Row Agent - 1 - 29 in Hindi Detective stories by bhagwat singh naruka books and stories PDF | रॉ एजेंट सीजन 1 - 29

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रॉ एजेंट सीजन 1 - 29

Countiue,,,,,,


अजय सिंह ने अभी-अभी जाना है कि फकीर कोई और नहीं, उसके पिता चंद्रभान सिंह उर्फ विक्रम सूद हैं। दोनों गले लगे हैं। अजय की आंखें भीगी हैं, और पिता का हाथ उसके सिर पर है।

अजय सिंह: कान छुड़ाते हुए, हल्की झुंझलाहट और प्यार से  
छोड़ो ना पापा, दर्द होता है। अब मैं बच्चा नहीं हूं। रॉ का एजेंट हूं, उस्मान बनकर घूम रहा हूं, यासीन मलिक जैसे दरिंदों की आंखों में आंखें डालकर बात करता हूं। और आप हैं कि कान पकड़ रहे हो जैसे पांच साल का हूं। इतने दिन बाद मिले हो, गले तो लग जाओ ढंग से।

दोनों कसकर गले लग जाते हैं। अजय की आंखों से आंसू की धारा बह निकलती है। वो कई सालों का बचा हुआ डर, अकेलापन, सब एक साथ बहा देना चाहता है। चंद्रभान सिंह उसकी पीठ थपथपाते हैं।

चंद्रभान सिंह – विक्रम सूद: भारी आवाज़ में, बेटे के बालों में हाथ फेरते हुए  
रो ले बेटा, जी भर के रो ले। इस वर्दी में आंसू बहाने की इजाजत नहीं होती। लेकिन बाप के कंधे पर हर बेटे का हक होता है। तुझे देखकर लगता ही नहीं कि तू वही अजय है जिसे मैं साइकिल सिखाते वक्त गिरने पर डांट देता था। अब तो तू पूरा मुल्क संभाल रहा है।

अजय खुद को संभालता है, आंसू पोंछता है और पिता की आंखों में देखता है।

अजय सिंह: भावुक होकर  
घर पर मां कैसी है पिता जी? उसकी तबीयत? पिछली बार जब कॉल पर बात हुई थी तो खांस रही थी। दवाई ली या नहीं? आप तो बस मिशन मिशन करते हो, मां का ध्यान कौन रखता है? 

चंद्रभान सिंह: हल्का मुस्कुराते हुए, बेटे का चेहरा देखते हुए  
हां मां बिल्कुल ठीक है तेरी। बस दिन रात तेरी फोटो देखकर दरवाजे को तकती रहती है। कहती है, 'मेरा उस्मान कब आएगा?' अरे उसको क्या पता कि उसका उस्मान तो यहां जन्नत और जहन्नुम के बीच झूल रहा है। और तू सुन...लगता है यहां खूब डाइट ले रहा है। चेहरे पर रंग आ रहा है। पहले तो हड्डी था बिल्कुल। यहां के कबाब और निहारी ने तो तुझे तगड़ा कर दिया। हूं, सही बोला ना?

अजय सिंह: फीकी हंसी हंसता है  
अपने देश का जैसा खाना यहां कहां पापा? यहां तो सुबह शाम गोश्त, गोश्त और गोश्त। बकरे की, गाय की, ऊंट की। शाकाहारी आदमी के लिए तो यहां जीना मुश्किल है। फिर भी अपने काम का तो मिल ही जाता है। दाल चावल बनवा लेता हूं कहीं ना कहीं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सबके साथ खाना खाने जाना पड़ता है। ताहिर के दस्तरखान पर बैठो तो बीस तरह का गोश्त। उस समय पता नहीं चलता कि गोश्त किसका है और किस तरह बना है। बस निवाला तोड़ते वक्त अल्लाह को याद कर लेता हूं।

चंद्रभान सिंह: चेहरा एकदम गंभीर हो जाता है, बेटे की बाजू पकड़ लेते हैं  
कहीं गलती से खा तो नहीं लिया ना बेटा? तेरी मां ने कसम दी थी मुझे। बोली थी, 'मेरा बेटा ब्राह्मण का खून है, उसका धर्म भ्रष्ट नहीं होना चाहिए'। बोल सच बोल।

अजय सिंह: पिता का हाथ अपने हाथ में लेता है  
नहीं पापा...कभी नहीं। मर जाऊंगा पर धर्म नहीं छोडूंगा। वो क्या है कि जब कभी मुझे लगता है कि आज सामूहिक खाना है या कोई दावत है, तो मैं कुछ ना कुछ बहाना लगा लेता हूं। कभी कह देता हूं पेट खराब है, कभी रोजा बताता हूं, कभी कह देता हूं कि मन्नत मानी है। अल्लाह का शुक्र है कि अभी तक बचता आया हूं। लेकिन कब तक पापा? कब तक?

