मुजरिम
कमल चोपड़ा
शोर-शराबा तो ऐसे मचा था जैसे कोई जीता-जागता आतंक गाँव में घुस आया हो, अपना-अपना काम वहीं छोड़कर बच्चे-बूढ़े बाहर निकल पड़े थे, देखा तो सामने से एक अधबूढ़ा-सा आदमी चला आ रहा था। चेहरे पर उगे काले-सफेद खूँटें, धँसी हुई आँखें और उसकी झुर्रिदार काली चमड़ी से पता लग रहा था कि वह पैंतालीस-छियालीस साल खा-बिता चुका है। फटा हुआ कोट और नाप से बड़े जूते उसके हुलिए को और भी गया-गुज़रा बता रहे थे। फिर भी उसके आगमन से हलचल-सी मच गयी थी। हैरान थे सब—ये है कौन?
पुराने लोगों के चेहरे खिले हुए थे। अधीर होकर ये बता रहे थे—ये धरम है...बसन्ती का घरवाला। पूरे सत्रह साल पहले घर छोड़कर चला गया था। खूब ढूँढ़ा भी पर चिट्ठी ना पत्री...खबर ना सुर...थक-हारकर बैठ गये, आज लौटा है सत्रह साल बाद...बता रहा है सीधा बम्बई गया हुआ था। इतने साल वहीं रहा...
उछलते और शोर मचाते हुए बच्चों की पूरी एक पलटन उसके पीछे-पीछे और गाँव के जाने-माने लोग उसके साथ चल रहे थे, गाँव लौटने पर उसका इस तरह स्वागत होगा, उसने खुद भी नहीं सोचा था। उसे तो डर था कि कोई उसे पहचानेगा भी या नहीं। ये तो हरनाम सिंह शहर जा रहा था। रास्ते में उसने धरमू को आते हुए देख लिया। वहीं से वापिस होकर उसके साथ हो लिया और उसके गाँव पहुँचते ही उसके नाम का शोर मच गया।
सत्रह साल पहले जब वह कल्लू कुम्हार की बहू को लेकर भाग गया था तब उसकी घरवाली बसन्ती सात महीने के पेट से थी। उसके सिर पर भारी कर्जा था। घर पहले से गिरवी पड़ा था। पत्नी के अलावा घर में सिर्फ माँ थी। कमानेवाला कोई नहीं था।
उसे रास्ते में ही हरनाम ने बता दिया था कि उसके जाने के बाद उसके यहाँ एक लड़का पैदा हुआ था जो बाबे की कृपा से आज सत्रह साल का जवान है। मन्नू एक कारखाने में काम करने जाता है। पूरे सात सौ रुपया महीना कमाता है। इस बीच बसन्ती ने अपनी हिम्मत और मेहनत से उसका सारा कर्ज़ा तो चुका ही दिया था; अब तो पीपलवाली गली में एक छोटा-सा मकान भी बना लिया है। अच्छी लगनेवाली खबरें पाने के बावजूद धरमू ने ठण्डी आह भरी—आखिर बसन्ती ने मुझे जिता दिया वरना मैं तो...
उसके साथ-साथ चल रहे लोगों की गिनती ने बढ़कर बारात की शक्ल ले ली थी। दूल्हे की तरह शरमाते सकुचाते हुए धरमू को उस बारात ने उसके घर तक पहुँचा दिया लेकिन दरवाजे पर ताला था। पता चला बसन्ती और मन्नू दोनों काम पर गये हुए हैं। तभी पड़ोस से कोई चारपाई ले आया और लाकर गली के बीचों-बीच बिछा दी। सभी उसे चारपाई पर बैठे जाने का आग्रह करने लगे। उसके चारपाई पर किसी गुरु-गुसाईं की तरह विराजने के बाद दो-चार बुज़ुर्ग भी उसके आजू-बाजू बैठ गये।
"धरम्...हमें तेरे लौट आने की बहुत खुशी हुई है।"
"पर मेरी माँ? माँ के बारे में मुझे अभी तक किसी ने कुछ नहीं बताया...?"
