कई दिनों से असद ने न तो गायत्री को ही चराई के लिए भेजा था और न वह खुद ही घर से बाहर निकला था। जिस कोठरी में वे खुद रहते-सोते थे, उसमें एक खूँटा गाड़कर उसने गायत्री को बाँधना शुरू कर दिया था और जहाँ पहले गायत्री बँधती थी, उस पर छप्पर के नीचे वह खुद रहने लगे थे। असद तो गायत्रीवाली कोठरी के दरवाज़े पर चारपाई बिछाकर दिन-रात उसकी रखवाली कर रहा था। गायत्री की हिफाजत में अपनी तरफ से कहीं कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। हर आहट पर उसकी रूह जैसे काँपकर रह जाती थी।
खुले रहने की आदी गायत्री कोठरी में बँधी-बँधी आज बहुत बेचैन होकर कुछ बिदक रही थी। असद ने उसे कोठरी से निकालकर वापिस छप्पर के नीचे ला बाँधा। इतने दिन कुछ नहीं हुआ तो आगे भी जो होगा देखा जायेगा। मुझे पता है वह सब मेरी हिम्मत तोड़ने के लिए किया, पर मैं नहीं डरूँगा। जो डर गया सो मर गया। डराकर ही तो मारना चाहता है वो हमें...सोचते-सोचते असद की आँख लग गयी।
गायत्री के बुरी तरह रम्भाने, अरड़ाने से असद हड़बड़ाकर उठा। उसने देखा एक परछाईं उसके घर की बाहरी चारदीवारी को फाँदकर भाग रही थी। उसने पीछा करने की कोशिश की, लेकिन अँधेरे में वह परछाईं जाने कहाँ गुम हो गयी थी। वह वापिस गायत्री की ओर लपका। घबराहट के मारे उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। जैसे-तैसे उसने माचिस की तीली जलायी थी। तीली की मरियल-सी रोशनी में उसने जो देखा, उसकी रूह काँपकर रह गयी थी। गायत्री की पूँछ और कान कोई काटकर ले गया था। गायत्री दर्द से बुरी तरह अरड़ा रही थी। उसकी घरवाली और सात साल का बेटा नूरा भी उठकर आ गये थे—गायत्री की हालत देखकर वे भी बुरी तरह रोने लगे थे।
क्षणभर में असद के दिमाग में सबकुछ साफ-साफ आ गया कि यह नापाक हरकत किसकी है; उस आदमी को किसने भेजा होगा? और आगे वे क्या करनेवाले हैं? किसी पूजास्थल को अपवित्र करके फसाद खड़ा करवायेंगे और फिर जब लोगों को पता चलेगा कि असद यानी एक मुसलमान की गाय के अंग गायब हैं तो लोग उसी पर शक करेंगे कि यह नापाक हरकत असद की ही है। इसके लिए मिलनेवाली भयानक सजा के बारे में सोचकर वह पसीना-पसीना होने लगा था।
उन्हें अपने सर पर साक्षात् मौत मँडराती हुई नजर आने लगी थी। खौफ और दहशत के मारे असद के हाथ-पाँव काँपने लगे थे। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह अब अपनी और परिवार की जान कैसे बचाये? कहाँ जा छुपे? गायत्री को कहाँ ले जा छुपाये। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह क्या करे? कहाँ जाये? उसे लग रहा था वह अपने पूरे परिवार की लाशों के पास बैठा रो रहा है। इसी बीच उसकी घरवाली ने रसोई में से हल्दी लाकर कटे हुए अंगों के शेष भाग पर लगाकर पट्टी कर दी थी।
अब उसे लगने लगा था जैसे वह दंगाई दरिंदों से घिर गया है—गाय क्या सिर्फ हिन्दुओं की माँ हो सकती है?
