मेहरा मेंशन की सुबह आज कुछ ज्यादा ही भारी थी. सूरज की रोशनी खिडकियों से अंदर तो आ रही थी, पर घर के कोनों में पसरी कडवाहट को दूर नहीं कर पा रही थी. सिया सुबह पाँच बजे ही उठ गई थी. उसने अपनी साधारण सी सूती साडी पहनी, बालों का ढीला सा जूडा बनाया और सीधे गायत्री दादी के कमरे की तरफ बढ गई.
उसके लिए ये घर अब एक वर्क- प्लेस (काम की जगह) से ज्यादा कुछ नहीं था. दादी की जाच करने के बाद जब सिया रसोई की तरफ बढी, तो उसका सामना काम्या बुआ से हुआ. बुआ नौकरों को डांट रही थीं, पर जैसे ही उन्होंने सिया को देखा, उनकी आवाज में जहर और बढ गया। आ गई तुम? रसोई का रास्ता तो तुम्हें याद ही होगा, आखिर तुम जैसों की जगह वहीं तो होती है,
बुआ ने तिरस्कार से कहा. सिया रुकी, उसने बुआ की आँखों में आँखें डालीं और शांत आवाज में बोली, काम्या जी, मेरी जगह कहाँ है, ये आप तय नहीं करेंगी. मैं यहाँ दादी की डॉक्टर हूँ. और अगर आपको मेरे काम से दिक्कत है, तो कबीर मेहरा से बात कीजिये, क्योंकि मैं उन्हीं की जिद्द पर यहाँ आई हूँ। बुआ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. उन्हें उम्मीद नहीं थी.
कि सिया इतनी निडरता से जवाब देगी. सिया उन्हें वहीं छोडकर रसोई में चली गई और दादी के लिए काढा बनाने लगी. इधर, कबीर अपने स्टडी Room में बैठा था. उसके सामने कुछ बिजनेस फाइल्स खुली थीं, पर उसका ध्यान कहीं और था. उसे याद आ रहा था कि कैसे कल रात सिया ने उसे' बुजदिल' कहा था. कबीर मेहरा को आज तक किसी ने ऐसा कहने की जुर्रत नहीं की थी।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और कमरे से बाहर निकला. डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था. बलराज दादाजी और दादी पहले से वहाँ मौजूद थे.
कबीर अपनी कुर्सी पर बैठा और अपनी प्लेट में नाश्ता लेने लगा. तभी सिया कमरे में दाखिल हुई, उसके हाथ में दादी की दवाइयों की ट्रे थी. कबीर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा. सिया की सादगी उसे बार- बार चिढा रही थी.
उसे लगा था कि सिया वापस आकर थोडा झुककर रहेगी, पर वो तो और भी ज्यादा स्वाभिमानी हो गई थी। सिया, तुम भी यहाँ बैठो और नाश्ता करो, गायत्री दादी ने बडे प्यार से कहा. कबीर का हाथ रुक गया. उसने सिर उठाकर दादी की तरफ देखा. दादी, ये डॉक्टर हैं. इनका नाश्ता इनके कमरे में भी भेजा जा सकता है.
घर के टेबल की कुछ मर्यादा होती है। सिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने ट्रे मेज पर रखी और कबीर की तरफ मुडकर बोली, शुक्रिया गायत्री दादी, पर Mister मेहरा सही कह रहे हैं. हर चीज की एक मर्यादा होती है, और इस टेबल पर बैठने की मेरी कोई इच्छा भी नहीं है. मुझे घमंडी लोगों के साथ बैठकर भूख नहीं लगती।
पूरे हॉल में सन्नाटा पसर गया. काम्या बुआ की आँखें फैल गईं. बलराज दादाजी ने कबीर की तरफ देखा, जो गुस्से में अपनी कुर्सी से खडा हो गया था.