उसका प्रश्न सुनकर सभी खामोश हो गये। माँ के बारे में जानने की उसकी बेसब्री को उस चुप्पी ने और भी बढ़ा दिया। पास बैठे बुजुर्ग ने ही चुप्पी तोड़ी, "अभी बीस-बाईस दिन पहले ही गुज़री है तेरी माँ...तुझे नहीं पता? हमने तो सोचा, माँ की खबर पाकर ही लौटा है तू...बड़ा ओखा वक्त देखा तेरी माँ ने...लम्बे अरसे से बीमार थी। बड़ा कष्ट भोगा बेचारी ने।"
माँ-माँ करते हुए बच्चों की तरह बिलखने लगा वह। सभी उसे धैर्य बँधाने लगे। कोई उसकी पीठ थप-थपा रहा था, कोई उसका हाथ दबा रहा था और कोई कन्धा...
"हौंसला रख यार...जाओ, ओये कोई जा के इसके लिए लस्सी-पानी ले के आओ...तू हौंसला रख वई...जो होना था वो तो हो गया..."
अजीब तरह से सुबकना-सिसकना जारी था उसका। पीछे से आवाज आयी, "सतराँ साल तक माँ ना याद आयी इस माँ दे लगदे नूँ? पुच्छो हुण कादा रोण...?"
लस्सी पीने के बाद उसकी वो ‘हुस्सक-हुस्सक’ बन्द हो गयी थी।
पास बैठे आदमी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "तू तो बड़ा खुशकिस्मत है रे! जो तुझे बसन्ती जैसी बीवी मिली...और कोई तो कब की भाग गयी होती...तेरे जाने के कुछ दिन बाद से ही तेरी माँ बीमार-बीमार सी रहने लगी थी। तीन-चार साल से तो उसने चारपाई ही पकड़ ली थी। टट्टी-पेशाब सब ऊपर। बसन्ती ने उसकी जितनी सेवा की, उतनी कोई कर नहीं सकता।"
एक सफेद दाढ़ीवाला बूढ़ा अपनी बुजुर्गियत झाड़ने लगा, "औरत जात के लिए तो सात फेरे का मतलब है सात जन्म...ये तो उसके साथ फेरे लेके अपने सारे कर्ज और फर्ज उस पर लादकर चलता बना। फँस गयी वो बेचारी! होता ही है, औरत ही रह जाती है निभाने के लिए। बसन्ती का तप आखिर सफल बना। और तुम लौट आये। अब चार दिन सुख के देख सकेगी...इतने सालों बाद तुम्हें पाकर कितना खुश होगी वह..."
एकाएक शोर मच गया...मन्नू आ गया...मन्नू आ गया...
"मन्नू...हटोई वई, मन्नू को रास्ता दो..."
मन्नू आगे बढ़ा तो धरमू चारपाई से उठ खड़ा हो गया, जैसे कोई इनाम लेने के लिए खड़ा हो। पले-पलाये जवान बेटे को सामने पाकर उसका दिल बल्लियों उछलने लगा। वह उम्मीद लगाये था कि मन्नू उसके पैरों को हाथ लगायेगा, फिर गले लगकर भावविह्वल हो जायेगा।
एकदम नजदीक पहुँचकर मन्नू को अपनी ओर घूरता पाकर वह खिसिया-सा गया। एकाएक मन्नू ने उसकी गिरेबान पकड़ ली, "तो वो तू है? कई बार सोचता था मैं—मेरी माँ की जिन्दगी बर्बाद करके छोड़ देनेवाला किसी दिन मेरे हत्थे चढ़ गया तो मैं उसे जिन्दा नहीं छोड़ूँगा..."
