Swayamvadhu - 65 in Hindi Fiction Stories by Sayant books and stories PDF | स्वयंवधू - 65

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स्वयंवधू - 65


65. ज़ंजीर और अधीर का सच


पिछली कांड में पुलिस ऑफिसर धीरज बिजलानी के सड़क हादसे के तहकीकात के बीच में था जब उसके सीनियर के सीनियर ने उसे बिजलानियों के अपडेट के लिए हॉस्पिटल भिजवाया था।

वहाँ उसकी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई जिन्हें वो वापस कभी नहीं मिलना चाहता था। मरते वक्त भी नहीं!

वहाँ उसकी मुलाकात अपने पागल हत्यारे वैज्ञानिक पिता से हुई जिसके लिए ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं बस कामयाब या नाकामयाब के रस थे। उस पागल साइंटिस्ट और बेरहम बाप को अपना आदर्श मानना उसकी ज़िंदगी ने उसकी मासूमियत का बहुत बड़ा सौदा किया था। बचपन से खुद पर हुए विषैले प्रयोग का उसे कोई मलाल नहीं था। पर उसकी माँ, जो पुलिस ऑफिसर धीरज की माँ और डॉक्टर सुधीर की पत्नी तो थी पर उसकी सुरक्षित चुहिया भी थी। उसपर उसने कई दवाइयों के परीक्षण किए। प्रसिद्धि पाई और नई अतरंगी और काल्पनिक मिथ्या परीक्षण करने लगा। उसकी पहली रुची थी कि ऐसा शरीर बनाए जो कभी मरे ना। उसके लिए पहली ज़रूरत थी ऐसे खून, ऐसे डीएनए की जिसने हर विष, हर दोष पर विजय पाई हो। और इसका आसान और कारगर रास्ता था ऐसे बच्चे को जन्म देना जो पैदा ही ज़हर के घूँट के साथ हुआ हो। पर उसका परीक्षण असफल रहा। धीरज दस साल तक अनेक नाना प्रकार के ज़हर सोखने के बाद भी आम निकला। तो उसने धीरज को नकार दूसरे बच्चे की कोशिश की, ज़्यादा ताप वाले ज़हर के साथ। पर एक चूक के कारण उसकी माँ चल बसी। चूक थी कि उसकी चुहिया अब एक माँ थी और माँ बनकर अपने दोनों बच्चों को बचाना चाहती थी और उसका भंडा फोड़ना चाहती थी। और डॉक्टर सुधीर को यह गवारा नहीं था तो उसने उसकी माँ का गला उसी के सामने घोंट-घोंटकर खुन्नस से मारा था और सरा दोष इसपर डाल दिया कि यह सारी उसकी गलती थी‌ और अपनी नोंक पर रखा। पंद्रह साल की उम्र में जब उसे सच का पता चला, वो बदले की भावना से घर से भाग निकला। उसने पानी माँ पर हुए अत्याचार और क्रूर हत्या को कभी भुला ना सका और इतने साल बाद उस उसके माँ के हत्यारे को हँसता खेलता मुस्कुराता सामने देख उसका दबाया हुआ गुस्सा एक हल्के धक्के के फूट पड़ा। पुलिस ऑफिसर धीरज ने एलीट रेपुटेड डॉक्टर सुधीर को लगभग पाताल पहुँचा चुका था कि एक अंजन, काले ठक-ठक आवाज़ वाले जूते पहने वाले ने लात मार उसे बुकशेल्फ पर सिधार दिया था। डॉ. सुधीर की सारी विज्ञान, मिथ्या और रोबोटिक्स की मोटी किताबें मोटी बारिश की बूँदो की तरह उस पर जा धमकी, और धूल के बादल ने उसे अपने अंदर निगल लिया था। पर धीरज भी कम नहीं था। मार लगते ही वह धूल के बादल को चीरते हुए उस काले कपड़े पहने शख़्स पर झपटा और उसे पूरी ताकत से नीचे दबाकर हथकड़ी पहना दी।

अब आगे……

हथकड़ी बाँधते हुए धीरज नीची हँसी हँस संतुष्ट भरी अति आत्मविश्वास के साथ अपनी बाई बाजों को पकड़कर उठा, "पीछे से वार करने वाले का अंज़ाम यही होता है!",

कमरे में उड़ी धूल धीरे-धीरे छटने लगे, साथ ही धीरज के चेहरे के मुस्कान भी। क्योंकि नीचे जिसे सक्षम और तेज़ तरार युवा पुलिस ऑफिसर ने पकड़ा था वो उसी का बाप था। आधी बेहोशी की हालत में।

