दो शब्द।
बहुत सोचने के बाद भी मुझे कुछ नहीं सुझा इसलिए यह कविता लिख रहा हूँ
और फिर….
प्रेम परिणय तक नहीं पहुँचता!
वह रह जाता है….
उस ललित कुंज के उपवन में,
स्मृति बन….!
जहाँ नयनों से नयन मिलें थे,
चंद्र की दीप्ति में कुसुम खिले थे।
वह ललित उपवन बीहड़ बन जाता….!
प्रेम फिर परिणय नहीं बनता,
वह स्मृति बन जाता
सत्यवीर सिंह जेतुंग
प्रेम पल्लवी-१
सूरज डूबने में कुछ क्षण शेष थे, सुनहरी किरणें पश्चिम के क्षितिज पर बिखरी नज़र आ रही थी। हवा के झोंके अपने मंद प्रवाह के साथ फूलों की महक ला रहे थे। उन झोंकों में महक भी थी और शीतलता भी। चैत की उदास, शांत और मासूम-सी शाम थी। मैं धीरज के साथ मंदिर के बाग़ में बैठा था।
दिल कुछ भारी था और मन कुछ उदास था। एक अजीब-सा खालीपन लग रहा था, हृदय में एक टीस-सी उठ रही थी। समय के प्रवाह के साथ सुकून कहीं बह गया था। वसंत की उपस्थिति के बाद भी सब रूखा और निरस-सा लग रहा था।
जब मन भारी होने को होता और खालीपन सांप की तरह टसने लगता तो मैं यहाँ इस बगिया में आ जाता हूँ और यहा उपवन अपने अनुराग भरे आलिंगन से मेरा अभिवादन करता है। लेकिन वह अधूरी स्मृतियाँ मुझे यहाँ भी खोज लेती हैं; यह स्मृतियाँ इसी उपवन में अंकुरित हुई थीं, वह यहाँ का पता जानतीं हैं। यहाँ से ऊबने के बाद मेरे पास ऐसी कोई जगह शेष नहीं रहती जो मेरे इन चिरस्थायी ज़ख्मों को भर सके। खैर! भर तो यह बगिया भी नहीं सकती लेकिन यहाँ आकर कुछ अच्छा लगता, यहाँ आने वाली उदासी भी अच्छी लगती है।
डूबते सूरज की अलसाई किरणों को देखते हुए मैंने धीरज से पुछा, "मेरे एक प्रश्न का उत्तर दोगे धीरज?"
"हाँ बिल्कुल। पूछो क्या पूछना है?" धीरज ने कहा।
"तुम प्रिया से कितनी देर बातें करते है?"
वह मुस्कुराते हुए बोला, "दो-तीन घंटे।"
"इतने देर क्या बातें करते हो?"
"बुरा मत मानना प्रेम, लेकिन सब बातें बताने की नहीं होती!" उसने कहा और वह पास लगे मधुमालती के फूल को तोड़ने के लिए खड़ा हुआ।
"भविष्य की कल्पनाएँ की हैं कभी?"
"यार, मैं तो भविष्य ही खोया रहता हूँ कि कब मिलूँगा उससे, कब बात होगी और कब हम शादी करेंगे।" उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मैंने मन-ही-मन सोचा—कितनी निराधार होती हैं प्रेम में की गई कल्पनाएँ, जो कभी यथार्थ का धरातल नहीं देखती। लेकिन वही कल्पनाएँ स्मृति बन डसती अवश्य रहती हैं। मैंने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस खींची। मेरे मानस पटल पर जैसे एक चलचित्र उभर आया और चलने लगा।
अंधेरी रात, बिजली तड़प रही थी और बारिश की हल्की बूंदे गिर रही थीं। आँधी के तेज़ झोंके उन बूंदों को अपने साथ उड़ाते ले जा रहे थे। पल्लवी मेरे पास बैठी थी, इतनी पास कि उसके हृदय का स्पंदन मुझे महसूस हो रहा था। वह रो रही थी और उसके रोने कि वजह थी उसका अपना विवाह। वह जो कल्पनाएँ हम पिछ्ले चार सालों से कर रहे थे, वह आज सिध्दांतों और परंपराओं से टकराकर चूर हो गई थीं और आँसुओं में बह रही थीं।
मैं खामोश था, मैं रो नहीं सकता था मुझे रोने से कोई रोक रहा था; शायद मेरा पुरुष होना मुझे रोक रहा था या मैं यह सोच के नहीं रो रहा था कि पल्लवी को चुप कोन कराएगा। इस घटना से भी हम दोनों अवगद थें, हम जानतें थे कि यह आँसु बहेंगे। फिर भी न जाने क्यों हम उन सुनहरी कल्पनाओं को हकीक़त मान बैठे!