गाँववालों के इतने स्वागत के बाद उसे अपने ही बेटे से एकाएक ऐसे अनादर और हमले की उम्मीद नहीं थी। गाँववालों ने मन्नू को खींचकर पीछे हटाया और समझाने लगे। आपे से बाहर हुआ मन्नू चीखा, "इस साले को मैं अपना बाप मान लूँ? और आप लोग इसका ऐसे आदर-सत्कार कर रहे हैं जैसे ये साला कोई जंग जीतकर लौटा हो! सत्रह साल से अपनी माँ, बीवी और बच्चे की याद ना आयी?"
"बेटा! इसने जो किया बहुत बुरा किया...लेकिन होनी बलवान होती है। बेटा...विनाश काले विपरीत बुद्धि। इसने भी कौन-सा सुख पाया होगा...तेरे आने से पहले ये बता रहा था कि ये बहुत बुरा वक्त देखकर हारकर लौटा है..."
दूसरे बुजुर्ग ने भी अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कहा, "और बेटा, जरा अपनी माँ के बारे में तो सोचो—उस बेचारी ने इसी उम्मीद में तो इतने बरस काटे हैं कि एक दिन उसका पति लौट आयेगा। अब तो उसके दुःखों का अन्त समय आ गया है। हम तो यही सोच-सोचकर खुश हैं कि इतने बरसों बाद पति को लौटा हुआ पाकर तुम्हारी माँ खुशी से कैसे नाच उठेगी...हम तो सिर्फ इसलिए इसके आदर-सत्कार में जुटे हैं कि बसन्ती भी अपनी बची-खुची जिन्दगी सुख से जी पायेगी..."
माँ की खुशी और आगे की जिन्दगी के प्रश्न ने उसे निरुत्तर और सोचने को विवश कर दिया था।
"बेटा, तुम मानो या ना मानो पिता तो ये तेरा है ही...बाकी अपनी माँ से पूछ देखना। तू अपने नये खून के जोश से कहीं अपनी माँ के सत्रह साल के तप को ना बेकार कर देना। तुझे तो पता है उस बेचारी ने कैसे-कैसे पहाड़-से दिन और कैसी-कैसी काली रातें कैसे काटी हैं...जो हो गया उसका तो अब क्या हो सकता है? अब सवाल तेरी माँ की जिन्दगी का है? तू क्या चाहता है, हम इसे जूते मार-मारकर भगा दें? बसन्ती अपनी बची-खुची जिन्दगी भी सुहाग के होते हुए भी विधवाओं की तरह गुजार दे? बेटा, असूलों से जिन्दगी नहीं चलती...बहुत सहना पड़ता है। कई बार सबकुछ जानकर भी अनजान हो जाना पड़ता है..."
"लेकिन..."
"हम-तुम कौन होते हैं? ये बन्ती का मुजरिम है। उसे आने दो, वही फैसला करेगी कि इसके साथ क्या व्यवहार किया जाये? इसे स्वीकारना है या धक्के मारकर भगाना?"
मन्नू को लगा, ठीक कह रहे हैं ये। उसे थोड़ा चुप और सन्तुष्ट पाकर बुजुर्ग ने फिर कहा, "और देख लेना वो इसका कितना आदर-सत्कार करती है। त्याग, सेवा, क्षमा, दया, स्नेह और ममता का दूसरा नाम ही औरत है।"
काफी देर तक इसी तरह बहस चलती रही। एकाध को छोड़कर सभी एकमत थे कि बन्ती जिसने अपने निकम्मे पति के कर्जे उतारे। जिसने पति के घर सुख-आराम नाम तक को ना देखा, फिर भी अपने पति की माँ की सत्रह साल तक सेवा की; उसके बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा किया। सत्रह साल तक अपने पति की प्रतीक्षा में बिता दिये। वो एकाएक उस पति को पाकर कितनी खुश होगी? कुछ ने औरत की महिमा में वेद-पुराणों की कुछ कथाएँ तक दोहरा डालीं।
काफी प्रतीक्षा के बाद बन्ती आती हुई दिखाई दी। लोग बड़ी बेसब्री से उसकी ओर दौड़े और उसे घेरकर बड़ी बेताबी से उसे बताने लगे—तेरा पति लौट आया है!
