Prem Pallavi - 2 in Hindi Love Stories by Satveer Singh books and stories PDF | प्रेम पल्लवी - 2

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प्रेम पल्लवी - 2

    सुबह की ताज़ा धूप सुकुमार कलियों के साथ खेल रही थी। हवा का प्रवाह धीमा था और उसमें फूलों की सुगंध घुली थी। उस ठंडी नसीम में सुबह की ताज़गी भरी थी; वह जिस तरफ़ से निकलती, उस तरफ़ के पेड़ों की कलियाँ खिल उठतीं। उस हवा के झोंके का स्पर्श इतना नन्हा, कोमल और शरारती था कि कान में ऐसी गुदगुदी करता कि मन खिल उठता!

    मैं उठा ही था कि पिताजी ने दो हज़ार रुपये मेरी जेब में डालते हुए कहा, "ये रुपये दीनदयाल को दे आओ।" मैं कारण पूछता, उससे पहले ही उन्होंने कहा, "घर में सब्ज़ी का तेल नहीं है और दीनदयाल आज शहर जा रहा है, तो उसी से मँगवा लेते हैं।"

   "जी!" मैंने कहा।

    भोर अभी हुई ही थी और इतनी सुबह-सुबह किसी के घर का दरवाज़ा खटखटाना मुझे अच्छा नहीं लगा। इसलिए मैं घर से थोड़ा दूर जाकर बैठ गया; घर से बस उतना ही दूर था, जहाँ से पिताजी की नज़र मुझ पर न पड़े। पंडित जी का घर भी कोस भर दूर नहीं था, पास में ही था। इतने में मेरी नज़र विनय सिंह पर पड़ी। मैं वहाँ से निकलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे पुकार लिया, "इतनी फ़ुर्सत लाते कहाँ से हो, जो सुबह-सुबह यहाँ आकर भोर निहारने लगे? या धूप सेंकने की आदत अभी गई नहीं?" उसने कुछ मज़ाकिया लहज़े में कहा।

   "पहले निज पर शासन, फिर दूसरों पर अनुशासन," मैंने कहा, और वह झेंप गया। "इतने तड़के घर से निकले हो तो कुछ काम ही होगा?" विनय ने पूछा।

   "हाँ!" मैंने कहा, लेकिन यह नहीं बताया कि मैं पंडित जी के घर जा रहा हूँ; नहीं तो न जाने कितने प्रश्न और शंकाएँ इसके मन में जंगली घास की तरह उग आएँगी।

   "क्या काम था?" विनय ने फिर पूछा।

     मैं झल्ला उठा! "यार! तुम आदमी हो कि पजामे? यह भी कोई तरीक़ा होता है कुछ पूछने का—कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो, क्या काम था, किससे काम था?"

   "अच्छा भाई! मैं ही चला जाता हूँ, तुम क्यों परेशान होते हो," और वह उठकर चला गया। मैं भी पंडित जी के घर की ओर चल दिया।

    रात की वह सुनहरी घटना मेरे मन में अभी तक वैसे ही चल रही थी। हो सकता है कि वह घटना उसके दिमाग में भी चल रही हो। फिर एक टक रुककर सोचा—घटना भी क्या थी? उसका अचानक मुझे और विनय को देखकर ठिठक जाना। और अब उसके घर जाऊँगा तो वह सोचेगी कि मैं उसे ही देखने आया हूँ। खैर! जाना तो पड़ेगा ही। इसी कशमकश में मैं पंडित जी के घर पहुँच गया। 

    घर की फ़िज़ा में एक कशिश थी, जादू था! दीवार के पास-पास क्यारियाँ बनी थीं और उनमें फूलों के पौधे लगे थे। सुबह की ताज़ा, ठंडी नसीम उन कच्ची, कुँवारी सुकुमार कलियों से खेल रही थी और फूलों पर ताज़ा धूप बिखरी हुई थी। लॉन की घास पर शायद किसी ने अभी-अभी पानी दिया था, वह पूरी तरह गीली थी। इतने में एक कोमल आहट मेरे कानों में पड़ी। किसी ने कहा, "नाना, कोई आया है।" 

    यह आवाज़ पल्लवी की थी। वह पीली फ्रॉक पहने बरामदे में खड़ी थी। उसने बालों को जूड़े में बाँध रखा था, लेकिन एक भीगी लट उसके होठों का चुंबन ले रही थी। चेहरा गोरा था और धूप से उसका रंग और निखर रहा था। बस, माथे पर एक बिंदी नहीं थी।

    वह मेरी तरफ़ आ रही थी और एक मनमोहक महक भी उसके साथ आ रही थी। वह महक इत्र की थी। उसने आकर सकपकाए स्वर में कहा, "नाना भीतर बुला रहे हैं।" मैं अंदर चला आया। दीनदयाल जी सोफ़े पर बैठे चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे। बोले, "आओ प्रेम, बैठो।" और मैं भी बैठ गया।

    इतने में पल्लवी चाय ले आई। उसने चाय का कप मेरे सामने रखा और दीनदयाल जी को चाय देने लगी। 

   "इसे जानते हो प्रेम?" दीनदयाल जी ने मुझसे पूछा।

मैंने कुछ झेंपते हुए कहा, "पल्लवी!"