उससे देख धीरज के तोते उड़ गए।

वो झटके में कूद सारे केबिन को घूम-घूमकर, ऊपर-नीचे देखा। वहाँ वो सुधीर को बँधा छोड़ केबिन के मुख्य दरवाज़े पर गया। दरवाज़ा अंदर से बँद था।

"अंदर से कोई बाहर नहीं गया।", धीरज ने खुद में सोचा।

परिस्थिति तनावपूर्ण थी।

बँधे सुधीर को लांघकर धीरज रिपोर्ट्स को देखने गया।

तभी उसके कान खड़े हो गए। वो रिपोर्ट्स को को अपने सीने से चिपकर पीछे की तरफ कूदा। उसी पल उसके बाल को छूते हुए एक ज़ोरदार पंच तनाव रूपी शांति को चीरते हुए सुधीर के डेस्क पर पड़ा। रिपोर्ट्स को बगल फेंक वो सीधे उससे लपका— पर वो कालू बूट वाला काफ़ी तेज़ निकला। वो स्फूर्ति से धीरज का गला दबाकर नीची हँसी मुस्कुराते हुए उसपर कूदा पड़ा। धीरज इस अचानक पलटवार से अचंभित एक पल के लिए सुन रह गया। उसके हाथ पैर मुर्दे जैसे स्थिर थे, फिर हवा की कमी ने उसमें नई जान फूँक दी जिसे बचाने के लिए वो संघर्ष करने लगा। उसके हाथ पैर हवा में लहरा रहे थे पर सुधीर ने जैसे किए वैसे नहीं, धीरज ने हाथ फड़फड़ाते हुए अपने अगल बगल कुछ ढूँढने की कोशिश कि पर कुछ हाथ ना आया। वहाँ कुछ भी नहीं था। वो शख़्स आपना चेहरा छिपाए अपनी तीखी आँखो से उसे तौल रहा था। धीरज की आँखे धुंधली पड़ रही थी, हमलावर के नीले कपड़े उसका ध्यान खींच रही थी। सिर को ज़ोर से झड़ककर वो होश में आया। हमलावर का ध्यान धीरज कि गिरती साँसो पर था। उसकी भटकी ध्यान का फ़ायदा उठा धीरज ने अपनी आखिरी ताकत बटोर उसने उस शख़्स के पेट के निचले हिस्से में एक ज़ोरदार लात मारी और उसे सिर से पकड़कर, हाथ घुमाकर उसे नीचे पटक दिया।

धीरज साँस लेने के लिए संघर्ष करता हुए उसे धड़ दर्पोचा और उसका मुखौटा चीरते हुए निकाला। धीरज उसका चेहरा देखने के लिए बेसब्र था। जैसे ही उसका घूंघट हटा– धीरज के अटकी साँस पूरी अटक गई। उसके पसीने छूटने लगे, उसके हाथ ढीले पड़ने लगे। उसने धीरे से उसका हाथ सम्मानपूर्वक छोड़ा और सामने जाकर अपने आप को ठीक कर उसे इज्ज़तदार सलाम ठोकी।

"जय हिंद सर!"

नील वर्ण ज़मीन पर अपना पेट मलते हुए बैठा।

सामने सलाम थोक धीरज डर से सावधान खड़ा था।

नील वर्ण ने थोड़े दर्द से कहा , "आह! तुम्हारे पंच में काफ़ी दम है।",

"यस सर!", धीरज ने सम्मान के साथ कहा,

हाथ आगे कर, "अब इस बूढ़े ऑफिसर को उठने में तो मदद करो।",

धीरज हड़बड़ाहट में, "यस सर, यस सर।", कह उससे उठाने भागा,

उसे उठाने के बाद धीरज सारे रिपोर्ट्स लेकर उसके पास गया, "सर यह रहे रिपोर्ट्स। इसमें वृषा बिजलानी और किसी वृषाली राय की रिपोर्ट्स है। दुर्घटना स्थल में तो यह सामान्य दुर्घटना ही लग रही थी पर कुछ तो अजीब है। क्या? समझ नहीं आ रहा।

और हाँ? आप यहाँ? आप तो अंडरकवर…", उत्सुकता उत्सुकता में उसने ज़्यादा ही बोल दिया। अपना मुँह बँदकर, "सॉरी सर। पर ज़ंजीर सर यह वृषाली राय है कौन?",