क्षणांश में जाने क्या कुछ बीत गया उस पर। अपने-आप पर काबू न रख सकी और फूट पड़ी वह। सभी उसे धैर्य बँधाने लगे। सफेद और लम्बी दाढ़ी वाले ने कहा—
"ऊपरवाले का शुक्र मना, आखिर उसने तेरी सुन ली। अब तेरे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।"
एकाएक बन्ती का चेहरा खीझ और झुँझलाहट से विकृत हो आया था। वह चीखी, "इसे कहो ये जहाँ से आया, वहीं फिर वापिस लौट जाये वरना मैं इसका खून पी जाऊँगी!"
हैरान रह गये सभी गाँववाले। वो औरत जिसने अपने पति के छोड़े हुए कर्ज़े चुकाये। सत्रह साल तक उसकी बीमार माँ की सेवा की, वही औरत अपने पति के लौट आने पर उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं...
"इस आदमी को यहाँ से धक्के मार-मारकर भगा दो...ये पहले मेरा ना हुआ, अब क्या होगा? मैं अब इस पर विश्वास कैसे कर लूँ...?"
काफी समझाने-बुझाने के बावजूद बन्ती ने अपना फैसला नहीं बदला। सफेद और लम्बी दाढ़ीवाले ने उसे आगे पड़ी पहाड़-सी जिन्दगी के बारे में ठण्डे दिमाग से सोच लेने की सलाह दी तो वह उस बुजुर्ग पर खीझ पड़ी, "ये किस कायदे में लिखा है कि औरत को जानबूझकर धोखा खाना ही होगा? खाते ही रहना होगा। जानबूझकर मक्खी निगलनी ही होगी। आपको तो पता ही है ना? कल्लू कुम्हार ने तो अपने बेटे की बहुत पहले कहीं दूसरी जगह शादी कर दी थी। उन्हें क्या फर्क पड़ा? और इसने उधर सुख देखा तो उधर भाग गया। जब मन भर गया तो लौट आया। मैंने सत्रह साल जो पहाड़-से दिन और काली रातें काटी हैं, मैंने सत्रह साल जो दण्ड भोगा वो इसने मुझे किस जुर्म के लिए दिया? उनका हिसाब कौन देगा? कौन लौटायेगा मेरी जिन्दगी के वो सुनहरे दिन? और वे कल्लू कुम्हार की बहू जो इसके साथ भाग गयी थी...?"
"हाँ-हाँ...उसका क्या हुआ?"
"वो भी लौट आयी है क्या?" बहुत बेसब्री से पूछा लोगों ने।
"हाँ! मुझे अभी रास्ते में पता चला कि लौट तो आयी थी पर उसके घर और आसपासवालों ने पत्थर मार-मारकर उसे भगा दिया? और आप लोग यहाँ उसके सत्कार और स्वागत में जुटे हैं? जो गुनाह उस औरत ने किया था वही इसने भी किया था बल्कि इसका गुनाह उससे भी ज्यादा बनता है। फिर उसे सजा और इसे...? ये फर्क क्यों?"
किसी के पास उसके सवाल का जवाब नहीं था। वह अपना सवाल बार-बार दोहरा रही थी, "ये फर्क क्यों?"
