Godaan - 2 in Hindi Classic Stories by Shivam Kumar Pandey books and stories PDF | गोदान : शब्दार्थ सहित - भाग 2

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गोदान : शब्दार्थ सहित - भाग 2


                गोदान: शब्दार्थ सहित,(भाग 2) 
                 मूल लेखक: मुंशी प्रेमचंद   
                 लेखक: 
                 Shivam Kumar Pandey



भाग 2
सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रांत के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की कोई जरूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अंतर है। पिछले सत्याग्रह-संग्राम में रायसाहब ने बड़ा यश कमाया था। कौंसिल की मेंबरी छोड़ कर जेल चले गए थे। तब से उनके इलाके के असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गई थी। यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो, मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी। रायसाहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था। वह बेचारे भी तो उसी व्यवस्था के गुलाम थे। जाब्ते का काम तो जैसे होता चला आया है, वैसा ही होगा। रायसाहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी, इसलिए आमदनी और अधिकार में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था। असामियों से वह हँस कर बोल लेते थे। यही क्या कम है? सिंह का काम तो शिकार करना है; अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।
रायसाहब राष्ट्रवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाए रखते थे। उनकी नजरें और डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियाँ जैसी की तैसी चली आती थीं। साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौकीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक, अच्छे निशानेबाज। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे; मगर दूसरी शादी न की थी। हँस बोल कर अपने विधुर जीवन को बहलाते रहते थे।
होरी ड्योढ़ी पर पहुँचा तो देखा, जेठ के दशहरे के अवसर पर होने वाले धनुष-यज्ञ की बड़ी जोरों से तैयारियाँ हो रही हैं! कहीं रंग-मंच बन रहा था, कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्य-गृह, कहीं दुकानदारों के लिए दुकानें। धूप तेज हो गई थी, पर रायसाहब खुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से संपत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पाई थी और धनुष-यज्ञ को नाटक का रूप दे कर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था। इस अवसर पर उनके यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमंत्रित होते थे और दो-तीन दिन इलाके में बड़ी चहल-पहल रहती थी। रायसाहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ सरदार एक साथ भोजन करते थे। कई चाचा थे। दर्जनों चचेरे भाई, कई सगे भाई, बीसियों नाते के भाई। एक चाचा साहब राधा के अनन्य उपासक थे और बराबर वृंदावन में रहते थे। भक्ति-रस के कितने ही कवित्त रच डाले थे और समय-समय पर उन्हें छपवा कर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चाचा थे, जो राम के परम भक्त थे और फारसी-भाषा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे। रियासत से सबक वजीफे बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की जरूरत न थी।
होरी मंडप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा रायसाहब उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले - अरे! तू आ गया होरी, मैं तो तुझे बुलवाने वाला था। देख, अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। समझ गया न, जिस वक्त श्री जानकी जी मंदिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक्त तू एक गुलदस्ता लिए खड़ा रहेगा और जानकी जी को भेंट करेगा, गलती न करना और देख, असामियों से ताकीद करके यह कह देना कि सब-के-सब शगुन करने आएँ। मेरे साथ कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।
