lie-truth in Hindi Moral Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | झूठ-सच

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झूठ-सच

झूठ-सच

 कमल चोपड़ा

​   राजकुमार श्वेतांक की उम्र पंद्रह वर्ष थी। एक दिन घूमते-घूमते वह वन की ओर निकल गया। अचानक उस पर एक शेर ने हमला कर दिया। राजकुमार के हाथों से हथियार छूट गए। वह लड़ते-लड़ते लहूलुहान होकर गिर पड़ा। वह बेहद घबरा गया, उसे लगा कि अब उसका अंत आ गया है। शेर उसे मारकर खा जाएगा लेकिन जैसे ही शेर ने उस पर दोबारा हमला करना चाहा, तभी एक साहसी युवक सामने आ गया। आते ही उसने राजकुमार से कहा, ‘घबराओ मत, मैं अभी इस शेर को मजा चखाता हूँ।’ और वह शेर से भिड़ गया।

​    एक अकेले आदमी को शेर के साथ युद्ध करते देखकर राजकुमार कांप रहा था। और उधर वह अद्भुत योद्धा शेर के साथ जूझ रहा था। काफी देर तक रोंगटे खड़े कर देने वाला यह युद्ध चलता रहा। राजकुमार उस युवक का साहस, बल और युद्ध-कला देखकर हैरान था।

​    काफी देर तक शेर के साथ जूझने के बाद युवक ने उसे मार भगाया। युवक को धन्यवाद देते हुए राजकुमार ने कहा, ‘मैं महाराज बलभद्र का पुत्र राजकुमार श्वेतांक हूँ। आपने मेरे प्राण बचाए, इसके लिए मैं आपको अपने पिता से मिलवाना चाहूँगा। उन्हें भी आप जैसे साहसी योद्धा से मिलकर प्रसन्नता होगी। इस घटना के बारे में सुनकर हो सकता है, मेरे पिता आपको ढेर सारा इनाम दें और राजदरबार में आपका सम्मान करें।’

​   युवक ने कहा, ‘ठीक है राजकुमार, मैं आपके साथ चलता हूँ। महाराज के दर्शन कर पाना ही मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।’

​  उधर महाराज बलभद्र राजकुमार के अभी तक न लौटने से चिंतित थे। वह सैनिकों को राजकुमार की खोज करने भेजने ही वाले थे कि सामने से उन्हें राजकुमार आता हुआ दिखाई दिया। महाराज राजकुमार को लौटा देखकर प्रसन्न हो उठे। आगे बढ़कर उन्होंने उसे गले लगाया और पूछा, ‘इतनी देर कहाँ लगा दी? कहाँ घूमने निकल गए थे तुम?’

​   राजकुमार ने सारी घटना अपने पिता को विस्तार से सुनाई। तब तक वहाँ कुछ मंत्रीगण भी आ पहुँचे थे। घटना का वर्णन सुनकर उनके भी रोंगटे खड़े हो गए। सब मिलकर युवक की प्रशंसा करने लगे।

​   एक मंत्री ने तो यहाँ तक कहा, ‘इसने राजकुमार का जीवन बचाकर पूरे राज्य पर उपकार किया है। इसे मुँहमाँगा इनाम दिया जाना चाहिए। बल्कि इस युवक को सेनापति बनाकर पूरे राज्य की सुरक्षा का भार सौंप देना चाहिए।’

​   सभी ने महाराज से उसे इनाम देने का आग्रह किया। महाराज ने सभी की बात सुनी और बोले, ‘इस युवक को क्या और कैसा इनाम दिया जाए, इसका फैसला हम आठ दिन बाद राजदरबार में करेंगे। तब तक इस युवक को अतिथिगृह में रखा जाए।’ इतना कहकर महाराज चले गए।

​   महाराज के इस व्यवहार से सभी परेशान हुए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि महाराज को इतनी सी बात पर विचार करने के लिए आठ दिन का समय क्यों चाहिए? उन्हें आखिर यही तो तय करना था कि युवक को क्या इनाम दिया जाए? महाराज को तो खुश होकर उसी समय युवक को मालामाल कर देना चाहिए था।

​   आठ दिन बाद राजदरबार लगा, तो युवक भी इनाम लेने आ पहुँचा। महाराज ने युवक को देखते ही उसे कारागार में डाल देने का आदेश दिया। दरबार में उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। युवक को तो इनाम मिलना चाहिए था। एक तो उसने महाराज के पुत्र की जान बचाई और उल्टा महाराज उसे कारागार में डाल रहे हैं।

    महाराज ने सबको शांत करते हुए कहा, ‘कभी-कभी सीधी-सी लगने वाली बात में भी बहुत गहराई होती है। यह बात भी सीधी-सी थी, लेकिन इन आठ दिनों में अपने गुप्तचरों से जाँच कराने पर पता चला है कि यह युवक कोई महान योद्धा, पराक्रमी और साहसी न होकर एक मामूली-सा मदारी है। वह शेर उसका सिखाया हुआ था। उसने जान-बूझकर पहले अपने शेर से हमला करवाया, फिर खुद वहाँ आकर शेर से युद्ध करने का अभिनय किया। ऐसे चालबाज आदमी को दंडित नहीं किया जाए, तो क्या किया जाए। इनाम पाने के लिए इसने ऐसी साजिश रची। इस साजिश से राजकुमार की जान जा सकती थी। शेर को प्रशिक्षण देना एक कला है, लेकिन इस आदमी ने एक कलाकार होकर अपनी कला का दुरुपयोग किया है, इसलिए इसे सात वर्ष का कारावास दिया जाता है ताकि भविष्य में कोई ऐसा षड्यंत्र न रचे।’

​   दरबार में उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। वे सब महाराज की बुद्धिमत्ता की मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे।