कमल चोपड़ा
बंसी पानवाले से लेकर अमर टेलर तक और शामलाल सब्जीवाले की रेहड़ी से कमेटी के नल तक लोकपुरी में एक ही चर्चा थी—कल रात को दो-तीन औरतों ने रामरतन को बुरी तरह धुन के रख दिया। उसी के घर में घुसकर वह भी रात के वक्त। आजकल औरतों की हिम्मत कितनी बढ़ गयी है। कल भी रामरतन दारू पीकर आया था। रोजाना की तरह छोटी-सी किसी बात को लेकर बीवी को पीटने लगा था। पति की बेरहम पिटाई से बचने के लिए सुरस्ती बुरी तरह चीख रही थी। रात काफी हो गयी थी। अब तक शांत हो चुके बस्ती के माहौल में बिलबिलाने की आवाज़ गूँज रही थी। आसपासवालों के लिए यह रोज़ की बात थी। कुछ खीझ रहे थे और कुछ लोग हँस रहे थे...कुछ लोग बुदबुदाते हुए उन्हें गालियाँ बक रहे थे।
अचानक झुग्गी का दरवाज़ा ठेलकर दो-तीन औरतें अन्दर घुस आयीं। उनके मुँह पर कपड़ा बँधा हुआ था और आँखें खुली थीं। आते ही उनमें से एक ने झुग्गी का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया और दूसरी ने बत्ती बुझा दी। रामरतन कुछ समझ पाता इससे पहले वे उस पर टूट पड़ीं। थप्पड़-लात-घूँसे जो बन पड़ रहा था चलाने लगीं। एकाएक हुए हमले को रामरतन न कुछ समझ पा रहा था, न सम्भल पा रहा था।
“कौन हो? अन्दर कैसे घुस आयीं?”
सुरस्ती ने पति को उनसे बचाने की कोशिश की तो उन्होंने ज़ोर से धकेल दिया। वह परे जा गिरी। जवाब में रामरतन ने भी अपने हाथ चलाने चाहे तो उन्होंने मिलकर उसे नीचे गिरा दिया। उनमें से एक ने स्टोव के पास पड़ा बेलन उठा लिया और रामरतन के पेंदे पर मारने लगी। रामरतन बिलबिलाने लगा, “आयी आयी...मरगया! मरगया!!”
“कमीने...हरामज़ादे! औरत को पीटते हुए तुझे शर्म नहीं आती?”
“औरत क्या? बीवी है ये मेरी? तुम कौन होती हो?”
लात जड़ते हुए उनमें से एक ने कहा, “कमीने...बीवी है तो बेवजह पीटेगा? इसमें जान नहीं है?”
दूसरी ने भी लात जमाते हुए कहा, “दर्द हो रहा है न?? अब पता चला दर्द कैसे होता है? औरत पे हाथ उठाएगा?”
सुरस्ती ने उनसे उसे छुड़ाने की फिर से कोशिश की तो उन्होंने उसे धक्का देकर फिर से पीछे धकेल दिया।
“औरत पर हाथ उठाना मर्दानगी है न? अब दिखा न मर्दानगी, कमीने... तेरे तो हाथ तोड़ देने चाहिए...”
हाथ जोड़ता हुआ रामरतन उनके पाँव पड़ने लगा, “माफ कर दो... अब नहीं पीदूँगा! बता तो दो आप कौन हो?”
उसे अच्छी तरह धुनने के बाद उनमें से एक ने कहा, “मैं दुर्गा हूँ! इस बार तुझे छोड़ देती हूँ। अगर फिर कभी तूने अपनी औरत पर हाथ उठाया तो तेरे हाथ-पाँव तोड़कर जिन्दगीभर के लिए अपाहिज बना दूँगी। याद रखना!!!”
