कमल चोपड़ा
झुग्गी के अन्दर जगह कम थी। वे कुल चार जने थे। तीन अन्दर घुस आये थे। एक बाहर ही खड़ा रहा था। घुसते ही उन्होंने जयसुखलाल से तीन हजार रुपये माँगे। सुना-अनसुना सा करते हुए जयसुखलाल ने कुछ जवाब नहीं दिया। ज्यों-का-त्यों बैठा रहा। अपने शब्द दोहराते हुए उन्होंने फिर से उससे पैसे माँगे। किसी ढीठ की तरह बीड़ी निकालकर सुलगाने लगा। वे माँ-बहन की गालियों पर उतर आये। जयसुखलाल पर किसी तरह का असर ना देखकर उनमें से एक ने चाकू निकालते हुए कहा, “आज तो हम तीन हजार लेकर ही जायेंगे वरना...”
झुँझलाते हुए जयसुख ने साफ-साफ कह दिया कि उसके पास तीन हजार छोड़...तीन कौड़ी भी नहीं हैं। जब हैं ही नहीं तो दे कहाँ से!
कनकटे के जैसे चिंगारी लग गयी, “साले मादर...झुग्गी में तो चौड़ा होके ऐसे बैठा है जैसे तेरे बाप की हो! पैसे ही नहीं हैं, पैसे नहीं हैं। फेंको साले का भग-भोसड़ा उठाके बाहर। सफेद कुर्तेवाले टुना ने उसे शांत करते हुए थोड़ा संयत लहजे से जयसुख को समझाने की कोशिश की, “देख, तू सीधी तरह पैसे दे दे। कलिराज प्रधान ने कहा है कि पैसे लेकर ही आना। आज तो हम पैसे लिए बिना नहीं जायेंगे।”
एकदम गूँगा पत्थर-सा बना रहा जयसुख। एक शब्द भी नहीं बोला।
कालेभुसुंड ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए कहा, “एक साल से ऊपर होने को आया। तूने यह झुग्गी प्रधानजी से छह हजार रुपयों में खरीदी थी। तीन हजार तूने उस वक्त दे दिये थे। हमने तुझे झुग्गी का कब्जा दे दिया। बाकी के तीन हजार रुपये तूने दो-तीन महीने बाद देने का वायदा किया था। हमने कहा चलो कोई बात नहीं, तीन महीने बाद तूने कहा मेरे पास पैसे हैं नहीं। मेरा काम छूट गया। ये हो गया वो हो गया। हमने दो-चार महीने की मोहलत दी कि चल ऐसा कर जब तक तू बाकी के पैसे न दे पाये तब तक तू हमें झुग्गी का किराया ही देता रह। किराया सात सौ रुपया बनता था। चल तू पाँच सौ रुपया देता रह, कुछ महीने तूने किराया दिया फिर वो भी देना बन्द कर दिया। अब साले न तू इस झुग्गी का मालिक है और न किरायेदार! और न ये झुग्गी तेरे बाप की है। तो...अब या तो पैसे निकाल या तू ही बोल तू चाहता क्या है!”
उन्हें थोड़ा-सा शांत देखकर जयसुख झुँझलाया, “जब मेरे पास हैं ही नहीं तो दूँ कहाँ से! किसी की मजबूरी भी तो देखनी चाहिए। साल से काम-धंधा है नहीं। जब होंगे पाई-पाई का हिसाब कर दूँगा।”
लोहे के ट्रंक की नुक्कड़ के पास पड़ी दारू की थैली पर कालेभुसुंड की नजर पड़ी तो लपककर उसने खोलकर मुँह को लगा ली—दारू-मीट की तो खूब ऐश हो रही है।
किलसकर रह गया वह। मीट के पकने की खुशबू तो साथवाली झुग्गी से आ रही है। यहाँ तो खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। देख लो डिब्बे-कनस्तर सब खाली हैं।
थैली खाली करके बाहर फेंकता हुआ कालाभुसुंडा बोला, “चल ठीक है। अब तू बता चाहता क्या है।”
जसमती पानी भरने गयी हुई थी। लौट रही थी तो झुग्गी से आती हुई ऊँची-ऊँची आवाजें उसे दूर से ही सुनाई दीं। दौड़कर वह अपनी झुग्गी पर पहुँची तो देखा, तीन हट्टे-कट्टे आदमी उसके पति को बुरी तरह पीट रहे हैं। चौथा हाथ में चाकू लिए खड़ा उसे पिटता हुआ देखकर हँस रहा था।
बुरी तरह चीखने लगी वह।
कनकटे ने अपना सस्ता-सा प्लास्टिक का जूता उतारकर जयसुख के कान के नीचे मारा।
“मार दिया, मार दिया!” बिलबिलाता हुआ वह नीचे बैठ गया। टुने ने उसकी पीठ पर पैर रखकर उसे आगे को ठेल दिया। वह औंधे मुँह जा गिरा। मौका देखकर कनकटा उसके पेंदे पर जूते मारने लगा।
“हा आयी, हा आयी!” जयसुख बुरी तरह डकरा रहा था। पति को पिटता हुआ देखकर तड़फकर जसमती आगे बढ़ी। चाकूवाले ने उसे बाहर ही रोक लिया और गाली देते हुए पीछे धकेल दिया।
पति को पिटता हुआ नहीं देख पा रही थी। वह तो तड़फड़ाकर चीखने लगी, “अरे! मार दिया रे...मार दिया! कोई बचाओ रे...कोई है तो बचाओ रे...”
उसकी पुकार की तड़प ने आसपास की झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के दिलों की धड़कनों में एकबारगी विघ्न उपस्थित किया था। कुछ झुग्गियों के दरवाजे खुले फिर बन्द हो गये। शायद उन्होंने भी किसी के फटे में टाँग अड़ाकर खुद को परेशानी में ना डाल लेने की व्यावहारिकता इसी जमाने से सीख रखी थी। आवाजों से ही उन्हें पता चल गया था कि मामला जयसुख और कलिराज प्रधान के बन्दों के बीच है।
कलिराज प्रधान को किसी ने चुना नहीं था, लेकिन वह अपने-आपको उस झुग्गी बस्ती का 'प्रधान' बताता था। सरकारी जमीनों पर पुलिस की मदद से झुग्गियाँ डलवाकर कब्जे करना कल्ली प्रधान का मुख्य धन्धा था। अनगिनत झुग्गियाँ डलवा रखी थीं उसने इस बस्ती में। यहाँ तक कि हर पाँचवीं झुग्गी का मालिक कल्ली ही था, जिन्हें कि उसने किराये पर दे रखा था। इलाके के विधायक कृष्ण प्रताप के यहाँ उसका आना-जाना था। जिसके चलते उसे अपनी गुण्डागर्दी चलाने में थोड़ी सहूलियत मिल जाती। ज्यादातर लोग उससे पंगा लेने में कतराते थे और उसकी छोटी-मोटी ज्यादतियाँ तक बर्दाश्त कर जाते।
मदद की उम्मीद में जसमती की पुकार इधर-उधर टक्करें मार रही थी, “बचाओ-बचाओ रे! जालिम बदमाशों ने मार दिया रे! मार दिया...अकेला निहत्था मेरा घरवाला।”
बहुत पास-पास झुग्गियाँ, एकदम सटी हुईं। बीच-बीच में पतली-सी फट्टियों या कहीं-कहीं टाट का पार्टीशन। एक-एक झुग्गी में कई-कई लोग। कुल मिलाकर हजारों की आबादी, लेकिन मदद के लिए कोई भी आगे नहीं आया। जसमती ने पड़ोसियों को उनका नाम ले-लेकर पुकारा। लेकिन कोई प्रत्युत्तर नहीं। कुछ का दरवाजा खटखटाया पर कोई पीकर बेसुध था तो किसी की तबीयत खराब हो गयी थी। सब जैसे अपनी-अपनी बाँस-फूस-खपच्ची की कब्रों में दफन हो गये थे।
वैसे तो आसपास की झुग्गीवालों की एक की एक से नहीं बनती थी। रोजाना ही कोई-ना-कोई किसी-ना-किसी से बात-बेबात उलझा होता। लेकिन अपने-आपको जयसुख का लँगोटिया कहनेवाला हरनाथ सारा-सारा दिन उसके साथ बैठकर ताश खेलनेवाला जगराम और शाम को उसके साथ दारू पीकर उसके लिए जान देने की कसमें खानेवाला शिवराम, सभी पता नहीं इस वक्त कहाँ थे।
धीरे-धीरे तमाशबीनों की भीड़ बढ़ने लगी। उसकी तरफ से उनसे लड़ना तो दूर कोई बीच-बचाव के लिए भी आगे नहीं आया था।
बहुत बेरहम होकर पीट रहे थे वे लोग जयसुख को। थोड़ी दूरी पर खड़े लोग आपस में फुसफुसा रहे थे—अरे रे! लगता है आज तो ये लोग इसे मार ही डालेंगे। हाय-हाय रे मर जायेगा बेचारा!
