खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भूमिका in Hindi Anything by Hind Gaurav books and stories PDF | खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भूमिका

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भूमिका

इस क्षणभंगुर अस्तित्व में यदि कोई तत्त्व स्थायी हैं तो वे हैं आत्मसम्मान तथा स्वतंत्रता। ये तत्त्व, बहुत मूल्य चुका कर प्राप्त होते हैं। मेवाड़ के महान सिसोदिया राजवंश ने अपने सुख, संपत्ति व जीवन का मूल्य चुकाकर ये तत्त्व हिंदू समाज को सहजता से दे दिए।

एक सहस्त्र वर्षों तक अरावली में यायावरों सा जीवन जीने वाले मेवाड़ के इन अवतारी पुरुषों के कारण ही भारत में आज केसरिया लहराता है। यह पुस्तक उन महापुरुषों के प्रति हिंदू समाज की कृतज्ञता व्यक्त करने का एक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष प्रामाणिकता से भारत के इतिहास के साथ हुए व्यभिचार को उजागर किया है। यह पुस्तक स्थापित भ्रांतियों को भंग करने के अतिरिक्त नई मान्यताओं को भी स्थापित करती है। भारतीय उपमहाद्वीप में गत चौदह शताब्दियों से चले आ रहे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को यह पुस्तक उसकी भयानक नग्नता में प्रकट करती है। हत्यारे व बलात्कारी आक्रांताओं के समूह से हिंदू धर्म को बचाकर लाने वाले इन देवपुरुषों के इतिहास को किस निर्लज्जता व निकृष्टता से पोंछ डाला गया है, यह इस पुस्तक का आधार है।

सत्य कोई अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन का मूल स्त्रोत है। जो समाज असत्य में जिएगा, वह बच नहीं सकता। जो समाज सत्य धारण करेगा, वह शाश्वत अमरत्व को प्राप्त होगा। मेवाड़ के महान् पुरखे तो सत्य में जीकर इहलोक और परलोक में परमगति पा गए। क्या आज के हिंदू समाज में इतना आत्मबल है कि सत्य के लिए लड़ सके.. जी सके और मर सके !

इन प्रश्नों के उत्तर ही निश्चित करेंगे कि हिंदू समाज सफलता के शिखर को छुएगा या अब्राह्मिक मतों की दासता भोगता हुआ मिट जाएगा।


~ भूमिका ~

एक ब्रिटिश कवि मैथ्यू अर्नोल्ड ने भारत के हिंदुओं के लिए ये पंक्तियाँ लिखी हैं–
'विस्फोट होने से पहले ही झुक गया पूरब,
गहन धैर्य व अन्यमनस्कता में,
सैन्य पंक्तियों को गरजते हुए जाने दिया,
और फिर से ध्यान में मग्न हो गया।'

ये पंक्तियाँ सार हैं उस विमर्श का, जिसने लगभग 300 वर्षों से हमारे अभागे देश की चेतना को बंधक बनाकर रखा है।

विशेषकर गत सात दशकों से तो वामपंथी-इस्लामी विचारकों द्वारा हमारे इतिहास के बलात् अधिग्रहण के कारण हमारे साहित्य व सामान्य जीवन में यह विमर्श अंगद के पैर की भाँति जम चुका है।

इसके अनुसार, हिंदू वे मूक और कायर लोग हैं, जो अपने वाणिज्य-व्यापार एवं अध्यात्म में ही रत रहे एवं भारतीय उपमहाद्वीप को निरंतर चोट पहुँचाने वाले इस्लामी आक्रांताओं को उन्होंने कोई चुनौती ही नहीं दी।

फिर कुछ वर्ष पूर्व, ट्विटर पर मेरे सामने श्री संजय दीक्षित का एक ट्वीट आया। संजय जी पूर्व उच्चाधिकारी, लेखक एवं एक क्रांतिकारी हिंदू विचारक हैं, जिन्होंने अपने ट्वीट में दिवेर के युद्ध का उल्लेख किया था, जहाँ 1583 ईसवी में महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना को पराजित किया था।

अपने अज्ञान एवं बौद्धिक आलस्य के कारण मैंने उस पर इतना अधिक ध्यान नहीं दिया ।

मुझे लगा कि यह प्रताप को महिमामंडित करने का एक अतिशयोक्तिपूर्ण प्रयास है। फिर मैंने अनायास ही दिवेर के निकट देवगढ़ में रहने वाले अपने एक मित्र श्री शत्रुंजय सिंह जी से जानकारी ली। उन्होंने मुझे देवगढ़ के एक पुण्यात्मा, श्री नारायण जी उपाध्याय से मिलवाया। यह भेंट मेरी सोच व जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

नारायण सा मुझे दिवेर एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों में ले गए जहाँ 1583 ईसवी में विजयदशमी के दिन हुए इस युद्ध के साक्ष्य उपस्थित थे।

वह स्थान देखा, जहाँ मेवाड़ के योद्धा कभी विश्राम करते थे। वे प्राचीन बावड़ियाँ देखीं, जो मनुष्य एवं पशु दोनों का समान रूप से पोषण करती थीं।

नारायण सा मुझे राजसमंद ले गए, जहाँ पर मूलतः एक तेलुगु इतिहासकार रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा लिखा इतिहास, शिलालेखों में उकेरा हुआ है। इन शिलालेखों में दिवेर के युद्ध का विस्तृत विवरण है।

मैंने पाँच शताब्दियों पुराने रास्तों पर समय के साथ धूमिल न होते अश्वों के पदचिह्नों को भी देखा। मैंने विश्वसनीय लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकों में दर्जनों उदाहरण पढ़े, जिनसे दिवेर के युद्ध की प्रामाणिकता सत्यापित होती है कि यही वह युद्ध था, जिसके पश्चात् मेवाड़ को इस्लामी साम्राज्यवादी अकबर के पंजों से छुड़वाया गया।

