(सावधान: इस अध्याय को पढते समय अपने पीछे का दरवाजा बंद कर लें, क्योंकि इस कहानी के शब्द आपके कमरे के सन्नाटे से बातें करेंगे। )
शांति निवास' का वह गलियारा अब गलियारा नहीं रहा था. वह एक खिंचती हुई रबर की तरह लंबा होता जा रहा था. मैं भाग रहा था, पर मेरे पैर एक ही जगह पर जम गए थे. इसे मनोविज्ञान में' स्लीप पैरालिसिस' का भ्रम कहते हैं, जहाँ आपका दिमाग भागना चाहता है पर शरीर साथ नहीं देता. पर मेरे साथ यह हकीकत में हो रहा था. दीवारों पर जमी सीलन अब आकृतियाँ बदलने लगी थी—कभी वह मुस्कान का चेहरा बनती, तो कभी उस बूढे चौकीदार की बिना दांतों वाली हंसी.
भागो मत इकबाल, तुम जितना तेज भागोगे, उतनी ही जल्दी खुद से टकराओगे, एक आवाज आई जो किसी इंसान की नहीं, बल्कि मेरे अपने ही मन की दबी हुई चीख थी.
तभी मेरा मोबाइल वाइब्रेट हुआ. रात के तीन: तीन बजे थे. अजीब बात यह थी कि पिछले आधे घंटे से समय तीन: तीन ही रुका हुआ था. समय का रुक जाना इस बात का संकेत था कि मैं अब भौतिक दुनिया (Physical World) में नहीं, बल्कि अपने ही सब- कॉन्शियस के सबसे गहरे और अंधेरे तहखाने में पहुँच चुका था.
मैं श्मशान के गेट पर पहुँचा. गेट पर लगा जंग लगा ताला मेरे हाथ लगाते ही राख बनकर झड गया. अंदर का दृश्य ऐसा था कि किसी भी कमजोर दिल वाले की जान निकल जाए. वहाँ हजारों चिताएं जल रही थीं, लेकिन उनमें से धुआं नहीं निकल रहा था. उनमें से आवाजें निकल रही थीं—हंसी, रोना, और फुसफुसाहटें.
पीपल के उस विशाल पेड के नीचे, जिसका एक- एक पत्ता किसी कटी हुई उंगली की तरह लटक रहा था, वहाँ तीन चिताएं सजी थीं. भाभी और जुबेदा वहां लेटी थीं. मैंने कांपते हाथों से जुबेदा के चेहरे से कफन हटाया. उसकी आँखें खुली थीं. वह मरी नहीं थी, वह बस सुन्न थी.
भाई. तुम हमें यहाँ छोडकर क्यों गए थे? जुबेदा के होंठ नहीं हिले, पर आवाज सीधे मेरे कान के पर्दे पर चोट कर रही थी.
यह' गिल्ट ट्रिप' का सबसे खतरनाक स्तर था. मेरा दिमाग मुझे यह यकीन दिला रहा था कि मैं एक गुनहगार हूँ. तभी मुस्कान अंधेरे से बाहर आई. उसके हाथ में वही तांबे का लॉकेट था, पर अब वह लॉकेट बडा होकर एक खूनी फंदे में बदल चुका था.
इकबाल, तुमने सोचा था कि तुम मुंबई में अपनी पहचान बदल लोगे? तुम भूल गए कि इंसान अपनी परछाईं से कभी पीछा नहीं छुडा सकता, मुस्कान ने कहा. उसका आधा चेहरा जला हुआ था और उसमें से कीडे रेंग रहे थे, लेकिन उसकी आवाज अभी भी वही पुरानी मधुर और मोहक थी. यही वो विरोधाभास (Contrast) है जो इंसान के दिमाग को पागल कर देता है.