जवाब ना पाकर वह मन्नू को बुलाकर उसके साथ अपने घर में जा घुसी और दरवाजा बन्द करती हुई बोली, “तो फिर अपना ये उल्टे-सीधे कायदे-कानूनवाला वो कायदा ले जाओ। ऐसे उल्टे-सीधे कानूनोंवाला कायदा फाड़कर फेंकना होगा। अपने ये दण्ड-विधान बदल लो।”
घर का दरवाजा बन्द करके बन्ती काफी देर तक अपनी हालत और किस्मत पर रोती रही। मन्नू उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा। माँ के आँसू पोंछते-पोंछते उसकी अपनी आँखों में आँसू आ गये थे।
लोगों का जमावड़ा उनके घर के बाहर ही था। बाहर से आवाजें आ रही थीं—
“देख तो...औरत होके ऐसी मजाल...?”
“मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि बन्ती जैसी असील गाय ऐसे सींग दिखायेगी...”
“हद हो गयी।”
“इसमें ऐसी कोई अनोखी बात नहीं है। सत्रह साल से वो औरत अन्दर-ही-अन्दर घुटती रही है...उसके अन्दर बरसों का गुबार जमा है। गुस्सा तो आना ही हुआ। कुछ देर में सब ठीक हो जायेगा। जरा उसका गुस्सा ठण्डा होने दो।”
काफी देर तक वे अपने-अपने अनुभवों के किस्से सुना-सुनाकर खुद को गौरवान्वित अनुभव करते रहे—औरत जात की अक्ल जिधर उलट जाये...वो सन्तोख सिंह भी तो सोलह साल बाद लौटा था...उसकी घरवाली तो खुशी से पागल हो गयी थी और ये...!
मर्द को तो देस-परदेस जाना ही पड़ता है...रोज-रोज परदेस से लौटना क्या आसान है? देर हो जाये तो क्या घरवालियाँ ऐसा बर्ताव करेंगी?
साधुओं के चक्कर में पड़कर अमृतलाल बाईस साल बाद लौटा था...कितनी आवभगत हुई...और ये...
बन्ती भी ऐसी नहीं...समझाने से समझ जायेगी...
लम्बी और सफेद दाढ़ीवाले बुजुर्ग को समझाने क्या भेजा गया, वे लौटे तो उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। झुँझलाहट और गुस्से में उनके हाथ-पैरों के साथ-साथ दाढ़ी भी काँप रही थी, बहुत बेसब्र थे सब ये जानने के लिए कि क्या हुआ?
“होना क्या है जी...ये बन्ती तो बड़ी कुत्ती रन्न है...मैंने उसे क्या समझाना था उसने तो उल्टा मेरी माँ-बहन सब एक कर दी...बोली, मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूँगी। तेरे चमूणे ज्यादा लड़ रहे हैं तो तू उसे अपने घर ले जा... तेरे घर में भी बेटी होगी... चुप करके चला जा यहाँ से वरना दाढ़ी पुट के तेरे हाथ में दे दूँगी...!"
हैरान रह गये सब—औरत होके उसने ऐसा कहा? गाँव के बुजुर्ग का भी शर्म-लिहाज नहीं किया? ऐसा कभी ना देखा, ना सुना... अब सवाल गाँव की नाक का भी आ गया था। थोड़ी देर पहले उन्हें उससे जो सहानुभूति-सी रही थी उसकी जगह क्षोभ और गुस्से ने ले ली थी। उसका दुस्साहस उनसे बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था—बन्ती की ये मजाल?
कुछ भी हो धरमू आखिर उसका पति है...
सबक सिखाना पड़ेगा सालों को... नहीं तो गाँव के मर्दों की क्या इज्जत रह जायेगी... और गाँव की औरतों पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा...
काफी देर तक वे आपस में सलाह-मशविरा करते रहे कि उसे सबक कैसे सिखाया जाये। लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके।
धरमू को मुँह लटकाकर बैठा देखकर एक आदमी ने कहा, "अबे तू क्या एकदम नामर्दों की तरह बैठा है? ये फददूपा छोड़ और कुछ मर्दानगी दिखा..."