दिवेर के विषय में खोज करते हुए मुझे दो पुस्तकें मिली। पहली थी जेम्स टॉड द्वारा लिखित ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ एवं दूसरी, श्री श्यामलदास द्वारा लिखित ‘वीर विनोद’। इन दोनों ही पुस्तकों के आधार पर मुझे दिवेर के युद्ध से संबंधित पुष्ट प्रमाण प्राप्त हुए ।

इन पुस्तकों के पन्नों में मुझे दिवेर के अतिरिक्त, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के जीवनचरित्र एवं क्रियाकलापों के विषय में विस्तार से परिचय मिला।

मैं ठगा सा रह गया इन महिमाशाली राजाओं के चरित्र को पढ़कर कि कैसे इन देवतुल्य महाराणाओं का सत्य हमसे बिल्कुल ही छुपा लिया गया है!

मुझे उन चरित्रों, उन प्रकरणों इत्यादि को पढ़कर रोमांचक गर्व व आश्चर्य हुआ कि आखिर कैसे, इतने कम संसाधनों की सहायता से मेवाड़ के इन महाराणाओं ने क्रूर हत्यारों के समूह को सहस्र वर्षों तक पराजित किया।

दुर्भाग्यवश, इन महाराणाओं के विषय में हमें बहुत ही कम लिखित प्रमाण मिलते हैं। मेवाड़ के लेखकों एवं इतिहासकारों के लेखन में तीन प्रमुख सूत्रों का उल्लेख होता है—
1. हिंदू मंदिरों एवं दुर्गों में प्राप्त शिलालेख,
2. मेवाड़ राजवंश की वंशावली व उनकी ख्यात,
3. लोकश्रुति में प्रचलित महाराणाओं के जीवन चरित्रों की कथाएँ।

मेवाड़ के मुसलमानों के साथ 1,000 वर्षों तक चले निरंतर संघर्ष में इस्लामी आक्रांताओं के द्वारा हिंदू साहित्य ग्रंथों इत्यादि को जलाकर और हिंदू मंदिरों व दुर्गों को तोड़कर भारतीय इतिहास को सर्वाधिक हानि पहुँचाई गई। ये अनपढ़ लुटेरे, लिखित इतिहास के जो प्राथमिक स्रोत थे, उनका नाश करना अपना धर्म मानते थे।

विपुल साहित्य व इतिहास इन बर्बर आक्रांताओं के कारण सदा के लिए खो गया। उदाहरणार्थ, तेरहवीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा व अध्ययन के महान केंद्र को ही जला दिया।

नालंदा का पुस्तकालय इतना विशाल था कि छह माह तक जलता रहा। यही घिनौना कृत्य अनेकानेक हिंदू गुरुकुलों व शिक्षा केंद्रों के साथ किया गया। तेरहवीं सदी में मुसलमान गुलाम वंश का इल्तुतमिश, दस वर्षों तक केवल राजस्थान के गुरुकुलों को ही जलाता रहा।

इस्लामी आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए हिंदू मंदिरों की संख्या हजारों में है। इन मंदिरों के साथ ही वे बहुमूल्य शिलालेख भी नष्ट हो गए, जिनमें हमारे पूर्वज हमारा इतिहास उकेर कर गए थे।

इन्हीं दोनों कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप में लिखित हिंदू इतिहास के प्रमुख स्रोत नष्ट हो गए। ऐसे में मेवाड़ के इतिहास के साथ ऐसा होना कुछ नया नहीं था।

भारतीय इतिहासकार, इस्लामी इतिहासकारों, जैसे कि फरिश्ता, अबुल फज्ल, अल बदायूँनी या मुगल बादशाहों, जैसे बाबर, जहाँगीर तथा औरंगजेब द्वारा लिखे अथवा लिखवाए गए ग्रंथों पर निर्भर होने को विवश हो गए।

यह एक प्रमुख कारण है कि दस सहस्र वर्ष पुरातन हमारी महान सभ्यता के विषय में यदि हम गहन जानकारी प्राप्त करना चाहें तो हमें अधिकतर केवल असत्य ही प्राप्त होते है। किंतु फिर भी, जब मैंने टॉड तथा 'वीर विनोद' के लेखन में मेवाड़ के विलक्षण महाराणाओं के विषय में पढ़ा कि कैसे सतत् 1,000 वर्षों तक केवल एक राजपरिवार के वंशजों द्वारा ही इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध महान संघर्ष किया गया, तो मेरे सुखद आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही।

मेरी जानकारी में मानव इतिहास में कभी, कहीं ऐसा नहीं हुआ है कि इस्लामी आक्रांताओं द्वारा किए गए कपटपूर्ण, हिंसक एवं निर्दयी आक्रमण का किसी एक राज्य ने इतनी तीव्रता से अनवरत प्रतिकार किया एवं उन पर विजय भी प्राप्त की।

तर्क व सत्यनिष्ठा के आधार पर मैंने जाना कि कितने अनर्गल असत्यों का निर्माण इस देश के तथाकथित इतिहासकारों ने किया है। अपनी विद्या व ज्ञान के साथ इतना गहरा छल करने वाले ये स्वयं घोषित इतिहासकार व बुद्धिजीवी स्वयं के साथ कैसे जीते होंगे, यह तो वही बता सकते हैं।

परंतु हिंदू समाज का अधिकार है यह जानना, कि आखिर क्या मंतव्य था इन लोगों का यूं हमारे इतिहास को पोंछ डालने का ?