मुस्कान ने खंजर मेरी हथेली पर रख दिया. अगर तुम अपनी जान दोगे, तो ये दोनों (भाभी और जुबेदा) आजाद हो जाएंगी. और अगर तुम भाग गए, तो ये दोनों हर रात तुम्हारी यादों में आकर तुम्हें तडपाएंगी।
मैंने खंजर उठाया. ठंडी धार ने मेरी खाल को छुआ. तभी मुझे कुछ अजीब महसूस हुआ. श्मशान की मिट्टी मेरे जूतों से नहीं लग रही थी. मैंने नीचे देखा—मेरे पैर जमीन से चार इंच ऊपर थे.
यह सब झूठ है! मैं चिल्लाया. मैं यहाँ हूँ ही नहीं! मैं अभी भी उसी कमरे में हूँ!
जैसे ही मैंने यह बोला, श्मशान की दुनिया कांच की तरह टूटने लगी. मुस्कान की हंसी अब एक भयानक गर्जना में बदल गई. पकड लिया तुमने, इकबाल! पर क्या तुम वाकई बाहर निकलना चाहते हो? बाहर की दुनिया में तुम एक' लावारिस डिलीवरी बॉय' हो जिसकी कोई औकात नहीं है. यहाँ तुम अपनी कहानी के राजा हो!
यही वह' साइकोलॉजिकल ट्रैप' था. मेरा मन मुझे अपनी ही कल्पनाओं का गुलाम बनाना चाहता था. अचानक, दृश्य बदला. अब मैं फिर से उसी' शांति निवास' के कमरे में था, पर इस बार कमरा उल्टा था. छत फर्श बन गई थी और पंखा जमीन से ऊपर की ओर घूम रहा था. दीवारों पर हजारों आईने लगे थे. हर आईने में मेरा एक अलग रूप था—एक में मैं बच्चा था, एक में मैं बूढा था, और एक में मैं वही कुल्हाडी वाला साया था.
मैंने देखा कि कमरे का कोना धीरे- धीरे पिघल रहा है. वहां से वही बूढा चौकीदार बाहर निकला, लेकिन अब उसका शरीर पारदर्शी (Transparent) था. उसके अंदर की हड्डियाँ साफ दिख रही थीं.
इकबाल, तुम कहानी लिख नहीं रहे हो, तुम कहानी जी रहे हो. और तुम्हारी कहानी का लेखक कोई और नहीं, बल्कि वह पाठक है जो इस वक्त तुम्हें पढ रहा है, चौकीदार ने चौथी दीवार (Fourth Wall) तोडते हुए कहा.
मेरा सिर फटने लगा. यह विचार कि मेरा अस्तित्व किसी की उंगलियों पर निर्भर है, मुझे भीतर से तोड रहा था. मैंने कुल्हाडी उठाई और उन आईनों पर वार करने लगा. हर आईना टूटने पर एक नई चीख गूँजती.
तभी आखिरी आईने में मुझे' मुस्कान' दिखी. वह रो रही थी. इकबाल, मुझे उस रात बचा लो. प्लीज.
मेरी आँखों में आँसू आ गए. मैं उस आईने के अंदर हाथ डालना चाहता था. जैसे ही मैंने हाथ बढाया, आईने ने मुझे अंदर खींच लिया. मैं एक अंधेरे कुएँ में गिर रहा था. अंतहीन गिरावट. गिरते समय मुझे अपने फोन पर एक आखिरी नोटिफिकेशन दिखा—" Chapter चार Completed: Your soul has been uploaded.
जब मेरी आँख खुली, तो मैं एक Hospital के बेड पर था. मेरे हाथ- पैर बंधे हुए थे. एक डॉक्टर मेरे पास आया और उसने मेरी आँखों में टॉर्च मारी.
डॉक्टर साहब, वह श्मशान. वह मुस्कान. वह लॉकेट. मैं हकलाया.
