कमल चोपड़ा
उसने जानबूझकर दीदी के घर जाने के लिए ऐसा ही वक्त चुना था, जबकि जीजाजी और बच्चे घर पर ना हों और दीदी अकेली हो। उसे अचानक आया देखकर दीदी का चेहरा खिल उठा था, लेकिन अगले ही क्षण हैरत से एकाएक मुरझा-सा गया। अपने आगे रखी सिलाई मशीन को धकेलती हुई दीदी उठ खड़ी हुई। खैर-खैरियत पूछने के बाद दीदी ने उससे उसके यों अचानक चले आने का मकसद पूछ डाला था। भले ही एकदम से अपने आने का मकसद कह डालना उसे ठीक नहीं लगा। मिलने को मन हो रहा था, बस इसलिए चला आया—कहकर वह बात टाल गया।
उसे पानी का गिलास पकड़ाकर उसके लिए चाय बनाने के लिए दीदी कोने में रखे स्टोव को जलाने के लिए उसमें हवा भरने लगी थी। उसने दीदी को चाय-वाय रहने देने के लिए कहा लेकिन दीदी ने उसकी बात को अनसुना कर दिया।
अनजान-सा बनते हुए उसने दीदी से पूछा, “बच्चे और जीजाजी नहीं दिख रहे?”
“बच्चे स्कूल गये हैं और वे अपने काम पर।”
“छुट्टी नहीं है आज?”
“किस बात की छुट्टी?”
“कोई रविदास जयन्ती या ऐसा कुछ है तो सही। मैं तो सोच के आया था कि अब सब घर पर ही मिलेंगे।”
आठ बाई आठ के कमरे में इतनी सारी चीजें इतने करीने से रखी जा सकती हैं, देखकर हैरानी हुई उसे। कमरे का एक कोना खाने-पकाने के सामान से भरा था। दूसरे कोने में सिलाई मशीन। तीसरे कोने में चारपाई और बाकी बचे कोने में ट्रंक, कनस्तर और ना जाने क्या-क्या? चारपाई जिस पर यह बैठा हुआ था, उस पर एकदम साफ चादर बिछी हुई थी। दीदी तो एकदम सद्गृहस्थिन हो गयी है। उसे गर्व हो आया। उसने तारीफ के दो शब्द कह डाले। जवाब में दीदी रोना ही रोने लगी। क्या करें हमारी तो किस्मत ही ऐसी है। किराये का कमरा है। ना साथ रसोई है ना कुछ और, किराया आठ सौ। आसपास पड़ोस भी अच्छा नहीं है। कालोनी ही बेकार है। कमरे का फर्श नीचा है और गली ऊँची। बरसात में सारा पानी अन्दर भर जाता है। घण्टों बैठकर पानी उलीचना पड़ता है।
चाय पीते-पीते मन में आया कि वह अपने आने का मकसद दीदी से कह डाले, पर जाने क्यों उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। दीदी को अपनी ओर देखता हुआ देखकर उसने सोचा दीदी तो बहुत ही समझदार है। अब तक तो समझ ही चुकी होगी कि ये जरूर कुछ-न-कुछ मदद माँगने आया है।
वह जीजाजी के कामकाज के बारे में दीदी से पूछने ही वाला था कि दीदी ने पूछ लिया, "तेरे काम का क्या चल रहा है? कहीं कुछ बना?" जवाब में वह क्या कहे, उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। अगले ही क्षण उसने लगभग चौंकते हुए पूछा, "दीदी, आपका टी.वी. कहाँ गया? सुना था टी.वी. लिया है?"
कुछ क्षणों तक दीदी के मुँह से जैसे शब्द ही नहीं निकले फिर खीझकर बोली, "टी.वी. क्या लिया बस रोग ले लिया।"
"क्यों क्या हुआ?"
