Row Agent - 1 - 28 in Hindi Detective stories by bhagwat singh naruka books and stories PDF | रॉ एजेंट सीजन 1 - 28

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रॉ एजेंट सीजन 1 - 28


जगह:
हुमायूं बाग, कराची – दोपहर का वक्त, बाजार की भीड़
अजय सिंह उर्फ उस्मान एक टूटी दीवार के कोने में फकीर को ले आता है। चारों तरफ शोर है। बकरे की आवाज़, पुलिस की सीटी, और दूर कहीं अज़ान की तैयारी। अजय इधर-उधर देखकर धीमी आवाज़ में शुरू करता है।

अजय सिंह: पैर छूते हुए, आवाज़ कांप रही है  
बाबा...आप? यहां? इस भेस में? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा। मैंने सोचा था दिल्ली से कोई कोड वर्ड आएगा, कोई नया हैंडलर मिलेगा।

लेकिन आप खुद चलकर मौत के मुंह में आ गए?

अगर यासीन मलिक के आदमियों ने पहचान लिया होता तो?

एक गोली...बस एक गोली और 20 साल की तपस्या मिट्टी में मिल जाती सर।

फकीर धीरे से हंसता है। उसकी सफेद दाढ़ी में धूल जमी है, लेकिन आंखें चील जैसी तेज। वो अजय के कंधे पर हाथ रखता है।

फकीर – रॉ चीफ विक्रम सूद:  
शाबाश उस्मान...माफ करना, अजय। पुराना नाम जुबान पर लाना खतरे से खाली नहीं।

तूने मुझे पहचान लिया, इसका मतलब मेरा भेस अभी कच्चा है। और जहां तक मौत की बात है...बेटा, मौत से डरकर जासूसी नहीं होती।

तू जिस घर में बैठा है, वो पूरा घर बारूद का ढेर है। अब्बू कासिम ताहिर कोई मामूली ISI चीफ नहीं रहा। वो जिन्न है। और जिन्न को बोतल में बंद करने के लिए खुद आग में कूदना पड़ता है।

अजय गुस्से और चिंता से फकीर का हाथ पकड़ लेता है।

अजय सिंह:  
लेकिन सर, प्रोटोकॉल? आप डायरेक्ट फील्ड में? अगर आपको कुछ हो गया तो दिल्ली में कौन जवाब देगा? पूरी सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग, डोजियर, सब आपके दिमाग में है। मैं यहां मर भी जाऊं तो एक एजेंट मरेगा। आप मरे तो पूरा सिस्टम हिल जाएगा। ये रिस्क क्यों?

फकीर अब गंभीर हो जाता है। वो अपने झोले से एक गंदी सी टोपी निकालता है और अजय के सिर पर रख देता है।

फकीर – विक्रम सूद:  
क्योंकि बेटा, अब वक्त रिपोर्ट पढ़ने का नहीं, मैदान में उतरने का है। तेरी आखिरी रिपोर्ट मैंने खुद पढ़ी। 'नूर जहां', 'यासीन मलिक', 'ड्रोन से पंजाब बॉर्डर पर हथियारों का बेड़ा'...ये सब लिखा है तूने। लेकिन जो नहीं लिखा, वो मैं तेरी आंखों में पढ़ने आया हूं। डर। तू डर गया है अजय। कल गोली तेरे बाजू को छूकर निकली, और तूने मौत को महसूस किया। मौत को महसूस करने के बाद दो तरह के एजेंट होते हैं। एक जो टूट जाते हैं, दूसरे जो फौलाद बन जाते हैं। मैं ये देखने आया हूं कि तू कौन सा है।

अजय की आंखें भर आती हैं। वो नज़र झुका लेता है।

अजय सिंह: रुंधी आवाज़ में  
मैं टूटा नहीं सर...मैं बस...नूर की आंखों में जब अपने लिए मोहब्बत देखता हूं, तो गद्दार लगता हूं खुद को। वो लड़की बेकसूर है। वो तो बस अपने अब्बू का प्यार चाहती है। और मैं? मैं उसके अब्बू को बेनकाब करने आया हूं।

कल जब ताहिर ने कहा 'बेटी तूने हीरा चुना है', तो लगा किसी ने कलेजा खींच लिया हो। देश के लिए जासूस हूं सर, पर इंसान भी तो हूं।

फकीर अचानक अजय का कान पकड़ लेता है, बिल्कुल पुराने अंदाज़ में।

फकीर – विक्रम सूद: धीमे पर सख्त लहजे में  
और यही इंसानियत तुझे जिंदा रखेगी अजय। जिस दिन तेरा दिल पत्थर हो गया, समझ लेना मिशन उसी दिन फेल हो गया।

सुन...नूर जहां मोहरा नहीं है, वो विक्टिम है। तेरा टारगेट अब्बू कासिम और मोहम्मद यासीन मलिक है। खासकर यासीन। वो आदमी ISI का दिमाग है। ताहिर सिर्फ चेहरा है, अक्ल यासीन लगाता है। ड्रोन, सोशल मीडिया के फेक अकाउंट, स्लीपर सेल...सब उसी के दिमाग की उपज है।