बहरे बेदर्द पड़ोसियों की बुजदिली और बेरहम गुण्डों की हैवानी कसाई-गीरी की जीभर गलियाने और चीख-चीखकर श्रापने के बाद एकाएक जसमती के मुँह से निकला था, "पुलिस...कोई पुलिस को बुलाओ रे!"
शायद ही वहाँ कोई डरा हो पुलिस के नाम से। कल्ली प्रधान के आदमी तो ठहाठहाकर हँस पड़े थे। जसमती ने जैसे कोई मजाकिया जुमला फेंका हो। लापरवाही से हँसा कालाभुसुंडा—पुलिस क्या कर लेगी, थोड़ी ही देर पहले हम त्रिभुवन दरोगा के साथ ही खा-पी रहे थे। अभी वहीं से उठकर आ रहे हैं। पुलिस आ गयी तो उलटा उसीकी लेनदार हो जायेगी। देने को इनके पास कुछ है नहीं। उलटा वैसे पुलिस और तोड़ेगी...।
परिणाम सबको पता था। लोगों को ठीक ही लगी थी कालेभुसुंड की बात। कोई फायदा तो है नहीं पुलिस को बुलाने का। कोई नहीं दौड़ा पुलिस चौकी की ओर। यों पिटता हुआ नहीं देख पा रही थी जसमती अपने पति को—
“अरे! कोई तो बुलाओ पुलिस को...!”
“जा साली...खुद बुला ला अपने पुलसिये खसमों को...देख लेंगे उन्हें भी...” पुलिस चौकी की ओर दौड़ पड़ी वह।
झुग्गियों के पास ही बने पच्चीस-पच्चीस गज के मकानोंवाली पुनर्वास बस्ती वजीरपुर में थी पुलिस चौकी। चौकी इन्चार्ज थे त्रिभुवन सिंह। अच्छी-खासी कीमत थी इस चौकी की, क्योंकि झुग्गियों की लम्बी-चौड़ी पट्टी इसके अन्दर आती थी जिसमें कच्ची शराब से लेकर स्मैक तक सभी कुछ खुलेआम मिलता था। छोटे-मोटे उठाईगीरों और स्मैकियों की तो यहाँ कोई गिनती ही नहीं थी। अतिक्रमण और बिजली चोरी का अच्छा-खासा महीना बँधा हुआ था।
चौकी के दरवाजे खुले थे। बाहर एक साठ वॉट का पीला-सा बल्ब जल रहा था। रात के ग्यारह बजे बदहवास-सी औरत को चौकी में अकेला घुस आया देखकर मेज के पास ऊँघ रहे पुलसिये की आँखें एकाएक चौड़ी हो आयीं। उसे समझ नहीं आया कि वह सपने से एकाएक जगा है या जागते में उसके आगे सपना चल रहा है। डर के मारे जसमती की आवाज नहीं निकली तो पुलसिया कड़का, “के पंगा हो गया!”
“वो...वो मेरे पति को मार रहे हैं...उधर झुग्गियों में...।”
“सैं कौन?”
“कल्ली प्रधान के आदमी...।”
कल्ली प्रधान नाम जरा भारी पड़ा पुलसिये पर। कुछ सोचने समझने के बाद पुलसिये ने ठन्डे लहजे में कहा, “थानेदार साहब बाहर गये हुए हैं...बाकी लोग भी गश्त पर सैं। मेरी ड्यूटी तै आड़ै ई सै...तू जरा इन्तजार कर सकै तै आड़ै ई बैठ जा। थानेदार साहब आ गये तै तेरी गैल भेज देंगे...।”
“पर इतनी देर में तो वो लोग उसे मार ही डालेंगे।” उसने घबराकर कहा।
“मैं के करूँ मेरी ड्यूटी तै आड़ै ई सै?”
पुलसिये की आँखों को उसने अपने-आपको घूरते हुए पाया तो उसे वो सहायता केन्द्र किसी गुप्त राक्षसी गुफा से अधिक भयानक लगने लगा। इन्तजार करे या लौट जाये, कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे। एकाएक घबराकर वह चौकी के बाहर आ खड़ी हुई।
आने-जानेवाले लोगों से दिन भर कुलबुलानेवाली गलियाँ रात के वक्त सुनसान थीं। काले स्याह भूतों जैसे इक्का-दुक्का लोग ही आ-जा रहे थे।
इतनी देर में वहाँ पता नहीं क्या हो जाये? उसका दिल धाड़-धाड़ धड़क रहा था। उसके पैर तेजी से बस्ती की ओर बढ़ने लगे थे।
कैसे बुरे ख्याल उसे जैसे हाँक रहे थे। चाहकर भी वह उन बुरे ख्यालों को रोक नहीं पा रही थी। वो डेढ़ पसलिया आदमी और चार हट्टे-कट्टे मुस्टंडे? कैसे सह पायेगा उनकी ठोकर लात? आज तो कुछ होकर रहेगा। मैं तो पहले ही दुःखों की मारी? कैसे तो जी रहे हैं हम? दुनिया भर के दुःख मेरी ही जान को पड़े हैं?