चंद्रभान सिंह: लंबी सांस लेते हैं  
जब तक मिशन पूरा नहीं होता बेटा। बस तब तक। चलो ये सब छोड़ो, अब ये बताओ कि तुम्हारा मिशन कहां तक पहुंचा है? दिल्ली में ऊपर तक हलचल है। पीएमओ रोज अपडेट मांगता है। तेरी भेजी हर रिपोर्ट पर NSA खुद निशान लगाता है।

अजय सिंह: आंखों में चमक आ जाती है  
बहुत जल्दी ही हम अपने मिशन को पूरा करके लौट आएंगे पापा। सब ठीक चल रहा है। जो जो सोचा था उससे कहीं अधिक हम आगे बढ़ रहे हैं। आपको पता है इनका प्लान कितना बड़ा है? अब्बू कासिम और उसके लोग पूरे भारत में जेहाद कायम करने के लिए सोशल मीडिया पर कब्ज़ा जमा चुके हैं। हज़ारों फेक अकाउंट। 'रोहित शर्मा फैन क्लब' के नाम से हिंदू-मुस्लिम नफरत, 'देशभक्त भारतीय' नाम से दलित-सवर्ण की लड़ाई। मैने सुना है कि अब भारत में जो भी पुराने सामाजिक ताने-बाने थे, इनके आईटी सेल वाले उनको तोड़ रहे हैं। सभी धर्म की लड़कियों को फंसाने वाले को इनाम, लव जेहाद को फंडिंग, सब कुछ। और यही नहीं पापा, मुझे मोहम्मद यासीन मलिक भी मिल गया है। अगला टारगेट वही होगा हमारा। उसकी रग-रग से वाकिफ हो जाऊंगा मैं।

चंद्रभान सिंह: पीठ थपथपाते हैं, गर्व से  
बहुत बढ़िया मेरे शेर। शाबाश। लेकिन ये चोट कैसे लगी तुम्हें? बाजू पर पट्टी बंधी है। दिखाओ मुझे।

अजय झेंप जाता है, बाजू पीछे कर लेता है।

अजय सिंह:  
नहीं कुछ खास नहीं है पापा। इतना तो चलता है। फील्ड में हो तो खरोंच आ ही जाती है। आप क्यों परेशान हो रहे हो? खैर ये बताओ, हमने यहां से जो जानकारी भेजी, ड्रोन वाले रूट की, पंजाब वाले स्लीपर सेल की, उसका क्या परिणाम हुआ? कुछ एक्शन हुआ या फाइल में घूम रही है?

चंद्रभान सिंह: अचानक सख्त हो जाते हैं  
बात को बदलो मत बेटा। बाप हूं तुम्हारा। पाला है तुम्हें। रात-रात भर जागकर तेरे बुखार में पट्टियां की हैं। इतना बड़ा किया है तो चिंता तो होती है ना। हुआ क्या था? सच बताओ। गोली कैसे लगी?

अजय सिंह: नज़रें चुराकर  
बस एक प्लान का हिस्सा था पापा। निशाना कोई और था। हम चाहते थे कि नूर को लगे कि मैं उसे बचाने के लिए गोली खा गया। ट्रस्ट बिल्ड करना था। लेकिन हल्की सी गलती से गोली मुझे छू कर निकल गई। बस और कुछ नहीं। एक इंच इधर होती तो आप आज मेरे जनाज़े पर होते।

चंद्रभान सिंह: आंखें बंद कर लेते हैं, जैसे दर्द को पी रहे हों  
निशाना कौन लगा रहा था? तुम खुद? या कोई और? अजय, ये खेल खतरनाक है।