जबान संभालकर बात करो सिया! तुम भूल रही हो कि तुम मेहरा मेंशन में खडी हो, कबीर ने दहाडते हुए कहा। मैं वही बोल रही हूँ जो आप सुनना नहीं चाहते. आपने मुझे यहाँ बुलाया है क्योंकि आपको मेरी जरूरत है, मुझे आपकी नहीं. तो बेहतर होगा कि आप अपना एटीट्यूड अपने बिजनेस मीटिंग्स तक रखें, सिया ने बेबाकी से जवाब दिया और दादी को दवा देकर बिना पीछे मुडे वहाँ से चली गई.
कबीर का गुस्सा सातवें आसमान पर था. उसने अपना नाश्ता वहीं छोडा और पैर पटकता हुआ सिया के पीछे गया. सिया अपने कमरे का दरवाजा बंद करने ही वाली थी कि कबीर ने उसे धक्के से खोल दिया। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई सबके सामने मुझे नीचा दिखाने की? कबीर ने उसे दीवार की तरफ धकेला. सिया बिल्कुल नहीं डरी.
उसने कबीर के सीने पर अपना हाथ रखा और उसे पीछे की तरफ धक्का दिया. नीचा मैंने नहीं, आपकी हरकतों ने आपको दिखाया है. आप चाहते हैं कि मैं यहाँ एक नौकरानी की तरह रहूँ, ताकि आपका ईगो संतुष्ट हो सके? भूल जाइये Mister मेहरा. मैं यहाँ सिर्फ अपनी ड्यूटी करने आई हूँ, आपकी गुलामी नहीं। कबीर ने उसका हाथ पकड लिया और उसे अपनी तरफ खींचा.
दोनों के बीच फासला इतना कम था कि वो एक- दूसरे के दिल की धडकन सुन सकते थे. कबीर की आँखों में एक अजीब सी आग थी— गुस्सा या कुछ और, ये कहना मुश्किल था। तुम यहाँ मेरी शर्तों पर आई हो सिया. और मेरी शर्त ये है कि तुम इस घर के किसी भी सदस्य से बदतमीजी नहीं करोगी, कबीर ने फुसफुसाते हुए कहा, पर उसकी आवाज में एक भारीपन था.
शर्तें बराबर के लोगों में होती हैं, मालिकों और गुलामों में नहीं. और मैं आपकी गुलाम नहीं हूँ, सिया ने अपना हाथ छुडाने की कोशिश की. कबीर ने उसकी पकड और मजबूत कर ली. तुम क्या चाहती हो सिया? क्या चाहती हो तुम मुझसे? मैं चाहती हूँ कि आप मुझे एक इंसान समझें, कोई वस्तु नहीं. पर शायद आपके पास वो दिल ही नहीं है जो किसी दूसरे का दर्द समझ सके,
सिया की आँखों में इस बार नमी थी,
पर वो कमजोरी के आँसू नहीं थे. कबीर ने धीरे से उसका हाथ छोड दिया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इस लडकी से इतनी नफरत क्यों कर रहा है, या फिर उसे सिया की ये बेबाकी अपनी तरफ क्यों खींच रही है. कबीर बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल गया.
दोपहर के वक्त, काम्या बुआ ने अपनी एक नई चाल चली. उन्होंने जानबूझकर गायत्री दादी के कमरे का कीमती फूलदान गिरा दिया और जब सिया वहाँ पहुँची, तो उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया.
देखो! देखो इस लडकी ने क्या किया! माँ की पसंद का सबसे कीमती फूलदान तोड दिया. कबीर, इसे बाहर निकालो! बुआ ने चिल्लाते हुए कहा. कबीर और दादाजी तुरंत वहाँ पहुँचे. सिया शांति से टूटे हुए टुकडों को देख रही थी. उसे पता था कि ये बुआ का काम है।
सिया, ये क्या है?