कौन लोग थे, जो राज्य व्यवस्था में बैठे इन मक्कार वामपंथियों के सहायक थे ? आखिर कैसे एक ही दिन में चित्तौड़ के 40,000 हिंदुओं की निर्मम हत्या करने वाला अकबर हमारे लिए महान बना दिया गया ? आखिर क्यों मुगल हत्यारों को हमारी महान सभ्यता के लिए हितकारी बताया जाता है ?

1,000 वर्षों के संघर्ष में इस्लामी आक्रांताओं ने भारत में केवल तीन मुख्य निर्माण किए— लाल किला, ताजमहल एवं कुतुब मीनार।

क्यों हमारे तथाकथित इतिहासकारों की दृष्टि में, हिंदू राजाओं द्वारा निर्मित सहस्रों दुर्ग, मंदिरों, मूर्तियों, गुफाओं में बने भित्ति चित्र, महल, चित्र इत्यादि का कोई मूल्य नहीं है ?

तथापि, जो सबसे बड़ा व प्रभावी छल इस देश के इतिहासकारों ने किया, वह है, मेवाड़ के साहसी महाराणाओं का नाम इतिहास से पूरी तरह मिटा देना।

वे महाराणा, जिनका कर्तृत्व व जीवन, उस समय की किसी महान क्रांति से कम नहीं था।

उनके नाम तक भारत के सार्वजनिक जीवन से मिट गए हैं!

बाप्पा रावल, मेवाड़ वंश के संस्थापक एवं एक शक्तिशाली राजा, जिन्होंने भारत पर सबसे पहले आक्रमण करने वाले अरब इस्लामी आक्रांताओं को बुरी तरह पराजित कर ईरान तक खदेड़ा। उन महान बाप्पा रावल का नाम इतिहास की पुस्तकों से हटा ही दिया गया, जबकि देश में विध्वंस एवं हत्याओं का तांडव करने वाले इस्लामी हत्यारों को 'दिल्ली सल्तनत' की उपाधि दी गई।

इस पुस्तक में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि दिल्ली सल्तनत नाम की कोई सल्तनत थी ही नहीं। यह वामपंथी एवं इस्लामी बुद्धिजीवियों द्वारा आविष्कृत एक पूर्णतया असत्य प्रस्तावना है।

महाराणा सांगा, कुंभा एवं हम्मीर सिंह के शासन में मेवाड़ का हिंदू राज्य तथाकथित दिल्ली सल्तनत से कई गुना अधिक बड़ा था। फिर भी हमारे पाठ्यक्रम में उनकी जगह तुगलक, खिलजी और लोधी जैसे विभिन्न वंशों के लुटेरों को, जिन्होंने केवल दिल्ली एवं आस-पास के कुछ क्षेत्र पर राज किया, हमारी पुस्तकों में शक्तिशाली सुल्तान व देश के संरक्षकों के रूप में दर्शाया गया है।

दिल्ली सल्तनत के अतिरिक्त एक और झूठ जो गढ़ा गया, वह है ‘हिंदू दासता के 1,000 वर्ष’, जिसका सत्य मैंने मेवाड़ का इतिहास पढ़कर जाना।

जब पूरा मेवाड़ कभी एक दिन भी न तो पराजित हुआ और न ही उस पर कभी इस्लामी आक्रांताओं का अधिकार हुआ, तो हिंदुओं की दासता का नंगा असत्य किसने और क्यों गढ़ा, यह इस पुस्तक का मौलिक अन्वेषण है। 

और मेवाड़ ही क्यों ?

दसवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य आए महमूद गजनी व अन्य इस्लामी आक्रांताओं का शाहिया वंश द्वारा प्रतिकार, आठवीं शताब्दी तक कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा उत्तरी एवं मध्य भारत की इस्लामी आक्रमणों से रक्षा का सत्य भी मिटा दिया गया।

मध्य भारत के गुर्जर-प्रतिहार राजाओं द्वारा अरब आक्रमणकारी को सदैव पराजित किया गया, और अरब इतिहास में उन्हें 'जुर्ज के राजा' अर्थात् 'मुस्लिम आस्था के सबसे बड़े शत्रु' बताया गया है। सिंध के जाट, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर ध्वस्त करके लौटती महमूद गजनी की सेना को समाप्त कर दिया था। रावल खुमाण, शक्ति कुमार, जैत्र सिंह, मूल राजा, भीमदेव, गुर्जर प्रतिहार राजा, चालुक्य, राष्ट्रकूट, कलिंग, विजयनगर, असम के अहोम, मराठे आदि ऐसे दर्जनों योद्धाओं के शौर्य को अपने कपट से आच्छादित कर, केवल हिंदू दासता का झूठ सतत् हमारी धमनियों में घोला जाता रहा।

कुछ पश्चिमी इतिहासकारों, जैसे जॉन मिल या रिचर्ड ईटन ने इस्लामी आक्रांताओं के महिमामंडन एवं भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी आक्रमण का विरोध करने वाले हिंदू राजाओं को नीचा दिखाना आरंभ किया। अधिकांश आधुनिक हिंदू इतिहासकारों ने उपमहाद्वीप में शताब्दियों तक चले हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के ऐतिहासिक कालक्रम को समझे बिना ही, इस मिथ्यारंजित भारतीय इतिहास को प्रचलित करने में सक्रिय रूप से भाग लिया।