"हाँ-हाँ... इसे भी भेजो। आखिर ये उसका पति है। प्यार से... अधिकार से, मनुहार से कैसे भी उसे मनाये। इसे नजदीक देखकर वो वैसे ही पिघल जायेगी नहीं तो... अब भइया तुझे अपनी मर्दानगी तो दिखानी ही पड़ेगी..."
हँसते-हँसते दोहरे होने लगे सब।
"दोनों मर्द-औरत को अन्दर बन्द कर दो, बस समझो सारा झंझट खत्म..."
सबको पसन्द आयी ये सलाह। काफी देर तक वे दरवाजा खटखटाते रहे। बन्ती ने दरवाजा ही नहीं खोला।
दरवाजे का भड़भड़ाना बन्द नहीं हुआ तो मन्नू से रहा नहीं गया। उसने झुँझलाकर दरवाजा खोला, "क्या बदतमीजी है ये?"
दरवाजे के खुलते ही लोग जैसे टूट पड़े। उन्होंने मन्नू को खींचकर बाहर निकाला और धरमू को अन्दर धकेल दिया और कुटिल हँसी हँसते हुए बोले, "जा ओये! मर्द बन और दिखाई दे अपनी मर्दानगी..."
बात के अश्लील अर्थ पर सभी बुरी तरह ठहाने लगे।
तड़पकर मन्नू चीख उठा, "शर्म करो... तुम्हारी भी माँ-बहन..." लेकिन किसी ने उसके बोलने की परवाह नहीं की। वह चिल्लाता रहा। उसे ले जाकर एक पेड़ के साथ बाँध दिया गया।
अच्छा-खासा तमाशा हो रहा था गाँव में। सभी एक-दूसरे की तरफ देखते और हँस पड़ते। एक औरत और एक मर्द को अन्दर बन्द करके खुद पहरा देनेवाले वे मर्द अपने किये पर खुद ही जैसे मुग्ध थे। अन्दर क्या हो रहा होगा यह सोच-सोचकर वे रोमांचित हो रहे थे।
सत्रह साल की रुकी हुई है बेचारी...एकदम से टूट के पड़ जायेगी... हँस-हँस के दोहरे होने लगे सब।
हाय...इस महामिलन को हम देख तो नहीं सकते पर सुन तो सकते हैं ना... कुछ लोग बन्ती के दरवाजे और खिड़की पर कान लगाकर कुछ सुन पाने का प्रयास करने लगे। तेज झड़प...पर अस्पष्ट-सी आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। लगता है अभी प्रेमालाप ही चल रहा है...
जो औरत नखरे ना दिखाये वो भी किस काम की? इसी में तो मजा है... थोड़ा सब्र रखो...थोड़ी ठण्ड खाओ...इतना बेसब्र तो वो धरमू भी नहीं होगा। वो बुजुर्ग जो अब तक अपनी उम्र का ख्याल करके दबी हँसी हँस रहे थे वो भी अब खुलकर हँसने लगे थे। सबकी नजरें बन्ती के मकान पर टिकी हुई थीं जैसे वो कोई सिनेमा का पर्दा हो और जो कुछ पर्दे के पीछे हो रहा था उसकी अलग-अलग काल्पनिक छवियाँ सबके दिमाग पर बन-बिगाड़ रही थीं।
तुम लोग मुझे भी उनके साथ अन्दर बन्द कर देते तो मैं तुम्हें खिड़की से आँखों देखा हाल सुनाता...हाय काश, मैं अन्दर होता...!
उधर पेड़ से बँधा मन्नू चीख-चीखकर उन्हें बुरा-भला कह रहा था पर वे उल्टा उस पर भी हँसने लगे थे—तसल्ली रख यार—हम तो उल्टा तेरे भाई या बहन की तैयार करवा रहे हैं और तू हम पर ही गुस्सा कर रहा है...