अजय सिंह: बात काटता है, परेशान होकर  
छोड़ो ना सब बातों को पापा। मैंने कुछ पूछा उसका जवाब दो ना। प्लीज़। मैं आपके सामने हूं, जिंदा हूं, मस्त हूं, ठीक हूं। आपके चेहरे पर साफ नज़र आ रहा है कि इतनी सी चोट से आपको कितनी तकलीफ हो गई। अगर कल को कुछ हो गया तो...आप तो... आवाज़ भर्रा जाती है, फिर गले लग जाता है अगर मुझे कुछ हो गया तो मां का क्या होगा? आपका क्या होगा?

चंद्रभान सिंह: बेटे को कसकर भींच लेते हैं, आवाज़ कांप रही है  
ख़बरदार जो और कुछ बोला तो। जुबान खींच लूंगा। अरे तू जानता नहीं अगर तुझे कुछ हो गया तो मैं पांच लोगों को क्या जवाब दूंगा? और खास कर उसे जिसने तुझे जन्म दिया और मेरे भाई की पत्नी की गोद में डाल दिया। लेकिन जब तू पांच साल का भी नहीं हुआ था, तब तुझे तेरी मां यानी मेरी पत्नी अपने साथ लेकर आ गई। क्योंकि मेरा आंगन सूना था। धन्य है वो मां और वो पिता जिसने तुझे जन्म दिया। उन्होंने कलेजे पर पत्थर रखकर तुझे मुझे दिया, ताकि देश को एक बेटा मिल सके।

अजय एकदम सुन्न पड़ जाता है। वो पिता से अलग होता है और हैरानी से देखता है।

अजय सिंह: हकलाते हुए  
क्या...क्या बोले जा रहे हो पापा? क्या मतलब है आपका? कि आप और मां मेरे असली जन्मदाता नहीं हो? और वो गांव में, चाचा-चाची, वो भी नहीं? फिर कौन है वो? मेरे असली मां-बाप कौन हैं? बताओ ना। शान्त क्यों हो गए? जवाब दो।

चंद्रभान सिंह: अचानक खुद को संभालते हैं, बात पलट देते हैं  
कुछ नहीं बेटा। मैं भी ना...पता नहीं भावुक होकर क्या क्या बक गया। बुढ़ापा आ गया है, जुबान फिसल जाती है। तू...तू अपने मिशन पर फोकस कर। वो तू पूछ रहा था ना, तूने जो सूचना भेजी थी? बड़े सही समय पर हमने एक्शन लिया। पंजाब बॉर्डर पर दो आतंकियों को जिंदा पकड़ लिया। 40 किलो RDX, 20 AK-47। और उस मिशन को अंजाम तुम्हारे पुराने दोस्तों ने ही दिया। वो चौटाला...हरियाणा पुलिस का DSP। याद है ना?

अजय ध्यान से पिता का चेहरा पढ़ रहा है। वो जान गया है कि कुछ छिपाया जा रहा है।

अजय सिंह: धीरे से  
चलो ये तो अच्छी बात है। लेकिन अब आप बात को गोल गोल घुमा कर बता रहे हो पापा। और इतनी जल्दी में अगर कोई आप से बात करे तो समझ लेना चाहिए कि कोई बात है जिसको छिपाया जा रहा है। क्या सच्चाई है? अब बता भी दो। मैं बच्चा नहीं हूं। गोली खा चुका हूं।

चंद्रभान सिंह: बेटे की आंखों में देखते हैं और फिर नज़रें चुरा लेते हैं  
सही समय आने पर पता चल जाएगी बेटा। और वो भी यहीं, पाकिस्तान में। जैसे ही मिशन खत्म होगा, मैं खुद तुझे तेरे असली मां-बाप से मिलवाऊंगा। वादा रहा। बस इंतज़ार करो। तब तक बस देश पर फोकस करो।

अजय सिंह: गहरी सांस लेकर  
ठीक है पापा। खैर वो सब जाने दो। ये बताओ आपने ख़बर किसके हाथ भेजी थी? मोहम्मद पप्पू? क्या वो एजेंट है हमारा?