वो नकाबपोश, ज़ंजीर क्षेत्रिय था।

खुश, ज़ंजीर क्षेत्रिय सोफे के पास जाकर बैठा और पूछा, "तुम्हें मेरे बारे में कैसे पता चला?",

धीरज गर्व के साथ, "आप ही मेरे प्रेरणा है सर। मैंने जब घर छोड़ा था, उस वक्त मेरे पास सिर्फ चिंगारी थी पर आपकी कहानी ने मेरे चिंगारी को आग बनाया है।",

"वो कैसे?", ज़ंजीर ने रिपोर्ट्स बगल रख पूछा,

धीरज शर्माकर अपनी आँखें बँद कर शर्मिंदगी से कहा, "वो- सर, सड़क पर दो दिन बिना किसी खाने पीने के भटकने के बाद में वापस उस आराम की ज़िंदगी के लिय उसके घर के बाहर भटक रहा था, तभी मुझे दो पुलिसवालों ने चोर समझकर पकड़ लिया। उनमें से एक मेरे लाख समझाने पर भी नहीं मान रहा था– तो... मैं उसे धक्के मारकर भागे लगा था पर दूसरे ने पकड़ लिया। और, वो, यह हुआ की…", शर्मिंदगी से वो लाल हो चुका था।

उसने आँखें हल्की उठाके ज़ंजीर की तरफ देखा। ज़ंजीर उसके कहानी का इंतज़ार कर रहा था। ना चाहते हुए भी वो मुँह छिपकर, "मैं लड़कियों जैसे रोने लगा…उनसे भी बत्तर। अहम!",

गला साफ़ कर, "वो... मैं, सर वो मैं... बोलने में भी शर्म आ रही है कि क्या बोलूँ।", शर्मिंदी से उसने कहा,"वो, मैं इतनी ज़ोर-ज़ोर से सो रहा था कि उन्हें भी दो मिनट के बाद मेरे ऊपर तरस आने लगी। जिस ऑफिसर को मैंने धक्का मारा था वो भी उठकर मुझे शांत करने लगे। बड़ी मेहनत के बाद मुझे याद है मैं चुप हुआ था। हाह!", धीरज भी ज़ंजीर के साथ ज़मीन पर बैठकर, "गिरिराज अंकल और राजवीर अंकल ने मेरी कहानी सुनने के बाद मुझे अपना लिया था।",

ज़ंजीर ने खुद में बड़बड़ाया, "गिरि और राज?",

धीरज हल्की मुस्कान के साथ के साथ गर्व से कहा, "उन्होंने मुझे नया घर दिया, आज़ादी का मतलब समझाया, पढ़ाया लिखाया, और आपकी बहादुरी कि किस्से सुनाई।",

" मे-मेरी बहादुरी कि किस्से?", ज़ंजीर ने खुशी और गम की मिश्रित भावना से कहा।

धीरज ने दुख और सम्मान के साथ कहा, "हाँ...", कह धीरज थोड़ी देर ज़ंजीर के साथ गम में डूब गया।

वो थोड़ी देर ज़ंजीर को ऐसे ही देखता रहा।

ज़ंजीर लाल आँखों से ज़मीन को देख रहा था। उसके आँखों के नस लाल, फूली हुई थी, और आँखें सूजी।

धीरज ने हल्की कड़वी मीठी कष्टदायक मुस्कान के साथ कहा, "... कैसे सर आपने अपनी ट्रेनिंग के पहले दिन सर के फेवरेट बनने के चक्कर में इतने लेप्स मारे थे कि उन दोनों को दो दिन छुट्टी लेकर आपकी देखभाल करनी पड़ी थी।",

"हा, हा...", ज़ंजीर थोड़ा हँसा, "क्या उन्होंने तुमसे कहा?", ज़ंजीर की आवाज़ अजीब सी कमज़ोर हो गई थी।

धीरज ने अपनी सूखी थूक को निगलकर कहा, "और उसके बाद से आपकी ट्रेनिंग पूरी होने तक आपको सब 'उत्साही' बुलाकर चिढ़ाते थे।

ज़ंजीर ने शर्म और पीड़ा वाली मुस्कान दी।

धीरज आगे बोला, "उन्होंने आपके बहादुरी के किस्से भी सुनाए कि कैसे अपने शुरुआती दिनों में ही ज़मींदारो के छक्के छुड़ा दिए थे और कैसे आपने एक अवैध बार में अवैध तरीके से नन्हीं बच्चियों के गरीबी और मासूमियत का फ़ायदा उठा उनपर होते अभद्रता का पर्दा फाश करने के लिए खुद ही वहाँ के रोज़मर्रा के ग्राहक बन गए और उन्हें उन्हीं के खेल में एक दूसरे को एक्पोज करने पर मज़बूर कर दिया। एक ही झटके में बीस बार बँद हो गए थे।

