🌿 दीक्षा — भाग १ 🌿अंधकार से प्रथम परिचय
धनबाद जिले की कोयला नगरी के समीप बंगालियों की एक बड़ी कॉलोनी थी।
उसके चारों ओर टीन, प्लास्टिक और खपरैल से बने कई झोपड़ीनुमा घर बिखरे पड़े थे।
सुबह होते ही पूरी बस्ती जाग उठती—
कहीं कोयले से काली हुई औरतें पानी भरतीं,
कहीं बच्चे आधी टूटी चप्पलों में स्कूल भागते,
तो कहीं मजदूर हाथ में टिफिन दबाए फैक्ट्रियों की ओर निकल पड़ते।
इसी चहल-पहल वाली बस्ती में मौसमी बैनर्जी अपने पति संजय मंडल और दो जवान होती बेटियों के साथ रहती थी।
संजय हिन्दुस्तान पेट्रोलियम की गाड़ियां चलाता था।
आमदनी बुरी नहीं थी।
पर उसकी सबसे बड़ी समस्या थी—नशा।
शाम ढलते ही वह मोहल्ले के कुछ आवारा दोस्तों के साथ बैठ जाता।
दारू, गाली और शोर—यही उसकी दुनिया थी।
घर में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता जब लड़ाई न होती।
नशे में लड़खड़ाता हुआ वह अक्सर मौसमी पर चिल्लाता—
“तुम्हारे बाप का नहीं पी रहा हूं!
खून जला के कमाता हूं!
थोड़ी पी ली तो क्या आसमान टूट पड़ा?
खाना-खुराकी मिल रहा है न?
अपना भाषण बंद रख!”
मौसमी चुप रह जाती।
अब विरोध करने की ताकत उसमें नहीं बची थी।
कभी-कभी वह देर रात अकेले बैठ सोचती—
“क्या इसी आदमी के लिए मैंने अपना घर छोड़ा था?”
युवावस्था में संजय लंबे बाल रखता था।
उसकी चाल-ढाल बिल्कुल फिल्मों के अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती जैसी थी।
मेदनीपुर के बांग्लाहट गांव में सहेली की शादी में जब मौसमी पहली बार उससे मिली थी, तभी उसके बाहरी रूप पर मोहित हो गई थी।
माता-पिता ने लाख समझाया—
“रूप देखकर जीवन का निर्णय मत ले।”
पर प्रेम में डूबी मौसमी ने किसी की नहीं सुनी।
दोनों घर छोड़ धनबाद आ बसे।
समय बीतते देर नहीं लगी।
धीरे-धीरे संजय का असली चेहरा सामने आने लगा।
नशा, झूठ, मारपीट और दूसरी औरतों से संबंध…
मौसमी को आज भी लगता था—
“काश…
मैंने उसके बाल नहीं, उसके संस्कार देखे होते…”
उसने कभी यह नहीं देखा था कि संजय किसी बूढ़े का सम्मान करता है या नहीं।
किसी जीव पर दया करता है या नहीं।
उसकी वाणी में शिष्टता है या नहीं।
वह केवल बाहरी चमक पर मोहित हो गई थी।
अब वही गलती उसके जीवन का दंड बन चुकी थी।
कई बार उसने घर छोड़ने की सोची।
पर दो जवान होती बेटियों का चेहरा सामने आते ही उसके कदम रुक जाते।
जाए भी तो कहाँ?
मायके के दरवाजे तो उसके लिए वर्षों पहले बंद हो चुके थे।
उसकी बड़ी बेटी मौ बैनर्जी सोलह वर्ष की थी।
वह अपनी मां की बेटी कम, सहेली अधिक लगती थी।
जब भी संजय हाथ उठाता, मौ बीच में आ खड़ी होती।
यह घर नहीं था—नरक था।
यहां न धर्म की कोई बात होती,
न बच्चों को नीति की कहानियां सुनाई जातीं।
बेटियां रोज नए-नए गाली शब्द सीख रही थीं।
ऐसी भद्दी गालियां कि सुनने वाले का सिर शर्म से झुक जाए।
पर इसी अंधकार के बीच शायद कहीं एक छोटी सी रोशनी जन्म लेने वाली थी।
एक दिन स्कूल में मौ की सहेलियां उससे बोलीं—
“कल रेलवे गेट के पास बहुत बड़ा सत्संग है।
भंडारा भी होगा।
तू तो इतना सुंदर गाती है, तुझे हमारे साथ चलना ही पड़ेगा।”
मौ ने पहले हिचकिचाया।
घर का माहौल ऐसा था कि उसे धार्मिक आयोजनों से कोई विशेष लगाव नहीं था।
पर उसके स्कूल के शिक्षक गोपाल दे अक्सर श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी की बातें किया करते थे।
वे स्वयं दीक्षित थे।
सादा सफेद वस्त्र, शांत चेहरा, मधुर वाणी…
न प्याज, न लहसुन, न नशा।
मौ को हमेशा लगता—
“सर बाकी लोगों जैसे क्यों नहीं हैं?”