चंद्रभान सिंह: मुस्कुराते हैं  
हां, सही पहचाना। उसका कोई नाम नहीं है। हर मिशन पर नया नाम होता है। कभी पप्पू, कभी सलीम, कभी रामू। उसी ने तुम्हें खबर दी थी। वहीं एक है जिस पर तुम आंख बंद करके बिलीव कर सकते हो। हालांकि और भी हैं, लेकिन 'अंदर' और 'भरोसेमंद' एक ही है। अच्छा अब मैं चलता हूं। मुझे कल सुबह सऊदी जाना है। वहां भारतीय दूतावास में कई काम हैं। फिर भारत वापिस। अपना ख्याल रखना बेटा। और नज़र चारों तरफ, और आंखें खुली। और विजय आए तो उसको प्यार देना मेरी तरफ से। Best of luck, मेरा शेर।

दोनों कुछ कदम साथ चलते हैं। मैन रोड पर आकर पिता एक तरफ मुड़ जाते हैं और अजय दूसरी तरफ। अजय मुड़कर देखता है, पिता भीड़ में गुम हो चुके हैं।

तभी अजय की नज़र सड़क किनारे सेव बेच रही एक लड़की पर पड़ती है। उम्र करीब 24-25। सलवार सूट, सिर पर दुपट्टा। लेकिन आंखें...आंखें अजीब थीं। वो लगातार अजय को ही देख रही थी। अजय को शक होता है। वो हल्के कदम उसकी तरफ बढ़ता है। दाएं-बाएं देखता है। कोई पुलिस नहीं, कोई यासीन का आदमी नहीं।

अजय सिंह: सेव देखते हुए, सामान्य लहजे में  
ये सेव क्या रेट दिए बहन? 

लड़की: बिना घबराए, सीधा अजय की आंखों में देखकर  
जी 250 रुपए किलो। लेकिन आपके लिए फ्री हैं। देश के लिए जो इतना रिस्क ले, उससे पैसे कैसे ले सकती हूं?

अजय का हाथ थम जाता है। वो चौंककर लड़की को देखता है।

अजय सिंह: धीमी आवाज़ में, सख्ती से  
तुम मुझे जानती हो? मैं कौन हूं? बोलो।

लड़की: मुस्कुराती है और एक अखबार उठाकर सेव की टोकरी पर रख देती है  
हां, जानती हूं। और जिसने ये भेजा है उसको भी जानती हूं। खोलकर देख लो। तुम्हारे लिए ही है।

अजय धीरे से अखबार खोलता है। अंदर एक छोटे कागज़ पर उर्दू में लिखा है: 'नूर जहां + उस्मान = निकाह? या जेहाद?'। अजय का खून खौल जाता है।

अजय सिंह: कागज़ मुट्ठी में भींचकर  
ये...ये तुम्हें किसने दिया? और तुम हो कौन? ISI की हो? यासीन की मुखबिर हो? एक शब्द झूठ बोला तो यहीं गर्दन मरोड़ दूंगा।

लड़की: बिल्कुल शांत, डर का कोई नाम नहीं  
इतना सेंटी नहीं होते IPS अजय सिंह तोमर। जो आप हो वही मैं हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि आप बंदूक से खेलते हो, हम कलम से।



अजय गुस्से और हैरानी से लड़की को देखता है। फिर बिना कुछ बोले तेज़ी से वहां से निकल जाता है। उसके जाते ही लड़की की दुकान पर 4-5 नए ग्राहक आ जाते हैं, जैसे वो सिर्फ अजय के जाने का इंतज़ार कर रहे थे। अजय पीछे मुड़कर देखता है। लड़की अब आम सी दुकानदार लग रही है, ग्राहकों से मोल-भाव कर रही है।

अजय सिंह: मन ही मन, चलते हुए  
ये कौन थी? चौटाला ने तो बताया नहीं कि कोई और भी है। पापा ने कहा था 'एक ही है अंदर'। तो ये कौन? गेम बड़ा होता जा रहा है। और मैं...मैं तो बस मोहरा हूं। असली खिलाड़ी तो दिल्ली में बैठे हैं।

अजय भीड़ में गुम हो जाता है, हाथ में अभी भी वो कागज़ का टुकड़ा भींचे हुए।


Contiue seen 


Writer bhagwat singhnaruka ✍️ ✍️ 🙏