कमल चोपड़ा
बीच में उसका वह डर लगभग खत्म हो गया था, जो उसे शुरू-शुरू में लगता था और जिसने इन दिनों फिर से उसे घेर लिया था। यहाँ रहते हुए उसे दस साल हो गये थे, उसे यह लगता नहीं था कि वे यहाँ किराये के मकान में रह रहे हैं और कि यह मुहल्ला हिन्दुओं का है।
बुजुर्ग मकान-मालिक और मालकिन जिन्हें कि वे 'जी बाबूजी' और 'जी अम्माजी' कहकर पुकारते थे, कभी लगा ही नहीं कि गैर हैं या दूसरे मजहब के हैं।
जिन्नी अभी तक नहीं लौटी थी। रत्ना स्टोरवाले लाला से नमक की थैली लेने गयी थी। अब तक तो शहाना ने हौसला रखा था—रास्ते में कोई सहेली-वहेली मिल गयी होगी...वहीं खड़ी हो गयी होगी बातें बनाने...नौ साल की हो गयी पर...? बातें जितनी मर्जी करवा लो...दस मिनट का काम था, आधा घण्टा होने को आया।
अनहोनी की आशंका से उसके हाथ-पाँव काँपकर रह गये। जिन्नी तो अपने अब्बू की जान है। उसे कुछ हो-हवा गया तो उसके अब्बू मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे।
घबराहट के मारे उसको पसीना चुहचुहाने लगा। जल्दी-जल्दी पैरों में चप्पल डालकर वह ज्योंही घर से निकली, सामने से पड़ोस में रहनेवाली जिन्नी की सहेली स्मृति दौड़ी आ रही थी। उसका साँस फूला हुआ था और वह घबराई हुई थी, "आंटी-आंटी...जिन्नी कहाँ है? घर पर है कि...?"
"नमक की थैली लेने बाजार भेजा था मैंने उसे...!"
"हूँ...उधर से ही आ रही हूँ मैं। थोड़ी देर पहले दो लड़के एक बाइक पर जिन्नी जैसी लड़की को बिठाकर ले जा रहे थे। लड़की के मुँह पर उन्होंने कपड़ा रखा था। लड़की रो रही थी। वे लड़के लग तो इसी मुहल्ले के रहे थे पर मैंने उन्हें पहचाना नहीं। बाइक फुर्र से उड़ाकर ले गये। लड़की ने स्काई ब्लू रंग का सूट पहन रखा था।"
गश खाकर शहाना नीचे गिर पड़ी। स्मृति सम्भालने लगी। उसकी 'आंटी-आंटी...' आवाजें सुनकर मकान-मालिक व मालकिन दौड़े आये—क्या हुआ? बात का पता चला तो परेशान हो उठे। अम्माजी दौड़कर पानी ले आयीं। छींटे मारे तो शहाना की सुध लौटी। बाबूजी हौसला देने लगे, "कुछ नहीं होगा जिन्नी को। तू घबरा मत। हिम्मत से काम लो!"
आसपास के लोग जुड़ने लगे थे। जिन्नी को खोजने के लिए इधर-उधर दौड़-भाग मच गयी थी। घबराहट के मारे शहाना का बुरा हाल था। उसे गश-पर-गश पड़ रहे थे। असलम को भी खबर देनी चाहिए, कहाँ गया है वह?
चुप लगा गयी शहाना—क्या बताये? कि वह तो हिन्दुओं का वह मुहल्ला छोड़कर मुसलमानों के मुहल्ले में रहने के लिए कमरा ढूँढ़ने गया है, कि उसे यहाँ के लोगों पर विश्वास नहीं, कि वह हिन्दुओं के इस मुहल्ले में रहना नहीं चाहता, कि शहर में कहीं भी कोई छिटपुट झगड़ा-फसाद या दंगा हो जाता है तो वह तुरन्त मुहल्ला छोड़ने की बात करने लगता है।
"गया कहाँ है असलम?" बाबूजी ने फिर से पूछा।
"जाफरपुर गये हैं किसी काम से! मोबाइल भी घर पर ही भूल गये हैं। वहाँ का कोई पता भी नहीं बता कर गये! उन्हें पता लगेगा तो..." वह फिर रोने-छटपटाने लगी थी।
असलम तो चाहता था कि इधर से शिफ्ट कर जायें लेकिन शहाना ही नहीं मानती थी।
"अब्बू-अम्मी की तरह हर सुख-दुख में काम आनेवाले कहाँ मिलेंगे ऐसे मकान-मालिक। मुहल्लेवालों ने भी कभी महसूस नहीं होने दिया कि हम दूसरे मजहब के हैं।"
"कामधन्धा इधर ही है। जाफरपुर तो इधर से बहुत दूर पड़ेगा। फिर कितना मुश्किल है रोज आना-जाना? किराया-भाड़ा अलग। जिन्नी का स्कूल भी इधर ही है। स्कूल बदलने का झंझट। इधर ठीक-ठाक तो चल रहा है।"
खीझ उठता असलम, "खुदा न खास्ता इधर कभी दंगा-वंगा हो गया तो बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा। मुझे तो हर वक्त जिन्नी की फिक्र रहती है। लड़की की जात है। कुछ ऊँच-नीच हो गया तो...?"
