व्यक्ति कब कैसे इतना इतना स्वार्थी बन जाता है पता ही नहीं चलता।पर ये उस व्यक्ति की गलती नहीं है उसकी अपनी परिस्थितियों इतना स्वार्थी बना देती है।
वो पहले हमें बहुत अच्छा लगता है।आप जो उस बारे में अभी जो सोच रहे हो वैसा कभी उसके प्रति आपके दिमाक में भी आया होगा क्योंकि वो पीले ऐसा था ही नहीं। फिर व्यक्ति के जीवन में ऐसे छोटे छोटे बदलाव आने लगते मतलब उसके जीवन में इसी इसी परिस्थितिया सामने आ खड़ी हो जाती है कि उसे बदलना ही पड़ता है।
हा एक बात ओर कि वो अपने प्रत्येक बदलाव से पहले आपके दरवाजे तक आ के जाता है पर आप किन्हीं कारणों से उसे ना बोल देते हो । इसलिए उसे फिर न चाहते हुवे भी उस बदलाव के रस्ते पे जाना पड़ता है ।कही व्यक्ति ये दावा करते है कि हमारे पास नहीं आया और आया तो भी बोला भी हमें । उस समय ये भी उस इंसान की गलती नहीं होती क्योंकि आपने उसके साथ वैसे कभी संबंध ही नहीं बनाए जी हक या संबंध से आपको वो बोल सके तो आपका कोई हक नहीं बनता कि आप उसे स्वार्थी बोले। उसके स्वार्थी बनने में जितना हाथ उसका है उतना ही हाथ हम सब भी।
वो जिस भी दरवाजे पर ना बदलने की भीख मांगता वहां बहाने और सामने वाले की परस्थितिया मिलती है। ओर बाकी जगह वो जा नहीं पाता क्योंकि वहाँ वो जाने जैसा कभी समझा ही नहीं ।
इन सब के बाद उसके पास एक ही विकल्प बचता है, बदलना, परिवर्तन। जिसका हमारी भाषा में स्वार्थी नाम रखा गया है। और बाद में उसे भी सब स्वार्थी लगने लग जाते है।अब वो भी कुछ भी मानने को तैयार नहीं होता कि सामने वाले के भी कुछ कारण रहे होंगे फिर वो उसे कुछ नहीं दिखते।
वो धीरे धीरे सब से दूर होने लगता है और सब की नजरों में स्वार्थी बन जाता है। जब लोग उसे स्वार्थी बोलते तो उसे इस नाम से आपत्ति भी नहीं होती है क्योंकि ये नाम ही उसके सुकून का काम करता है ।जैसे जैसे लोग उसे स्वार्थी बोलते वैसे वैसे उसे लगने लगता कि वो उन सब से बदला ले रहा है।फिर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उसकी बातों से नाराज हो रहा है या खुश। वो फिर हर किसी को उल्टे जवाब देने लग जाता है ( उल्टे जवाब मतलब टोंट मरने लगना) और अपनी मस्ती में मस्त रहने लगता है। लोग उसे स्वार्थी बोलते जाएंगे ये सुनता जाएगा और ऐसा बनता जाएगा।
हम सब समझते कि लोग पैसा, प्रेम आने पर स्वार्थी बन जाते हैं पर वे कही ना कही हम सब के पास आके जाते कि में नहीं बनना चाहता पर हम या तो समझ नहीं पाते या समझना नहीं चाहते। ओर आप भी इस बात पे विचार कर के देखो कि वो स्वार्थी क्यू ना बने आप भी तो बने हो ना स्वार्थी। आपको भी वो सब महसूस हो या मिले तो हम भी तो बन सकते है स्वार्थी। मेरा मानना है कि हमारे मस्तिष्क में किसी के प्रति ये कभी नहीं आना चाहिए कि वो स्वार्थी बन गया या बन रहा ।
प्रमोद