"किश्तों पर लिया था। देते वक्त तो मुए बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे पर बाद में? पाँच सौ रुपये एडवॉन्स देकर चार सौ रुपये महीने की किश्तें देनी थीं। तीन-चार महीने देते भी रहे। फिर दीपू बीमार पड़ गया। टाइफाइड बिगड़ गया था। ये खर्चा और लग गया। क्या करते? इलाज तो करवाना ही था। आमदनी बस वही पूरी पट। तीन महीने उन मुओं की किश्तें नहीं दे पाये, बस आ गये उनके गुण्डे और लगे गाली-गलौज करने। हमारे पल्ले कुछ होता तो चुकाते। बहुत हाथ-पाँव जोड़े पर वे माननेवाले थे ही नहीं। बस टी.वी. उठाकर ले गये और बोल गये एक महीने के अन्दर बकाया किश्त दे जाना और टी.वी. ले जाना वर्ना पहले का लिया-दिया गुल...।"
"ऐसा कैसे कर सकते हैं वो? अँधेरगर्दी है क्या?"
"महीना निकल चुका है। अब तक तो उन्होंने टी.वी. किसी और को बेच दिया होगा। कह देंगे सैकेंड हैंड था। पाँच सौ में बिका, इससे ज्यादा उनका ब्याज बनता है। पैसे की लाठी है उनके पास... मार खा-खाकर रह गये हैं हम तो... माँ-बहन की गालियाँ... बेइज्जती कर गये सो अलग...।"
दीदी की आँखों में पानी भर आया देखकर उसका खून जैसे खौलने लगा। था—लूट मची है क्या? उनके बाप का राज है? इतना कुछ हो गया। आपने भी तो हमें खबर नहीं की? कम-से-कम खबर तो कर देते? जीजाजी तो हैं ही शरीफ, पर आप मुझे उन लोगों का पता-ठिकाना बताओ। मेरे बहुत से दोस्त हैं। उनकी ऐसी-तैसी। बात करेंगे उनसे। ऐसे कैसे खा जायेंगे। एडवांस और जमा कराई किश्तों में से कुछ तो वापस देंगे। उनको हम...।"
“इसीलिए तो खबर नहीं की। वो ताकतवर हैं। उनका तो कुछ बिगड़ेगा नहीं। तुम पुलिस-वुलिस के चक्कर में पड़ जाओगे। लेने के देने पड़ जायेंगे।”
“लेकिन ऐसे तो... आपके पास टी.वी. के कुछ कागज-वागज हैं?”
दीदी ने साफ मना कर दिया। उसे विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा, दीदी उसे इस पचड़े में नहीं डालना चाहती इसलिए झूठ बोल रही है। उसने दीदी से दो-एक बार पूछा। दीदी झुंझलाकर उल्टा उसी से पूछने लगी कि क्या वो झूठ बोल रही है? फिर एकाएक बात को टालते हुए मौसम के गर्म होने और घण्टों बिजली के गुल रहने जैसी दिक्कतों के बारे में कहने लगी थी। बात बढ़ाकर उसे क्या मिलना है? वह कर भी क्या लेगा? यह सोचकर वह भी चुप लगा गया। जितना भी दीदी पूछती जा रही थी, उतना-उतना ही वह बताता जा रहा था।
दीदी ने अम्मा के गठिये और बापू के दमे के बारे में पूछा तो उसने ठण्डी साँस लेकर कहा, “एक तो उनकी बीमारियाँ ही ऐसी नामुराद हैं और कुछ उम्र का तकाजा है। कोई क्या कर सकता है? मजबूरी है।”
दीदी का चेहरा एकदम रोने जैसा हो आया था। एकाएक उसने बड़े सहज लेकिन अचरज से कहा, “दीदी, हम लोग एक ही शहर में रह रहे हैं? ऐसा नहीं लगता न?”
“मुझे पता है ऐसा क्यों कह रहा है? इसलिए ना कि कई महीनों से मैं अम्मा-बाबूजी को मिलने नहीं आयी। पिछली बार मेरी वजह से तुम लोगों में घर में आपस में क्लेश मच गया था। मैंने सोचा मैं क्यों खाहमखाह जाकर क्लेश करवाऊँ। इतना तो मैं समझती हूँ कि घर में बाहर का कोई रहने आयेगा तो खर्च बढ़ जाने से सबकुछ गड़बड़ा तो जायेगा ही...।”
“कैसी बात कर रही हैं दीदी आप? वो तो हम लोगों का आपस का क्लेश था और वो आपका घर है, आप बाहर की कैसे हुईं?”