उसे तो उसी दिन से ही अंदेशा हो गया था कि गायत्री को लेकर कुछ बखेड़ा होनेवाला है, जिस दिन से शामनाथ चौधरी को पता चला था कि असद के पास बहुत बढ़िया गाय है, जो एक दिन में चौदह सेर दूध देती है और यह गाय और कोई नहीं उन्हीं की एक बीमार बछिया थी जिसे कि उन्होंने ही असद को कई साल पहले खुद ही दिया था। वह पता चलते ही उसी दिन चौधरी असद के घर खुद चलकर अपनी उस बछिया जो कि अब साक्षात् कामधेनु गाय थी, को लेने चले आये थे।
लेकिन असद अपने घर की बड़ी बुजुर्ग जैसी उस गाय को किसी भी कीमत पर किसी भी हालत में शामनाथ चौधरी को देने को तैयार नहीं हुआ था। असद की ये ‘ना’ चौधरी को अपने रुतबे पर सीधे ही थूकने जैसी लगी। काफी कहासुनी के बाद चौधरी असद को देख लेने की धमकी-सी देकर चले गये। उसी क्षण से असद और उसके परिवार के सर पर किसी भयानक लाइलाज रोग की कोई तलवार-सी लटक रही थी...चौधरी गाय पर हक तो ऐसे जता रहा है जैसे उसने ये बछड़ी मुझे मुफ्त में दी थी। पूरे सात दिन लगकर चौधरी के घर में दिहाड़ी लगाई थी, उसी के एवज में चौधरी ने ये बीमार बछड़ी मुझे दी थी, वो भी एकदम मरने-मराने की हालत में...!
लकड़ी का बहुत अच्छा कारीगर था असद। कई साल पहले एक दिन जब चौधरी के घर उनके बच्चे के लिए लकड़ी का पालना बना रहा था तो उसे पता चला कि चौधरी की गाय की एक छोटी-सी बछड़ी कई दिन से बीमार है और ठीक होने में नहीं आ रही। चौधरी ने जानवरों के एक डॉक्टर को बुलाकर दिखाया तो उसने एक पर्चे पर कुछ टीके और दवाइयाँ लिखकर दे दीं। पता चला कि वे टीके-दवाइयाँ इतने महँगे थे कि उनमें कम-से-कम चार सौ रुपये खर्च आते थे। चौधरी ने कहा था, "चार सौ रुपये और डॉक्टर के रोज आकर टीका लगाने की फीस अलग? फिर कोई गारंटी नहीं कि बच ही जायेगी... इतनी कीमत की तो ये बछड़ी है भी नहीं, फिर इस पर इतना खर्च कैसे कर दूँ? मरने दो!"
बछड़ी को उसकी हालत और ऊपरवाले की मर्जी पर छोड़ दिया गया था। घर के अन्दर काम करने में दिक्कत होने की वजह से चौधरी के घर के पिछवाड़े बैठकर असद काम करता था। वहीं पास ही पड़ी हुई वह बछड़ी अपनी मौत से लड़ती रही। घरवालों ने उसे पानी पिलाना तक छोड़ दिया था। उसे तड़फता हुआ देखकर असद की रूह भी तड़फड़ाकर रह जाती। अपना काम छोड़कर वह बार-बार उठकर उसे पानी पिलाता।
इस तरह बछड़ी का तिल-तिलकर मरना असद से बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसने चौधरी से कहा भी कि मालिक अगर पैसों के बदले इस बेजुबान की जान बच सके तो बचा लीजिए। उसकी इस अर्जी पर चौधरी ठहठहाकर हँस पड़ा—जितने की ये है नहीं उससे ज्यादा इसके इलाज पर खर्च कर डालूँ तो मुझे कौन समझदार कहेगा?
"इस तरह तो ये मर ही जायेगी।" तड़फकर कहा असद ने।
"तो क्या करें?"