दूसरी ने कहा, “मैं चण्डी हूँ! मैं तेरी मुण्डी उखाड़ माला बनाकर गले में डाल लूँगी।”
तीसरी ने कहा, “याद रखना! फिर कभी भी तूने इस पर हाथ उठाया तो हम फिर आ जायेंगी। औरत ही शक्ति देती है आदमी को और आदमी...?”
उसे कराहते हुए छोड़कर वे झुग्गी से बाहर निकल गयीं।
उनके जाते ही रामरतन बीवी पर झुँझलाते हुए बोला, “देख तो साली किधर को जा रही हैं? हाय... पता तो चले साली कौन थीं? कहाँ से आयी थीं?”
सुरस्ती दरवाजे की ओर लपकी। पता चला जाते-जाते वो दरवाजा बाहर से बन्द कर गयी थीं।
सुरस्ती झुँझलाई, “इसलिए तो बन्द कर गयी हैं ताकि पता न चल सके किधर को गयी हैं? पीछा करके कोई पकड़ न ले?”
कराहते-टसकते हुए रामरतन बोला, “तुझे तो पता ही होगा... कौन थीं? किधर से आयीं? किधर को गयीं?”
“हँ? मुझे पता था यही कहोगे!!!”
“छोड़ूँगा नहीं! अब पता चल जायेगा कौन थीं, कौन नहीं??? पता लगाकर रहूँगा!!”
बत्ती जलाते हुए सुरस्ती ने कहा, “हाँ-हाँ पता लगा लेना। नहीं तो मुझ पर शक करते रहोगे!!!”
दायें-बायें दोनों तरफ के पड़ोसियों से उसकी बोलचाल बन्द थी। न चाहते हुए भी सुरस्ती ने पड़ोसिन को आवाज लगाकर उससे बाहर से कुंडा खुलवाया। बात भी बतानी पड़ गयी।
चोटों पर हल्दी-तेल लगवाता हुआ रामरतन सुरस्ती का बार-बार हाथ झटक रहा था और दारू की झोंक में—छोड़ूँगा नहीं...छोड़ूँगा नहीं...बुदबुदा रहा था। सुरस्ती मन-ही-मन हँस भी रही थी और डर भी रही थी—ये चण्डिकाएँ मेरी परेशानी तो और बढ़ा गयीं। ये तो पहले ही मेरी जान का दुश्मन बना फिरता है, अब न जाने क्या करेगा? इससे तो इसे अक्ल आने से रही।
सुबह होते-होते बात बस्तीभर में फैल गयी थी और उनकी झुग्गी के आगे मजमा लग गया था। लोग अन्दर जाते और पता होने के बावजूद पूछते—क्या हुआ? कैसे हुआ? वे औरतें थीं कौन? उनकी सहानुभूति रामरतन के जख्मों पर नमक-मिर्च छिड़क रही थी। तड़फकर रोने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं था। जाते-जाते वे कहते—देख लेना कहीं हड्डी-वड्डी न टूट गयी हो। एक्स-रे करवा लेना! लापरवाही मत करना। बाहर आकर लोग हँसने लगते—खूब तबीयत से ठोका है। भई अब तो औरतों से डरकर ही रहना पड़ेगा।
रामरतन न सीधा बैठ पा रहा था न सीधा लेट पा रहा था। उसका पिछवाड़ा सूज गया था और दर्द कर रहा था। दिन भर आने-जानेवालों का ताँता लगा रहा था और वह उनसे उल्टा लेटे-लेटे ही बात कर रहा था। उसके साथ ताश खेलनेवाले गंगू और फत्ते उसका पता करने आये तो उसकी हालत देखकर उनकी हँसी ही निकल गयी। बड़ी मुश्किल से किसी तरह अपनी हँसी पर काबू पाकर गंगू ने बात को सम्भाला, “अरे! दो-तीन बिल्ली मिलकर हमारे शेर की ठुकाई कर गयीं? कोई बात नहीं? कोई बात नहीं...हम किसलिए हैं...पता लगाकर रहेंगे साली कौन थीं...कहाँ से आयी थीं???”