पाँच साल हो गये थे उनकी शादी को। अभी तक वह माँ नहीं बन पाई थी। इधर-उधर बहुत दिखाया। डॉ. आशा गुप्ता का बहुत नाम सुना था, उसे दिखाया तो चेक-अप करके उसने कहा—आठ हजार रुपये खर्च होंगे। एक छोटा-सा ऑपरेशन होगा इसके बाद वह माँ बन पायेगी। इधर-उधर से पैसे उधार लेकर जयसुख तो तैयार था उसका इलाज करवाने के लिए लेकिन वह नहीं मानी। अपना रहने का ठिकाना नहीं ऊपर से बच्चे को और ले आयें। पहले सिर छुपाने के लिए एक छत का इन्तजाम हो जाये फिर वह अपना इलाज करवायेगी और माँ बनने की सोचेगी।
पहले शिव मन्दिर के पास चाट की ठेली लगाता था जयसुख। एक दिन अचानक कॉरपोरेशनवालों ने उसका ठीया तोड़कर उसकी रोटी का जरिया बन्द कर दिया। उसी दिन दारू पीकर घर लौटते हुए एक लावारिस गाय ने उसे अपने सींगों पर उठाकर जमीन पर दे पटका। चोट उसके कूल्हे की हड्डी पर लगी। तब से मेहनत का काम वह कर नहीं सकता था और हल्का काम वह करना नहीं चाहता था। छिटपुट नौकरी करके अपने खाने-पीने का इन्तजाम कर लेता और पड़ा रहता। दस दिन से ज्यादा तो कहीं टिकता ही नहीं था। लोगों के घरों में बरतन माँजते हुए भी जसमती हर वक्त अपनी छत का सपना देखती। फूँस-खपच्ची-तिरपाल की कैसी भी एक छत हो, पर हो अपनी!
बस्ती तक वापिस पहुँचते-पहुँचते उसकी साँस फूल गयी थी। माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा था। बस्ती में घुप अँधेरा था।
अँधेरे के बावजूद उसकी झुग्गी के आगे भीड़ जमा थी। अनहोनी की आशंका से उसके हाथ-पाँव थरथराने लगे। उसका साँस जैसे जहाँ-का-तहाँ रुका हुआ था। वहीं दिलेर मर्द और झाँसी की रानियाँ जो थोड़ी देर पहले चार गुण्डों-मुस्टंडों से एक अकेले कर्जदार आदमी को पिटता हुआ देखकर दूर खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे। अब उस झुग्गी के पास आ गये थे क्योंकि वे चारों गुण्डे-मुस्टंडे जा चुके थे। उसके जाने के बाद उन मर्दों की दिलेरी और उन औरतों की बहादुरी लौट आयी थी।
वे दिलेर मर्द और बहादुर औरतें छोटे-छोटे झुण्डों में बँटे आपस में तबादला-ए-खयालात कर रहे थे।
थरथराते कदमों से भीड़ में से रास्ता बनाती हुई किसी तरह जसमती डेढ़ चारपाई जितने क्षेत्रफलवाली अपनी झुग्गी में दाखिल हुई तो देखा, उसका पति परमेश्वर जयसुख चुपचाप पैरों के भार बैठकर अपने सिर को घुटनों में दिये गठड़ी-सा बना बैठा था। जैसे वो गुण्डे-मुस्टंडे उसकी हड्डियाँ, गर्दन-वर्दन सबकुछ तोड़-तोड़कर जाते समय इकट्ठी कर गये हैं।
पत्नी को लौटा देखकर जयसुख कराहने लगा। पत्नी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ जी? खैर तो है ना?” जवाब में जयसुख और कराहने लगा तो जसमती उन मुस्टंडों को गालियाँ बकती हुई उन्हें श्राप देने लगी कि उनका सत्यानाश हो जाये। कलपते हुए उसने अपने पति से पूछा, “ज्यादा तो नहीं लगी? कहाँ-कहाँ लगी?” दर्द से बिलबिलाता हुआ वह पत्थर की मार खाये किसी पिल्ले की तरह किंकियाते झींखते हुए झुँझलाया, “अब लौटी है साली तू...मादर...तेरी माँ की...”
उसे अपने पति की गालियाँ सुनाई नहीं दे रही थीं। सहारा देकर उसने पति को नीचे बिछी बोरी पर लिटाया और उसके जख्मों पर हल्दी लगाने लगी।
“वो कह रहे थे पैसे दे या झुग्गी खाली कर। मैंने कहा कैसे खाली कर दूँ? तीन हजार दे रखे हैं वो? वो बोले, इतने दिन से रह रहा है! न ब्याज न किराया? झुग्गी तेरे बाप की है? मैंने कहा, बाप के बेटे ने तीन हजार दे रखे हैं। खरीद न समझो किराये पर ही समझ लो। बीच-बीच में किराया देता भी रहा हूँ। आज तक का किराया-विराया काट के फिर भी मेरे डेढ़ हजार निकलते हैं। बिना किराया दिये मैं तीन महीने और रह सकता हूँ। वो बोले, ठीक है पिछला सौदा कैंसिल। तीन महीने के बाद झुग्गी खाली कर दियो। ये फैसला करके टले हैं।”
लम्बी सर्द-सी साँस छोड़ते हुए जसमती ने झण्डेवाली माँ का मन-ही-मन शुक्रिया अदा किया कि उसने उसका तीन महीने तक तो संकट टाल दिया। अब वो किसी-न-किसी दिन ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ायेगी। तीन महीने बाद देखा जायेगा। जानें सलामत रहें। आगे भी माँ झण्डेवाली मेहर रखेगी!
पड़ोसी के दुख में शामिल होने का धर्म निबाहते हुए आसपास के कुछ खाये-पीये मर्दों के बाहर जमा छोटे-छोटे झुण्ड काम-धन्धों के मन्दे होने से लेकर सरकार के निकम्मेपन तक की बातों-बहसों में जुटे हुए थे। फिस्स-फिस्स खिस्स-खिस्स करतीं औरतों के झुण्ड से कभी कोई-कोई आवाज खुलकर खनक जाती। उन्हें आज जैसे मौका मिला था अपने-अपने बच्चों की नादानियों, परेशानियों और पतियों की ज्यादतियों से लेकर कपड़ों-साड़ियों की बातें करने का। अपने सेठ-सेठानियों की बेहूदगियों और क्रूर हरकतों का खुलासा करने का।
जसमती की चिन्ता थी कि गुम चोटों के दर्द से तड़फड़ा रहे जयसुख के लिए रात के इस वक्त दवा-गोली का इन्तजाम कैसे हो? बीच-बीच में रह-रहकर तड़पकर कहता, छोड़ो दवा-फवा, कहीं से थोड़ी-सी दारू हो जाती तो...
उसे अपनी ठुकाई का इतना दुःख नहीं था जितना अपनी नयी कच्ची दारू की थैली का था जिसे कालेभुसुंड ने उसके सामने ही घटक लिया था। लेकिन बस्ती की खासियत यह भी थी कि कोई किसी को मुफ्त में खाना खिलाये या न खिलाये, दूसरे को दारू पिलाने का आग्रह जरूर करता।
कुछ ही क्षणों में प्रबन्ध हो गया था। जिसे देखते ही जयसुख के चेहरे पर अजीब-सी दर्दभरी मुस्कराहट आ गयी थी। दारू के अन्दर जाने से पहले ही उस पर उसका असर शुरू हो गया था। उसका बिलबिलाना बन्द हो गया था।
बाहर से औरतों की फिस्स-फिस्स खिस्स-खिस्स की आवाजें आ रही थीं।
“जमाना बहुत खराब आ गया है न?” दूसरी औरत ने सुर मिलाया, “और देखो तो एक अकेली औरत रात के इस वक्त थाने जा चढ़ी। हिम्मत तो देखो अगली की।”
इस हैरतनाक बात से वहाँ ज्यादातर औरतों का मुँह खुला-का-खुला रह गया था, जबकि उन्हें पहले से पता था कि जसमती पुलिस से मदद माँगने गयी थी कि उसके पति की जान बच सके। थाने जाते-जाते बड़े-बड़े मर्दों का रास्ते में ही पैंट-पाजामा गीला हो जाता है। ऐसे में एक अकेली औरत का रात के वक्त थाने जाना उन लोगों के हिसाब से जलती चिता में कूदकर आत्मदाह करने जैसा था।
“गयी तो थी जरूर बड़े नाज से अपने खाकी खसमों को बुलाने...पर आयी बेचारी बैरंग।” वहाँ जमा लोगों को लगा बात तो सच है लेकिन नहीं आयी तो आ तो सकती है, आ गयी तो? एकाएक सभी को अपने-अपने चूल्हे-चौके घर-बार, पति, बरतन, बच्चे याद आने लगे और वे अपनी-अपनी झुग्गियों की ओर बढ़ने लगे।
सुबह जब रामदीन मोची अपनी पेटी, हरखू गुब्बारेवाला अपने बाँस का चौखटा और फत्ते माल ढोनेवाला अपना रिक्शा लेकर अपने काम पर निकलने ही वाले थे कि बस्ती में एक पुलसिया आकर गरजा, “रे कित सै वो माधुरी दीक्षित? रात नै जिसके घर आले का मरडर होन लग रया था?”
