they don't live there in Hindi Children Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | वहां नहीं रहते वे

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वहां नहीं रहते वे

वहां नहीं रहते वे

कमल चोपड़ा

​रिजू को जैसे बता डालने की बहुत जल्दी थी, "विशू विशू विशू... पता है क्या हुआ? लगता है अपना रोमी मर गया है। सच में ना वो हिल-डुल रहा है ना...।"​"सो रहा होगा... चल मैं देखता हूं!"​दोनों बिजली दफ्तर के पीछे की ओर दौड़ पड़े जहां कि उन्होंने पिल्ले रोमी का ईंटें जोड़कर घर बनाया था। वहां पहुंचे तो देखा सचमुच रोमी अपने अधटूटे घर में बाहर पड़ा था। विशू ने पास जाकर उसे पुचकारा- "रोमी... रोमी... रोमी... पुच्च..चु पच्च...पु चु..."​पर रोमी नहीं जागा। विशू ने उसे हिलाया-डुलाया। जेब से निकालकर बिस्कुट उसके मुंह में ठूंसने की कोशिश की। कहीं से पानी लाकर उसके नाक और मुंह पर डाला पर रोमी नहीं हिला।​"यार... जब मैं कह रहा हूं कि ये मर चुका है। तू मानता क्यों नहीं? पता है जब किसी की सांस बंद हो जाती है ना, तो वह मर जाता है। सांस बंद हो जाए तो समझ लो वह मर गया।"​विशू ने अपनी हथेली रोमी की नाक के आगे लगाकर देखी। सचमुच उसे अपनी हथेली पर हवा का स्पर्श महसूस नहीं हुआ। विशू को मानना पड़ा कि रोमी मर चुका है।​आसमान में उड़ते नन्हे पक्षी-सा विशू का दिल एकाएक किसी शिकारी की गोली से छलनी-सा हो गया।​"हमने तो कल अपने जेबखर्च के पैसों से जख्मों की दवाई लेकर उसके जख्मों पर लगाई थी पर..." रिजू भर्राये स्वर में बोला। विशू भी रोने को हो आया था।​"अब ये कभी नहीं उठेगा?""जो मर जाते हैं तो फिर थोड़ा ही हिलते-बोलते हैं?""क्यों?""कहते हैं मरनेवाले ऊपरवाले के पास चले जाते हैं।"​“लेकिन ये तो यहीं पड़ा है।”“पता नहीं पर...”“इसे डॉक्टर के पास ले चलें?”“अब क्या फायदा ये तो मर चुका है।”“अब इसे कोई जिंदा नहीं कर सकता?”“सिर्फ ऊपरवाला कर सकता है।”“ऊपरवाला? लेकिन हम उसके पास कैसे पहुंच सकते हैं?”“मंदिर या मस्जिद में रहता होगा ना ऊपरवाला तभी तो लोग वहां आकर पूजा करते हैं।”​“अरे हां... तो चलो हम रोमी को उठाकर भगवान के पास लेकर जाते हैं कि इसे जिंदा कर दो। क्या पता भगवान जी को दया आ जाए और वो इसे जिंदा ही कर दें। चल आ, नजदीक ही एक मंदिर है। मैंने देखा हुआ है।”​विशू ने रोमी को अपनी बाहों पर उठाया और मंदिर की ओर चल पड़ा। तेज-तेज कदम उठाता रिजू भी उसके साथ हो लिया।​मंदिर के पास पहुंचकर दोनों ठिठक गए। चप्पलें बाहर ही उतारकर डरते-सहमते हुए दोनों मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे। अब भी विशू ने ही रोमी को उठा रखा था। दोपहर का वक्त था। मंदिर का मुख्य मूर्तिवाला कक्ष बंद था। कीर्तनवाले बड़े-से हॉल में उस वक्त मंदिर कमेटी की कोई मीटिंग चल रही थी। दोनों वहीं-के-वहीं खड़े रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे किस तरफ बढ़ें? मंदिर शाम को खुलेगा तब तक क्या करें? तभी कोई अन्य भक्त आया और मुख्य मूर्ति-कक्ष के सलाखोंवाले दरवाजे के बाहर ही से अंदर झांककर मत्था टेक कर चला गया।​“विशू... विशू... हम भी बाहर ही से भगवान जी को प्रार्थना करते हैं कि ये रोमी को जिंदा कर दें।”​दोनों झिझकते-झेंपते से आगे बढ़े। तभी मीटिंगवाले हॉल से एक आदमी बाहर आया। उसकी नजरें इन दोनों पर पड़ीं तो आंखें चौड़ी करके बोला- “यह क्या है?”​“ये तुम्हारे हाथों में क्या है? दिखाओ...”जवाब में उनके मुंह से शब्द नहीं निकल पाए। थर-थर कांपने लगे वे। फिर एकाएक वह आदमी चीखा जैसे उसे किसी ने जलती हुई लकड़ी छुआ दी हो- “कुत्ता? वह भी मरा हुआ? पूजास्थल में मरा हुआ कुत्ता...! अनर्थ! घोर अनर्थ!”      ​बुरी तरह घबरा गए वे दोनों। विशू के हाथ से पिल्ला।  छूटकर नीचे जा गिरा। पूजा-स्थल अपवित्र करने की नापाक कोशिश?​पिल्ले को वहीं छोड़कर सीढ़ियां पार करके जान बचाकर नंगे पैर वे भाग खड़े हुए। मीटिंग छोड़ मंदिर से निकलकर कुछ लोग उन्हें ललकारते हुए उनका पीछा करने लगे। उनके हाथ में त्रिशूल व लाठियां थीं। वो दोनों पूरा दम लगाकर भाग रहे थे। कुछ दूर निकल आने के बाद वे एक पतली गली में मुड़ गए और एक खाली खड़ी रेहड़ी के पीछे छिप गए।​कुछ देर बाद खतरा न पाकर वे रेहड़ी के पीछे से निकले और चुपचाप घर की ओर चल दिए। एकाएक विशू बोला—“वह भगवान जी का घर नहीं है। वहां नहीं रहते वे! वहां तो बस गुंडे-मुंडे रहते हैं।