एकाएक असद ने कहा, "कहें तो मैं ले जाऊँ इसे अपने घर?" असद के इस प्रस्ताव को सुनते ही चौधरी के दिमाग में विचार कौंध गया—बहुत भावुक हुआ जा रहा है ये तो? एकदम बेवकूफी की हद तक, इसका भी कुछ फायदा उठाया जा सकता है, पर क्या?
चौधरी को एकदम चुप्प-सा देखकर असद ने खुद ही कहा, "आप चाहें तो आखिरी साँस गिनती इस बछड़ी के एवज में जो आपके यहाँ काम किया है वो मजदूरी आप ही रख लें।"
"ठीक है तू भी क्या याद करेगा, ले जा।" उल्टा अहसान जताते चौधरी ने कहा।
बिना कोई नफा-नुकसान सोचे असद बछड़ी को घर लाकर उसकी सेवा और दवा-दारू में जुट गया। जाने कैसा लगाव हो गया था और उसके परिवार को उस बछड़ी से। अपना काम-धन्धा छोड़कर बछड़ी की सेवा में जुटा देख लोग उसे टोकते—पागल हो गये हो क्या? इस पर खर्च करने का फायदा?
किसी जीव से प्यार करना पागलपन होता है क्या? अपने घर के किसी फालतू बूढ़े, बुजुर्ग या किसी बच्चे का इलाज करवाते समय नफा-नुकसान सोचा जाता है क्या? लोग उलटा उसी पर हँसते और गर्दन झटककर चल देते। अपने घरेलू इलाज से फायदा न देखकर जिस दिन उसने अपनी घरवाली का जेवर बेचकर जानवरों के उसी डॉक्टर का इलाज शुरू करवाया था, उस दिन ‘गायत्री’ नाम रख छोड़ा था असद ने उस बछड़ी का और उसी दिन से उस इलाज से उसकी हालत भी बड़ी तेजी से सुधरने लगी थी।
उसी बीमार बछड़ी ने बड़ी होकर असद और उसके परिवार के सारे दलिदर ही धोकर रख दिये थे। उसके सारे कर्जे अपने दूध से चुका ही दिये थे। गायत्री की मदद के बिना नसीम के हाथ पीले होने नामुमकिन-सी ही बात थी। नसीम भी तो उसे अपनी सगी माँ से भी बढ़कर मानती थी। ससुराल के लिए विदा होने के वक्त गायत्री के गले लगकर कैसे फूट-फूटकर रोयी थी। उसके जाने के बाद भी दो-चार दिन गायत्री ने चारे में मुँह तक नहीं मारा था। फिर कुछ दिन बाद जब नसीम की खैर खैरियत की चिट्ठी आयी थी, नसीम की माँ ने वो चिट्ठी सबसे पहले गायत्री को पढ़कर सुनाई थी। वो बेजुबान भी जैसे सबकुछ ही तो समझती थी। नसीम के राजी-खुशी होने की खबर पाकर पेटभर कर खाया था उस दिन गायत्री ने। और नूरे की माँ ने भी तो गायत्री को आटे का पेड़ा खिलाये बिना खुद कभी नहीं खाया था। लोग हँसते—पिछले जन्म में कहीं तुम लोग हिन्दू तो नहीं थे? माँ की तरह पुज रही है गायत्री तुम्हारे यहाँ।
वह फखर से जवाब देता—माँ होने के सारे फर्ज पूरे किये हैं गायत्री ने, फिर सभी जीवों से प्यार करना तो सभी धर्मों में सिखाया जाता है। अपने जवाब पर लोगों को हैरान देखकर वह कहता, "पता नहीं क्यों लोग अपने धर्म के बारे में सिर्फ खुशफहमियाँ और दूसरों के धर्म के बारे में सिर्फ गलतफहमियाँ ही पाले रखते हैं?"