अजय कान छुड़ाकर सीधा खड़ा होता है। उसकी आंखों में अब पानी की जगह आग है।

अजय सिंह:  
मैं भी उसी नतीजे पर पहुंचा था सर। यासीन की कमजोरी ढूंढ रहा हूं। वो रोज़ रात 2 बजे सीक्रेट रूम में जाता है। कहते हैं वहां एक सर्वर है। पूरा डेटा वहीं है। फर्जी इंस्टा, फेसबुक, ट्विटर हैंडल...जो कश्मीर और पंजाब में नफरत फैलाते हैं। अगर वो सर्वर हाथ लग जाए, तो हम 5 साल की ISI की मेहनत एक झटके में खत्म कर देंगे।

फकीर – विक्रम सूद: मुस्कुराते हुए, दाढ़ी पर हाथ फेरकर  
इसीलिए तो कहता हूं तू हीरा है। सुन, अब आगे क्या करना है। पहला, यासीन की कमजोरी औरत, पैसा या नशा नहीं है। उसकी कमजोरी है 'गुरूर'। उसे लगता है वो अल्लाह के बाद सबसे अक्लमंद है। उसके गुरूर पर चोट कर। दूसरा, मोहम्मद पप्पू...वो गार्ड। वो छुट्टी पर नहीं है। वो हमारा आदमी है। 'डीप स्लीपर'। 7 साल से ताहिर की हवेली में माली बनकर बैठा है। उसी ने तुझे यहां भेजा। आगे से वो ही तेरा लोकल कॉन्टैक्ट रहेगा। 'हुमायूं बाग' कोड था।

अजय चौंक जाता है।

अजय सिंह:  
पप्पू? वो? हे भगवान...मैं तो उसे शक की निगाह से देख रहा था। उसने ही सुबह दरवाजा खटखटाया था। मैं समझा ट्रैप है। सर, आप लोग ग्रेट हो। पूरी बिसात बिछा रखी है और मुझे पता भी नहीं।

फकीर – विक्रम सूद:  
तुझे पता नहीं होना चाहिए था अजय। यही नियम है। जितना कम पता, उतना कम रिस्क। अब सुन, अगला कदम। 3 दिन बाद 'यौम-ए-दुआ' है। ताहिर की हवेली में बड़ा जलसा होगा। सारे कमांडर आएंगे। यासीन भी। उसी रात सर्वर रूम का एक्सेस कार्ड यासीन की जेब से निकलना है। कैसे निकलेगा, वो तुझे तय करना है। नूर का इस्तेमाल कर, उसके गुरूर का इस्तेमाल कर, कुछ भी कर। लेकिन वो डेटा चाहिए।

फकीर अपने झोले से एक छोटा सा तावीज़ निकालकर अजय की हथेली पर रख देता है।

फकीर – विक्रम सूद:  
इसे रख ले। तावीज़ नहीं है। पेनड्राइव है। मिलिट्री ग्रेड एन्क्रिप्शन। सर्वर में लगाते ही 60 सेकंड में पूरा डेटा कॉपी और लोकेशन दिल्ली भेज देगा। उसके बाद तावीज़ खुद डेड हो जाएगा। बस ध्यान रखना, 60 सेकंड...उसके बाद या तो तू हीरो बनेगा या शहीद।

अजय तावीज़ को मुट्ठी में भींच लेता है। उसकी जबड़े की नसें तन जाती हैं।

अजय सिंह: आंखों में आंखें डालकर  
60 सेकंड बहुत हैं सर। आपने भरोसा करके मुझे यहां भेजा, अब भरोसा रखिए। यौम-ए-दुआ की रात अब्बू कासिम ताहिर की सल्तनत की आखिरी दुआ होगी। और सर...थैंक यू। मेरे बाप बचपन में गुजर गए थे। जब आपने कान पकड़ा ना, तो लगा वो लौट आए।

फकीर की आंखें पहली बार नम होती हैं। वो जल्दी से मुंह फेर लेता है और अपनी आवाज़ को फकीरों वाली खराश में बदल देता है।

फकीर – विक्रम सूद: तेज आवाज़ में, ताकि आसपास वाले सुनें  
जा बच्चा जा...अल्लाह तेरा भला करे। हज को जाना है मुझे। पाक की सबसे बड़ी मजार बनेगी मेरे नाम की...हा हा हा!

वो लंगड़ाता हुआ भीड़ में गुम होने लगता है। अजय वहीं खड़ा उसे जाते देखता है। मुट्ठी में तावीज़, दिल में आग, और दिमाग में सिर्फ एक नाम: मोहम्मद यासीन मलिक।

अजय सिंह: मन ही मन  
खेल अब शुरू हुआ है यासीन...तेरा गुरूर ही तेरी कब्र खोदेगा। यौम-ए-दुआ...आ रहा हूं मैं।

बैकग्राउंड में अज़ान शुरू हो जाती है। अजय टोपी सिर पर ठीक करता है और भीड़ में मिल जाता है। कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है, पूरा हुमायूं बाग दिखता है, और दूर हवेली की छत पर खड़ा मोहम्मद यासीन मलिक दूरबीन से इसी भीड़ को देख रहा है।


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Writer bhagwat singhnaruka ✍️ ✅