जितनी सुखद स्मृति होती है, वह उतनी ही पीड़ा देती है। आँखें रोना भूल जाती है। कहते हैं वक्त मरहम बन, हर ज़ख्म को भर देता है लेकिन यह पीड़ तो जीवन भर डसती रहती है।
मुझे याद है वह खुशनुमा शाम, वह भोला और मासूम चेहरा। जो चार वर्ष पहले मुझे इसी मंदिर के उपवन में देवलोक के सुनहले कुसुम की तरह खिला हुआ नज़र आया था। उसकी मासूमियत और भोली सूरत को देखने के बाद शायद मैं सब भूल गया था। और अब तो यह अपरिचित चेहरा जैसे हर शाम की जरूरत बन गया है।
ग्यारहवीं की परीक्षाएं पूरी हो गई थी, मार्च का महीना था। मैं हर शाम मंदिर के पास वाली उस बगिया में आ जाता जो गाँव से थोड़ी बाहर है, लेकिन मेरे घर से काफी दूर।
वसंत के मौसमी फूलों की सुगंध शाम की मनमोहक हवा में घुलकर सांसों के सहारे हृदय में उतरती तो जैसे लगता कि सुकून बस यहीं है। उड़ते पक्षियों का सुरीला और मंत्रमुग्ध कर देने वाल वह स्वर दिन भर की थकान और बोझ को उतार देता। इसलिए यह बगिया मुझे पसंद है।
मैं बेंच पर बैठा उन शरारती पक्षियों का सुरीला गीत सुनी ही रहा था कि विनय आ गया और बोला। "क्यों! घर में कुछ काम नहीं रहता, जो यहाँ आकर बैठ जाते हो?" और वह पास आकर बैठ गया।
"काम क्यों नहीं रहता, बहुत काम रहता है।"
"तो इस मनमोहक ऋतु में प्रेम अंकुरित करने आते होंगे?" विनय ने हँस कर कहा।
"प्रेम हृदय की उपज है, ऋतु का प्रभाव उस पर नहीं होता और उसका अंकुरण सूर्य की किरणें नहीं मांगता।" मैंने कहा।
"बशर्त यही है कि आदमी के पास फुर्सत होनी चाहिए।" उसने हँसते हुए कहा। "खैर! अब बता भी दो कि किस मृगनयना के नयनों ने तुम्हें डूबा लिया?"
"कोई नहीं है भाई!" मैंने कुछ झल्लाकर कहा।
इतने में एक छोटा-सा लड़का दोड़ते हुए हमारे सामने से निकला और उसके पीछे एक सुरीली, मनमोहक आवाज़ आई। किसी ने लड़के को पुकारा। "श्याम, वापस आ जाओ। घर चलना है, देर हो रही है।"
मैंने दाईं ओर देखा। एक लड़की अपना आँचल संभाले हुए तेज कदमों से हमारी ओर ही आ रही थी। "यह कोन है?" मैंने पूछा।
"क्या पता!" विनय ने कहा।
एका-एक मुझे कुछ याद आ गया। "अरे! यह तो पल्लवी है। दीनदयाल जी है न, पंडितजी उनकी नाती है।"
"अच्छा! तुम कैसे जानतें हो?" विनय ने कुछ अजीब स्वर में कहा।
मैंने वातावरण की गंभीरता को भापा और चुप हो गया और अपने को कुछ बचाते हुए बोला। "मैं जानता हूँ इसे बचपन से।"
मैंने देखा लड़की वहीं रुक गई थी। शायद हम आगे थे या उसकी सांस फूल गई होगी। लड़का भी रुक गया था और बीना शरारत के वापस आ रहा था।
मैं भी बेंच से खड़ा हो गया और बोला। "अच्छा विनय सिंह, मैं चलता हूँ; देर हो रही है।" उसने भी मुस्कुराते हुए कहा। "कल मिलते हैं।"