खाकी वर्दी की मौजूदगी से बस्ती की रोजमर्रा की खटक-खटक पर कोई असर नहीं पड़ा था इसीलिए कि उन लोगों का वहाँ आना-जाना लगा ही रहता था। फिर भी वे आगे बढ़-बढ़कर परिचय बढ़ाने की गरज से सलाम ठोक रहे थे, “साबजी नमस्ते, साबजी नमस्ते!” कुछ इसलिए भी आगे हो रहे थे, अगर किसी की नमस्ते का थानेदार ने जवाब दे दिया तो उसकी बस्ती में कद्र बढ़ जायेगी कि अगले की जान-पहचान थाने तक है।
आगे-पीछे हो रहे बस्ती के लोगों के राम-सलाम को एकाएक झटककर पुलसिये ने अपना सवाल फिर दोहराया, “रे भाई तम यो बताओ उस बीरबानी की झुग्गी कुण सी सै जो रात थाणे आयी थी?”
झुग्गी सामने ही थी।
दरवाजे पर खाकी झलक को देखकर, बोरी पर चौड़ा होकर लेटा हुआ जयसुख एकाएक दर्द के मारे बिलबिलाने की एक्टिंग करने लगा। दया का पात्र बनने की उसकी चालाक मक्कारी को भाँप लिया था पुलसिये ने, पर वह बोला कुछ नहीं। शायद अनुमान लगा रहा था कि यहाँ से आज की दिहाड़ी का जुगाड़ बना पायेगा कि नहीं? पता लगने पर कि जसमती जिसे माधुरी दीक्षित बताकर खोजता हुआ वह यहाँ तक आया; सुबह-सवेरे ही काम पर निकल गयी थी।
एकबारगी पुलसिये का मुँह फटे जूते-सा लटक गया। बड़बड़ाने लगा वह, “इब मैं किसकी माँ ने मौसी कहूँ? लेन-देन में जरा-सी खटपट हुई पहुँच गये थाणे...पुलिस ना हो गयी घरेलू नौकर हो गयी। पुलिस ने इतना सस्ता समझ रक्ख्या सै सालयाँ नै?”
पुलसिये को लगा वह यों खाली हाथ लौट जायेगा तो इसमें उसकी बहुत बेइज्जती है। बस्ती में कोई अपनी झुग्गी ठीक कर रहा था, किसी का सामान बाहर पड़ा था; किसी से सौ, किसी से पचास, पुलसिया अपनी दिहाड़ी बनाकर ही टला।
जाते-जाते पुलसिया जिन-जिनका नुकसान कर गया था, वे बाहर चौड़े में खड़े होकर जसमती को गालियाँ बकने लगे थे, जिसकी वजह से बस्ती में बेवक्त पुलिस आयी और उनका नुकसान कर गयी।
आसपास की झुग्गियों में रहनेवाली औरतें जो अपनी-अपनी झुग्गियों में रखे कलर या ब्लैक एंड व्हाइट टीवीयों पर हिन्दी फिल्में देख-देखकर अपने-आपको हीरोइनों से कम नहीं समझती थीं और उनके अंदाजे गुफ्तगू की कॉपी करने की हर वक्त कोशिश करती थीं, वे भी अपना-अपना चूल्हा-चौका छोड़कर बाहर आकर झुण्ड बनाकर बातें बनाने लगी थीं। ये राँड जसमती थाने करने क्या गयी थी? किसी पुलसिये से कुछ चक्कर होगा, नहीं होगा तो पड़ ही गया होगा।
“हमारे पीहर के गाँव में एक औरत का घरवाला परदेस गया रहा। पीछे से एक लड़का उसे छेड़ दिहिना। उ औरत गयी थाणे। हुआ थाने दस ठो पुलसिया रहा। बस...इज्जत बचाये खातिर गयी रही, उलटा इज्जत दे आयी। उ दस रा...बारी-बारी...!”
“जसमती की तो थाने में पहले से किसी से साठ-गाँठ होगी तभी तो देखा नहीं कैसे वो पुलिसवाला माधुरी दीक्षित-माधुरी दीक्षित करता डोल रहा था?”
जलते हुए चूल्हे और चलते हुए टीवी छोड़कर वे औरतें बातें बनाने में मशगूल थीं। इधर-उधर की घटनाओं का जिक्र करके निन्दा गान करती हुई औरतों का निष्कर्ष था कि जाल में फँसी मछली की जान, गिद्ध के पंजे में फँसी माँस की बोटी और थाने पहुँची औरत की इज्जत कभी बच नहीं सकती। वे गरीब हैं और झुग्गियों में रहते हैं पर उनकी भी कोई इज्जत है? जसमती के चरित्र में ही कुछ खोट है तभी तो शादी के पाँच साल हो जाने के बावजूद उनके कोई बच्चा नहीं है।
आमतौर पर अपना सिर-मुँह ढककर मर्यादा में रहनेवाली औरतों ने एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर जाने कहाँ-कहाँ से खोजकर या गढ़-गढ़ के ऐसे-ऐसे राज खोले कि उन औरतों को मारे शर्म के अपने ही दुपट्टे से अपना ही मुँह छिपाकर ‘हाय राम! हाय राम!’ कहना पड़ा।
अपने-अपने शक जाहिर करने और अनुमान लगाने में उन औरतों को बड़ा मजा आ रहा था। पर इस पर वे एकमत थीं कि जसमत के चाल-चलन में खराबी है और उसका पति जयसुखलाल नामर्द।
उन औरतों को अपने काबिल और बेहद अनुभवी होने पर जरा भी शक नहीं था, बल्कि उनका दावा था कि उनकी बातें हमेशा सच निकलती हैं।
ये सब बातें जयसुख को भी पता चलें जोकि बड़ा मर्द बना फिरता है। यह सोचकर वे औरतें और मर्द धीरे-धीरे जयसुख की झुग्गी के आगे भीड़ बनकर जुड़ने लगे। उसके साथ हमदर्दों का नाता बनाकर वे अपनी शिकायतें और शक उसके आगे जाहिर करने लगे। उनका एक-एक शब्द जयसुख को बारूदी गोलियों-सा छलनी किये दे रहा था। हालाँकि वे उसके खैर-खाह बनकर बात कर रहे थे पर जयसुख को समझ नहीं आ रहा था अपने वजूद में अचानक लग गयी आग पर वह कैसे काबू पाये? एक औरत ने तो उसे यहाँ तक कह दिया कि उसकी घरवाली जोकि शादी के पाँच वर्षों से अभी तक तो माँ नहीं बन पाई है, अब जल्दी ही, बल्कि इसी महीने देख लेना कि उसे माँ बनने की खुशखबरी दे देगी, क्योंकि धरती पर गिरा बीज और थाने चढ़ी औरत, कुछ गुल तो खिलेगा ही। अपना ही किला कमजोर हो तो रस्सा तुड़वानेवाली भैंस का भी क्या कसूर?