दादाजी ने सवाल किया. सिया ने बुआ की तरफ देखा और फिर दादाजी से बोली, दादाजी, फूलदान मैंने नहीं गिराया. पर अगर आप सबको लगता है कि मेरी मौजूदगी से यहाँ चीजें टूट रही हैं,
तो शायद मेरा यहाँ से जाना ही बेहतर होगा। काम्या बुआ के चेहरे पर जीत की मुस्कान थी. पर तभी कबीर आगे बढा. उसने जमीन पर पडे टुकडों को देखा और फिर बुआ की तरफ मुडा.
बुआ, ये फूलदान जिस कोने में रखा था, वहाँ सिया का जाना मुमकिन ही नहीं है क्योंकि वहाँ दादी की दवाइयों की अलमारी है. और मैंने आपको वहाँ से निकलते हुए देखा था, कबीर ने शांति से कहा.
बुआ का चेहरा सफेद पड गया. कबीर, तुम अपनी बुआ पर शक कर रहे हो? मैं शक नहीं कर रहा, मैं देख रहा हूँ. आज के बाद सिया पर कोई भी झूठा इल्जाम नहीं लगाएगा.
वो यहाँ मेरी जिम्मेदारी है, और जो मेरी जिम्मेदारी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, वो मुझसे बुरा कोई नहीं पाएगा, कबीर ने साफ कर दिया. सिया ने हैरानी से कबीर को देखा. ये पहली बार था जब कबीर ने उसका पक्ष लिया था.
पर कबीर ने उसकी तरफ देखे बिना ही कमरे से बाहर कदम बढा दिए. रात को जब मेंशन में सब सो चुके थे, सिया बगीचे में बैठी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि कबीर अचानक उसका बचाव क्यों करने लगा.
क्या ये उसका कोई नया खेल था? तभी पीछे से एक आवाज आई। ज्यादा मत सोचो. मैंने वो तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि सच के लिए किया था, कबीर वहीं खडा था, चाँद की रोशनी उसके चेहरे पर पड रही थी। शुक्रिया, सिया ने धीमी आवाज में कहा।
शुक्रिया की जरूरत नहीं है. बस अपना काम ठीक से करो. दादी कल से फिर से थोडा कमजोर महसूस कर रही हैं, कबीर ने अपना एटीट्यूड फिर से ओढ लिया। वो इसलिए क्योंकि घर का माहौल तनावपूर्ण है।
अगर आप चाहते हैं कि वो ठीक हों, तो आपको थोडा बदलना होगा, सिया ने उसे आईना दिखाया. कबीर ने एक लंबी सांस ली और आसमान की तरफ देखने लगा. बदलना इतना आसान नहीं होता सिया. खासकर तब, जब पूरी दुनिया आपको पत्थर दिल मानती हो। सिया ने कबीर को देखा.
पहली बार उसे कबीर के उस सख्त चेहरे के पीछे एक अकेलापन नजर आया. पर वो कुछ बोली नहीं. दोनों वहीं खामोशी में खडे रहे— दो अलग- अलग किनारे, जो शायद कभी नहीं मिल सकते थे, पर आज रात उनकी खामोशी एक जैसी थी.
क्या कबीर का यह बचाव सिया के दिल में जगह बना पाएगा?
काम्या बुआ की अगली चाल इस बार कितनी खतरनाक होगी?
क्या दादी कबीर और सिया की इस' कोल्ड वार' को खत्म कर पाएंगी?
दोस्तों, इस कहानी के हर शब्द को मैंने अपनी भावनाओं और कडी मेहनत से पिरोया है. एक- एक सीन को विजुअलाइज करने और उसे लिखने में बहुत समय और दिल लगता है. मुझे इस सफर में आप सबके साथ और प्यार की बहुत जरूरत है. अगर आपको मेरी यह कोशिश अच्छी लग रही है, तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें. आपका एक लाइक, कमेंट और फॉलो मुझे और भी शानदार लिखने की प्रेरणा देता है.
आपके प्यार के बिना यह कहानी अधूरी है.
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