वह आगे-आगे कोठी की ओर चले, होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की छाया में एक कुर्सी पर बैठ गए और होरी को जमीन पर बैठने का इशारा करके बोले - समझ गया, मैंने क्या कहा - कारकून को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही, लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकून की नहीं सुनता। हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हजार का प्रबंध करना है। कैसे होगा, समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना दुखड़ा ले बैठे। किससे अपने मन की कहूँ? न जाने क्यों तुम्हारे ऊपर विश्वास होता है। इतना जानता हूँ कि तुम मन में मुझ पर हँसोगे नहीं। और हँसो भी, तो तुम्हारी हँसी मैं बर्दाश्त कर सकता हूँ। नहीं सह सकता उनकी हँसी, जो अपने बराबर के हैं, क्योंकि उनकी हँसी में ईर्ष्या व्यंग और जलन है। और वे क्यों न हँसेंगे? मैं भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर हँसता हूँ, दिल खोल कर, तालियाँ बजा कर। संपत्ति और सहृदयता में बैर है। हम भी दान देते हैं, धर्म करते हैं। लेकिन जानते हो, क्यों? केवल अपने बराबर वालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार। हममें से किसी पर डिग्री हो जाय, कुर्की आ जाय, बकाया मालगुजारी की इल्लत में हवालात हो जाय, किसी का जवान बेटा मर जाय, किसी की विधवा बहू निकल जाय, किसी के घर में आग लग जाय, कोई किसी वेश्या के हाथों उल्लू बन जाय, या अपने असामियों के हाथों पिट जाय, तो उसके और सभी भाई उस पर हँसेंगे, बगलें बजाएँगे, मानों सारे संसार की संपदा मिल गई है और मिलेंगे तो इतने प्रेम से, जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हैं। अरे, और तो और, हमारे चचेरे, फुफुरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर रहे हैं, और जुए खेल रहे हैं, शराबें पी रहे हैं और ऐयाशी कर रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, आज मर जाऊँ तो घी के चिराग जलाएँ। मेरे दुःख को दुःख समझने वाला कोई नहीं। उनकी नजरों में मुझे दुखी होने का कोई अधिकार ही नहीं है। मैं अगर रोता हूँ, तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। मैं अगर बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है। मैं अगर अपना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता, तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है, अगर ब्याह कर लूँ, तो वह विलासांधता होगी। अगर शराब नहीं पीता तो मेरी कंजूसी है। शराब पीने लगूँ, तो वह प्रजा का रक्त होगा। अगर ऐयाशी नहीं करता, तो अरसिक हूँ; ऐयाशी करने लगूँ, तो फिर कहना ही क्या! इन लोगों ने मुझे भोग-विलास में फँसाने के लिए कम चालें नहीं चलीं और अब तक चलते जाते हैं। उनकी यही इच्छा है कि मैं अंधा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब कुछ देख कर भी कुछ न देखूँ। सब कुछ जान कर भी गधा बना रहूँ।
रायसाहब ने गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दो बीड़े पान खाए और होरी के मुँह की ओर ताकने लगे, जैसे उसके मनोभावों को पढ़ना चाहते हों।
होरी ने साहस बटोर कहा - हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती हैं, पर जान पड़ता है, बड़े आदमियों में भी उनकी कमी नहीं है।
रायसाहब ने मुँह पान से भर कर कहा - तुम हमें बड़ा आदमी समझते हो? हमारे नाम बड़े हैं, पर दर्शन थोड़े। गरीबों में अगर ईर्ष्या या बैर है, तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और बैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले, तो उसके गले में उँगली डाल कर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और बैर केवल आनंद के लिए है। हम इतने बड़े आदमी हो गए हैं कि हमें नीचता और कुटिलता में ही निःस्वार्थ और परम आनंद मिलता है। हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गए हैं, जब हमें दूसरों के रोने पर हँसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझो। जब इतना बड़ा कुटुंब है, तो कोई-न-कोई तो हमेशा बीमार रहेगा ही। और बड़े आदमियों के रोग भी बड़े होते हैं। वह बड़ा आदमी ही क्या, जिसे कोई छोटा रोग हो। मामूली ज्वर भी आ जाए, तो हमें सरसाम की दवा दी जाती है; मामूली गुंसी भी निकल आए, तो वह जहरबाद बन जाती है। अब छोटे सर्जन और मझोले सर्जन और बड़े सर्जन तार से बुलाए जा रहे हैं, मसीहुलमुल्क को लाने के लिए दिल्ली आदमी भेजा जा रहा है, भिषगाचार्य को लाने के लिए कलकत्ता। उधर देवालय में दुर्गापाठ हो रहा है और ज्योतिषाचार्य कुंडली का विचार कर रहे हैं और तंत्र के आचार्य अपने अनुष्ठान में लगे हुए