सीधा प्रश्न और प्रहार था यह उसके पुरुष होने पर। जयसुख ने गौर से देखा उसे, ये उसके हमदर्द हैं या तमाशा खड़ा करके मजा लेनेवाले दर्शक। पर उसे सब-कुछ जलता हुआ-सा दिखाई दिया। धू-धू करके जल रहा था उसका वजूद-ये साली मादर... थाने गयी ही क्यों?
जसमती काम से लौटी तो उसे बस्ती का व्यवहार एकदम बदला हुआ-सा लगा। कोई हिकारत से देखकर नजरें चुरा रहा था तो कोई तिरछी नजरों से देखकर मुँह बिचका रहा था। बिना किसी शर्म-लिहाज के कोई-कोई तो उसके मुँह पर दूसरों को सुनाकर कहता, “ये वही है! रातवाली! जो थाने जा चढ़ी। माधुरी...!”
अपनी ओर उठी उँगलियों का अर्थ वह अच्छी तरह समझ रही थी लेकिन रात जो हुआ उसमें उसने कहीं कुछ भी गलत नहीं किया है। उसे अपने-आप पर विश्वास था।
फिकरों-फब्तियों-तानों ने उसका उसकी झुग्गी तक पीछा किया।
अपनी ठुकाई-पिटाई के दर्द को भूलकर उसे आया हुआ देखकर जयसुख उठ बैठा। जसमती ने मुस्कुरा के खुशी जाहिर की—अब तो आप ठीक लग रहे हो!
जयसुख भभक पड़ा, “साली तेरी माँ...तेरी बहन की...औरत होके तू अपने उन खाकी खसमों के पास थाने तू करने क्या गयी थी? औरत होके?”
मारे गुस्से के फूल गयी अपनी साँस के साथ वे सभी इल्जाम, शब्द और सवालात जो बस्तीवालों ने उठाये थे, जयसुख ने जसमती को कह डाले थे। बहते हुए हर शब्द के साथ उसे माँ और बहन की गालियाँ देना भी जरूरी समझा था। डर, शर्म और गुस्से के मारे काँपने लगी थी जसमती। जयसुख ने ये भी कहा कि उसकी तो बस्तीभर में मिट्टी पलीद हो गयी है।
नाकाबिल बर्दाश्त बातों को सुनकर अपनी छाती पीटती हुई कुरलाने लगी, “हाय राम! नास जाय बातें बनानेवालों का।”
अच्छे-खासे तमाशे की उम्मीद में झुग्गी के बाहर जुड़ आये आसपास के लोगों की हँसी उससे बर्दाश्त नहीं हुई तो वह बाहर आकर बिना किसी को लक्ष्य किये चिल्लाने लगी, “नास होगा मुझपर झूठा इल्जाम लगानेवालों का। कभी भला नहीं होगा...।”
जसमती ने चुन्नी से अपने आँसू पोंछे और झुग्गी के बाहर बने ईंटों का चूल्हा जलाया और दाल बनाने के लिए पतीली चढ़ा दी।
अश्लील गालियाँ दे-देकर अपनी मर्दानगी जाहिर कर-करके जयसुख थककर थोड़ा चुप हो आया था। धीरे-धीरे उसकी साँस थोड़ा शान्त और संयत होने लगी थी।
थोड़ा संयत स्वर में जसमती ने अपने पति से पूछा, “कौन-सी औरत चुपचाप खड़ी होकर अपनी आँखों के सामने अपने पति को चार-चार मुस्तंडों से पिटता देख सकती है? बस्ती में से एक भी बन्दा न आगे आया, न पुलिस में खबर करने दौड़ा। ऐसे में वह थाने न जाती तो क्या करती? अगर वह थाने गयी भी तो किसके लिए। बस्तीवालों को तो मौका चाहिए। ऐरे-गैरों की ऐसी बातें वह सुनता क्यों है? वैसे भी अपनी इज्जत अपने हाथ होती है।”
कुछ जवाब नहीं दे पाया जयसुख। उसे लगा जसमती ठीक कह रही है। ताश खेलते हुए अगले दिन जयसुख के कुछ नकारा लेकिन बातें गढ़ने के माहिर उसके कुछ साथियों ने उसके अन्दर जल-बुझ रही आग को झिंझोड़ा और फूँक मारी, “भैया, जयसुख तो अब बड़ा आदमी हो गया है। उसकी जबरदस्त पहुँच है थाने में! मानते हैं उस्ताद तेरी बीवी माधुरी दीक्षित से कम नहीं है।”
कहनेवालों ने तो यहाँ तक कह दिया कि महीनों से वह बीवी के बूते पर बैठकर खा रहा है।
आग लग गयी उसको। जाने कौन-कौन हँस रहा था उस पर। किस-किस की जुबान चल रही थी। किस-किस से उलझता वह? गालियाँ बकता और जलता धुँधुआता लौट आया था वह।
रात वह घर लौटा तो जसमती अपना चूल्हा-चौका निबटा चुकी थी।
झुग्गी में घुसते ही जयसुख फिर से गालियाँ बकते हुए बुरा-भला कहने लगा। जवाब में जसमती ने भी गुस्से से कहा कि वह उन निकम्मे नाकारा लोगों के पास सारा दिन ताश पीट-पीटकर वक्त क्यों बरबाद करता है? ठीक है उसका ठीया टूट गया तो वह किसी और काम-धन्धे से लगे। उसकी ऊँची आवाज ने जैसे जयसुख की पूँछ पर पैर रख दिया। भड़ककर वह उठा और थप्पड़-लात-घूँसे जो बन पड़ रहा था जसमती पर चलाने लगा। मुस्तंडों से पिटते वक्त चूहा बना जयसुख औरत को पीटते वक्त सीधे शेर बन गया था।
अपने बचाव में जसमती बार-बार यही दोहरा रही थी कि वह उसीकी खातिर थाने में गयी। उसकी एक लात जसमती को न लगकर पास पड़े लोहे के एक ट्रंक को जा लगी थी। बुरी तरह बिलबिलाकर रह गया वह। वह और भी भभक उठा जैसे वो चोट उसके जसमती ने ही मारी हो! वह दुगुने जोर से चीखा—साली कुतिया! अब तू अपने उन खाकी खसमों के पास ही जा। अब मैं नहीं रखूँगा तुझे। पूरी बस्ती में मेरी इज्जत का तो कचरा हो गया। निकल जा यहाँ से।
और वह जसमती की बाँह पकड़कर बाहर की ओर खींचने लगा। जसमती झुग्गी का दरवाजा पकड़कर अटक गयी थी। एकाएक उसने इतनी जोर से उसके धक्का मारा कि वह बाहर जा गिरी। रात काफी हो चुकी थी। बाहर इक्का-दुक्का ही लोग थे। रोते हुए वह बोली, “चली जाऊँगी, रहना भी कौन चाहता है तेरे जैसे के साथ?” जयसुख चीखा, “तो जा यहाँ से जाती क्यों नहीं? खड़ी क्यों है?” जसमती ने कहा कि वह जायेगी तो अपना ट्रंक जोकि जहाँगीरपुरी में रहनेवाले उसके भाई ने उसके दहेज में दिया था वो साथ लेकर जायेगी। हेकड़ी में आये जयसुख ने सुनते ही ट्रंक उठाकर झुग्गी से बाहर लाकर पटका और चीखा, “ले जा अपना अडंगा...मुझे क्या करना है इस कबाड़ का?” कहकर उसने झुग्गी का दरवाजा बन्द कर लिया।
बाहर काला घना घुप अँधेरा था। एकाएक यों बाहर कर दिये जाने से हैरान थी वह। ये उसे किस जुर्म की सजा दी गयी है? इतनी रात गये अब वह जाये कहाँ? इक्का-दुक्का रोते फिर रहे कुत्ते के अलावा दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था।