“अम्मा-बाबूजी ने ही बाद में मुझे कौन-सा बुलावा भेज दिया?”
“वो बेचारे बीमार-शीमार रहते हैं आपको पता है।”
“और तुम!”
दीदी से वह नजरें नहीं मिला पा रहा था। शर्म के मारे उसकी गर्दन झुक गयी थी। बड़ी मुश्किल से कह पाया, “अपने घर आने के लिए बुलावे की क्या जरूरत दीदी?”
“अपना घर?” दीदी की आँखें गीली हो आयी थीं, अपना तो मेरा कोई घर है ही नहीं। ना मेरा वो घर अपना था, ना ये घर मेरा अपना है। तुम लोगों ने तो जैसे विदा करके ‘बला टाली’ और यहाँ बात-बात पर तेरे जीजाजी कहते हैं कि निकल जा मेरे घर से, जबकि लोगों के कपड़े सी-सी कर पैसा-पैसा जोड़कर इस घर का किराया मैं खुद चुकाती हूँ।”
तड़पकर रह गया वह। अपने-आप पर कोफ्त होने लगी उसे—क्या मैं दीदी का दिल दुखाने आया हूँ।
दीदी अपना दुख खोल रही थी, “आठ सौ रुपया महीना किराया है इस कमरे का। वो मैं हजारेक रुपया महीना कमा लेती हूँ पर खर्चा है कि बस पूरा ही नहीं पड़ता। ये भी कमा तो लेते हैं आठ-नौ सौ, पर अपना ही खर्च पूरा कर लें तो बहुत है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं उनकी पढ़ाई-लिखाई है ऊपर से हारी-बीमारी... छह महीना से सोच रही हूँ आँखें टैस्ट करवा लूँ पर...! सरकारी अस्पताल में जाऊँ तो सारा दिन लग जाता है। काम का ही हर्जा होता है। प्राइवेट में नाजायज खर्चा। बन्दा जाये तो कहाँ जाये? इनका तो इतना भी सुख नहीं कि किसी छुट्टीवाले दिन पीछे बच्चों को ही सम्भाल लें। बस बिना बताये निकल जायेंगे और रात पड़ने पर ही लौटेंगे। बन्दा कम-से-कम बता के तो जाये पर नहीं... मैं कौन होती हूँ? पीछे इंसान चिन्ता में घुलता रहे कि कुछ हो-हवा सा ना गया हो! मुझे तो अपने से ज्यादा इनकी चिन्ता रहती है। मुझे बुखार हो या कुछ... मुझे तो काम में जुटे रहना ही पड़ता है। और है भी कौन करनेवाला? और ये? इन्हें तो कुछ हुआ नहीं कि बस छुट्टी करके बैठ जाते हैं। मामूली जुकाम, सिरदर्द में ही चार दिन की छुट्टी मामूली बात है। घर पर रहें तो और मुसीबत। हर घण्टे, आधे घण्टे बाद चाय का आर्डर देंगे जैसे घर में दूध-पत्ती-चीनी के गोदाम ला के भर रखे हैं। और बच्चों ने नाक में दम कर रखा है, सो अलग। किसी की कोई चीज देख लेंगे तो बस वही चीज लेने की जिद्द करने लगेंगे। मुन्नी तो खैर समझाने से मान जाती है पर दीपू? चाहे उसे मार लो चाहे पीट लो, जिद्द मनवाकर रहेगा। और मैं... मेरी तो कोई ख्वाहिश ही नहीं रही। किसी चीज को मन होता भी नहीं। बस मैं तो जीने नहीं, कोई सजा भुगतने आयी हूँ। गैरमियादी बामशक्कत यह सबकुछ जैसे करना ही है। सिलाई मशीन चलानी है। जीना है तो क्या कर सकते हैं। लेकिन कभी-कभी लगता है ये सिलाई मशीन ना होती तो मेरा क्या होता? खैर छोड़, तू भी कहेगा दीदी भी क्या अपने रोने रोये जा रही है।”
“नहीं दीदी, अपना समझ रही हो तभी तो सुना रही हो। वैसे भी दुख कह लेने से मन हल्का हो जाता है...”