हैं। राजा साहब को यमराज के मुँह से निकालने के लिए दौड़ लगी हुई है। वैद्य और डॉक्टर इस ताक में रहते हैं कि कब इनके सिर में दर्द हो और कब उनके घर में सोने की वर्षा हो। और ए रुपए तुमसे और तुम्हारे भाइयों से वसूल किए जाते हैं, भाले की नोंक पर। मुझे तो यही आश्चर्य होता है कि क्यों तुम्हारी आहों का दावानल हमें भस्म नहीं कर डालता; मगर नहीं आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। भस्म होने में तो बहुत देर नहीं लगती, वेदना भी थोड़ी ही देर की होती है। हम जौ-जौ और अंगुल-अंगुल और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं। उस हाहाकार से बचने के लिए हम पुलिस की, हुक्काम की, अदालत की, वकीलों की शरण लेते हैं और रूपवती स्त्री की भाँति सभी के हाथों का खिलौना बनते हैं। दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं। हमारे पास इलाके, महल, सवारियाँ, नौकर-चाकर, कर्ज, वेश्याएँ, क्या नहीं हैं, लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है। जिसे दुश्मन के भय के मारे रात को नींद न आती हो, जिसके दुःख पर सब हँसें और रोने वाला कोई न हो, जिसकी चोटी दूसरों के पैरों की नीचे दबी हो, जो भोग-विलास के नशे में अपने को बिलकुल भूल गया हो, जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, मैं उसे सुखी नहीं कहता। वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है। साहब शिकार खेलने आएँ या दौरे पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ। उनकी भौंहों पर शिकन पड़ी और हमारे प्राण सूखे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते; मगर वह पछड़ा सुनाने लगूँ तो शायद तुम्हें विश्वास न आए। डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत है, हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं। मुफ्तखोरी ने हमें अपंग बना दिया है, हमें अपने पुरुषार्थ पर लेश मात्र भी विश्वास नहीं, केवल अफसरों के सामने दुम हिला-हिला कर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता से अपने प्रजा पर आतंक जमाना ही हमारा उद्यम है। पिछलगुओं की खुशामदों ने हमें इतना अभिमानी और तुनुकमिजाज बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है। मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर सरकार हमारे इलाके छीन कर हमें अपने रोजी के लिए मेहनत करना सिखा दे, तो हमारे साथ महान उपकार करे, और यह तो निश्चय है कि अब सरकार भी हमारी रक्षा न करेगी। हमसे अब उसका कोई स्वार्थ नहीं निकलता। लक्षण कह रहे हैं कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जाने वाली है। मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ। ईश्वर वह दिन जल्द लाए। वह हमारे उद्धार का दिन होगा। हम परिस्थितियों के शिकार बने हुए हैं। यह परिस्थिति ही हमारा सर्वनाश कर रही है और जब तक संपत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जब तक यह अभिशाप हमारे सिर पर मँडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे, जिस पर पहुँचना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
रायसाहब ने फिर गिलौरी-दान निकाला और कई गिलौरियाँ निकाल कर मुँह में भर लीं। कुछ और कहने वाले थे कि एक चपरासी ने आ कर कहा - सरकार, बेगारों ने काम करने से इनकार कर दिया है। कहते हैं, जब तक हमें खाने को न मिलेगा, हम काम न करेंगे। हमने धमकाया, तो सब काम छोड़ कर अलग हो गए।
रायसाहब के माथे पर बल पड़ गए। आँखें निकाल कर बोले - चलो, मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया, तो आज यह नई बात क्यों? एक आने रोज के हिसाब से मजदूरी मिलेगी, जो हमेशा मिलती रही है; और इस मजूरी पर काम करना होगा, सीधे करें या टेढ़े।
फिर होरी की ओर देख कर बोले - तुम अब जाओ होरी, अपने तैयारी करो। जो बात मैंने कही है, उसका ख्याल रखना। तुम्हारे गाँव से मुझे कम-से-कम पाँच सौ की आशा है।
रायसाहब झुल्लाते हुए चले गए। होरी ने मन में सोचा, अभी यह कैसी-कैसी नीति और धरम की बातें कर रहे थे और एकाएक इतने गरम हो गए!