तभी असलम का फोन बजा, "अरे मेरा ये मोबाइल घर पर ही रह गया था!" रुलाई नहीं रोक पाई शहाना और रोते-रोते सारी बात असलम को बताई। फोन पर ही भड़क पड़ा असलम, "वही बात हुई न, इसी बात का डर था मुझे। अभी वापस आता हूँ। जिन्नी को कुछ हो गया तो तेरी खैर नहीं...।"
मुहल्लेवालों को भी नहीं छोड़ूँगा। क्या समझते हैं? हम वहाँ अकेले हैं? कौम बिरादरीवालों को वहाँ पहुँचने में कितनी देर लगेगी। ईंट-से-ईंट बजा देंगे! इन्हें भी ऐसा सबक न सिखा दिया तो...।"
शहाना को दिलासा देते-देते बाबूजी की आँखों में भी आँसू आ गये। उनके अपने बेटे विदेश में रह रहे थे। वे इन्हें ही अपना बेटा-बहू मानते थे। बाबूजी ने उठकर अपने जाननेवाले एस.पी. को फोन पर तुरन्त बच्ची का पता लगाने के लिए कह दिया।
दो महीने पहले भी असलम जाफरपुर में किराये का कमरा देखकर एडवांस दे आया था तब जिन्नी नहीं मानी थी—नहीं अब्बू! हम इधर ही रहेंगे। बच्ची की खातिर तब तो मान गया था असलम। बच्ची का यहाँ मन लगा हुआ है। दिया हुआ एडवांस भी जाया किया। आठ-दस दिन पहले जिन्नी ने आकर बताया कि मुहल्ले के लड़कों ने उसे छेड़ा है तो अम्मी और अब्बू की साँस जहाँ की तहाँ अटक गयी। जिन्नी के कपड़ों पर गोबर लगा हुआ था। उसने बताया कि सहेली के घर से वह अकेली आ रही थी। कुछ लड़के पार्क में क्रिकेट खेल रहे थे। एक लड़के ने जोर से शॉट मारा। बॉल उड़कर पार्क के बाहर सड़क पर बैठे कुत्ते को जा लगी। कुत्ता कैऊँ-कैऊँ करके जिन्नी की ओर भागा। उसे लगा कुत्ता उसे काटने आ रहा है। वह भी डरकर भागी। हड़बड़ी में वह सड़क पर पड़े गोबर पर गिर पड़ी। कुत्ता तो साइड से होकर निकल गया।
बताते-बताते जिन्नी अपनी सूनी आँखें मलने लगी, "सारे लड़के हँसने लगे। एक लड़का मुझे देखकर भैंस की तरह भाँ-भाँ करने लगा।"
अम्मी भी हँस पड़ी पर अब्बू सीरियस हो गये।
"वो कुत्ता कमीना भी हँस रहा था...दूर खड़ा होकर...।"
"कुत्ता कमीना कौन?"
"वो कुत्ता जो मुझे काटने मेरी तरफ आ रहा था।"
उस दिन असलम ने फिर से यह मुहल्ला छोड़ने का निश्चय कर लिया था और आज फिर कमरा ढूँढ़ने जाफरपुर गया हुआ था।
स्मृति बेहद डरी हुई थी। जो मिलता उससे पूछताछ करने लगती—वे कौन, नाम नहीं पता, तो शक्लें तो देखी होंगी। रंग कैसा था? उम्र कितनी होगी? लम्बे थे या ठिगने कद के? किधर को जा रहे थे।
स्मृति रोने को हो आयी थी। उसकी मम्मी को पता चला तो वह उसे बुलाकर घर से ले गयी, "तू जिसका भी नाम लेगी वह हमारा दुश्मन ही बन..."