काले घने अँधेरे का समुद्र पार करके जहाँगीरपुरी अपने भाई के घर तक पहुँच पाना उसे सम्भव नहीं लग रहा था क्योंकि आधी रात का वक्त था और वह अकेली औरत थी। जाने कौन कहाँ घात लगाये बैठा हो? आसपास के किसी पड़ोसी झुग्गीवाले से मदद माँगना फिजूल लगा उसे। इतनी रात गये भाई के घर पहुँचेगी तो भाई-भाभी क्या कहेंगे? और वहाँ उनके पास पड़ोसवाले भी...। दो-चार घण्टे ही तो रह गये हैं सुबह होने में। वहीं अपनी झुग्गी के बाहर रात काटने का निर्णय लिया उसने।
मुँह अँधेरे ही उठकर वह जहाँगीरपुरी की ओर चल दी थी। उसे यों एकाएक आये देखकर भाई और भाभी हैरान रह गये थे।
लोगों के घरों की रँगाई-पुताई करके गुजर-बसर करनेवाला उसका भाई भड़क उठा, “ऐसे कैसे घर से निकाल सकता है तुझे? उसकी तो अकल ठिकाने कर दूँगा। ऐसी की तैसी उसकी। गलती तेरी भी है, तू थाने गयी ही क्यों? पिटने-छितने देना था ऐसे आदमी को। कहे तो मैं दो-एक बन्दों के साथ उसकी टाँगें तोड़ के आयें?”
“गुस्से में कोई कदम नहीं उठाना।” त्याग-दया-ममता-क्षमा की मूर्ति बनने की कोशिश की जसमती ने। तमतमाये चेहरे के साथ दबी-सी आवाज में कलपने लगी भाभी, “घर में फाकों की नौबत है। ठेकेदार के साथ पूरा दिन खटने पर आधी दिहाड़ी मिलती है...उस पर महीने में आधे दिन काम लगता ही नहीं। बैठ के खाना पड़ता है। ऊपर से...”
बिना किसी भीगे थरथराये नारी विलाप के उसने भाई और भाभी को आश्वस्त कर दिया था कि वह वहाँ ज्यादा दिन नहीं रहेगी। ज्यादा होगा तो आसपास किराये पर कोई झुग्गी ले लेगी। उसका घर छूटा है। काम नहीं। शालीमार बाग की जिन कोठियों में वह काम करती थी अब भी वहीं करेगी। उसे पता है कि उसका भाई कोई रईस आदमी नहीं है। उसकी अपनी जिन्दगी घर-बार और परेशानियाँ हैं। सुबह काम पर निकलेगी शाम को आयेगी। अपना खर्चा आप करेगी। कुछ दिन का खलल और तकलीफ वे सह लें।
शालीमार बाग की कोठियाँ यहाँ से लगभग उतनी ही दूर थीं कि जितनी कि वजीरपुर की झुग्गियों से थीं। आमदनी बढ़ाने और वक्त न बर्बाद करने की गरज से अगले ही दिन उसने दो-एक कोठियों का काम और पकड़ लिया था। पराश्रित होने की विवशता और परित्यक्ता होने का दुख हजारों मुँहवाले किसी साँप-सा पलपल उसके दिलोदिमाग को झिंझोड़ रहा था। पूरी दुनिया ने उसे दुतकार दिया। उसके लिए कहीं कोई जगह नहीं है। किसी श्मशान की तलाश में किसी मृतक की मिट्टी लिए-लिए भटक रही है वह।
लोगों की घूरती निगाहें, शक, उपहास, समूचे वजूद को छीलती जाती बातें जैसे वह कोई असामाजिक जीव हो। कोई बहुत बड़ी मुजरिम हो।
वो ट्रंक जिसे जयसुख ने गुस्से में बिना कुछ जाने-समझे बाहर दे फेंका था इस मुश्किल वक्त में उसे बल दे रहा था। कपड़े-लत्ते और गहने थे उस ट्रंक में जो उसकी जीने की इच्छा को जीवित बनाये रखने की कोशिश में थे।
पहले महीने में पूरे चार घरों का बर्तन सफाई करके भाई-भाभी को रहने खाने का खर्चा देकर उसने पूरे बारह सौ रुपये बचाये थे। दूसरे महीने में तेरह सौ, तीसरे महीने में पूरे हजार। थोड़ी बहुत जान-पहचानवाले एक सुनार के पास जाकर उसने अपने गहनों की कीमत लगवाई और उन्हें तीन हजार रुपयों में बेच डाला। कुल साढ़े छह हजार रुपयों का जमा-जोड़ करके उसने अपनी ख्वाहिश अपने भाई को बताई तो जलते चिमटे से दागे गये किसी निर्दोष पशु की तरह भड़क उठा कि पागल तो नहीं हो गयी। जिस झुग्गी से उसे धक्के मार-मारकर बाहर निकाल दिया गया वह उसी झुग्गी को खरीदने के लिए अपनी जमापूँजी तक को दाँव पर लगा देना चाहती है? जब वो घरवाला ही उसका न हुआ तो...उस घर के लिए वह इतनी बड़ी कुर्बानी क्यों देना चाहती है? वह त्याग-व्याग कुछ नहीं, ये तो बेवकूफी है। वह खुद उसके पाँव पर कुल्हाड़ी होगी। पछतायेगी वह।
लेकिन वह जिद पर अड़ गयी, उसे वही झुग्गी खरीदनी ही है।
झुग्गी बेचने से मना कर दिया था कल्ली प्रधान ने। बोला, “इधर झुग्गियों की कीमतें बहुत बढ़ गयी हैं। इस बीच डेवलपमेंट अथॉरिटीवालों ने सर्वे किया था। जिन-जिन की झुग्गी थी उन्हें सर्वे का एक कार्ड भी दिया गया है। अब जब भी झुग्गियों पर बुलडोजर चलेगा, सरकार झुग्गीवालों को वैकल्पिक प्लॉट देगी। अब मैं ये झुग्गी दस हजार से कम नहीं बेचूँगा।”
वापस लौटकर जसमती पैसों के इन्तजाम में जुट गयी। जसमती जहाँ काम करती थी कुछ उन मालकिनों से, कुछ अपने भाई से उधार लेकर जसमती ने पैसे पूरे किये और अपने भाई को साथ लेकर फिर कल्ली प्रधान के पास पहुँची। पूरे दस हजार रुपये गिनकर कल्ली ने दस रुपये के स्टाम्प पर एक सेल एग्रीमेंट लिखवाकर जसमती को दे दिया। साथ ही डेवलपमेंट अथॉरिटी का सर्वेवाला कार्ड भी सौंप दिया। उसके भाई ने सलाह दी कि चार-पाँच सौ रुपया खर्च कर वह राशनकार्ड भी बनवा ले ताकि काम पक्का हो जाये। दस दिन पहले ही जयसुख झुग्गी खाली कर गया था। झुग्गी का कब्जा जसमती को देकर कल्ली प्रधान का आदमी लौट गया था। अब उसे उस झुग्गी में अकेले ही रहना है इसलिए होशियारी से रहने की सलाह देकर उसका भाई भी लौट गया था। झुग्गी की साफ-सफाई करते हुए उसे गर्व हो आया। उसका भी बाँस-फूँस-खपच्ची का एक घर है। जैसा चाहे जो सामान जहाँ रखे उसे रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं। अब उस पर कोई बिना बात की धौंस-पट्टी नहीं मार सकता। लेकिन अब उसे उसी बस्ती में अकेली रहना है। जिस बस्तीवालों ने उस पर बेवजह इल्जाम लगाकर घर से बेघर कर दिया था। ताने, उपहास, हमदर्दी फिकरे। उसके दिलोदिमाग पर जाने कितने साँप-बिच्छू कुलबुलाने लगे। जाने क्या-क्या देखना-सुनना बाकी है।