इनमें से कुछ ने तो ऐसा भारत की आध्यात्मिक संस्कृति को पश्चिम एवं मध्यपूर्व के आक्रांताओं की भोगवादी संस्कृति से उत्कृष्ट बताने की अपनी सड़ी-गली, कपोलकल्पित धारणा के चलते किया। एक ऐसी निकृष्ट धारणा, जिसका व्यावहारिक जीवन से कोई संबंध ही नहीं था। आध्यात्म का अर्थ यदि गुंडों के एक समूह के आगे समर्पण होता, तो क्या श्री कृष्ण, महाभारत का युद्ध करवाते ? वे भी कुछ ले-देकर यथास्थिति बनाए रख सकते थे।

इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के आलस्य, उनकी दीन-हीन मानसिकता एवं हिंदू नेतृत्व तथा धनी व समर्थ हिंदुओं द्वारा किए गए वैचारिक समर्पण का परिणाम है कि ये असत्य, भारतवर्ष की पाठ्य-पुस्तकों से लेकर सामान्य जनजीवन तक, सभी जगह फैल गए। ईसाई मिशनरियों ने इस प्रयास में खुलकर साथ दिया और हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करके वे वामपंथ की पोषित इस पकी फसल को काटने में लग गए।

15 अगस्त, 1947 को जब गोरे साहिबों द्वारा स्थानीय भूरे साहिबों को सत्ता का हस्तांतरण हुआ, तब कांग्रेसियों, वामपंथियों, मुसलमानों एवं इतिहासकार बने मार्क्सवादियों ने ब्रिटिश इतिहासकारों एवं मिशनरियों का बचा खुचा काम समाप्त किया।

मिशनरी, मार्क्सवादी एवं मुल्लाओं को उनके विस्तारवादी लक्ष्य को हवा देने के लिए हिंदू इतिहास का पराजित स्वरूप काफी सुविधाजनक लगा। इसके पश्चात् मीडिया एवं मैकाले-पुत्रों (वे हिंदू जो केवल जन्म से हिंदू हैं और हिंदू धर्म से घृणा करते हैं) ने भी इस नाश में साथ दिया एवं इस देश के पाठ्यक्रम को मुसलमानों के पक्ष में प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इस प्रकार ये भारत विखंडन के पाँच वाहक (मुल्ला, मिशनरी, मीडिया, मैकालेपुत्र तथा मार्क्सवादी) भारत के विखंडन की प्रक्रिया में एक साथ सक्रिय होकर जुट गए।

नेतृत्वहीन, संसाधनहीन व शस्त्रहीन हिंदू समाज, अपने धर्म का नाश किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देखने को विवश हो गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात्, जर्मन सत्ता दो भागों में विभाजित हो गई। एक वे, जो यहूदियों के साथ हुए होलोकास्ट (नरसंहार) को नकारना चाहते थे और दुसरे वे, जो आने वाली पीढ़ियों को सत्य बताना चाहते थे। दूसरा धड़ा कहता था कि इतिहास का मूल उद्देश्य है अपने वंशजों को उनके पूर्वजों की गलतियों के विषय में ज्ञात हो, फलस्वरूप इसकी पुनरावृत्ति न हो। भाग्यवश, इस धड़े की ही जीत हुई।

भारत ने एक स्वतंत्र देश के रूप में इसके ठीक विपरीत रास्ता ही चुना। हम अपने पूर्वजों के साथ इस्लामी आतताइयों द्वारा की गई प्रत्येक धृष्टता को सिरे से नकारते ही आए हैं। देश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रायोजित इस नीति को समझने के लिए केवल एक उदाहरण ही पर्याप्त है।

1989 में, पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने एक सर्कुलर निकाला, जिसमें लिखा था, “मुस्लिम शासन की कहीं पर भी आलोचना ना की जाए। मुसलमान शासकों द्वारा मंदिरों के विध्वंस के विषय में न कहीं छापा, ना कहीं लिखा जाए।”

इस सर्कुलर के साथ दो कॉलम की एक पूरी सूची भी संलग्न थी।

पहले कॉलम में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ घटनाओं का उल्लेख था और दूसरे कॉलम में आवश्यक बदलाव कर उन्हीं घटनाओं को लिखा गया था। पहले कॉलम का नाम 'अशुद्ध' रखा गया था एवं दूसरे कॉलम का नाम था 'शुद्ध'।

इस सर्कुलर को सभी प्रकाशकों के पास भेजा गया। आदेश बड़े ही स्पष्ट और अधिकारपूर्ण थे कि वे तथाकथित त्रुटियों को सुधार लें। प्रकाशक एवं लेखक गण से निवेदन है कि वो अपने द्वारा लिखित अथवा प्रकाशित पुस्तकों में यदि कहीं भी ये अशुद्धियाँ हैं तो उन्हें आने वाले संस्करणों में सुधारें, अथवा संलग्न पृष्ठ को अपनी पहले से प्रकाशित पुस्तकों में त्रुटी सुधार के रूप में चिपकाएँ। प्रकाशकों से अनुरोध है कि वो त्रुटि-सुधार होते ही पुस्तक की एक प्रति सिलेबस कार्यालय में जमा कराएँ।" 

संक्षेप में, हम यहाँ केवल एक ही उदाहरण दे रहे हैं–

पृष्ठ-89 (अशुद्ध) सुल्तान महमूद ने बलात् नरसंहार, लूट, विध्वंस व धर्म परिवर्तन किया।
(शुद्ध) महमूद द्वारा विध्वंस एवं लूटमार मचाई गई।
विडंबना यह है कि मूलतः ये अंश महमूद गजनी के संस्मरणों में से ही लिये गए हैं।
यदि भारत की तत्कालीन सरकार में बैठे लोग, द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् जर्मनों जितने सत्यनिष्ठ (ईमानदार) होते, तो इस तरह के असत्य फैलाने वालों को जेल हो जाती। 
यह कैसी रुग्ण दशा है हिंदू समाज की, जिससे ग्रस्त हो मनुष्य अपने पुरखों के हत्यारों के सत्य को छुपाना चाहता है !
अपराधियों के एक समूह को क्यों नैतिक मनुष्यों के समकक्ष बिठाना चाहता है ! — नीरज अत्री द्वारा