गोपाल दे मौ के घर की परिस्थिति जानते थे।
उन्होंने भी स्नेह से कहा—
“मां को लेकर जरूर आना।
अच्छा लगेगा।”
अगले दिन रेलवे गेट के समीप विशाल पंडाल सजा था।
चारों ओर सफेद धोती-कुर्ते और लाल किनारी वाली सफेद साड़ियों में माताएं दिखाई दे रही थीं।
पूरा वातावरण ऐसा लग रहा था मानो किसी देव लोक का उत्सव धरती पर उतर आया हो।
करताल, शंखध्वनि और “वंदे पुरुषोत्तमम्” के जयघोष से पूरा मैदान गूंज रहा था।
मौसमी ने आश्चर्य से देखा—
उनकी कॉलोनी और मोहल्ले के कई लोग वहां सेवा में लगे हुए थे।
वे लोग, जिन्हें उसने हमेशा शांत और प्रेमपूर्ण पाया था।
थोड़ी देर बाद मंच पर बैठे सहप्रतृत्विक देव मधु दा ने बोलना शुरू किया—
“श्रीश्री ठाकुर जी ने प्रत्येक नारी में मातृभाव देखने की शिक्षा दी है।
मातृभाव स्थापित हुए बिना किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करना चाहिए।
इसीलिए सत्संग में हर स्त्री को ‘मां’ कहकर संबोधित किया जाता है।”
पूरा पंडाल शांत था।
मधु दा आगे बोले—
“माताएं…
घर को स्वर्ग बनाना हो या नरक—उसकी नींव आपके हाथ में होती है।
यदि पति नशे में डूब गया है…
यदि वह अनैतिक रास्ते पर चला गया है…
तो केवल गाली और क्रोध से परिवर्तन नहीं आएगा।
हिंसा से द्वेष जन्म लेता है।
अहिंसा से प्रेम…
प्रेम से श्रद्धा…
और श्रद्धा से परिवर्तन।”
ये शब्द सीधे मौसमी के भीतर उतरते चले गए।
उसे पहली बार लगा—
शायद वह केवल संजय को दोष देती रही…
पर घर से प्रेम और श्रद्धा भी तो कहीं खो गई थी।
मधु दा की आवाज फिर गूंजी—
“श्रीश्री ठाकुर जी की अमोघ वाणी है—
‘सत्संग का आश्रय ग्रहण करो।
सतनाम मनन करो।
मैं तुम्हें निश्चय ही कहता हूं—
तुम्हें अपने उन्नयन के लिए अलग से सोचना नहीं पड़ेगा।’”
मौसमी की आंखें भीग उठीं।
उधर भंडारे में हजारों लोग अनुशासन से प्रसाद ग्रहण कर रहे थे।
इतनी विशाल भीड़…
फिर भी न धक्का-मुक्की, न पुलिस।
बार-बार माइक से घोषणा हो रही थी—
“सत्संग अनुसरण और अनुशासन का दूसरा रूप है।”
थोड़ी देर बाद संगीतांजलि प्रारंभ हुई।
मौ का नाम पुकारा गया।
इतने बड़े मंच पर वह पहली बार गाने जा रही थी।
उसके हाथ कांप रहे थे।
मां का हाथ पकड़कर वह मंच पर चढ़ी।
सामने ठाकुर जी का विशाल विग्रह था।
मौ ने प्रणाम किया।
फिर धीरे-धीरे उसने बंगला में भक्ति-गीत आरंभ किया।
कुछ ही क्षणों में पूरा वातावरण बदल गया।
करताल की ध्वनि तेज हो उठी।
माताएं भावविभोर होकर झूमने लगीं।
लोग आपस में कहने लगे—
“इतनी सुंदर बच्ची को आज तक बड़े मंच पर क्यों नहीं लाया गया?”
तभी किसी ने कहा—
“वह अभी दीक्षित नहीं है।”
मौसमी यह सब देख स्तब्ध थी।
उसे पहली बार समझ आने लगा—
क्यों उनके पड़ोसी हमेशा प्रेम से रहते हैं।
क्यों उनके घरों से गाली नहीं, भजन की ध्वनि आती है।
शायद…
दीक्षा में सचमुच कोई शक्ति होती है।
उसी समय सामने वाली कॉलोनी के राहुल बैनर्जी वहां आए।
रिश्ते में वे मौसमी के चाचा लगते थे।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“चलो…
मधु दा अभी दीक्षा गृह में बैठे हैं…”
और मौसमी ने जीवन में पहली बार किसी ऐसे द्वार की ओर कदम बढ़ाया…
जहां शायद उसे दोष नहीं, दिशा मिलने वाली थी।
॥ प्रथम भाग समाप्त ॥
जयगुरु 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तम