don't lose courage in Hindi Moral Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | हिम्मत न हार

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हिम्मत न हार

हिम्मत न हार

कमल चोपड़ा

​चलते-चलते अगम नदी तक आ पहुँचा था। कुछ देर तक वह पानी के तेज बहाव को देखता रहा फिर नदी के किनारे लगे एक पेड़ के तने से लिपट कर रोने लगा। आज विद्यालय में आठवीं कक्षा का परिणाम निकला था जिसमें वह अनुत्तीर्ण हो गया था। माँ-पिताजी दोनों क्या कहेंगे? वह घर नहीं लौटना चाहता था।​माँ-पिताजी क्या कहेंगे? कितनी मुश्किल से अपना पेट काटकर तेरे विद्यालय का शुल्क भर रहे हैं और तू अनुत्तीर्ण हो गया? नालायक! निकम्मे! हाँ, मुझे मर जाना चाहिए। नदी में कूद कर मरने के लिए तो मैं यहाँ आया हूँ... घर लौटना तो मुश्किल है। माँ-पिताजी बुरा-भला कहेंगे। कहीं दूर भाग जाऊँ तो कहीं किसी कारखाने में नौकरी करनी पड़ेगी या कोई मेरे हाथ-पाँव तोड़ भीख मँगवाएगा। मेहनत करवाएगा। इससे अच्छा तो मैं पढ़ ही लेता तो ये नौबत न आती। पर मैं तो टी. वी., कार्टून, कॉमिक्स में उलझा रहा पर अब पछताने से क्या होगा? अब तो मर जाना ही ठीक रहेगा।​उसे लगा उसके सिर पर पड़ रही पेड़ की शाखाओं की छाया किसी बुजुर्ग की तरह उसका सिर सहला रही है। वह पेड़ के नीचे बैठ गया। उसकी आँखों से अब भी आँसू बह रहे थे।​  ​तभी अगम ने देखा एक दुबला-पतला बूढ़ा पीठ पर बड़ी-सी गठरी उठाए नदी के पुल की ओर बढ़ रहा है। बूढ़े के हाथ में लाठी और पैर पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। उसे चलने में बेहद मुश्किल हो रही थी। एकाएक चक्कर खाकर बूढ़ा गिर पड़ा। दौड़कर अगम उस तक पहुँचा और सहारा देकर पेड़ की छाँव में लाकर बिठा दिया। फिर गठरी भी लाकर रख दी।​थोड़ा होश आने पर अगम के पूछने पर बूढ़े ने बताया- “मेरा नाम रामकिशन है। कोई समय था जब लोग मुझे लाला रामकिशन कहा करते थे। सदर बाजार में मेरी बहुत बड़ी दुकान थी। वजीरपुर में मेरा बहुत बड़ा कारखाना था। एक दिन मैं परिवार समेत कहीं जा रहा था कि एक बस दुर्घटना में मेरा बेटा मर गया। मेरी बेटी का एक हाथ एक पाँव टूट गया। मेरी पत्नी के सिर पर चोट लगी जिसकी वजह से वह अपनी याददाश्त खो चुकी है और मेरी टाँगें तो देख ही रहे हो? दुर्घटना के बाद पत्नी, बेटी और मेरे इलाज के चक्कर में मेरी दुकान बिक गई। मेरा कारखाना मेरे मैनेजर ने अपने कब्जे में ले लिया। आज मैं नदी पर कृष्ण नगर के फुटपाथ पर रहकर ये किताबें बेच कर किसी तरह गुजारा कर रहा हूँ। समय-समय की बात है। लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारा हूँ। मुझे हार माननी भी नहीं। पत्नी का बड़े-से-बड़े डॉक्टर से इलाज करवा रहा हूँ। बेटी भी काफी ठीक हो गई है। बस लँगड़ा कर चलती है। मेरा एक पाँव तो ठीक है पर ये दूसरा अभी ठीक नहीं है। इसका भी इलाज चल रहा है। मैनेजर पर भी मुकदमा अभी चल रहा है। आगे भी लड़ूँगा। बेटी के ब्याह के लिए बहुत सारे रुपए इकट्ठे करने हैं। उम्र भी काफी हो चली है पर मुझे हिम्मत नहीं हारनी है।”​अगम की आँखों में आँसू देखकर एकाएक बूढ़े ने पूछा- “क्या हुआ?”​रुलाई फूट पड़ी अगम की- “बाबा, मैं फेल हो गया। मैं घर नहीं लौटना चाहता। मर जाना चाहता हूँ।”  ​अगम को घूरते हुए बूढ़े ने कहा- “अपने बारे में ही सोच रहे हो? तुम्हारे बाद माँ-पिता पर क्या गुजरेगी? वे बेचारे तो रो-रोकर ही मर जाएँगे। मुझे देखो! मैं इतना दुखी हूँ फिर भी हार नहीं मान रहा हूँ। और तुम? उल्टा अपने माँ-पिता को सजा देना चाहते हो कि वे रो-रोकर मर जाएँ?”​तड़पकर अगम ने कहा- “नहीं.........”​“तो वापिस लौट जाओ। उधर तुम्हारे माता-पिता परेशान हो रहे होंगे। तुम्हें ढूँढ़ रहे होंगे।”​अगम ने उस बुजुर्ग के पाँव छुए और तेज-तेज कदमों से घर की ओर लौट पड़ा।