किंतु जैसे पत्थरों का वक्ष चीरकर भी नन्हे पौधे पल्लवित हो आते हैं और कालांतर में अपनी जड़ें जमाते हैं, वैसे ही सत्य के प्रगट होने के भी सहस्रों मार्ग होते हैं। लाख चेष्टा करे कोई दबाने की, एक जाग्रत् समाज में सत्य प्रगट हो ही जाता है। रॉबर्ट ओर्मे एवं जेम्स टॉड जैसे निष्कपट इतिहासकारों ने क्रमश: 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में बड़े ही परिश्रम से मुगलों एवं मेवाड़ वंश के निकटतम ऐतिहासिक तथ्यों को एकत्र करके संकलित किया। महाराणा राज सिंह जी ने भी तेलुगु इतिहासकार, रणछोड़ भट्ट तैलंग को मेवाड़ के राजाओं का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया। उन्नीसवीं सदी में महाराणा सज्जन सिंह ने मेवाड़ के इतिहास के शोध हेतु श्री श्यामलदास जी को अनुदान दिया और 'वीर विनोद' की रचना हुई।

श्री आर. सी. मजूमदार, जदुनाथ सरकार, गौरीशंकर हीरचंद ओझा, राजेंद्र शंकर भट्ट, डॉ. रामगोपाल मिश्रा, डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, डॉ. के.सी. गुप्ता, सूर्य मल्ल मीसण, डॉ. एल.पी. माथुर जैसे सत्यनिष्ठ इतिहासकारों ने भारत का इतिहास तटस्थ रहकर लिखने का प्रयास किया। यद्यपि इन्हें राज्य द्वारा उचित सहयोग नहीं मिला।

इनके कार्य, सम्यक् प्रचार के अभाव में आमजन तक नहीं पहुँच पाए और अंततः भुला दिए गए।

यह पुस्तक इन सत्यनिष्ठ इतिहासकारों के कार्य को समाज तक सरल भाषा में एक कहानी की तरह रोचक बनाकर पहुँचाने का लघु प्रयास है। यह पुस्तक मेवाड़ के महान महाराणाओं के इतिहास के पुनर्लेखन एवं हत्यारे अरबों, तुर्कों, लोधियों, तुगलकों, खिलजियों जैसे बलात्कारी लुटेरों व दुष्ट मुगलों बाबर, अकबर, जहाँगीर व औरंगजेब के विरुद्ध इन महाराणाओं के सफल सैनिक अभियानों पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से लिखी गई है।

जितनी जानकारी मुझे 'वीर विनोद', जेम्स टॉड एवं अन्य शोध इत्यादि से प्राप्त हुई, उसके आधार पर मैंने महाराणाओं की कथा कहने का प्रयास किया है। जिन-जिन पुस्तकों से मैंने उद्धरण लिये हैं, उनका उल्लेख मैंने किया है।

मेरी मौलिक शिक्षा आधुनिक विज्ञान की है तथा मेरी सहज प्रवृत्ति तर्कनिष्ठ व सत्य का निष्पक्ष आकलन करने की है, क्योंकि मैं एक शल्य चिकित्सक हूँ। मैं इतिहासकार तो नहीं हूँ, किंतु इस पुस्तक को लिखकर एक शिक्षित हिंदू के रूप में, मैं सत्य बोलने के अपने अधिकार का उपयोग कर रहा हूँ।

मेरा मत है कि इस्लामी आक्रमणकारियों एवं हिंदुओं के मध्य चले आ रहे सभ्यताओं के संघर्ष के सत्य को सार्वजनिक किया जाना अति आवश्यक है। इस पुस्तक के माध्यम से मैंने 1,400 वर्षों के हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के विषय में फैले असत्य को प्रकाश में लाने एवं महाराणाओं की कथाओं के माध्यम से हिंदुओं में आत्मसम्मान एवं गौरव की भावना पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।

मेरा मंतव्य है कि युवा हिंदू ऐसे ही प्रयास भारत भर में करें एवं शोध इत्यादि के माध्यम से इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध साहसी हिंदुओं के संघर्ष के सत्य को सबके सामने लाएँ। फिर चाहे वे आंध्र के काकातिया राजा हों, कर्नाटक के गौड़ा, असम के अहोम, सिंध के जाट, चालुक्य, राष्ट्रकूट, प्रतिहार वंश, विजयनगर साम्राज्य, अजेय मराठा और ऐसे कई राजवंश, जिन्होंने इस्लामी आक्रांताओं का सीधा सामना किया I प्रत्येक राजवंश का इतिहास एवं बलिदान लोगों के सामने आना चाहिए।

यदि यह पुस्तक हिंदुओं के चैतन्य एवं संवेदनशीलता को समान रूप से जाग्रत् कर पायी तो अपने लक्ष्य में सफल होगी।

यदि हम उन असत्यों को समझ पाएँ, जो आज तक हमें सुनाए गए और जान पाएँ कि हिंदुओं ने इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध कितना साहसपूर्ण संघर्ष किया था, तो यह पुस्तक सिद्ध होगी।

इस पुस्तक का लक्ष्य है कि किसी दिन इतिहास के साथ हुए व्यभिचार पर कोई निष्पक्ष जाँच आयोग बैठे और जिन इतिहासकारों एवं बुद्धिजीवियों ने समाज में सत्य को छिपाकर असत्य स्थापित किया, उन्हें दंडित किया जाए। तथापि, इस पुस्तक का आधारभूत तत्त्व यह है—