आगे आपके ऐसे ही कारनामों के कारण मुजरिमों का यमदूत कहते थे जो अब अपनी ज़िंदगी की सबसे कठिन और लंबी लड़ाई लड़ रहे है। हाँ सर, गिरिराज सर और राजवीर सर ने मुझे आपके साथ हुए अन्याय के कई किस्से सुनाए थे।", धीरज ने बहुत कष्ट में बोला।

ज़ंजीर चुप था।

धीरज ने बदले की भावना के साथ बोला, "गिरिराज सर और राजवीर सर ने उस दिन के बारे में भी बताया जब... हाह! समीर बिजलानी ने आपको सबक सिखाने के लिए हॉस्पिटल में लगी आग में आपकी पत्नी और नवजात बच्चे समेत तीन सौ लोग, बच्चे बूढ़े सभी ज़िंदा जलकर मार दिया...कोई सबूत, कोई गवाह नहीं।", धीरज ने ज़ंजीर की तरफ़ देखा, उसकी आँख लावा से भी लाल थी। धीरज उससे शांत करना चाहता था पर नहीं भी।

डर से ही पर धीरज ने कहा, "दोनों का मानना था कि सब समीर बिजलानी का किया कराया था लेकिन सबूत और गवाहों के कमी के कारण..... उनकी ज़िंदगी हमेशा इसी केस पर ही आकर रुक जाती थी। मरते वक्त भी वो इसी केस पर काम कर रहे थे।",

भारी आवाज़ के साथ उसने पूछा, "आठ साल पहले हुई घटना?",

उसी भारीपन के साथ धीरज ने हिचकिचाते हुए, "हाँ भी और ना भी...", धीरज की आवाज़ भावनाओं से भरी हो गई थी।

ज़ंजीर के पैरों के नीचे की जमीन टूटने लगी।

"इंटरनल और एक्टरनल, हर एक रिपोर्ट्स कहती है कि आठ साल पहले वो जेल इंस्पेक्शन के दौरान गैंग फ़ाइट रोकते हुए मारे गए।

मैंने खुद चुपके से जाँच की थी। वो लोग जेल में! गैंग फ़ाइट में मारे गए!", ज़ंजीर ने धीरज को कंधे से पकड़कर पूछा,

ज़ंजीर के आँखों की ज्वाला और लाल होने लगी। साँसे तेज़ थी और चेहरे पर बेसब्री और खुन्नस जिससे धीरज को भी अपने आदर्श से डर लगने लगा था। इतना डर कि उससे उसके आदर्श के पीछे से लाल और काले रंग का कोहरा दिखने लगा।

धीरज उस धुएँ को देख सुन रह गया। ज़ंजीर की आवाज़, उसके कान में नहीं, उसके सिर के अंदर गूँज रही थी, "वो ऐसे कैसे मर सकते है? महज़ एक गैंग फ़ाइट से? हम इससे बत्तर परिस्थित से निकलकर बाहर आए थे। इतने छोटे से हादसे से वो कभी नहीं मर सकते!",

"आह!", धीरज दर्द से करहाया,

डॉक्टर सुधीर जो वह बँधा लेटा पड़ा था, वो भी उसकी चीख सुन डर से उछल पड़ा।

"धीर-धीरज!", डॉक्टर सुधीर चिल्लाकर धीरज को बुलाया। उसकी पीठ उनकी तरफ थी। वो उसे देखने के लिए झटपटने लगा।

धीरज उसी जगह दिमाग में ज़ंजीर की दुख, दर्द, पीड़ा, खुन्नस और पश्चाताप की भावना कील की तरह कुरेदने लगी।

उसके माथे पर नस सूजकर नीले पड़ने लगी, दिल की धड़कने खतरनाक गति से तेज़ होने लगी, आँखें बाहर निकलने लगी और साँसे छोटी और तेज़।

उससे और नहीं हुआ, अपने कान बँद कर धीरज ज़ोर से चिल्लाया,

"नहीं वो मरे नहीं! उन्हें मारा गया था, वो लोग शहीद हुए! वे देश को बचाते हुए शहीद हुए! उन्हें पता था, उन्हें पता था कि उनके मौत की साज़िश उन्हीं के सीनियर और जूनियर रच रहे थे। उन्हें उनके मौत का वक्त, उसकी तारीख, कारण सब पता था। फिर भी, फिर भी वो चुप रहे और अपनी अर्थी सजते हुए देख रहे थे। मरे नहीं, मारे गए!....", कहते-कहते धीरज बैठे-बैठे बेसुध झूमने लगा।

