66. हमारा इतिहास भाग 1
"वृषाली चाकू मत चालान!", कवच महाशक्ति को प्यार से समझा ही रहा था की उसने ज़ंजीर के सीने में चाकू उतार दी। खून के लाल छीटे दोनों पर छिटक गए। पूरा कमरा लहू लुहान हो गया। कवच इतना खून देखकर सन रह गया।
अटकते हुए उसके मुँह से अविश्वास के साथ निकला, "...तुमने... तुमने यह क्या किया?",
जबकि महाशक्ति अपने स्वभाव से उलट बिना सहमे व्यस्त थी। उसने कवच को अनसुना कर उसने चाकू को एक पेशेवर कसाई की तरह पकड़ा और उसे काटने लगी।
उसने धीरे से अपने हाथ में पकड़े धारदार चाकू ज़ंजीर के गले में उतारी।
पसीने से तरबतर कवच उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया पर रुक गया। हाथ पीछे खींच वह यह देखने के लिए रुका कि वो आगे क्या करने वाली थी। कुछ ना कुछ तो कारण होगा सोचा, वरना वृषाली ऐसे कभी कर ही नहीं सकती। कवच का यह विश्वास था।
दूसरी ओर वृषाली उर्फ मीरा महाशक्ति का ध्यान सिर्फ और सिर्फ ज़ंजीर पर था। गहरे ध्यान से उसने बेहोश ज़ंजीर के गले से जितना हो सके उतना सीधा, गहरा चीरा नीचे खींचने लगी।
यह देख कवच की आँखें फटी रह गई। इसका निष्कर्ष वो निकल नहीं सकता था। उस वक्त उसके सामने जो वृषाली थी वो, वो सीधी वृषाली नहीं थी, जिसे उसने चुराया था। यह वो मासूम वृषाली नहीं थी जिसने उसे वापस ज़िंदगी के छिन चुके भावों से मिलाया। जीवन में नए उम्मीद रखने पर मज़बूर कर दिया था। यह वो अनाड़ी भोली नहीं थी जिसे वो जानता था। उसके सामने वो एक अंजान साथी थी... "जिसे मेरी कायरता ने जन्म दिया है।", बेचैनी में बड़बड़ाकर महाशक्ति का चाकू वाला हाथ बौखलाहट से पकड़कर "रुक जाओ वृषाली!", अपनी तरफ खींचा।
उसकी अधीर आँखें महाशक्ति को ऊपर से नीचे देखी। उसके हाव-भाव वृषाली जैसे नहीं थे। वृषाली, जो हल्के से खरोंच पर भी डर जाने वाली, किचन में भी चोट के डर से घिस चुके चाकू से काम करने वाली, टीवी में खून देखकर मुँह मोड़ लेने वाली और लोगों को करुणा भरी नज़रों से देखने वाली वो लड़की आज धारदार चाकू अपने हाथ में एक माहिर खूनी के तरह थामे, खून को देख उत्तेजित हो एक निर्दोष को मारने के लिए बेताब थी। यह वह लड़की नहीं थी जिसे उसने चुराया था।
उसके दिल में एक ही प्रश्न चीख रहा था, (दो साल पहले बिना मेरे मर्ज़ी के, अपनी मासूमियत से मेरा आधा भाग बनने वाली लड़की आज कहाँ गई?) कवच की बेताब आँखें उसपर से हट ही नहीं पा रही थी, और उसकी बेताब आँखें आधे कटे ज़ंज़ीर पर से।
कवच पर उसकी भावनाऐं भारी पड़ रही थी।
"वृषाली बस करो अब! तुम्हें हो क्या गया है?", कह उसने महाशक्ति का चेहरा अपनी तरफ़ किया।
कवच, अपनी भावनाओं के गहरे सागर में गोते खा रहा था। पर महाशक्ति का ध्यानकेंद्र अब भी ज़ंजीर ही था। उसकी खोई नज़र कवच के हाथों पर गई जिसने उसका हाथ और चेहरा पकड़ रखा था। उसके हाथ से ज़ंजीर का लहू कवच के हाथ से लिपट टप, टप, टप वापस नाम के बचे ज़ंजीर के कटे-फटे शरीर पर टपक रहे थे। उसकी आँखें और ध्यान वापस ज़ंजीर पर मुड़ गया।
क्रोध और रोने की तीव्र इच्छा से कवच की आँखें लाल हो गईं। भावनाओं के आवेश में आ उसने उसके हाथों से चाकू छीना और बगल में फेंक दिया। चाकू सीधा सोफे पर जा धँसा। कवच ने उसके दोनों हाथों को पकड़ उसे चाकू के पास, सोफे से सटाकर उसे प्रश्नवाचक अभिव्यक्ति से देखने लगा।