जायेगा। लोग उसके घर पर तो हमला बोल ही देंगे। दंगा-फसाद खड़ा हो जायेगा। अब तू घर से बाहर मत जाना।"
भराये स्वर में पूछा स्मृति ने, "जिन्नी को कुछ होगा तो नहीं?"
छटपटा रही थी शहाना, "हाय मेरी बच्ची जाने कहाँ होगी? इसके अब्बू कहेंगे तूने बच्ची को भेजा ही क्यों? खुद क्यों न चली गयी नमक की थैली लेने। मुहल्लेवाले तो मदद कर रहे हैं। जाने कौन थे वो गुण्डे...।"
जिन्नी के अब्बू ने आते ही मुहल्लेवालों के खिलाफ कुछ बोल दिया तो? बात बढ़ जायेगी। कहीं दंगा-वंगा न हो जाये।
असलम लौटा तो डर और गुस्से के मारे फनफना रहा था। आते ही उसने इधर-उधर फोन करने शुरू कर दिये। कुछ ही देर में उसके दोस्त-रिश्तेदार इकट्ठे होने लगे। पहले दबी जुबान में फिर बाकायदा ऊँची आवाज में मुहल्लेवालों को सुनाने लगे, "बस पता चल जाये किसकी हरकत है? दिखा देंगे कि किसी की इज्जत पर हमले का अंजाम क्या होता है? हमने चूड़ियाँ नहीं पहन रखीं!" मुहल्ले में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।
"जिन्नी आ गयी...जिन्नी आ गयी!" गली से आवाजें आयीं। सभी बाहर लपके। दो लड़के मोटरसाइकिल पर जिन्नी को लेकर आये थे। जिन्नी के माथे पर पट्टी बँधी हुई थी। घबराकर शहाना ने पूछा—क्या हुआ। एक लड़के ने बताया, "बहनजी, ये बिल्ली की तरह दौड़ी जा रही थी। एक बाइकवाला इसे साइड मारकर भाग गया। ये गिर पड़ी। माथे पर चोट लगी। खून निकलने लगा और ये बेहोश हो गयी। मैंने अपना रूमाल निकाल माथे पर रखा। खून को बहने से रोका। सामने से ये भैया भी इधर से आ रहे थे। ये पीछेवाली गली में रहते हैं। मैंने सोचा, आपको खबर करने में देर लग जायेगी। इधर पास ही बाटा चौक पर मेरे मामाजी का क्लीनिक है। जल्दी से हम इसे वहाँ ले गये। पट्टी-वट्टी सुई-वुई लगवाई...तब ठीक हो पाई।"
शहाना की आँखों में आँसू थे। असलम ने भी पूरी बात सुनकर दोनों लड़कों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, "इलाज-विलाज में तुम्हारा जो खर्च हुआ हो वो ले लो...!"
छोटे लड़के ने हँसते हुए कहा, "मामाजी ने लिए ही नहीं! बोले मुहल्ले के नाते ये तुम्हारी बहन है तो अब ये भी मेरी भानजी हुई! अब भानजी से क्या पैसे लूँगा?"
जिन्नी का मुँह लटका हुआ था, "भैया का रूमाल खराब हो गया। उस पर खून लग गया है। भैया ने उसे वहीं डस्टबिन में फेंक दिया।"
लड़का हँस पड़ा, "फिर क्या हो गया?"
दोनों लड़के चले गये। एक को ट्यूशन जाने की जल्दी थी तो दूसरे को काम पर।
बाबूजी बहुत खुश थे। फोन करके उन्होंने एस.पी. को भी सूचना दे दी थी कि जिन्नी मिल गयी है। असलम के नाते-रिश्तेदार दबे पाँव लौटने लगे थे। इतनी जल्दी हम मान भी कैसे लेते हैं कि अपने यहाँ भाईचारा और इंसानियत खत्म हो सकते हैं।
बाबूजी जिन्नी से बोले, "शाम को मेरे साथ झण्डेवालान मन्दिर चलना। मैंने मन्नत मानी थी कि जिन्नी ठीक-ठाक वापस आ जायेगी तो हम मत्था टेकने और प्रसाद चढ़ाने आयेंगे!"
देर रात जिन्नी ने डरते-डरते अब्बू से पूछा, "अब्बू, आप कमरा देखने गये थे! क्या हम यहाँ से चले जायेंगे?"
अब्बू ने हँसते हुए कहा, "वहाँ हमारा कौन है? हमारे अपने तो सारे यहाँ हैं।"
शुक्रवार : सितम्बर, 2013