अपनी आँखें पोंछकर थोड़ा मुस्करा दी दीदी, “अरे वाह-वाह! अब तो तू भी समझने लगा है दुख-दर्द?”
कपड़े सिलवाने के लिए आयी किसी महिला को देखकर दीदी उठ खड़ी हुई। नाप डिजाइन की बातें करके महिला जाने लगी तो दीदी ने उस महिला को बताया, “ये मेरा भाई है।” महिला ने बिना किसी विशेष दिलचस्पी के कहा, “अच्छा, पहले तो कभी नहीं देखा।” वह अपने बारे में बात होती देखकर अपनी जगह पर बैठा-बैठा जैसे सिकुड़ने-सा लगा। महिला ने आगे दिलचस्पी ली, “क्या काम करता है?” अकबकाकर रह गयी दीदी। जैसे-तैसे दीदी ने जवाब दिया, “बड़े बाजार की दुकान पर काम करता है।”
महिला के जाने के बाद दीदी ने उससे कहा, “अगर मैं उसे कह देती कि भाई तो सगा है पर मुझे खुद पता नहीं कि आजकल ये क्या कर रहा है तो वो क्या सोचती?”
उसने महसूस किया जबसे वह आया, दीदी ने तानों और शिकायतों के सिवाय कुछ कहा है। अब तक तो जीजाजी ही नाराज थे अब दीदी भी। इसीलिए तो वह जीजाजी के सामने नहीं आया। जीजाजी के सामने पड़ा तो हजार-हजार बातें सुनायेंगे लेकिन अब तो दीदी भी...! पर इस सबमें उसका क्या कसूर है? उसे समझ नहीं आ रहा था—दूसरों के काम तो मैं तब आऊँ जब मैं खुद इस लायक हो जाऊँ। मैं तो खुद दीदी से मदद माँगने आया हूँ पर लगता नहीं दीदी कुछ मदद करेगी। माँगना ही फिजूल है। माँगकर भी क्या अपना और दीदी का मन खराब करूँ?
“अच्छा दीदी चलता हूँ!” कहकर ज्यों ही वह उठने को हुआ। दीदी की अनुभवी आँखें उसके चेहरे को गौर से पढ़ने लगी थीं।
“किसलिए आया था वो तो तूने बताया ही नहीं?”
“कुछ नहीं बस योंही।”
“मुझे लगता है तू कुछ छुपा रहा है।”
दीदी के कुरेदने से उसका मन थोड़ा बढ़ आया था। एकबार देखने में क्या हर्ज है। वैसे भी दीदी से कुछ छिपा नहीं। मदद करे तो ठीक, नहीं करे तो ठीक। बहुत धीरे-धीरे उसने कहा, “दरअसल मुझे एक एजेन्सी में नौकरी मिल रही है, पर उनकी शर्त है कि उनका माल सप्लाई करने के लिए मेरे पास खुद की एक साइकिल हो। साइकिल का जुगाड़ लग जाता तो मेरी नौकरी लग जाती। जीजाजी से माँगने की मेरी हिम्मत नहीं है। आप कुछ कर सको तो। नयी साइकिल बारह सौ में आती है...।”
“इतने तो नहीं हैं मेरे पास। होते, वह ‘इन्हें’ बिना बताये भी दे देती लेकिन...। पुरानी साइकिल नहीं चलेगी? सस्ती भी पड़ेगी वो तो...”
“चल तो सकती है लेकिन पुरानी भी छह-सात सौ से कम क्या आयेगी। फिर पुरानी पुरानी ही होती है। चलो अगर अब पाँच-सात सौ की मदद कर दें तो...”
“मेरे पास तो इतने भी नहीं होंगे। अपनी हालत तो तुझे बता ही दी है। कुछ छुपाया तो नहीं...।”
“चलो, जितने हो सकें कर दीजिए। बाकी मैं कहीं और से जुगाड़ कर लूँगा...”