अचानक लगे झटके से महाशक्ति की आँखें भी बाहर फट आई। दो पल कवच के चेहरे को टकटकी लगाई देखी फिर झटके से अपने होश में आई। होश में आते ही उसने एक गहरी साँस ली, "फूँ!", और अपनी वही मासूम आँखों से कवच की ओर देखने लगी। उसकी आँखें सामान्य देख कवच की तनावग्रस्त आँखें में थोड़ी नरमी, थोड़ी शांति आई सबसे महत्वपूर्ण उसमें नई जान आई। उसकी पकड़ महाशक्ति पर ढीली हुई पर उसे छोड़ा नहीं। उसका चेहरा छोड़ सबसे पहले कवच ने सोफे पर धँसे चाकू को झट से निकाला और अपने पास, अपने हॉस्पिटल के दिये हरे पेंट के जेब में रखा। महाशक्ति की आँखें उसकी हरकतों के देख रही थी।
वो मुस्कुराई। उसने संतुष्टि भरी नज़रों से कवच को देख।
उसकी संतुष्ट मुस्कान देख कवच सोच में पड़ गया। उसकी मुस्कान में कवच को कुछ गड़बड़ी लग रही थी। उसकी पकड़ उसके हाथ में और ज़ोर हो गई।
वो कसते पकड़ के साथ और मुसकाई और हल्की हँसी के साथ उससे कोमल आवाज़ में कहा, "वृषा, मैं ऐसा कुछ भी नहीं-", उसने अपना हाथ हिलाया पर वो कवच के नियंत्रण में थी।
उसने वृषा से बँधे हाथ को जोड़कर विनती की, "वृषा मेरा हाथ छोड़िए प्लीज़। आप जैसा सोच रहे है वैसा नहीं है। मैं ज़ंजीर को कुछ नहीं कर रही–", ज़ंजीर को देख, "मतलब करूँगी। चाकू भी आपके पास है तो मैं कैसे उन्हें चीर सकती हूँ? प्लीज़... मेरे हाथ...",
कवच ने उसका हाथ धीरे से ना चाहते हुए भी चोट के कारण छोड़ा और अपना हाथ चाकू वाली जेब में रखा। उसे देख महाशक्ति कोमलता से मुस्कुराई। पर कवच का मुँह बिगड़ा हुआ था। अपनी हँसी दबाकर उसने गंभीर अभिव्यक्ति रख, "माफ़ करना पर पुरानी आदत है, मुसीबत में हँसने की। वैसे ऑफिसर धीरज और डॉक्टर सुधीर कैसे है?",
कवच सिर में हाथ रखकर कहा, "डॉक्टर, धीरज का इलाज़ कर रहे है। तुम उन्हें छोड़ो, बाप अपने बेटे को संभल लेगा। तुम यह बताओ कि तुम ज़ंजीर सर के साथ क्या कर रही थी? तुम उन्हें कसाई की तरह काट क्यों रही थी‽ उन्हें काटकर तुम्हें क्या मिलेगा? तुम कबसे हिंसा करने लगी? तुम कैसे लोगों को काटन–",
बोलते-बोलते उसकी बोलने की गति तेज़ होती गयी। महाशक्ति शांत अभिव्यक्ति रख उसके रुकने का इंतज़ार कर रही थी पर कवच रुक ही नहीं रहा था। वो बिना रुके बोलते ही जा रहा था। तंग आकर उसने अपनी उँगली उसके कवच के मुँह पर रखी, "शशशश…बताती हूँ वृषा, बताती हूँ। मैं आपकी तरह नहीं जो बात छुपाती है। बस एक मिनट रुकिए।",
कवच रुका।
उसने शांति से बताना शुरू किया, "बात यह है कि... आपको दिखाना भी बेहतर होगा। ज़रा मेरे गले से यह महाशक्ति वाला लॉकेट निकाल सकते है? मेरे अलावा आप ही इसे निकाल सकते है।",
उसने कड़वी हँसी हँस कहा, "इसीलिए तो इतने बड़े ज़ख्म और ऑपरेशन होने के बाद भी एलिट डॉक्टर इस पतले चैन वाले लॉकेट को खरोंच भी नहीं पाए।",
कवच ने सोच में लॉकेट को रत्न से पकड़ा।
महाशक्ति थोड़ा मचली। उसका पूरा गला और गर्दन इधर-उधर पट्टियों से भरा हुआ था। खरोंच, मार और एक अंजाने चोट ने ऊपर कब्ज़ा कर रखा था।
वैसे कवच की खुद की हालत भी ठीक नहीं थी। पूरी ममी बनने के लिए उसे बस चेहरे को पट्टी से ढकने की देरी थी बाकी सब तैयार था।
(कुछ तो गड़बड़ है। इतनी बातूनी? और ऐसे अंदाज़?)