इस्लाम हमें पराधीन करने आया था। 
मेवाड़ ने ऐसा होने नहीं दिया।

भारत के मिथ्याचारी वामपंथी इतिहासकारों के मुँह पर एक करारा चाँटा स्वयं एक मुसलमान लेखक अल्ताफ हुसैन हाली ने मारा है। हाली लिखते हैं — 
हिजाज के मजहब का हठी युद्धक बेड़ा 
अपनी पताका संसार के हर कोने में ले गया, 
जिसे सात समुद्र भी नहीं रोक पाए,
हा, वह इस्लाम का बेड़ा गंगा में आ कर डूब गया। 

अरबों को हिंदू राजाओं द्वारा पाँच सौ वर्षों तक निरंतर पराजित कर पीछे धकेला गया। 

फिर आए अफगान, उज्बेक और सभी ने भारत के उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में आंशिक सफलता पाई। किंतु मतांध हत्यारों के सतत आक्रमणों के उपरांत भी 1,000 वर्षों तक विरोध का एक केसरिया ध्वज सदैव ऊँचा लहराता रहा, जिससे ये उपद्रवी सदैव भयभीत रहे : सिसोदिया राजपूतों का मेवाड़।

यह सत्य है कि इन महान राजाओं के साथ हिंदुओं की सभी जातियों ने मिलकर युद्ध किया, किंतु नेतृत्व, किलेबंदी और शत्रु का पहला आघात, मेवाड़ के राजपूतों ने ही अपने वक्ष पर लिया।

मनुष्य के अस्तित्व में उचित व दूरदर्शी नेतृत्व ही सब कुछ होता है। नेतृत्व के बिना निरंकुश मानव समाज, दिशाहीन अराजकता में चला जाता है।

मेवाड़ के महाराणाओं ने इस राष्ट्र के हिंदुओं को इस्लाम के विरोध के अभियान में एक सशक्त नेतृत्व प्रदान किया। इन विस्मयकारी महाराणाओं को भली-भाँति पता था कि इस्लामी आक्रमणकारियों से संघर्ष में उन्हें केवल कष्ट एवं मृत्यु का सामना करना होगा। किंतु इनमें से एक भी महाराणा ने बर्बर इस्लामियों के साथ समझौता नहीं किया।

इस्लामी आक्रांताओं से संधि करने वाले अन्य हिंदू राजाओं की तरह मेवाड़ के ये महाराणा भी भोग-विलास में डूबकर स्त्री-सुख व मदिरा की उन्मत्तता में मेवाड़ के लोगों का रक्तपान करते हुए जीवनयापन कर सकते थे। किंतु उन्होंने इस्लामी अतिक्रमण का पुरजोर विरोध का बीड़ा उठाकर हिंदू समाज को बाँधे रखा। अपने सम्मान तथा हिंदू धर्म की रक्षा में असहनीय कष्ट उठाए, बलिदान दिए और शत्रुओं का संहार किया। यद्यपि यह एक असंतुलित संघर्ष था, जिसमें ये महाराणा, साधनसंपन्न, निर्दयी और अनैतिक, इस्लामी जिहाद की हत्यारी मशीन के सामने संख्या व संसाधन दोनों में कम थे। एक ऐसी घातक विचारधारा, जिसने हिंदुओं की निष्ठा भी खरीद रखी थी, जिसमें कोई भी नैतिक मापदंड नहीं बचा था, सिवाय इसके कि हिंदुओं का सर्वनाश करना है।

इन अद्भुत महाराणाओं ने अपना अधिकांश जीवन इन हत्यारे अतिवादियों से संघर्ष करने के अपने धर्म का पालन करते हुए, कभी अश्व की पीठ पर, कभी जंगलों में निवास कर, कभी पत्तों अथवा पत्थरों पर सोकर, कभी घोर निराशा में, कभी मित्रों को खोने की पीड़ा में व्यतीत किया। 1,000 वर्षों तक ये महाराणा, हिंदुओं की स्वाधीनता और संपन्नता पर होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध अडिग, एकाकी ही खड़े रहे। इन महापुरुषों ने सभी प्रकार के छल-कपट को सहकर भी इस्लामी आक्रमणकारियों को भारतवर्ष की आत्मा को दूषित नहीं करने दिया।

मृत्यु और संघर्ष की छाया में जीवन व्यतीत करते हुए भी इन महाराणाओं ने कभी अपनी तलवारें म्यान में नहीं रखीं, अपने भाले नहीं झुकाए अथवा अपने तीरों को कुंद न होने दिया। ये देवपुरुष 'क्षात्र धर्म' के जीवंत उदाहरण हैं, जो हमें विषम-से-विषम स्थिति में भी निडर होकर खड़े रहना सिखा गए। इन्होंने अपने जीवन, कर्म और मृत्यु से भी सिद्ध कर दिया कि हिंदू कायरता की ओट में बैठे निरीह प्राणी नहीं हैं, बल्कि हिंदू वे सिंह हैं, जो आमने-सामने के संघर्ष में लोहे को लोहे से, अग्नि को अग्नि से और रक्त को रक्त से प्रत्युत्तर देने में सक्षम हैं।