“मेरे पास तो सिर्फ सौ का एक नोट पड़ा है।”
“सौ ही सही। बाकी, कहीं और से कोशिश करूँगा।”
विवश था वह। कोई और चारा नहीं था।
दीदी ने कपड़ेवाले ट्रंक को खोलकर नीचे हाथ मारकर एक गाँठ खोलकर उसमें बँधा हुआ मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर उसके हाथ पर रख दिया। दीदी ने उसकी ओर देखा। उसे लगा दीदी कुछ कहना चाहती है। इससे पहले कि दीदी कुछ कहे वह बोला, “महीने-दो महीने में ही लौटा दूँगा।”
दीदी चुप रही। वह जाने के लिए उठा। दीदी ने उसे रोकना चाहा फिर ना जाने क्या सोचकर चुप रह गयी।
जाते-जाते वह रुका और धीरे-से बोला, “दीदी, मैं इतने दिनों बाद आया वह भी खाली हाथ। मुझे कुछ लेके आना चाहिए था पर उल्टा लेके जा रहा हूँ...”
दीदी का गला भर आया था, “कोई बात नहीं तू मिलने आ गया समझो सबकुछ आ गया। तेरे जीजाजी होते तो जरूर कहते खाली हाथ चला आया लेकिन मुझे खुशी है तू मुझे मिलने तो आया। जरूरत के वक्त ही सही तुझे अपनी बहन की याद तो आयी।”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा ही था कि दीपू और मुन्नी आ गये। उन्हें देखकर उसका चेहरा फटे हुए जूते-सा हो आया। बच्चे ‘मामाजी-मामाजी’ कहते हुए उससे लिपट गये थे। बच्चों को प्यार करने के बाद अपने-आप ही उसका हाथ अपनी जेब में जा घुसा था। जेब में सौ रुपये के नोट के सिवाय कुछ भी नहीं था। इसीलिए तो वह बच्चों से बचना चाह रहा था। उसके पास इतने पैसे भी नहीं थे, जिनसे यह बच्चों के लिए गोली, टॉफी, बिस्कुट कुछ ला पाता। जेब में अब भी पाँच-दस या कुछ खुले पैसे होते तो बच्चों को हथेली पर टिकाकर निकल जाता पर...! अजीब दुविधा में फँस गया था वह। मन-ही-मन अपने-आपको कोसा—अगर एक मिनट पहले निकल जाता तो बच्चों से उसका सामना ना होता।
उसका चेहरा बिना कसूर के पिटे बच्चे की तरह लटक गया था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करे? एकबार उसने सोचा, बच्चों को कुछ दिये बिना निकल जाये... बच्चे सब समझते हैं। अब तो जीजाजी को भी पता चल जायेगा कि मैं आया था और जब पता चलेगा कि मैं बिना कुछ दिये निकल गया तो...
एकाएक उसका हाथ जेब से निकला तो उसमें वही सौ का नोट दबा हुआ था। उसने नोट दीपू की ओर बढ़ाते हुए कहा, “लो, तुम दोनों भाई-बहन बाँट लेना। अपने लिए कुछ ले लेना।”
हैरानी से दीदी का मुँह खुला रह गया था फिर स्थिति को सम्भालते हुए बोली, “नहीं इतने नहीं...इन्होंने क्या करने हैं इतने रुपये? ये तो बहुत ज्यादा हैं।”
“आप ना मत करो दीदी!”
“लेकिन...ऐसे कैसे फिर तू क्या करेगा?”
दीदी की बात अनसुनी करके उसने नोट दीपू की जेब में ठूँस दिया था। परेशान-सी हो उठी दीदी। उसकी आँखों में सवाल-ही-सवाल थे। बहुत कुछ कहना चाहती थीं वह, पर मुँह से सिर्फ इतना ही निकला, “लेकिन...सुन तो...पर...?”
“दीदी! ये मत समझना ये वही नोट है जो आपने दिया है। वो तो आपका मेरे ऊपर उधार है। बहुत जल्दी लौटा दूँगा। यह नहीं, कोई और नौकरी सही।”