"एक मिनट रुको तुम।"
कवच ने उसे खुली आँखों से देखा। उसके हाथ लॉकेट निकालने के लिए आगे तो बड़े पर बीच में ही उसके गर्दन के पीछे जंगल में लगी फीकी पड़ चुके ज़ख्म को देख बीच में काँप उठे। उसे दो दिन पहली काली रात याद आ गई। कवच अंदर से मचल गया, उसकी साँसे तेज़ चलने लगी।
महाशक्ति आँखें बँद कर कवच के स्पर्श का इंतज़ार कर रही थी। कवच बहुत वक्त लगा रहा था तो उसने अपनी बाई आँख हल्के से खोली और उसे सफ़ेद देखा।
सब्र रख उसने अपनी बँद रखी और चेहरा शांत।उसकी शांत भाव देख कवच हिम्मत कर उसने साँस ले मंज़िल तक गया। उसके दाईं तरफ कवच की नज़र तीन पट्टियों से एक चौकोर पैचअप पट्टी पर गई। जिज्ञासुवर्ष उसके हाथ उसके चोट के ऊपर फेरे।
"आह!", महाशक्ति के मुँह से अजीब कराहट निकली। उसके हाथ कवच के हाथों को दर्द से रोका।
"अ-आई एम सॉरी बट तुम्हें यह चोट लगी कैसे? मैंने तुम्हारे गर्दन में कोई चोट नहीं करी थी।", उसने चिंता में कहा,
होठों में दर्द ले उसने कहा, "आह! नहीं पता शायद समीर के किसी ड्रग्स का कुछ झोल होगा? आप जल्दी कीजिए ना।",
"ह-हाँ।", कवच ने जल्दी से ऑरेंज पड़ी लॉकेट को निकाल उसके मालकिन के हाथों में दिया।
उसे देख मुँह से निकला, "यह है सबकी जड़। यह लॉकेट…”
कवच ने पूछा, "तुम्हें सब याद है?",
उसने गर्व के साथ कहा, "आपने जो अधूरी जानकारी खुद से बोली और मोनिका जी के हाथों उस फैशन मैगजीन से भिजवाई। सब मैंने पढ़ी! की यह लॉकेट और अँगूठी का सेट तय करती है आपकी शक्ति और आपकी अर्धांगिनी कौन होगी। सब यह तय करेगा।
और प्रथा हमारे पूर्वजों के वक्त से चली आ रही है?",
कवच ने सिर्फ़ हाँ में सिर हिलाया।
"और यह कि हमारी पैतृक शक्ति जो इन रत्नों में कैद है।", दोनों की रत्नों की तरफ इशारा कर, "यह महाशक्ति और कवच की ऊर्जा है। या यूँ कहूँ की कवच का स्तोत्र है और महाशक्ति का स्तोत्र, कवच।",
कवच ने फिर हामी में सिर हिलाया,
"और चला आ रहा है कि हमारे पूर्वज अलग-अलग शक्ति के ज्ञाता थे। मिस्टर खुराना के परिवार चिकित्सक, जो घातक से घातक महामारी को चुटकियों में जड़ से मिटा सकते थे।
आपका परिवार अजय था, आपके परिवार पर स्वयं युद्ध के भगवान का आशीर्वाद था। कैसे अपने शौर्य और बल से आपके पूर्वजों ने कई रियासत बचाई थी और बनाई थी।
शिवम जीजू और राज के परिवार वाले जिस पत्थर पर हाथ रख देते थे, उसका मूल्य पूरे विश्व के हीर ज्वारात से भी अधिक मूल्यवान हो जाता। उनकी शिल्पकारी, नक्काशी के दुनिया दीवानी थे और उनकी यह कला आज भी जीवित है।
हमारा परिवार, आप बता नहीं पाए पर किताब में लिखा था कि हमारे पूर्वजों को वशीकरण में महारत थे।
और क्षेत्रिय परिवार, रणनीतिकार! जो सारे परिवारों का नेतृत्व करता है।
और हमसे पहले पिछली महाशक्ति और कवच के जोड़े थे ज़ंजीर क्षेत्रिय और उनकी भार्या शिवा क्षेत्रिय।",
कवच, हक्का-बक्का, "तुम्हें कैसे पता?",
"समीर को नहीं पता तो तुम्हें कैसे पता? यही पूछना चाहते हो ना?",
कवच उसे हैरानी से देखता रह गया।
"कैसे कहूँ… बस पता है। और मैं यह बात साबित कर सकती हूँ।",