सूर्य सिर पर आ गया था। उसके तेज से अभिभूत हो कर वृक्ष ने अपना पसार समेट लिया था। आकाश पर मटियाली गर्द छाई हुई थी और सामने की पृथ्वी काँपती हुई जान पड़ती थी।
होरी ने अपना डंडा उठाया और घर चला। शगुन के रुपए कहाँ से आएँगे, यही चिंता उसके सिर पर सवार थी।


शब्दार्थ:

अवध-प्रांत: उत्तर प्रदेश का एक ऐतिहासिक क्षेत्र।
सत्याग्रह-संग्राम: सत्य के लिए किया गया संघर्ष या स्वतंत्रता आंदोलन।
यश: कीर्ति, प्रसिद्धि या नाम कमाना।
कौंसिल: परिषद या सभा (विधायिका)।
मेंबरी: सदस्यता।
असामियों: काश्तकार, किसान या वे लोग जो जमींदार की भूमि पर खेती करते हैं।
श्रद्धा: आदर, सम्मान या अटूट विश्वास।
रियायत: छूट, नरम बर्ताव या सुविधा देना।
डाँड़: दंड, जुर्माना या हर्जाना।
बेगार: बिना मजदूरी दिए जबरन कराया गया काम।
कड़ाई: सख्ती या कठोरता।
बदनामी: अपयश या कलंक।
मुख्तारों: जमींदार के कारिंदे, एजेंट या प्रबंधकर्ता।
कीर्ति: ख्याति या गौरव।
कलंक: दाग या लांछन।
व्यवस्था: सिस्टम या प्रबंध प्रणाली।
जाब्ते: नियम, कानून या तयशुदा कानूनी प्रक्रिया।
सज्जनता: शराफत या भलमनसाहत।
जौ-भर: बहुत ही कम मात्रा में, रत्ती भर।
अधिकार: हक़ या पावर।
गुर्राने: क्रोध में चिल्लाना या डराना।
मनमाना: इच्छानुसार या पर्याप्त।
हुक्काम: सरकारी अधिकारी या हाकिम (बहुवचन)।
मेल-जोल: संपर्क या अच्छे संबंध।
नजरें: भेंट, उपहार या वह राशि जो सम्मान में दी जाती थी।
डालियाँ: टोकरियों में सजाकर दी जाने वाली भेंट (अक्सर फल या मिठाइयाँ)।
दस्तूरियाँ: दस्तूर या रस्म के अनुसार दी जाने वाली कमीशन या रिश्वत।
वक्ता: भाषण देने वाला या बोलने में कुशल व्यक्ति।
निशानेबाज: अचूक निशाना लगाने वाला।
विधुर: वह पुरुष जिसकी पत्नी का देहांत हो गया हो।
बहलाते: मन बहलाना या मनोरंजन करना।
ड्योढ़ी: मुख्य द्वार, देहरी या प्रवेश द्वार।
जेठ: हिंदी पंचांग का तीसरा महीना (मई-जून का समय)।
दशहरा: एक प्रमुख हिंदू त्यौहार।
धनुष-यज्ञ: रामलीला का वह प्रसंग जिसमें श्रीराम शिव का धनुष तोड़ते हैं।
रंग-मंच: वह स्थान जहाँ नाटक खेला जाता है (स्टेज)।


मंडप: मांगलिक कार्यों के लिए बनाया गया अस्थाई छायादार स्थल या शामियाना।
आतिथ्य-गृह: मेहमानों के ठहरने का स्थान या गेस्ट हाउस।
धनुष-यज्ञ: रामायण की एक घटना (सीता स्वयंवर) पर आधारित धार्मिक उत्सव।
शिष्ट: सभ्य, शालीन या उच्च श्रेणी का।
मनोरंजन: दिल बहलाव या आमोद-प्रमोद।
साधन: जरिया या माध्यम।
हाकिम-हुक्काम: सरकारी अधिकारी और शासन करने वाले लोग।
निमंत्रित: जिन्हें न्योता दिया गया हो या आमंत्रित।
चहल-पहल: रौनक या लोगों की भारी गतिविधि।
विशाल: बहुत बड़ा या वृहद।
सरदार: यहाँ इसका अर्थ परिवार के मुख्य या प्रतिष्ठित सदस्यों से है।
अनन्य: जिसके समान कोई दूसरा न हो, यानी अटूट या अनन्य भाव वाला।
उपासक: पूजा या भक्ति करने वाला व्यक्ति।
भक्ति-रस: श्रद्धा और ईश्वर प्रेम से ओत-प्रोत भाव।
कवित्त: हिंदी कविता का एक विशेष छंद या काव्य विधा।
भेंट: उपहार स्वरूप प्रदान करना।
परम: सर्वोच्च या सबसे बड़ा।