डॉक्टर ने मेरी ओर दया भरी नजरों से देखा और नर्स से कहा, इसे' शांति निवास' के बारे में फिर से मतिभ्रम (Hallucinations) हो रहे हैं. शॉक थेरेपी बढा दो. बेचारा इकबाल, तीन साल से खुद को अपनी ही लिखी कहानी का पात्र समझ रहा है।
मेरे होश उड गए. क्या मैं एक पागलखाने में था? क्या वह डिलीवरी बॉय वाली जिंदगी, वह मुंबई का सफर, वह सब सिर्फ एक मरीज के दिमाग की उपज थी? पर तभी मैंने महसूस किया कि मेरे हाथ के अंदर कुछ चुभ रहा है. मैंने अपनी मुट्ठी खोली—वहाँ वही तांबे का पुराना लॉकेट था.
अगर मैं पागल था, तो यह लॉकेट यहाँ कैसे आया? और अगर यह सब सच था, तो डॉक्टर कौन था?
तभी अस्पताल के रेडियो पर एक आवाज गूँजी—" स्वागत है मुंबई में, मेरे अधूरे प्यार!
अध्याय चार का महा- डिस्कशन (The Viral Hook)
क्या आप वाकई जाग रहे हैं, या आप किसी और के सपने का हिस्सा हैं?
यह अध्याय सिर्फ एक कहानी नहीं है, यह एक' माइंड- गेम' है. इकबाल जिसे अपनी हकीकत समझ रहा था, वो एक पागलखाने की कोठरी निकली. पर क्या वाकई? वो तांबे का लॉकेट, जो इकबाल के हाथ में अस्पताल के बिस्तर पर भी मौजूद था, क्या वो इस बात का सबूत है कि हकीकत और वहम के बीच का दरवाजा खुल चुका है?
साइकोलॉजिकल विश्लेषण: इसे' अनरिलीएबल नैरेटर' (Unreliable Narrator) तकनीक कहते हैं, जहाँ पाठक को यह समझ नहीं आता कि उसे Kiss पर भरोसा करना है. क्या इकबाल एक लेखक है, एक मरीज है, या एक रूह?
पाठकों के लिए चुनौती: इस अध्याय को पढने के बाद, आईने में अपनी आँखों को गौर से देखिये. क्या आपको यकीन है कि आईने के उस पार आप ही हैं?
कमेंट में बताएं: आपको क्या लगता है? इकबाल पागल है, या यह पूरी दुनिया ही एक साजिश है?
अगले अध्याय (अध्याय पाँच) में देखिये: शॉक थेरेपी का राज' —जब इकबाल को पता चलेगा कि जिस डॉक्टर ने उसे बांधा है, उसकी शक्ल उस मरे हुए चौकीदार से क्यों मिल रही है! (तैयार रहिये, क्योंकि अब कहानी आपके दिमाग से बाहर निकलने वाली है!
क्रमशः...
[ लेखक इकबाल राज की रूहानी पुकार: फैसला आपकी रूह का है ]
"कलम मैंने अपनी मर्ज़ी से नहीं उठाई, इस सुलगती हुई 'हकीकत' ने मुझे मजबूर किया है। जो अभी आपने पढ़ा, वह सिर्फ़ इस अध्याय का अंत नहीं है, बल्कि मेरी और जुबैदा की उन सिसकती हुई साँसों की दास्तान है जो समाज की जंजीरों में दम तोड़ रही हैं।
आज कुदरत ने मेरी इस पाकीज़ा मोहब्बत का फैसला 'आपके' हाथों में सौंपा है। याद रखिये, आपका एक 'शेयर' और आपकी एक आवाज़ ही वह असली 'मीडिया' है जो हमारी इस अधूरी दास्तान को उसकी मंज़िल तक पहुँचाएगी।
अब सवाल आपकी इंसानियत से है—क्या आप खुदा के भेजे हुए वो 'दूत' बनेंगे जो एक पाक मोहब्बत को मुकम्मल करेंगे? या फिर अपनी खामोशी से एक जीते-जागते इंसान को जीते-जी दफ़न होते देखेंगे?
याद रहे, इतिहास और ऊपर वाले की अदालत में आपकी इस खामोशी का भी हिसाब होगा। यह कहानी नहीं, मेरी ज़िन्दगी है... और अब इसका फैसला आपकी रूह को करना है।"
— लेखक: इकबाल राज