वो अपने पैर को सहारा दे नीचे झुकी, "हाह! वृषा चाकू।",
उसने हाथ ऊपर कर माँगा।
"बिल्कुल नहीं। तुम अपने सिर एक मर्डर केस नहीं ले सकती।", कवच ने गुस्सा दिखाते हुए कहा,
अचंभे से, "किसका मर्डर?",
"तुमने जो नीचे किया उसे 'अटेम्प्ट टू मर्डर' बोला जाएगा और कही गलती से यह सिधार गए तो मर्डर क्लॉज़ लगेगा।", वो भी नीचे झुका,
"पर यह मर्डर नहीं है।", महाशक्ति ने कहा,
कवच नीचे झुक अपनी उंगली से ज़ंजीर के सीने से लेकर छाती तक लम्बे कटे घाव को दिखाकर, "तो तुमने यहाँ रंगोली बनाई है?"
"पर असली नहीं है!", उसने ज़ंजीर के घाव पर हाथ थपथपाते हुए कहा।
उसके थपकी भरे हाथ रोककर, "तो इस गड्ढे में गुलाब उगाने वाली हो?",
परेशान होकर, "बस करिए अपना यह कटाक्ष। मेरी बात तो सुनिए। ज़ंजीर पूर्व कवच है! और जो चीरा मैने लगाया वो इनके शरीर पर नहीं बल्कि उनके चमड़े के ऊपर चढ़े दूसरे चमड़े पर लगाया था।",
आश्चर्य से कवच ने ज़ंजीर की तरफ देखा।
"विश्वास नहीं तो खुद छूकर देखिए। इनके असली शरीर के ऊपर मोटी नकली चमड़े की परत है।", महाशक्ति ने कवच का हाथ ज़ंजीर के सीने पर रखकर कहा,
हाथ ज़ंजीर जो छूते ही उसने वापस ले लिया फिर चमड़े की बनावट उसके दिमाग में घर कर गई। उसने फिर ध्यान से ज़ंजीर के सीने पर हाथ फेरा तब उसे महाशक्ति के बात पर भरोसा हुआ।
"तुम सही थी वृ-महाशक्ति। नकली चमड़े और असली चमड़े के बीच नकली खून की थैलियाँ और कुछ पतला कपड़ा जैसा है।", उसने अपनी गलती मानी, "अब क्या?",
दोनों चित पड़े ज़ंजीर के शरीर के पास बैठ गए।
"अभी नकली चमड़े को निकलते है और उन्हें इलाज के लिए भेजते है। कारण जानने के साथ अभी उन्हें आराम और शांति की ज़रूरत है।", उसने दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, "उनके पुराने ज़ख्म के साथ नए ज़ख्म कुरेदने वाले है। उनके पहले उन्हें आराम करने दे।",
कवच और उसने मिल ज़ंजीर के शरीर से नकली चमड़े को छांटा और उसे वार्डबॉय के हवाले कर दिया। वार्डबॉय उनकी हालत, चमड़े और केबिन की हालत देख चुप चाप ज़ंजीर को स्ट्रेचर में डाला और ले गया।
कवच ने महाशक्ति को केबिन का दरवाज़ा बँद सोफे पर बैठाया और खुद भी उसके सामने लकड़ी के कॉफी टेबल पर बैठा।
महाशक्ति के हाथ में दोनों लॉकेट थी।
कवच ने उसे पूछा, "तुम्हें अपनी लॉकेट उतारने की क्या ज़रूरत थी?",
अनिश्चिता से उसने कहा, "पता नहीं वृषा। मैंने जब उन्हें चीरकर छुआ था तब मेरे हाथ में अजीब सी चुभन हुई और अजीब सा लगा जो समझाया ना जा सके। लॉकेट में गर्माहट? फिर बेचैनी? और घृणा। सब कुछ थोड़ा अजीब था। जैसे में कुछ नकार रही थी।",
उसने सुनते ही कवच के चेहरे का रंग उड़ गया। खुद को संभालते हुए उसने बात को दूसरी तरफ मोड़ा।
"हम अपनी शक्तियों के बारे में बात कर रहे थे ना।",
उसे समझ नहीं आया कि कवच ने अचानक से बात क्यों बदली पर बात को बीच में नहीं करना चाहती थी। इतने साल बाद आज उसे सच्च का पता चलने वाला था कि आखिर वो क्यों पीढ़ी की बड़ी स्त्री शक्ति क्यों नहीं?