गीली हो आयीं आँखों से झुग्गी के दरवाजे पर कोई धुँधली-सी शक्ल दिखाई दी उसे। आँखों का पानी पोंछा तो शक्ल साफ दिखाई दी। हैं-हैं करता हुआ जयसुख था। खिसियाता पूँछ हिलाता-सा बिना किसी इजाजत और दुआ सलाम के वह झुग्गी के अन्दर घुस आया था और बिना पूछे बताने लगा था कि उससे कल्ली प्रधान ने कुछ दिन पहले ही ये झुग्गी खाली करवा ली थी। फिलहाल उसने अपना सामान रामदीन मोची के यहाँ रखवाया है और खुद उसकी झुग्गी के बाहर रात बिता रहा है। हरखू गुब्बारेवाले से जैसे ही उसे पता चला कि ये झुग्गी उसीकी बीवी जसमती ने खरीद ली है, वह दौड़ता चला आया है।
खीसें निपोरता घिघियाता हुआ ये आदमी क्या उसका पति है, जिसने उसको धक्के मार-मारकर घर से निकाल फेंका था, वो भी इसलिए कि वह उसीकी रक्षा के लिए पुलिस से सहायता माँगने गयी थी। हैरान थी जसमती।
एकदम चुप खड़ी थी वह। माथे पर बल, लाल तमतमाया चेहरा। भिंचे हुए दाँत और मुट्ठियाँ। उसकी नाराजगी भाँपकर वह सफाई-सी देने लगा कि पिछले कई महीनों से उसके पास कुछ काम-धन्धा है नहीं। खाली दिमाग शैतान का घर। शैतान ही तो घुस गया था उसके दिमाग में और कुछ दुनिया-जहान की बातों में आ गया था।
इसलिए तुम भी दुनिया के साथ हो गये—उसने पूछना चाहा था। एकदम चुपचाप खड़ी थी वह। दुनिया के इल्जाम लांछन उस पर थे। बर्दाश्त कर लेती वह, अगर वह उसके साथ होता। लेकिन अब इतने दिनों से मैं धक्के खा रही थी तब कहाँ था वह? अब सर छुपाने की जगह दिखी तो खुदगर्ज पूँछ हिलाता हुआ चला आया?
मैं जैसे चाहे रहूँ... मुझे नहीं चाहिए बिना कसूर के सजा देनेवाला मालिक। हुक्म चलानेवाला।
झुग्गी के दरवाजे पर खड़े जयसुख को पीछे से जसमती ने एक जोरदार धक्का दिया और वह वहीं झुग्गी के बाहर जा गिरा, जहाँ कभी जसमती आ गिरी थी। जयसुख को उसका रवैया समझ नहीं आया। गाली-वाली बकते हुए वह कहने ही वाला था कि साली औरत होके...?
इससे पहले वह चीख पड़ी, "मैं अपनी मालिक आप हूँ! भाग जा यहाँ से। मुझे नहीं चाहिए अपने ऊपर कोई मालिक।"
खुदमुख्तारी के एहसास के बावजूद वह हैरान थी। अपने पति से वह बदला लेगी। सिर छुपाने की जगह यह सोचकर तो नहीं ली थी! अचानक उसने ये कैसे-क्या किया? दिन भर वह झुग्गी से बाहर नहीं निकली। बाहर से खिलखिलाने और सीटियाँ मारने की आवाजें आती रहीं। वह यहाँ इस बस्ती में अकेली कैसे रह पाएगी? जहाँ हर आदमी दूसरे से खिंचा-खिंचा और नाराज रहता है जैसे उसकी परेशानियों की वजह वही हो!
दो महीने अकेली नहीं रह पाई थी रामस्वरूप की बीवी ईसरी। पति के मरने के बाद नाते-रिश्तेदारों ने समझाया था कि औरत को अकेले रहना मुश्किल होता है। चलकर किसी सगे-सम्बन्धी के साथ रह ले पर वह नहीं मानी। खुद कमाती है। किसी पर बोझ क्यों बने। लेकिन कुछ दिनों में ही पता चल गया। वह माँस का ढेरभर है जो माँसाहारियों से घिरा हुआ है। कभी झुग्गी का दरवाजा टूटा मिलता, कभी सामान गायब। आवारा लड़के सारा दिन उसकी झुग्गी के चक्कर काटते और बहाने से टैम-बेंटैम कोई भी झुग्गी में आ घुसता। तंग आकर झुग्गी बेचकर उसे लोकपुरी की झुग्गियों में मौसी के साथ जाकर रहना पड़ा।
आमतौर पर जसमती अपनी झुग्गी का दरवाजा बन्द रखती लेकिन बहाने से कोई भी हमदर्दी जताने चला आता। वह घर से निकलती तो उसके कानों में तानों, फिकरों और सीटियों की आवाजें आतीं, जो रात को सोते वक्त भी उसके दिलोदिमाग पर गूँजती रहतीं। रास्ते में रोक-रोककर आस-पड़ोस की औरतें हमदर्दी जतातीं। तंग आ गयी वह। जयसुख आखिर है तो उसका पति ही। जैसा भी था चाहे वह दारू में बेसुध झुग्गी में एक तरफ निर्जीव-सा क्यों न पड़ा रहे। उसके होते वह इतनी असुरक्षित नहीं थी।
इधर-उधर से उसे पता चलता रहता कि उसका पति बीमार तो चल ही रहा है। लोग उसका मजाक उड़ाते हैं और वह बात-बात में जिस-तिस से उलझता फिर रहा है। न खाने का कुछ ठीक, न रहने का कोई ठिकाना। अब भी कोई उसके मुँह पर जसमती की बुराई करता है तो वह उससे लड़ने लगता है।
गलती हो गयी उससे। जो हुआ सो हुआ। औरत है वह। मर्द को क्या झुकायेगी? कल वह खुद जाकर अपने पति को वापिस बुला लायेगी। फिर से गृहस्थी बसायेगी। शक्तिनगर जाकर डॉ. आशा गुप्ता से अपना इलाज करायेगी। भगवान ने चाहा तो जल्दी ही माँ बनेगी। बाँस-फूस-खपच्ची से बने इस घर को खुशियों से भर देगी।
सुबह-सुबह झुग्गी का दरवाजा भड़भड़ाया। सामने रामदीन मोची था। वह घबराया हुआ था—जयसुख को पुलिस पकड़कर ले गयी है। कल रात काला भुसुण्डा उसे कहीं अकेले टकरा गया। वह जयसुख को छेड़ने लगा। पहले तो जयसुख बर्दाश्त करता रहा। नहीं रहा गया तो वह उससे भिड़ गया। जयसुख ने काले भुसुण्डे का सिर फाड़ दिया। उस वक्त तो काला भुसुण्डा अपना फटा सिर लेकर भाग गया। बाद में साथियों के साथ वापिस लौटा।
जयसुख को उन्होंने खूब मारा-पीटा, फिर ले जाकर थाने में बन्द करवा दिया। अब थानेदार उसे छोड़ने को तैयार नहीं है।
हाँफती-काँपती हुई रामदीन को साथ लेकर वह थाने की ओर चल दी थी। आस-पड़ोस के कुछ बच्चे कूदते-फाँदते उनके पीछे-पीछे हो लिए थे। थानेदार बड़ी मुश्किल से मिलने को तैयार हुआ। उस पर नजर पड़ते ही फुँफकारा—बहुत गुण्डागर्दी मचा रखी सै बस्ती में तुम लोगों ने? तेरे घर आले ने कत्ल के इरादे से एक आदमी का सर फाड़ दिया है। इरादा-कत्ल का केस बनेगा। जिन्दगीभर जेल में सड़ेगा साला। फाँसी भी हो सके है। चल-चल जा आड़े ते...ना तै तन्ने बी अन्दर कर दूँगा...!