सिसोदिया वंश के महान योद्धाओं में से दो महाराणाओं की यशोगाथा अद्वितीय है : महाराणा हम्मीर सिंह एवं महाराणा प्रताप सिंह। दोनों को ही मेवाड़ का राज्य विदीर्ण एवं क्षत-विक्षत अवस्था में प्राप्त हुआ। किंतु दोनों ने प्रचंड साहस, दूरदृष्टि एवं सम्यक् योजनाओं से मेवाड़ को समाप्त होने से बचा लिया। दोनों ने ही हमें अपने जीवन और कर्मों से सिखाया कि धर्म और स्वाधीनता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। धर्म व स्वतंत्रता की रक्षा में कोई भी मूल्य बड़ा नहीं है। कोई बलिदान इन दोनों से बढ़कर नहीं है। कोई संकट, कोई दुविधा, कोई विवशता, धर्म एवं स्वाधीनता को भुलाने जैसे बड़े नहीं हो सकते।

यदि मेवाड़ इस्लामी अत्याचार के नीचे दब जाता, तो हमारी उत्तरी सीमा कुछ ही दशकों में ध्वस्त हो जाती। हम भी दूसरा अफगानिस्तान बन जाते। अपने-अपने समय में धर्म का ध्वज ऊँचा करने हेतु हिंदुओं के पास हम्मीर एवं प्रताप के अतिरिक्त कोई और था ही नहीं।

यही कारण है कि इन दोनों महापुरुषों को हम सदैव याद रखें, उन्हें पूजें, क्योंकि यदि हम आज भी हिंदू हैं तो केवल उन्हीं के कारण हैं। इन दोनों वीर राजपूतों ने घोर अंधकार के बीच हिंदुओं को जीवन की आशा प्रदान की। तुगलकों के विरुद्ध हम्मीर एवं अकबर के विरुद्ध प्रताप ने।

भारतवर्ष के समस्त हिंदू एवं सभी समकालीन हिंदू राजा भी उन्हें सहज ही अपने नेतृत्व के रूप में मानते थे और इन्हीं महान महाराणाओं का ओज एवं प्रताप था कि समस्त भारत के हिंदू एक केसरिया ध्वज के नीचे एकत्र हो सके, ताकि मुस्लिम आक्रांताओं के विनाश से बचा जा सके। दोनों महाराणाओं ने अपने जीवन में इस कार्य के लिए अतुलनीय मूल्य चुकाया एवं अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने से पहले दोनों को ही घोर संकटों का सामना करना पड़ा। अतः इन दोनों को मेवाड़ के सिसोदिया राजाओं की सशक्त वंशावली में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। हमारे समय के महान विचारक एवं आधुनिक महर्षि, श्री सीताराम जी गोयल लिखते हैं—“इस्लामी आक्रांताओं के लिए लूटमार और अराजकता, धार्मिक उन्माद की परिणति थे। 
मुसलमानों में नेतृत्व और सैनिकों के मध्य लूट के माल (माल-ए-गनीमत) का बँटवारा एक नियम था और इसी से मुसलमान सैनिकों में हिंसा व लूट के प्रति अति उत्साह रहता था। हिंदुओं को ऐसा कोई प्रोत्साहन उपलब्ध नहीं था, बल्कि निहत्थे लोगों पर वार करना तो महापाप व दंडनीय समझा जाता था। हिंदू धर्म के करुणा व न्याय के मौलिक सिद्धांत, हिंदुओं को इस तरह के दानवी कर्म करने से रोकते हैं। किंतु लूट और बर्बादी मुस्लिम समुदाय का आधार रहा। मुसलमानों के जिस आपसी भाईचारे का इस्लाम, धर्म के आधार पर अपेक्षा रखता है, वह अधर्म तथा लूटपाट के हिस्सों पर आधारित भाईचारा है। ऐसे भाईचारे को 'डकैतों का भाईचारा' कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।”

यदि हम 14 शताब्दियों के हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को देखें तो इन दोनों महाराणाओं एवं मेवाड़ की प्रजा ने डकैतों के इस समुदाय का यह सत्य जान लिया था, अत: वे उनसे निरंतर संघर्षरत रहे तथा मेवाड़ में उन्हें पैर नहीं रखने दिया।

प्रताप के एक सेनानायक एवं राजकोषाधिकारी भामाशाह स्वयं एक ओसवाल जैन थे एवं महाराणा राज सिंह के सेनानायक दयाल शाह भी। इससे ज्ञात होता है कि अहिंसा का पाठ, मेवाड़ के आम लोगों को भ्रमित नहीं कर पाया था।

वे भगवान् महावीर का पूजन-स्मरण तो करते थे। पूरा मेवाड़ जगह-जगह जैन मंदिरों से भी पटा पड़ा है। जैन मत तो अहिंसा का चरम सीमा तक पालन करता था, किंतु उन्हीं अहिंसक जैनों ने अपनी स्त्रियों व मातृभूमि के लिए तलवारें उठाकर अपनी स्वतंत्रता पर आक्रमण करने वाले लुटेरे समुदाय से भयंकर युद्ध भी किया।

इस घटना से बड़ा क्या उदाहरण हो सकता है कि अहिंसा का सिद्धांत निरपेक्ष न होकर सापेक्ष है ? मेवाड़ की प्रजा एवं महाराणाओं ने कभी भी व्यर्थ की नैतिकता का सहारा लेकर कायरता नहीं दिखाई, जो दुर्भाग्य से आज के अधिकांश हिंदुओं की परिपाटी बन चुकी है।

यद्यपि महाराणा केवल मार-काट मचाने वाले, हृदयहीन योद्धा नहीं थे। इनमें लेखन, कविता, वास्तुशास्त्र, स्थापत्य, संगीत एवं जीवन की सभी कलाओं को संरक्षण देने वाले सहृदय, रसिक शासक भी थे।

यह पुस्तक उन देवपुरुषों के चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि है।

मैं मानता हूँ कि इन महापुरुषों को हिंदू धर्म को अपराधी मानसिकता वाले समूह से बचाने हेतु किसी उच्चतर सत्ता द्वारा भेजा गया था, अन्यथा उन्होंने अपनी सेना से 3-4 गुना बड़ी सेनाओं को बार- बार कैसे पराजित किया। कैसे बिना धन व जन-बल के, ये मतवाले राजा शत्रु से लड़ते रहे, पर झुके नहीं !