बाहर कदम रखते ही वे ठहठहाकर हँस पड़े। अन्दर पड़े रामरतन को लगा उसे सारी दुनिया के सामने नंगा करके लगातार पीटा जा रहा है। ठीक उसी वक्त उसने अपनी बीवी के चेहरे की ओर देखा। वह बर्तन माँज रही थी और उसकी आँखों में आँसू थे। उसे लगा, उसका शक गलत है कि उन चण्डिकाओं को इसीने बुलवाया होगा। ये बेचारी तो मेरे दुख में खुद दुखी है। पर अगले ही क्षण उसे लगा, क्या पता उन औरतों को बुलवाया हो और अब पोल खुल जाने के डर से घबरा रही हो।
मिश्रा मेडिकोज से सुरस्ती द्वारा लाई गयी दर्द-निवारक गोलियों के दो पत्ते वह खत्म कर चुका था। गोली खाकर चोटों का दर्द तो वह कुछ घण्टों के लिए भूल जाता पर लोगों की बातों की चोटों का दर्द उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वह न चीख पा रहा था, न चिल्ला पा रहा था।
तीन दिन तक वह घर से बाहर नहीं निकला था। उसका बस नहीं चल रहा था। बात-बेबात वह पत्नी को गालियाँ तो बक रहा था पर उसे पीट नहीं पा रहा था। इस बीच एकबार उसने हाथ उठाया भी पर चण्डिकाओं का ख्याल आते ही उसका हाथ जहाँ का तहाँ रुक गया। कन्धे में उठे दर्द की एक्टिंग करते हुए उसने अपना हाथ नीचे लिया।
प्लास्टिक का सामान बनानेवाली एक फैक्ट्री में नौकरी करता था वह। पहले भी वह दो-दो, तीन-तीन दिन बिना बताये छुट्टी मार लेता था। मालिक उससे पहले ही से परेशान था। आज वह फैक्ट्री पहुँचा तो मालिक ने उसे खड़े-खड़े जवाब दे दिया। वह भी ऐंठने लगा, “मैं भी कहाँ नौकरी करना चाहता हूँ? ऐसी दस नौकरियों को ठोकर मारता हूँ! रखो अपनी नौकरी अपने पास! हुँह!!”
वह वापिस बस्ती लौट पड़ा। रास्ते में जो मिलता पूछने लगता—ऐसे घुस कैसे गयीं घर में औरतें? हद हो गयी? आजकल औरतें...!!!
उनकी बातों में छिपा उपहास उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। जिन्दगी में इधर-उधर कई बार पिटा भी है पर इस तरह औरतों से पिटकर तो उसने पूरी मर्द जात की बेइज्जती करवा दी है। वो औरतें कहीं उसे मिल जायें तो वह उन्हें छोड़ेगा नहीं, उसे कुछ भी करना पड़े चाहे फाँसी ही क्यों न हो जाये...। उसका बस नहीं चल रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे? घर आकर उसने अपनी बीवी से घुमा-फिराकर पूछने की कोशिश की। उसे विश्वास था हो न हो उसकी पत्नी को पता होगा। पर कुछ पता नहीं चल पाया। सुरस्ती बार-बार अपनी और अपने होनेवाले बच्चे की कसमें खाती रही कि उसे कुछ पता नहीं।
शाम को रामरतन घर के बाहर खड़ा होकर ऊँची आवाज में अड़ोस-पड़ोसवालों को सुनाता हुआ बोलने लगा था, “बस मुझे पता चल जाये वे साली भैन चो...कौन थीं? छोड़ूँगा नहीं सालियों को। मुँह पर तेजाब फेंककर सबक सिखा दूँगा...क्या समझा है? इस तरह पिटकर बेइज्जती करवा के चुप बैठ जाऊँगा?”
