Anjor ke rah in Hindi Drama by kuleshwar Jaiswal books and stories PDF | अँजोर के राह

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अँजोर के राह

कहानी: “अँजोर के राह”गांव के किनारा म एक छोटकुन घर रहिस—माटी के दीवार, खपरैल के छत। ओ घर म रहत रहिस रामसाय अऊ ओकर बिटिया, गीता।

गीता बहुत तेज-तर्रार अऊ सपना देखे वाली लइकी रहिस। वो रोज अपन ददा ले पूछत रहिस—

“ददा, हमन घलो बड़े सहर जाके पढ़ सकथन का?”

रामसाय मुस्कुरा के कहत—

“बिटिया, पढ़ई-लिखई बर मन लगाहीस, त तोर बर दुनिया के कऊनो दरवाजा बंद नइ रहय।”

गांव म स्कूल तो रहिस, फेर बस पाँचवीं तक। ओकर बाद पढ़ई बर 10 कोस दूर जाना परत रहिस। जादा लइका-लइकी मन बीच म पढ़ई छोड़ देथें, फेर गीता के मन म कुछ अलग जिद रहिस।

एक दिन, गांव म नया मास्टर साहेब आइन—नाम रहिस संतोष वर्मा। ओ मन गीता के पढ़ई देख के चकित हो गइन।

“तें तो बहुत आगे बढ़ सकत हस,” मास्टर जी कहिन, “तें पढ़े बर सहर जाबे का सोचत हस?”

गीता ह धीरे से कहिस—

“सोचत तो हंव, फेर ददा के हालत…।”

मास्टर जी ह रामसाय ले बात करिन।

“तोर बिटिया म गजब के हुनर हे। ओकर पढ़ई बर हमन मदद कर सकथन।”

रामसाय के आंखी भर आइस।

“हम गरीब जरूर हन, फेर अपन बिटिया के सपना टूटे नइ देहूं।”

कुछ महीना बाद, गीता ह सहर पढ़े बर चल दिस। पहिली दफा ट्रेन म बैठिस, पहिली दफा अपन गांव ले दूर होइस।

सहर म शुरू-शुरू म बहुत दिक्कत होइस—नवा लोग, नवा माहौल। फेर गीता हार नइ मानिस। रात-रात भर पढ़त रहिस।

बरस बीत गइस।

एक दिन, गांव म खबर आइस—

“गीता डॉक्टर बन गे हे!”

पूरा गांव खुश हो गिस। रामसाय के आंखी म गर्व चमक उठिस।

कुछ दिन बाद, गीता वापस गांव आइस—अब वो सिरिफ रामसाय के बिटिया नइ, पूरा गांव के अँजोर (रोशनी) बन गे रहिस।

ओ ह गांव म छोटकुन अस्पताल खोलिस, अऊ कहिस—

“जेन गांव मोला सपने देखना सिखाइस, आज मंय ओही गांव के सेवा करहूं।”

 

कहानी: “अँजोर के राह”

गांव के किनारा म एक छोटकुन घर रहिस—माटी के दीवार, खपरैल के छत। ओ घर म रहत रहिस रामसाय अऊ ओकर बिटिया, गीता।

गीता बहुत तेज-तर्रार अऊ सपना देखे वाली लइकी रहिस। वो रोज अपन ददा ले पूछत रहिस—

“ददा, हमन घलो बड़े सहर जाके पढ़ सकथन का?”

रामसाय मुस्कुरा के कहत—

“बिटिया, पढ़ई-लिखई बर मन लगाहीस, त तोर बर दुनिया के कऊनो दरवाजा बंद नइ रहय।”

गांव म स्कूल तो रहिस, फेर बस पाँचवीं तक। ओकर बाद पढ़ई बर 10 कोस दूर जाना परत रहिस। जादा लइका-लइकी मन बीच म पढ़ई छोड़ देथें, फेर गीता के मन म कुछ अलग जिद रहिस।

एक दिन, गांव म नया मास्टर साहेब आइन—नाम रहिस संतोष वर्मा। ओ मन गीता के पढ़ई देख के चकित हो गइन।

“तें तो बहुत आगे बढ़ सकत हस,” मास्टर जी कहिन, “तें पढ़े बर सहर जाबे का सोचत हस?”

गीता ह धीरे से कहिस—

“सोचत तो हंव, फेर ददा के हालत…।”

मास्टर जी ह रामसाय ले बात करिन।

“तोर बिटिया म गजब के हुनर हे। ओकर पढ़ई बर हमन मदद कर सकथन।”

रामसाय के आंखी भर आइस।

“हम गरीब जरूर हन, फेर अपन बिटिया के सपना टूटे नइ देहूं।”

कुछ महीना बाद, गीता ह सहर पढ़े बर चल दिस। पहिली दफा ट्रेन म बैठिस, पहिली दफा अपन गांव ले दूर होइस।

सहर म शुरू-शुरू म बहुत दिक्कत होइस—नवा लोग, नवा माहौल। फेर गीता हार नइ मानिस। रात-रात भर पढ़त रहिस।

बरस बीत गइस।

एक दिन, गांव म खबर आइस—

“गीता डॉक्टर बन गे हे!”

पूरा गांव खुश हो गिस। रामसाय के आंखी म गर्व चमक उठिस।

कुछ दिन बाद, गीता वापस गांव आइस—अब वो सिरिफ रामसाय के बिटिया नइ, पूरा गांव के अँजोर (रोशनी) बन गे रहिस।

ओ ह गांव म छोटकुन अस्पताल खोलिस, अऊ कहिस—

“जेन गांव मोला सपने देखना सिखाइस, आज मंय ओही गांव के सेवा करहूं।”