गायत्री जो कि अब उस परिवार में बड़ी बुजुर्ग की-सी हैसियत रखती थी और जिसे पहले उन्होंने पाला था, अब वह खुद उस पूरे परिवार को पाल रही थी। असद को परेशान देखकर बार-बार रम्भा उठती थी जैसे उसे दिलासा दे रही हो! असद भी अपना दुःख और उसका दर्द साझा करना चाहता था और उसके गले लग रोने लगता जैसे वह सबकुछ समझ-बूझ रही हो—शामनाथ जो चाहता है मैं कैसे मान लूँ? कहता है थोड़े-बहुत पैसे लेकर गाय मुझे सौंप दे। कोई पैसे लेकर अपनी माँ दूसरों को सौंप सकता है? कोई उस चौधरी से पूछे उस वक्त तूने भी उस बीमार बछिया को मरने के लिए छोड़ दिया था अब तू किस मुँह से उसे माँग सकता है? ये तो जोर-जबरदस्ती की बात हो गयी। सिर्फ इसलिए कि हम गरीब हैं और मुस्लिम भी? इसी बात का ही तो मुझे डर है कि कहीं शामनाथ ओछे हथकंडों पर ना उतर आये और खुद ही कोई नापाक हरकत करके खुद ही कोई बखेड़ा ना खड़ा कर दे और अपने फायदे के लिए कोई दंगा न करवा डाले...!
रूह काँपकर रह गयी असद की। उसके दिलो-दिमाग पर कितने ही मासूम और बेगुनाहों की चीख-पुकार चील-कौओं की तरह मँडराने लगी थी। उसकी घरवाली और बेटे का घर में से निकलना भी दूभर हो गया था। उन्हें रास्ते में रोककर शामनाथ चौधरी की बात मान लेने के लिए धमकियाँ दी जाने लगी थीं।
शाम हो चुकी थी। चूल्हा जलाती हुई नूरे की माँ बोली, "क्योंजी, यो ना हो सके कि कुछ दिनों के लिए गायत्री को ले जा के मामा के यहाँ छोड़ आओ? कम-से-कम गायत्री तो सही-सलामत रहेगी वहाँ...।"
"मेरे दिमाग में भी आयी थी ये बात पर... चौधरी को तो कुछ-ना-कुछ मौका चाहिए। अगर इधर उसने अफवाह उड़ा दी कि हमने अपनी देवी जैसी गाय को किसी कसाई को बेच डाला है तो..."
"चौदह सेर दूध देनेवाली अपनी गाय को कोई कसाई को क्यों बेचेगा?"
"बात जब धर्म की आ जाती है ना, तो सारे तर्क-तरीके धरे रह जाते हैं।"
उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्या नहीं करें? एकाएक नूरे की माँ ने कहा, "फिर तो इस फसाद से बचने का एक ही रास्ता है कि हम गायत्री को किसी हिन्दू भाई को सौंप दें।" कहते-कहते नूरे की माँ का गला भरा गया और आगे कुछ नहीं बोल पायी वह।
फिर उसी ठण्डे-से लहजे में असद ने उसकी बात बेकार कर दी, "फिर तो चौधरी और ज्यादा चिढ़ जायेगा... खुद ही कोई शरारत करके नाम हमारा ही लगा देगा। लोग भी हमीं पर शक करेंगे कि हमने अपनी माँ-जैसी गाय एकाएक किसी और को सौंप कैसे दी? इसमें जरूर कुछ साजिश होगी। अब तो सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि हम खुद ही अपनी गायत्री को शामनाथ चौधरी को ही सौंप दें, इसीमें सबकी भलाई है?"
उसकी बात सुनते ही नूरे की माँ फूट-फूटकर रोने लगी, "नहीं...गायत्री के बिना हम कैसे रहेंगे?" और वह गायत्री के गले लगकर काफी देर तक रोती रही।
बेहद निराश और नाउम्मीद-सा होकर असद ने कहा, "इसके सिवाय अब हमारे पास कोई चारा नहीं है वरना बात बढ़ गयी तो जाने कितने मासूम और बेगुनाह बेमौत...।"
थोड़ी देर बाद अपने-आप पर काबू पाकर नूरे की माँ ने कहा, "इसे ले ही जाना है तो नूरे के आने से पहले ही ले जाओ...वो आ गया तो रो-रो के बखेड़ा खड़ा कर देगा।"
मन मार के असद उठा, 'आज आखिरी बार तो दूह ही लूँ...फिर पता नहीं अमृत जैसा दूध नसीब हो या नहीं...'