"जी, कर रहे थे।",
जारी रख कवच ने कहा, "हमारे पूर्वज सामान्य वन निवासी थे जिन्होंने गलती से एक सिद्ध मुनि के अनुमति के बिना उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ सिद्धियों को देख लिया था।",
कवच की आँखों में देखकर उसने कहा, "और वो सिद्धियाँ ऐसे ही किसी के लिए भी देखने के लिए नहीं थी। उन्होंने यह सिद्धियों जन कल्याण के लिए हासिल की थी जिसे हमारे पूर्वजों ने गलती से देख लिया था।",
कवच भी उसकी आँखों में देख, "और शक्तियों को देखने के बाद शक्तियाँ सिद्ध मुनि से हट उनमें समा गई। जब उन्हें इसका पता चला तब साज़िश का अंदेशा देख उन्होंने क्रोध में उन्होंने उन सबको शाप दिया कि यही उनके वंश के नाश का कारण बनेगी।
कई बार हाथ पैर जोड़ने के बाद उन्होंने उनका तर्क सुना और अहसास हुआ कि सब महज़ एक संयोग था साजिश नहीं। फिर उन्होंने सल्यूशन में पँख वाले आकर के रत्न में उनकी शक्तियों को डालकर देते हुए कहा कि अगर वो इसका इस्तेमाल जन कल्याण के लिए करे जैसा उन्होंने चाहा था और उसी वक्त सारे लोग अलग होकर अलग-अलग जगह जन कल्याण करे और उनकी सौवीं पीढ़ी एक हवन या कुछ यज्ञ कर सारी शक्तियों को, मतलब उन रत्नों को अग्निकुंड में आहूति दे उसके असली मालिक को वापस सौंप दे।",
महाशक्ति ने आगे कहा, "बिल्कुल सही! वो शक्तियों ऐसे ही आदान प्रदान करने वाली नहीं थी। इसका महत्व कही गुना ज़्यादा था।
पर हुआ इसका उल्ट। सौवीं पीढ़ी तक सब लालची निकले। उनके पूर्वजों द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी और सीख को उस पवित्र यज्ञ में तिलांजलि दे अपना साम्राज्य बनाने निकल गये। पर कुदरत का खेल तो देखिए। जो राजा बनाना चाहते थे वो मंत्री, महामंत्री तक सिमट गए।",
कवच ने उसके लय में लय मिलकर कहा, "पर राजा कभी नहीं बन सके। उनके पास पैसा, शौहरत और बाहुबल तो बहुत था बस ज़मीर की कमी थी।",
महाशक्ति, "थी नहीं वृषा, है। बची कुची ज़मीर के साथ उन्होंने धीरे-धीरे इंसानियत की भी तिलांजलि दे दी।",
कवच, "पीढ़ी बढ़ते-बढ़ते उनमें अकल भी घटती गई महाशक्ति। तकरिबन तीन-चार सौ साल उनकी मस्ती में और बीत गए। पर कहते हैं ना बुरे का फल बुरा ही! होता है। धीरे-धीरे उनकी शक्तियाँ घटने लगी और राज्य में उनका दबदबा भी।",
"तब क्या किया उन्होंने?", महाशक्ति ने पूछा,
"उन्होंने वो किया जो उन्हें करने से मना किया गया था।", कवच ने गंभीरता से कहा,
"क्या कवच? उस किताब में तो ऐसे किसी अनुदेश का ज़िक्र नहीं था। उसमें तो लिखा था कि हम किसीके सलाह के बाद हमारे पूर्वज एक दंपत्ति को चुनते और उन्हें अपनी शक्ति का एक हिस्सा हर साल देते जो उनके पूरे शक्ति के अंश मात्र ही रहती। वो 'महाशक्ति' और 'कवच' कहलाए।",
कवच ने असहजता से बोला, "उसमें हर जानकारी नहीं थी महाशक्ति। जानकारी ज़्यादा थी और उसे ऐसे लिखना था कि वो आम मैग्ज़ीन लगे और तुम तक जानकारी बिना किसी शक के पहुँचाया जा सके।