हालाँकि इस तरह कहते-कहते वह अन्दर-ही-अन्दर डर भी रहा था। रस्सी जल गयी थी पर ऐंठन नहीं गयी थी। एक तरफ वह लोगों से मुँह छुपाता फिर रहा था तो दूसरी ओर ऐंठ रहा था। अन्दर से वह इतना डरा हुआ था कि जहाँ भी दो-तीन औरतें खड़ी दिखतीं, वह वहीं से मुड़कर अपना रास्ता ही बदल लेता। वहाँ यह और भी परेशानीवाली बात थी क्योंकि बस्तीभर में तंग गलियों के बावजूद औरतें घर के बाहर चारपाई बिछाकर धूप सेंकतीं और गप्पें मारती बैठी रहतीं।
उसे काम के छूट जाने की इतनी चिन्ता नहीं थी जितनी कि उन चण्डिकाओं का पता न लग पाने की। दो-एक जगह वह काम की तलाश में गया भी था पर बात नहीं बन पाई थी।
वह सार्वजनिक शौचालय के पीछे पड़ी जगह पर बने ताश के अड्डे पर ताश खेलता रहता। ताश खेलते-खेलते आज गंगू ने उसे सुनाते हुए कहा, “कहते हैं औरत को दो जूते रोज मारने चाहिए ताकि उसकी अक्ल ठिकाने रहे!! हह...हाह...!”
गर्दन अकड़ाते हुए फत्ते ने भी कहा, “मेरी बीवी कमा के लाती है। घर का काम भी करती है पर मैं तो जब मन चाहे जूता फेर देता हूँ। मैं तो आज भी अपनी बीवी को बिना बात धुन के आया हूँ। बात कुछ थी नहीं। बस मेरा उसे पीटने को मन कर रहा था। मैंने योंही खाने के लिए गुड़ माँग लिया। बोली—गुड़ कहाँ से लाऊँ? मैंने कहा—लाके क्यों नहीं रखा? घर में नहीं है तो क्यों नहीं है? बस मैंने धुन दिया।”
रामरतन समझ रहा था, वे जानबूझकर उसके जले पर नमक छिड़कने के लिए उसे यह सब सुना रहे हैं। घर में चाहे अपनी कमाऊँ बीवियों की चमचागीरी करते हों।
गंगू ने फिर कहा, “मैं तो भई औरतों से नहीं डरता...।” रामरतन झुँझलाया, “मैं भी तो लगभग रोज ही पीटता था अपनी घरवाली को पर...?”
“पर क्या? अब डर लगता है?”
“कहीं वो चण्डियाँ फिर न आ जायें?”
“अरे तू डर मत! हम तेरे साथ हैं!! देख लेंगे कौन हैं...साली?”
लगभग फुसफुसाते हुए फत्ते ने कहा, “तू ऐसा कर, आज तू घर जा के पूछ—वो चण्डियाँ कौन थीं? बता दे तो ठीक नहीं तो जम के पिटाई कर दे। मार के आगे भूत भी नाचता है। बक ही देगी कि वो औरतें कौन थीं? इस तरह पता चल जायेगा। न भी पता चल पाया तो पिटाई करके तू अपनी बीवी की नजरों में मर्द बना रहेगा वरना...और हाँ अगर तू डरता है कि तेरी बीवी चिल्लायेगी और वे चण्डियाँ फिर आ जायेंगी तो ऐसा करते हैं हम तेरे घर के बाहर खड़े रहेंगे। देखते हैं कौन औरतें आती हैं तेरी बीवी को बचाने...? हाहा...उन तीनों के लिए हम दो ही काफी हैं...! हा हा...!”