वह उठा ही था कि राम मन्दिर के पुजारीजी की बीवी आ धमकी। उसे आया देखकर एकबार तो असद और उसकी बीवी की रूह काँप गयी। क्षणभर में जाने कितनी भयावह आशंकाओं ने उनके दिलो-दिमाग को हिलाकर रख दिया, लेकिन अगले ही क्षण पुजारिन के हाथ में लोटा देखकर उनकी जान-में-जान आयी।
बहुत डरते झिझकते हुए पुजारिन ने कहा, "हमारा छह महीने का बच्चा बहुत बुरी तरह बीमार है...मिनट-मिनट में उलटी-दस्त कर रहा है।" कहते-कहते पुजारिन का गला रूँध गया, "वैद्यजी ने कहा है कि इसे गाय का दूध पिलाओ...अगर हो सके तो थोड़ा-सा दूध...।"
"क्यों नहीं? क्यों नहीं? माँ के दूध पर तो सब बच्चों का बराबर का हक होता है ना?"
असद की मायूसी, निराशा और नाउम्मीदरी जाने कैसे एकाएक धुल-पुँछ गयी थी, "आप लोटा रख जाओ, मैं दूध दूह के अभी नूरे के हाथ आपके घर ही पहुँचा देता हूँ।" असद ने नये उत्साह में भरकर कहा।
पहले जैसे जोशोखरोश से वह गाय के सानी-पानी में जुट गया...चौधरी तो सिर्फ मुनाफे की बात सोचता है बस्स...उसे क्या पता कि राम के साथ हमारे मुल्क की तहजीब और कद्रें-कीमतें जुड़ी हुई हैं। अगर हम गायत्री चौधरी को सौंप दें तो पारबती बुआ, जिसके इकलौते जवान बेटे को टी.बी. हो गयी है, को चौधरी मुफ्त में दूध देगा?
दूध की पहली धार उसने बाल्टी में गिराई ही थी कि उसे कुछ बच्चों का शोर सुनायी दिया। उसने मुड़कर देखा—धूल-मिट्टी से सने हुए चार-पाँच बच्चे उसके पीछे आ खड़े हुए थे। नूरे के सिवाय सभी बच्चे हिन्दुओं के थे। नूरा बोला, "अब्बू! ये मेरे दोस्त हैं... दूध की एक-एक धार इन्हें भी पिलाओ ना?"
"हाँ, हाँ... क्यों नहीं, एक-एक कर मेरी बायीं ओर आते जाओ।"
असद बारी-बारी सब बच्चों के मुँह में गाय के थन से सीधे ही दूध की धारें मारता रहा। बच्चे खुशी से किलकारियाँ मार रहे थे। आखिर में कोई चार-पाँच साल का बच्चा जोकि उन सबमें से छोटा भी था, डरते-डरते आगे बढ़ा।
"डरो मत... हाँ-हाँ... मुँह खोल... पूरा मुँह खोल।"
ज्योंही असद ने उसके मुँह में दूध की धार मारी, नूरा बोला, "अब्बू ये लड़का पता है कौन है? शामनाथ चौधरी का पोता..."