अनुवाद: एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में बदलना (ट्रांसलेशन)।
रियासत: रजवाड़ा, राज्य या जमींदारी का क्षेत्र।
वजीफे: नियमित रूप से मिलने वाली आर्थिक सहायता या छात्रवृत्ति/पेंशन।
सहसा: अचानक या एकाएक।
सूचना: जानकारी या खबर।
गुलदस्ता: फूलों का गुच्छा।
असामियों: वे किसान जो जमींदार की जमीन पर खेती करते हैं या काश्तकार।
ताकीद: कड़ाई से कहना, निर्देश देना या चेतावनी के साथ समझाना।
शगुन: उत्सव के समय दिया जाने वाला मांगलिक उपहार या नेग।
कोठी: बड़ा बंगला या हवेली।
कारकून: जमींदार का कर्मचारी या प्रबंधकर्ता जो लगान आदि का काम देखता है।
मन से: पूरी लगन या ईमानदारी के साथ।


प्रबंध: इंतजाम या व्यवस्था करना।
टके का आदमी: वह व्यक्ति जिसकी कोई खास हैसियत न हो, मामूली या तुच्छ व्यक्ति।
दुखड़ा: अपनी व्यथा या परेशानी सुनाना।
बर्दाश्त: सहन करना या झेलना।
ईर्ष्या: जलन या दूसरों की प्रगति देखकर होने वाला द्वेष।
व्यंग: ताना मारना या कटाक्ष करना।
दुर्दशा: बुरी हालत या खराब स्थिति।
विपत्ति: मुसीबत या संकट।
पतन: गिरावट या बर्बादी।
सहृदयता: दयालुता या कोमल हृदय होना।
बैर: दुश्मनी या शत्रुता।
विशुद्ध: एकदम शुद्ध या पूरी तरह से।
अहंकार: घमंड या गर्व।
डिग्री: अदालत का फैसला या आदेश (अक्सर कुर्की के संदर्भ में)।
कुर्की: कर्ज न चुकाने पर कानूनी रूप से संपत्ति जब्त होना।
बकाया: बाकी बचा हुआ पैसा।
मालगुजारी: लगान या जमीन का टैक्स।
इल्लत: मुसीबत, दोष या झंझट।
हवालात: जेल या कैदखाना।
वेश्या: गणिका या तवायफ।
उल्लू बनना: मूर्ख बनना।
असामियों: काश्तकार, किसान या वे लोग जो जमींदार के अधीन काम करते हों।
बगलें बजाना: बहुत खुश होना (अक्सर दूसरों की हार पर)।
संपदा: धन-दौलत या संपत्ति।
पसीना: श्रम या मेहनत।
रियासत: छोटा राज्य या जमींदारी।
मौज उड़ाना: ऐश करना या मजे करना।
ऐयाशी: भोग-विलास या विलासितापूर्ण जीवन।
घी के चिराग जलाना: बहुत अधिक खुशी मनाना (उत्सव जैसा माहौल)।
विलासांधता: भोग-विलास में अंधा हो जाना।
कलह: झगड़ा या क्लेश।
स्वार्थपरता: केवल अपने बारे में सोचना, मतलबी होना।
अरसिक: जिसमें रस या कला की समझ न हो, नीरस व्यक्ति।
भोग-विलास: शारीरिक सुख-सुविधाओं और आनंद में डूबे रहना।
धर्म: यहाँ इसका अर्थ 'कर्तव्य' या 'नैतिक जिम्मेदारी' से है।


गधा बना रहूँ — मूर्ख या अनभिज्ञ बने रहना।
बीड़े — पान के पत्तों को मोड़कर बनाया गया टुकड़ा जिसमें कत्था, चूना और सुपारी आदि सामग्री भरी होती है।
ताकने — एकटक या ध्यान से देखना।
मनोभावों — मन के विचार, भावनाएँ या हृदय की बात।
साहस बटोर — हिम्मत जुटाकर या साहस इकट्ठा करके।
कमी — अभाव या किल्लत।
दर्शन थोड़े — मुहावरेदार प्रयोग ('नाम बड़े और दर्शन छोटे'), जिसका अर्थ है केवल प्रसिद्धि होना पर वास्तविकता में वैसा न होना।
ईर्ष्या — जलन या डाह।
बैर — शत्रुता या दुश्मनी।
स्वार्थ — अपना मतलब सिद्ध करना या खुद का भला सोचना।
क्षम्य — क्षमा करने योग्य या जिसे माफ़ किया जा सके।
धर्म — कर्तव्य (यहाँ धार्मिक अर्थ के बजाय 'जरूरी कर्म' के रूप में प्रयुक्त)।