बाहर आकर फफककर रो पड़ी थी। ये अचानक क्या मुसीबत टूट पड़ी? अब मैं क्या करूँ? सामने तीन-चार लोगों के साथ काला भुसुण्डा खड़ा था। उसके सिर पर पट्टी बँधी हुई थी। पता चला उसका सिर ज्यादा नहीं फटा था। दो-तीन टाँके लगे थे। अपने साथियों के साथ काला भुसुण्डा अच्छी तरह हँस-बोल रहा था। जसमती बेहद घबराई हुई थी। पुलिस चौकी उसे किसी खूँखार जानवर की माँद जैसी लग रही थी। कैसे बचाये वह अपने पति को उनके पंजे से? भाई को बुलवाये? तभी एक आदमी ने उसके पास आकर कहा—यहाँ खड़े होकर रोने-धोने से कुछ नहीं होगा। आदमी को छुड़वाना है तो झुग्गियों के प्रधान कल्लीराजजी को जा के मिल ले। थानेदार के साथ उठना-बैठना है उनका।
लगभग लपकती हुई वह कल्ली प्रधान के घर पहुँची थी। बात सुनकर कल्ली प्रधान भड़क उठा, "तेरे घरवाले ने जिसका सर फाड़ा है वो मेरा ही आदमी है और तू मुझे ही छुड़वाने को कह रही है?"
"पिटाई तो मेरे ही घरवाले की ज्यादा हुई है। ये बात और है कि आपके आदमी का सिर फट गया। हम भी तो आपके ही आदमी हैं। प्रजा हैं। आपके सिवाय किसके दर पर नाक रगड़ें?"
काफी देर तक गिड़गिड़ाती रही वह। कल्ली के माथे के बल कुछ कम हुए। जेब से मोबाइल निकाला और बात करते-करते वह अन्दर चला गया। थोड़ी देर बाद लौटा, "बहुत मादर...है थानेदार, साला मान ही नहीं रहा था। ऊपर से फोन करवाया तब जाकर बात करने को तैयार हुआ है। पूरे दस हजार माँग रहा है जयसुख को छोड़ने को। अब तू देख ले, छुड़वाना है तो नोट ले आ नहीं तो पड़ा रहने दे साले को। केस चलेगा तो इतने तो वकील-कचहरी में लग जायेंगे। गारंटी फिर भी नहीं कि सजा से बच ही जायेगा।"
"इतने पैसे कहाँ से लाऊँ? हैं ही नहीं तो...?"
"हैं कैसे नहीं? झुग्गी खरीदी है दस हजार की? बेच दो...।"
काँपती-सी आवाज में उसने कहा, "अब एकाएक, कौन खरीदेगा मेरी झुग्गी?"
कुछ देर सोच में डूबे होने की मुद्रा में रहने के बाद एकाएक कल्ली प्रधान ने कहा, "कुछ नहीं हो सकता। पर अगर तू अपने पति को छुड़वाना चाहती है तो झुग्गी हमें ही वापिस सौंप दे। जयसुख को बाहर निकलवाने का जिम्मा हमारा। गनीमत है कि अभी केस रजिस्टर नहीं हुआ है। जल्दी से जाके झुग्गी खाली कर दे और कागज ले आ।"
तड़पकर रह गयी थी वह। इसके सिवाय उसके पास कोई चारा भी नहीं बचा था।
छत छीनकर एकाएक जैसे किसी ने सर्दी, गर्मी और बरसात एकसाथ उसके सिर पर दे मारी हों! खून जैसे जम गया हो और उसे आग की लपटों के हवाले किया जा रहा हो! आँखों में आये पानी को दुपट्टे से पोंछकर वह झुग्गी की ओर चल दी।
झुग्गी खाली कर उसने कागज कल्ली प्रधान को थमाये तो उसने दो-चार और कागजों पर जसमती के अँगूठे लगवा लिए। कल्ली प्रधान की आँखों में कामयाबी की खुशी चमक रही थी।
"ठीक है, जा थोड़ी ही देर में तेरा आदमी आ जायेगा...।"
बाहर जाकर कल्ली के घर के सामने पड़े अपने सामान के पास वह बैठ गयी।
थोड़ी ही देर बाद जयसुख उसे ढूँढ़ता हुआ वहीं आ पहुँचा था। दोनों की आँखें गीली थीं और दोनों एक-दूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे। वे चेहरे अब पहचान चुके थे जिन्होंने उनका सामान घर से धक्का देकर बाहर दे फेंका था। रात काली और मनहूस होकर उनके सिर पर गिरने लगी थी।
थोड़ी देर बाद कलिराज बाहर आया। शायद वह कहीं जाने के लिए निकला था। जसमती ने आगे बढ़कर कहा, "कहीं के नहीं रहे हम तो? अब हम कहाँ जायें?" कुछ क्षण सोचने के बाद कलिराज बोला, "वो नेहरूनगर है न? जहाँ से पिछले साल झुग्गियाँ उजाड़ी गयी थीं। हम वहाँ फिर से झुग्गियाँ बसवा रहे हैं। हजार रुपया हम लेंगे। हजार पुलिस को देना होगा। दो दिन में जुगाड़ करके दे देना। प्लास्टिक की पन्नी, बाँस, फूस का इधर-उधर से इन्तजाम कर लो और जा के रातों-रात वहाँ झुग्गी बना लो।" कहते-कहते मोटरसाइकिल पर सवार होकर कलिराज फुर्र हो गया। पीछे से जसमती ने चीखकर कहा, "अब तू कर इन्तजाम...हम तो तेरे घर के बाहर ही पड़े हैं—अब तो मेरा पति भी मेरे साथ है!!"