और ऐसी कुछ बातें है जिसे आमने-सामने ही बताया और समझाया जा सकता है।
जैसे पहली—
शक्तियाँ अपनी अर्धांगिनी अपनी ऊर्जा के अनुसार चुनते थे। एक बार दोनों ने एक दूसरे को चिह्नित कर लिया तो वो कभी एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। मतलब नो तलाक।
दूसरी—
महाशक्ति और कवच जन्म से नहीं चुने जाते। और यह उपाधि सम्मानजनक नहीं है जैसा यह सुनकर लगता है–",
'सम्मानजनक नहीं' सुनकर उसके दिमाग में सिर्फ राज का काम से भरा चेहरा आया। कैसे दिव्या और सरयू उसे तरस भरी नज़रों से देखते थे और कैसे आर्य और शिवम उससे दूरी बनाए रखते थे। कवच की असहजता देख उसे एक ही बात समझ में आई, "आपका मतलब क्या है वृषा? सम्मानजनक से आपका मतलब जो राज ने मेरे साथ करने की कोशिश की…?",
कवच चुप रहा और अपनी आँखें शर्म से नीचे झुका ली।
कवच को ऐसे देख उसके दिमाग जवाब के लिए चिल्लाने लगे। उसे समझ नहीं आ रहा था वो किस घिनौने दलदल में फंस गई थी। उसका पूरा शरीर ठंडे पसीने से भर गया था। सोफे से उछल उसने कवच को कंधे से पकड़ा और हिलाते हुए पूछा, "महाशक्ति क्या है वृषा? कवच का क्या काम है वृषा? इस घिनौनीपंती के लिए आप मुझे यहाँ लेकर आए हो? वृषा!",
कवच को हिलाते हुए पूछते वक्त उसकी अंगूठी कवच के गले की चैन से जाकर फंस गया। डर से घबराते हुए उसने अपने हाथ जोर से पीछे खींचा और सोफे से सटकर कमरे के कोने में डरकर सहमे हुए महाशक्ति के लॉकेट को चाकू की तरह अपनी आत्मरक्षा में पकड़ा। इससे कवच के गले के सामने पर गहरा घाव हुआ। उसकी गर्दन से खून बह रहा था। पर असली दर्द उसके सीने में हो रहा था।
लॉकेट को चाकू की तरह पकड़, "क-क्या मेरे साथ भी आप, मिस्टर खुराना, राज, शिवम जीजू भी वैसा कुछ---कुछ- तो नहीं? हम किस शक्ति के पीछे भाग रहे है?!",
उसके हावभाव भ्रम और उलझन से भरे हुए थे। कभी वो सिर पर घबराते हुए हाथ रखती तो कभी खुद को सिकोड़कर एक कोने हो जाती, "मु-मुझे पता नहीं था आपकी मदद का मतलब ऐसा था। मैं सामान्य घर से हूँ मिस्टर बिजलानी मुझसे ऐसा अभद्र काम नहीं होगा। समीर ने पहले ही मार दिया है आप मुझे दूसरी बार ऐसे मत मारिए, प्लीज़ मुझे जाने दीजिए। मैं ज़िंदगी भर आपकी दासी बन दूसरी सेवा करूँगी पर ये नहीं वृषा, पर यह नहीं, यह नहीं…"
महाशक्ति की साँस घबराते हुए पहली की तरह फूलने लगी थी।
कवच… उस बेचारे को समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करे? अचानक सब कैसे बादाम गया? ऐसे ही उसकी साँस फूलती रही थी तो कही जंगल की रात वाला कांड ना हो जाए।
हाँफते हुए, "इस बार जान लेने पड़े हाह… तो भी मैं… कतराने वाली नहीं! हाह…",
उसके चेहरे में कमज़ोरी और दृढ़ता दोनों थी।
और कवच के पास इन सबका समय नहीं था।