हँसी ठट्ठा जारी था। तभी जस्सा दौड़ता हुआ आया, "तुम्हें पता है...वो कल्लू कुम्हार की बहू जो धरमू के साथ भाग गयी थी, उसकी लाश उधर बलवन्त के घर से थोड़ा आगे पक्की सड़क के किनारे पड़ी है...कोई बड़ा पत्थर उसके सिर पर लगा होगा। लगता है दिमाग की कोई नस फट जाने से उसकी मौत हुई है..."
क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गये। जैसे मौत उन्हीं के सिर पर से मँडराती हुई गुजर गयी हो।
ऊपरवाला जो करता है, अच्छा ही करता है...जिन्दा रहती तो जाने क्या-क्या देखना पड़ता उसे...?
वो साली आयी किस ख्याल से थी? क्या सोचा था उसने कि सब लोग उसका स्वागत करेंगे...
जैसी करनी, वैसी भरनी...
माहौल एकबार फिर से हल्का हो गया था।
ओ देख वई, अपने हीर-राँझे का खेल पूरा हुआ कि नहीं...खिलखिलाहट एकबार फिर से गूँज उठी।
लेकिन अन्दर महामिलन नहीं, महायुद्ध हो रहा है।
अन्दर से दोनों के लड़ने-झगड़ने की आवाजें आ रही थीं। माहौल एकदम भारी हो गया था। चटाक-पटाक चीजों के गिरने-टूटने की आवाजों से जाहिर था अन्दर हाथापाई हो रही है। बुजुर्गों को लगा कि अब उन्हें बीच-बचाव के लिए अन्दर होना चाहिए। वे दरवाजा खटखटाने लगे, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। फिर बन्ती की एक लम्बी चीख के बाद सबकुछ शांत हो गया। वे चुप्पी सबके दिलोदिमाग पर चील-कौवों की तरह मँडराने लगी थी।
एकाएक धीरे से दरवाजा खुला। सामने खून से सने अपने हाथों को दीवार से पोंछता हुआ धरमू खड़ा था। उसे वहीं खड़ा छोड़कर धड़ाधड़ लोग अन्दर घुसने लगे। देहरी पार करके वे आँगन में पहुँचे तो बन्ती आँगन में लगे हैंडपम्प के पास ढेर पड़ी हुई थी। धरमू की जोर-जबरदस्ती में बन्ती का सिर हैंडपम्प से जा टकराया होगा और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया होगा। यह समझने में लोगों को देर नहीं लगी थी। थर्राकर रह गये थे सभी। वो तमाशा अब एक हादसे में बदल चुका था। उनकी हँसी-ठट्ठा किसी बेकसूर की इस तरह जान ले लेगा और उसने पहले शायद ये सोचा ही नहीं था।
पकड़ो...पकड़ो...धरमू फिर खिसक रहा है...वो भागा...पकड़ो...
सुनते ही लोग भागे और कुछ ही देर में उन्होंने धरमू को धर दबोचा।
बुरी तरह चिल्ला रहे मन्नू को भी खोल दिया गया। माँ का मरा मुँह देखकर उसने पागलों की तरह चीख-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लिया था। उसे इस कदर बुरी तरह रोते-बिलखते देखकर गाँववाले भी थर्राकर रह गये थे।
कुछ ही देर बाद आयी पुलिस को अपना बयान लिखवाते हुए मन्नू चीख-चीखकर कह रहा था—मेरी माँ का कत्ल इन सबने किया है...इन सबका नाम लिखो...धरमू...हरनामसिंह...चमनसिंह...सरदारीलाल...दर्शनसिंह...इन सभी तमाशबीनों के नाम भी लिखो...तमाशे का मजा लेनेवाले, उस हत्यारे से भी बड़े मुजरिम हैं...देखो इनकी दाढ़ियाँ...इनके कुर्ते, इनके हाथ-मुँह सब खून से रंगे हुए हैं...निकलवाओ इनसे वो कायदा जिस पर लिखे सारे कानून और सारे अक्षर बेकसूरों के खून से, धब्बों से ढके जा चुके हैं।