चौधरी की नाम आते ही असद काँपकर रह गया। उसके हाथ के काँपने से दूध की धार बच्चे के मुँह के अन्दर ना जाकर चेहरे पर पड़ गयी। उसकी नाक, गाल... सारे चेहरे पर दूध लग गया। बच्चा खाली मुँह चलाकर रह गया। इसे देखकर बाकी सब बच्चे हँस-हँसकर दुहरे होने लगे। बहुत पवित्र और बेखौफ-सी उस हँसी को सुनकर असद की रूह भी खिल उठी। वह भी हँस पड़ा। गायत्री भी बार-बार उधर देख-देखकर खुश हो रही थी। माँ की तरह बच्चों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ती हुई-सी।
असद ने चौधरी के पोते का मुँह पुछवाया और फिर बड़े प्यार से दूध की धारें पिलायीं। खुशी से उछलता हुआ वह जाने लगा तो असद ने उसे आवाज देकर रोका और कहा, "अपने दादा को कहियो कि गाय जो दूध देती है उस पर लोगों का नाम लिखकर नहीं देती। माँ के दूध पर सब बच्चों का बराबर हक होता है। गाय के दूध पर अपना सिर्फ अपना नाम लिखने की कोशिश फिजूल है।"
उनके जाने के बाद असद को लगा कि शामनाथ के पोते से उसे यह सब नहीं कहना चाहिए था। वह तो पहले ही से फुँका बैठा है। कहीं उसे यह सब बुरा लगा तो चिढ़कर जाने क्या कर बैठें?
कैसे बुरे-बुरे ख्यालों के डर से उसे सारी रात नींद नहीं आयी। लेकिन कुछ ऐसा-वैसा हुआ नहीं। इससे असद को थोड़ी तसल्ली हो गयी थी।
अगली रात गायत्री के कोठरी के अन्दर बँधे-बँधे कूदने-बिदकने से असद ने उसे वापिस उसी छप्पर के नीचे ला बाँधा और उसी रात उसकी पूँछ और कान काट लिए गये थे। इस सबका ही तो डर असद को खाये जा रहा था। उसे लगा आज की रात उसके परिवार के लिए आखिरी रात है। आज का दिन देखना भी नसीब होगा या नहीं, कुछ पता नहीं। गलती मेरी है, मैंने गायत्री को बाहर बाँधा ही क्यों? लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए धर्म की आड़ लेकर कितना नीचे गिर सकते हैं? कितने लोगों की जान ले सकते हैं।
उनके घर पर मची हुई कुरलाहट को सुनकर आस-पास के उनकी बिरादरी के लोग आ जुटे थे।
"क्या हुआ? क्या हुआ?"
"खैर तो है ना? कुछ बोलो भी?"
बहुत खोद-खोदकर पूछने के बावजूद वे बोले कुछ नहीं, बस रोते रहे। फिर असद ने बस इतना कहा, "किसी ने गायत्री के कान और पूँछ काट लिए और अब खुद ही दंगाकर उसका जिम्मा हम पर ही डालना चाहता है।"
"है कौन वो काफिर... उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे हम, है कौन वो?"
असद ने किसी का नाम नहीं बताया पर कुछ ही देर में लाठियों और लोहे के सरियों से लैस एक सेना तैयार हो गयी थी और वे अपने धर्म की जय और दूसरे धर्म के नाश के नारे लगाने लगे थे। असद को थोड़ा सहारा तो हो गया था कि अब उतना अकेला और असहाय नहीं है। पर लग रहा था कि जो होनेवाला है वह किसी के लिए भी अच्छा नहीं होगा।
पूरे इलाके में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। वैसा ही हो रहा था जैसा असद को डर था। उधर मन्दिर के बाहर भी भीड़ आ जुटी थी। धर्म पर आये ख़तरे को देखते हुए उनके हाथों में भी त्रिशूल, लाठियाँ और सरिये आ गये थे। शामनाथ मन्दिर के बाहरी अहाते में खड़े इधर-उधर जैसे कुछ ढूँढ़ रहे थे।
पुजारीजी शोर सुनकर बाहर आये और पूछने लगे, "यह सब क्या है? क्या ढूँढ़ रहे हैं चौधरी साहब?"