देवता — अत्यंत नेक, परोपकारी या दिव्य पुरुष।
नीचता — अधमता, बुरा व्यवहार या ओछापन।
कुटिलता — चालाकी, छल-कपट या टेढ़ापन।
निःस्वार्थ — जिसमें अपना कोई निजी स्वार्थ या मतलब न हो।
परम आनंद — सर्वोच्च सुख या अत्यंत प्रसन्नता।
दर्जे — स्तर, पद या कोटि।
साधना — तपस्या, कठिन अभ्यास या अनुशासन।
कुटुंब — परिवार या कुनबा।
रोग — बीमारी या व्याधि।
मामूली — साधारण या सामान्य।
ज्वर — बुखार या ताप।
सरसाम — मस्तिष्क ज्वर या एक प्रकार की गंभीर मानसिक बीमारी (Meningitis)।
गुंसी — फुंसी या छोटा दाना (त्वचा संबंधी)।
जहरबाद — नासूर, सेप्टिक या एक प्रकार का घातक घाव।
मझोले — मध्यम आकार के या बीच के।
तार — टेलीग्राम (पुराने समय में संदेश भेजने का तीव्र माध्यम)।
मसीहुलमुल्क — देश का बड़ा हकीम या विख्यात चिकित्सक (यह एक सम्मानजनक उपाधि भी है)।
भिषगाचार्य — आयुर्वेद का महान ज्ञाता या बड़ा वैद्य/डॉक्टर।
देवालय — मंदिर या ईश्वरीय स्थान।
दुर्गापाठ — देवी दुर्गा की स्तुति या सप्तशती का पाठ।
ज्योतिषाचार्य — ज्योतिष शास्त्र का प्रकांड विद्वान।
कुंडली — जन्मपत्री या ग्रहों की स्थिति बताने वाला चक्र।
तंत्र के आचार्य — तांत्रिक विद्या या गुप्त साधनाओं के विशेषज्ञ।
अनुष्ठान — धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ या किसी विशेष लक्ष्य के लिए किया जाने वाला कर्मकांड।


यमराज: मृत्यु के देवता।
ताक: अवसर की तलाश या इंतज़ार।
वर्षा: बारिश (यहाँ धन की प्रचुरता के संदर्भ में)।
वसूल: उगाही करना या इकट्ठा करना।
भाले की नोंक पर: ज़बरदस्ती या बल प्रयोग द्वारा।
आश्चर्य: हैरानी या अचरज।
आहों: दुःख भरी आहें या विलाप।
दावानल: जंगल की आग।
भस्म: जलाकर राख कर देना।
वेदना: अत्यधिक पीड़ा या कष्ट।
जौ-जौ: थोड़ा-थोड़ा करके (तिल-तिल कर)।
अंगुल-अंगुल: इंच-इंच या बहुत छोटे हिस्से में।
पोर-पोर: शरीर का जोड़-जोड़ या रोम-रोम।
हाहाकार: हाहाकार, चीख-पुकार या भारी अशांति।
हुक्काम: हाकिमों या सरकारी अधिकारियों का समूह।
शरण: पनाह या आश्रय।
रूपवती: सुंदर स्त्री।
खिलौना: कठपुतली या दूसरों के इशारों पर नाचने वाला।
इलाके: क्षेत्र या जागीर।
सवारियाँ: वाहन (पुराने समय में घोड़े, हाथी, रथ)।
आत्मा: अंतर्मन या रूह।
अभिमान: आत्म-सम्मान या गर्व।
दुश्मन: शत्रु।
भय: डर।
चोटी दूसरों के पैरों के नीचे दबी होना: पूरी तरह से दूसरों के अधीन या गुलाम होना।
भोग-विलास: ऐशो-आराम और इंद्रिय सुख।
नशे: मद या धुंध (यहाँ विलासिता का प्रभाव)।
तलवे चाटना: चापलूसी करना या अत्यधिक गुलामी करना।
अधीनों: जो नीचे काम करते हों या प्रजा।
खून चूसना: शोषण करना।
अभागा: जिसका भाग्य खराब हो, दुर्भाग्यशाली।
प्राणी: जीव या मनुष्य।
दौरे: निरीक्षण के लिए की जाने वाली यात्रा (Official tour)।
कर्तव्य: फर्ज या जिम्मेदारी।
दुम के पीछे लगा रहना: चापलूसी में पीछे-पीछे घूमना।
भौंहों पर शिकन: गुस्सा आना या अप्रसन्नता प्रकट करना।
प्राण सूखना: बहुत अधिक डर जाना।
पछड़ा: दुखड़ा या झंझट भरी लंबी कहानी।