दुर्भाग्यवश, पिछले 1,400 वर्षों के हिंसा के तांडव, छल से रचे प्रपंच व सार्वजनिक लूट के इस भयावह उपक्रम में, कम-से-कम हिंदुओं के लिए तो कुछ भी नहीं बदला है। वही हत्याएँ, बलात्कार व संपत्ति की लूट चल रही है और निरीह हिंदू उसका मूल्य चुका रहे हैं। बस, अफगानिस्तान-पाकिस्तान एवं बांग्लादेश जैसे देश, जो कभी हिंदुओं की भूमि होते थे, आज हमसे छिन गए हैं। आज भी इस्लामी विस्तारवाद के इस अजगर ने हिंदुओं को अपने पाश में कस रखा है तथा निरंतर हमें निगल रहा है।

यद्यपि अब यह विस्तारवाद हमारे बीच सूफीवाद, मानवता, साम्यवाद, उदारतावाद इत्यादि का मुखौटा पहनकर आ जाता है। पर अंतिम लक्ष्य वही है, जो 1,400 वर्ष पूर्व था — ‘भारत का इस्लामीकरण।’ इन सभी प्रपंचों का यदि हिंदुओं द्वारा उचित प्रत्युत्तर नहीं दिया गया तो हमें भयानक परिणाम भुगतने होंगे। इस्लामी विस्तारवाद के सम्यक् प्रतिकार के लिए हमें अपने इतिहास को नूतन दृष्टि से देखना होगा। इन महापुरुषों के जीवन चरित्र को जानना एवं समझना होगा, जिन्होंने शक्तिशाली व परजीवी धार्मिक शक्तियों से संघर्ष किया और उन्हें रोके रखा। वे लड़े और जीते। उन्होंने उस दानवी एवं अनैतिक विस्तारवादी शक्ति का ऐसा सामना किया, जैसा मानवता के इतिहास में कभी नहीं हुआ।

उन्होंने एक कपटपूर्ण एवं घृणित विचारधारा के वाहक समूह को हिंदुत्व की उदात्त व न्यायपूर्ण विचारधारा से पराजित किया। इन महाराणाओं ने शत्रु की शक्तिशाली एवं कपटी सेना को पराजित करने के लिए ऐसी धर्मनिष्ठ सेनाओं को तैयार किया, जिसने अंत तक अपने महाराणाओं का साथ नहीं छोड़ा। फिर चाहे वीरगति मिली या विजय। उन्होंने हमें दासता से मुक्त रखा, जिससे हमारा मनोबल सदैव ऊँचा रहा।

इन महापुरुषों ने अपनी हड्डियों से निर्मित व अपने रक्त से पोषित स्वतंत्रता का दीपस्तंभ हमें संभालने हेतु दिया है। अब यह हम पर है कि हम उनके द्वारा स्थापित परंपरा को आगे बढ़ाएँ एवं अपने बच्चों को भी वही स्वतंत्रता उनके वंशजों हेतु सँभालकर रखने को दें।

यदि हम सत्य व स्वतंत्रता के लिए प्राणों की बाजी लगाने को तैयार हैं, केवल तभी हम मेवाड़ के इन महापुरुषों के सच्चे वंशज कहलाने के पात्र हो सकते हैं। केवल तभी हम अपने विस्मृत आत्मविश्वास एवं सम्मान को पुनः अर्जित कर सकते हैं।

केवल तभी हम मेवाड़ के महाराणाओं की धरोहर का उपयुक्त सम्मान कर सकते हैं।

केवल तभी हम सिद्ध कर पाएँगे कि मैथ्यू अर्नोल्ड का विचार सर्वथा अनुचित था कि हमारी वैदिक धरती पर इस्लामी आक्रमण का हिंदुओं ने सफल विरोध नहीं किया।

केवल तभी हम झूठ के उन मकड़जालों से मुक्त हो पाएँगे, जो भारत के विखंडन की शक्तियों ने हिंदुओं को अकर्मण्यता एवं आत्मसमर्पण के मार्ग पर ले जाने के लिए बिछाए हैं।

केवल तभी हम सनातन हिंदू विचार को बाह्य कुत्सित विचारों से उत्कृष्ट सिद्ध कर पाएँगे।

युद्ध और शांति एक साथ संभव हैं अन्यथा गैया चराने वाले, परम करुणावान कृष्ण, महाभारत का युद्ध नहीं करवाते।

शांति का एकमात्र मार्ग है, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना। हिंसा रोकने का केवल एक उपाय है अस्तित्व में, प्रतिहिंसा का भय।

शांति व युद्ध के इस संतुलन को समझना व जीना ही सत्य सनातन धर्म है। मेवाड़ के ये महाराणा इसी संतुलन के सच्चे वाहक हैं।

इस समझ को हिंदू समाज में स्थापित करके ही हम सीधे सादे हिंदुओं को दानवी विचारधाराओं से प्रभावित होने या धर्मांतरित होने से बचा सकते हैं। 

केवल इसी समझ से, दोनों अब्राहमिक मतों द्वारा भारत की आत्मा पर होने वाले आक्रमण को पराजित किया जा सकता है।

केवल तभी हम हिंदू; जीवन में सम्मान व मृत्यु में मोक्ष के अधिकारी होंगे। ✍️     —लेखक 

हर हर महादेव!  🙏