाँ भागे जा रहे हो?
रहीम- मैं मरना नहीं चाहता.....भागो.....भागो....
नागरिक-क्यों भाग रहे हो भाई? बात क्या है?
रहीम- अभी षीशगंज की मस्जिद में किसी ने सुअर का गोश्त फेंक दिया। सुअर का गोश्त......
नागरिक- यह अफवाह भी हो सकती है रहीम।
रहीम- अफवाह कैसी? तुम मुझे मार डालना चाहते हो।
नागरिक- रहीम बीस वर्शा की दोस्ती को तुम एक झटके में खत्म कर देना चाहते हो। मैं तुम्हें मार सकता हूँ। मैं पूछता हूँ तुम भाग क्यों रहे हो?
रहीम- ज़िन्दा रहने के लिए । मैं मरना नहीं चाहता।
नागरिक- भाग कर बच जाओगे?
रहीम- जरूर बच जाऊँगा। लोग मुझे मार डालेंगे।
नागरिक- ठीक है। यदि भागकर ही बच सकते हो तो जाओ।
(जाता है)
नागरिक- देखा आपने यह किस नशे से कम है?
(नेपथ्य में‘हनुमान जी की जय, मारो मारो मंदिर में किसी ने गोमांस फेंक दिया। खींच लो,उसे मारो दौड़ो।’ सुकुल भागते हुए आते हैं।)......
सुकुल- गजब हो गया भाई साहब, गजब हो गया। भागिए दंगा हो जाने वाला है, गोलियाँ चलेंगी, लाठियाँ बरसेंगी भाग चलो (नागरिक रोककर)
नागरिक- कहाँ भाग रहे हो?
सुकुल- आपने सुना नहीं? मंदिर में किसी ने गोमांस फेंक दिया है।दंगा बस हुआ समझो, भागो,भागो(कहते हुए निकल जाते हैं।)
नागरिक- किसी मस्जिद में सुअर का गोश्त और किसी मंदिर में गोमांस इसका भी तो नशा है। लोग इसी की रोटी खा लेते हैं। आदमी अफ़वाह फैलाता है, मरता है, अपने को आधुनिक कहता है। च्यूइंगगम खाकर चिल्लाता है-हम आधुनिक हैं। आप लोगों में से भी बहुत से लोग च्युइंगगम खाकर आए होंगे लेकिन क्या कभी सोचते हैं, इस पर भी?
(तब तक एक लोटा लुढक कर मंच पर आ जाता है। उसके पीछे त्रिवेणीनाथ एक लड़के की पीटते हुए आते हैं। नागरिक दौड़कर उसको छुड़ाता है।)
नागरिक- क्या हुआ है भाई? इसे क्यों पीट रहे हो (पकड़कर छुड़ाता है)
त्रिवेणीनाथ- क्यों पीट रहे हो? पीट रहा हूँ बस तुमसे मतलब?
नागरिक- मेरे सामने पीट रहे हो। क्या मैं पूछ भी नहीं सकता?
त्रिवेणीनाथ- पूछ सकते हो। इस लोटे का दाम दे सकते हो? लाइए निकालिए , टेंट में एक पैसा नहीं, पूछते हैं?
नागरिक- पैसा क्यों दूँ? कोई लोटा मुझे खरीदना है।
त्रिवेणीनाथ- नहीं खरीदना है तो पूछते क्यों हो?(फिर दो झापड़ लगाता है)
नागरिक- पंड़ित जी, अब मेरे सामने इसे मार नहीं सकते खबरदार।
त्रिवेणीनाथ- मार नहीं सकते, मार नहीं सकते। कहता तो हूँ टेंट से पैसा निकालो नहीं मारूँगा। टेंट में तो एक पैसा है नहीं और चिल्ला रहे हैं मार नहीं सकते। इसने मेरा लोटा छू लिया है। अब मैं लोटा कैसे ले जाऊँगा? लोटा आप लीजिए, मुझे पैसा चाहिए।