विश्वास: यकीन या भरोसा।
डालियों: उपहार या भेंट (जो रिश्वत के रूप में दी जाए)।
रिश्वतों: घूस।
खैर गनीमत: संतोषजनक स्थिति या गनीमत।
सिजदे: माथा टेकना या दंडवत प्रणाम करना।
मुफ्तखोरी: बिना मेहनत किए खाने की आदत।
अपंग: विकलांग या असहाय।
पुरुषार्थ: मेहनत, पराक्रम या मानवीय शक्ति।
लेश मात्र: ज़रा सा भी।
दुम हिलाना: चापलूसी करना।
कृपापात्र: जिस पर किसी की दया हो।
प्रजा: जनता।
आतंक: डर या खौफ।
उद्यम: व्यवसाय, काम या धंधा।
पिछलगुओं: चापलूस अनुयायी या पीछे चलने वाले।
खुशामदों: झूठी प्रशंसा।
अभिमानी: घमंडी।
तुनुकमिजाज: बात-बात पर चिढ़ने वाला या क्रोधी।
शील: अच्छा स्वभाव या सदाचार।
विनय: नम्रता।
लोप: गायब होना या समाप्त हो जाना।
रोजी: आजीविका या कमाई।
उपकार: भलाई या नेकी।
निश्चय: पक्का या तय।
स्वार्थ: निजी लाभ या मतलब।


लक्षण: संकेत, आसार या चिन्ह।
वर्ग: श्रेणी, समूह या तबका (यहाँ जमींदार वर्ग के संदर्भ में)।
हस्ती: अस्तित्व, वजूद या पहचान।
मिटना: समाप्त होना या नष्ट हो जाना।
स्वागत: अगवानी या अभिनंदन।
ईश्वर: परमात्मा या भगवान।
उद्धार: कल्याण, मुक्ति या संकट से निकलना।
परिस्थितियों: हालात या समय का चक्र।
शिकार: आहत होना या चंगुल में फँसना।
सर्वनाश: पूरी तरह से बर्बादी या विनाश।
संपत्ति: धन-दौलत या जायदाद।
बेड़ी: जंजीर या बंधन।
अभिशाप: शाप या लानत।
मँडराना: ऊपर चक्कर लगाना या खतरा बने रहना।
मानवता: इंसानियत।
पद: स्थान, दर्जा या ओहदा।
लक्ष्य: ध्येय, मकसद या मंजिल।
गिलौरी-दान: पान रखने का विशेष पात्र या डिब्बा।
गिलौरियाँ: पान के तैयार बीड़े।
चपरासी: अर्दली या सेवादार।
सरकार: मालिक, हुज़ूर या संबोधन शब्द।
बेगारों: बिना मजदूरी दिए काम करने वाले मजदूर।
इनकार: मना करना या अस्वीकार करना।
धमकाया: डराया या भयभीत किया।
माथे पर बल पड़ना: क्रोधित होना या चिंता में पड़ना।
दुष्टों: नीच, बुरे लोग या उद्दंड।
ठीक करना: सबक सिखाना या सीधा करना।
रोज: प्रतिदिन या हर दिन।
मजदूरी/मजूरी: काम के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक।
सीधे करें या टेढ़े: स्वेच्छा से या मजबूरी में (हर हाल में)।
ख्याल: ध्यान या याद।
आशा: उम्मीद या अपेक्षा।
झुल्लाते: चिड़चिड़ाते हुए या झुंझलाहट में।
नीति: सिद्धांत, मर्यादा या कार्य करने का ढंग।
धरम (धर्म): कर्तव्य, नैतिकता या मजहब।


एकाएक: अचानक या सहसा।
गरम: क्रोधित, उत्तेजित या तपता हुआ (यहाँ गुस्से के संदर्भ में)।
सूर्य: सूरज या दिनकर।
तेज: चमक, ताप या प्रखरता।
अभिभूत: वशीभूत, प्रभावित या दबा हुआ।
वृक्ष: पेड़ या पादप।
पसार: फैलाव या विस्तार।
समेटना: इकट्ठा करना या संकुचित करना।
आकाश: नभ या गगन।
मटियाली: मिट्टी के रंग वाली या मटमैली।
गर्द: धूल या गर्द-गुबार।
छाई: फैली हुई या ढकी हुई।
पृथ्वी: धरती या ज़मीन।
काँपती: थरथराती या लरजती हुई।
जान पड़ना: प्रतीत होना या दिखाई देना।
डंडा: लाठी या सोटा।
शगुन: शुभ अवसर पर दी जाने वाली भेंट या नेग।
चिंता: फिक्र या उधेड़बुन।
सिर पर सवार होना: अत्यधिक हावी होना या हर समय दिमाग में रहना।