सुधीर भी मचलने लगा। 

ज़ंजीर के पीठ से अब भी वो धुँध निकल रहे थे पर और घनी, घातक। ज़ंजीर को बहुत बड़ा धक्का लगा था।

"उनकी मौत का कारण जेल गैंग वार नहीं था? इतने साल मैं क्या करता रहा?",

कमरा एक घुटन भरी, पश्चाताप की गाढ़ी धुँध से घुटा हुआ था।

धीरज आँखें पीछे पलटने लगे। आँखों, कान, नाक से खून निकलने लगा तभी अचानक, अंदर से बँद दरवाज़ा अपने आप एक ज़ोर के धमाके से खुल गया। दरवाज़ा खुलते ही सारी धुँध उस वैक्यूम सीलबंद कमरा से बाहर निकलने लगी।

धीरज ने खुद को संभालने की जीतोड़ कोशिश कर कहा था पर ज़ंजीर के शक्ति के आगे घुटने टेक गिरने लगा तभी पट्टी बाँधे एक बड़े हाथ ने उसे संभालकर लेटाया और आदेश दिया, "वृषाली तुम ज़ंजीर सर को देखो।",

"वृषाली नहीं मीरा।", वृषा को ठीक करते हुए ज़ंज़ीर की तरफ भागी।

दोनों की कदमों की गूँज पूरे केबिन में फेल गई। दोनों हॉस्पिटल गाउन पहने धीरज और ज़ंजीर को संभल रहे थे। कवच धीरज को आराम से लेटकर डॉक्टर सुधीर को खोलने भगा ताकि वो उसकी जाँच कर सके। डॉक्टर सुधीर धीरज की जाँच कर रहा था तो कवच महाशक्ति की ओर देख। वो ज़ंजीर के पास भागकर उसके आँख में हाथ नरमी से, कोमल भाव से रखा। कवच को लगा कि सब ठीक से निपट रहा था कि उसने अपना दाहिना हाथ उठाया और उसकी गर्दन में एक खींच कर ज़ोरदार कराटे चॉप मारा और उसे वही बेहोश कर दिया।

"यह तुम क्या कर रही हो वृषाली‽", अचानक हुए हमले से वो चौंक गया।

"मीरा!", उसे ठीक किया फिर आगे बोली, "बस एक मिनट वृषा- हाह! हो गया, ही गया।", उसने उसे लेटते हुए बोला, "बहुत भरी है आपके सर।"

चिढ़ से कवच ने पुछा, "मैडम मीरा। यह आप क्या कर रही है?",

बिना एक सेकंड जाया किए उसने कहा, "जो पढ़ा-सीखा उसका सजीव प्रदर्शन। समझे, गुरु वृषा बिजलानी जी।",

उसके बाद महाशक्ति, ज़ंजीर का कोट निकलने लगी। फिर एक-एक कर ज़ंजीर के कमीज़ के बटन खोलने लगी।

"क्या कर रही हो तुम?", कवच ने तंग आकर पूछा,

कवच को नज़रंदाज़ कर ज़ंजीर को बीच कमरे में अर्धनग्न कर अपने जेब से एक चाकू निकाला।

चाकू देख कवच ने फटी आँखों से पूछा, "ये चाकू कहा से आया?",

"फल की कटोरी से।", चाकू लेकर उसके जिस्म काटने लिए हाथ उठाया।

हाथ में चाकू देख उसने घबराकर हाथ पकड़कर पूछा, "तुम ये सर का खून करने जा रही हो?", 

उसने उसे भ्रम से देखा, "आपके ज़ंजीर सर की सच्चाई आपको नहीं पता?", कह महाशक्ति ने कवच का हाथ ज़ंजीर के सीने पर रखा।

हाथ रखते ही कवच सहम गया। उसके हाथ ज़ंजीर के सीने पर रुक गया।

"यह शक्ति? रुक जाओ वृषाली। मुझे नहीं लगता तुम्हें ऐसा कुछ करना!", कवच ने काँपते हुए बोला,

"अब होगी खून की बारिश।", कह उसने तेज़ चमकती हुई चाकू ज़ंजीर के सीने में उतार दी।