   "और तुम पल्लवी? तुम जानती हो इसे?"

    उसने भी कुछ हिचकिचाहट के साथ 'हाँ' कहा। मुझे मन ही मन बड़ी खुशी हुई कि यह मुझे पहचानती है। युगों पहले देखा था इसने मुझे, तब मैं नर्सरी में पढ़ता था।

   "याददाश्त बड़ी दुरुस्त है तुम लोगों की," पंडित जी ने कहा। पल्लवी बिना मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए वहाँ से चली गई। वह झेंपकर गई या अनायास ही चली गई, यह मैं नहीं कह सकता। मैं भी रुपये देकर निकल आया। बाहर विनय सिंह मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने माथा पीट लिया।

   "कहो, कैसी रही प्रथम भेंट?" विनय ने मुस्कुराते हुए कहा।

   "अच्छी रही।"

   "अरे! मैं परम मित्र हूँ, तेरी रग-रग से वाक़िफ़ हूँ और तुम मुझी को बना रहे थे? आओ चलो, बताओ कि बात कहाँ तक बनी।"

    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "पहचानती तो है।"

   "तब तो अच्छा है। शाम को मंदिर आएगी?" विनय ने पूछा।

   "शायद आ जाए," मैं बोला।

   "अच्छा! मैं दूर से ही सुन लूँगा, पास नहीं आऊँगा," विनय ने चुटकी ली।

मैं झल्ला उठा, "क्यों? मैं वहाँ भजन गाऊँगा जो तुम सुनोगे?"

वह बड़ा भोला चेहरा बनाकर बोला, "मुझे प्यार करना सीखना है।"

   "लेकिन तुम्हारे पास प्यार करने की फ़ुर्सत कहाँ! क्या करोगे सीखकर?" मैंने कहा, और वह मेरी वाकपटुता से हार गया। बोला, "ठीक है, लेकिन बताते रहना।"

   "लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ आया हूँ?"

   "जब तुम झल्ला रहे थे, तभी मुझे लगा कि दाल में कुछ काला है। लेकिन यहाँ आकर पता चला कि पूरी दाल ही काली है," विनय ने मुस्कुराते हुए कहा और हम दोनों घर की तरफ़ आ गए।

    शाम ढल रही थी और एक-एक क्षण बड़ी कठिनाई से बीत रहा था। प्रतीक्षा में क्षण भर भी युग के समान लगता है। न जाने क्यों समय इतना धीमा हो जाता है और कभी-कभी तो ठहर-सा जाता है। शायद समय की गति धीमी नहीं होती, मन की व्याकुलता उसे धीमा कर देती है।

    वृक्षों का रंग गहराने लगा, रात की काली छाया उन पर बिछने लगी। दिन भर की कर्कश आवाज़ें गहरी शांति में बदलने लगी थीं, लेकिन मन में उथल-पुथल थी। बाहर जितनी शांति होती, भीतर उथल-पुथल उतनी ही बढ़ने लगती। मंदिर की आरती हो गई थी और मैं निराश होकर उसी उपवन में लौट गया और बेंच पर बैठ गया।

    मुझे बैठे करीब पंद्रह मिनट ही हुए थे कि दो लड़कियाँ मेरे सामने वाली बेंच पर कब आकर कब बैठ गईं, मुझे पता ही नहीं चला। मैंने चौंककर देखा—अरे! यह तो पल्लवी है। लेकिन श्याम कहाँ है? फिर सोचा, यहीं होगा आसपास। मन की उथल-पुथल छूमंतर हो गई थी, लेकिन हृदय का स्पंदन तेज़ हो गया था। ज्यों ही उसके अधरों से वह मृदुल स्वर फूटता, त्यों ही हृदय की धड़कन  बढ़ जाती; जैसे उसके सारे संवाद पास बैठी लड़की के लिए नहीं, बल्कि मेरे लिए हों। 

    पंद्रह-बीस मिनट के बाद वे दोनों चली गईं। उनके पीछे-पीछे मैं भी चला आया, लेकिन पल्लवी अभी भी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी किसी की राह देख रही थी। मेरे आते ही वह कुछ हिचकिचाती, कुछ झेंपती हुई बोली, "आज श्याम नहीं आया और मुझे घर जाने में थोड़ा डर लग रहा है, तो क्या आप घर तक छोड़ आएँगे?"

   "हाँ बिलकुल, चलो," मैंने कहा।

    और हम दोनों घर की तरफ़ चल दिए। वह भी कुछ झिझकती, झेंपती और लजाती हुई मेरे साथ-साथ चलने लगी। यह पहला सफ़र था जो हम दोनों को साथ तय करना था, और शायद इसीलिए श्याम आज साथ नहीं आया था—यह बात मुझे देर से समझ आई।


मेरी बस यही अभिलाषा है। कि मैं यह जान पाऊँ कि मेरी यह कहानी आपको कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे। अगला भाग जल्द ही आ जाएगा।

धन्यवाद