काफी देर तक वे उसे अपनी बीवी को पीटने के लिए भड़काते रहे। उसे लगा वे ठीक कह रहे हैं, इस तरह वह अपनी बीवी को पीटकर बदला भी चुकता कर लेगा और उसकी नजरों में मर्द भी बना रह सकेगा वरना...और चण्डिकाओं का पता चल गया तो और भी बढ़िया।
देर शाम तक वे ताश खेलते रहे। रामरतन का शरीर दुखने लगा था। दारू पीने के लिए जेब में कुछ नहीं था। एकाएक वह उठकर चल दिया। धीमे से गंगू ने कहा, “ठीक है तू चल और बेधड़क हो के बीवी को खुराक दे दे! हम तेरे पीछे पाँच मिनट बाद पहुँचते हैं।”
आज वह अपनी बीवी को अच्छी तरह सबक सिखा देगा ताकि साली की अक्ल ठिकाने रहे। अभी वह कूड़े के खत्ते के पास से मुड़ा ही था कि रामदास कबाड़ी ने उसे आवाज देकर रोका। अनसुना करके वह आगे बढ़ जाना चाहता था पर रामदास भागता हुआ उसके पास पहुँचा, “पता चला तुझे? आज राधेलाल चाटवाले की बारी आ गयी। अभी थोड़ी देर पहले की बात है वह अपनी बीवी को पीट रहा था। बच्चे कहीं गये हुए थे। बस मुँह पर कपड़ा लपेटे दो-तीन चण्डियाँ प्रकट हो गयीं। पीट-पीटकर राधेलाल की चाट-चटनी बनाकर बाहर से दरवाजा बन्द करके गायब हो गयीं। पता ही नहीं चल पाया कौन थीं?”
उसकी रूह काँप गयी। रामरतन की साँस जहाँ-की-तहाँ सूख गयी। उसे लगा वह फिर से चण्डिकाओं से घिर गया है। राधेलाल को पड़े डण्डों का दर्द उसे होने लगा। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे, “वही गलती फिर से करने जा रहा था मैं तो?”
घर पहुँचा तो सुरस्ती अंगीठी के पास बैठी खाना बना रही थी। वह चुपचाप आकर चारपाई पर बैठ गया।
सुरस्ती ने उसके चेहरे को गौर से देखा आज इनका मूड कैसा है? बोली, “कहीं नई जगह काम नहीं लगा तो मूड खराब करने की जरूरत नहीं। कपड़े सीने-पिरोने का काम करके मैं थोड़ा बहुत कमा रही हूँ न? हम दो-ढाई प्राणियों के लिए बहुत है...!”
मन-ही-मन कुढ़ गया—हुँह अहसान जता रही है साली। पर वह कुछ बोला नहीं। उसे चुपचाप देख सुरस्ती ने पूछा, “क्या हुआ? कुछ बोलते क्यों नहीं? बड़ी सोच में डूबे हुए हो?”
“सोच रहा हूँ वो चण्डियाँ हैं कौन?”
सुरस्ती कुछ कहने को हुई फिर एकाएक चुप लगा गयी। वह बताना चाहती थी कि वे अगल-बगलवाली किरशना और दरशना और पीछेवाली झुग्गी में रहनेवाली रामवती ही थीं। वैसे तो औरत ही औरत की दुश्मन होती है। हालाँकि किरशना और दरशना से मेरी बनती भी नहीं थी। यहाँ तक कि बोलचाल ही बन्द थी पर उस दिन उनसे मेरा बुरी तरह पिटना बर्दाश्त नहीं हुआ। संयोग से उस दिन उनके पति भी अभी काम से नहीं लौटे थे। बस आ गयीं मेरी मदद को और...किरशना कह रही थी हमारे पतियों को पता भी चल जाता तो ज्यादा-से-ज्यादा क्या होता, वे भी उनसे पिट जातीं!! फिर किसी दिन उस पति की भी बारी आ जाती। पर वह कुछ नहीं बोली थी। एकदम चुपचाप बनी हुई थी। रामरतन दो बार बाहर झाँककर देख चुका था। गंगू और फत्ते आये ही नहीं थे। शायद उन्हें भी पता चल चुका था कि दो-एक जगह और भी उन जैसों की पिटाई हो चुकी है। औरत दूसरी औरत का साथ देने लगी है।