हड़बड़ा गये शामनाथ, "वो, वो ढूँढ़ना क्या... हाँ, हाँ सुना है कि किसी ने गाय के कटे हुए अंग? यहाँ दिख नहीं रहे? गये कहाँ? म्लेच्छों की हिम्मत तो देखो। हम इन म्लेच्छों का नामोनिशान मिटा देंगे..."
"लेकिन चौधरी साब, यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ है... किसी ने मन्दिर में कोई माँस-वाँस नहीं फेंका है... मैंने सुबह खुद सफाई-वफाई की है। मुझे तो ऐसा कुछ नहीं मिला, लेकिन आपने किससे सुना है यह सब?"
जवाब नहीं दे सके शामनाथ चौधरी। नारे लगाती हुई भीड़ भी एकदम चुप हो आयी थी। पुजारीजी ने हँसते हुए कहा, "चौधरी साब, आप भी... इतने बड़े आदमी होकर अफवाहों पर यकीन करके चले आये।"
"अफवाह क्या... मैंने तो खुद..." कहते-कहते एकाएक रुक गये चौधरी, उन्हें लगा इतने लोगों के बीच जैसे वे एकाएक नंगे हो गये हैं। एकाएक सन्नाटा-सा छा गया वहाँ। चौधरी साब के हाथ-पाँव काँपने लगे, अगर लोगों को पता चल जाये कि यह हरकत उन्हीं की है तो लोग क्षणभर में उनके चीथड़े उड़ा देंगे। मारे घबराहट के चौधरी साहब पसीना-पसीना हो आये। आँय-बाँय करते हुए बोले, "मैंने खुद...मैंने तो खुद कहा है कि ये अफवाह ही होगी!"
बात को सम्भाल ही लिया चौधरी साहब ने। उनके साथियों की भी जान में जान आ गयी।
शामनाथ चौधरी की आवाज की कड़क फिर लौट आयी थी, "पर पता चला है कि वो असद है ना? उस म्लेच्छ ने जो गाय पाल रखी थी उसके कान और पूँछ गायब हैं। हमारे मन्दिर को अपवित्र करने के लिए ही उसने ये हरकत करायी है। ठीक है यहाँ गऊ माँस बरामद नहीं हुआ है पर उस म्लेच्छ ने गऊ माता के साथ ऐसी हिंसक हरकत किसलिए की है?"
अब एकाएक पुजारीजी को कोई जवाब नहीं सूझा। उन्होंने हथियारों से लैस भीड़ को देखा। उनकी आत्मा काँप उठी। चौधरी साहब कड़कड़ाते हुए अपना सवाल फिर दोहरा रहे थे। पुजारीजी के दिलो-दिमाग पर जाने कितने बेकसूर और मासूमों की चीख-पुकार चील-कौओं की तरह मँडराने लगी थी। 'जैसे भी हो, मैं ये हिंसा नहीं होने दूँगा।' मन ही मन उन्होंने निर्णय किया और बोले, "वो दरअसल ऐसा हुआ कि कल मैं असद के घर के पासवाले कीकर के पेड़ से दातुन काटने गया हुआ था। वहीं असद की गाय भी चर रही थी। एकाएक उस गाय को जाने क्या हुआ कि मुझे मारने दौड़ पड़ी। मेरे तो होश ही उड़ गये...मेरे हाथ में दातुन काटनेवाला चाकू था, मैंने अपनी आत्मरक्षा को वही चला दिया और बस असद की उस गाय के कान और पूँछ कट गये। मुझे भी बहुत अफसोस है ये जो कुछ भी हुआ...खैर! मैं इसके लिए शास्त्रों के अनुसार पश्चाताप करूँगा ही..."
पुजारीजी से ऐसे बयान को चौधरी साहब को बिलकुल भी आशा नहीं थी। उनके लिए अब ये समझना कुछ मुश्किल नहीं था कि खुद उन्होंने रात को जो गऊ-माँस मन्दिर में फिंकवाया था उसे दिन होने से पहले पुजारीजी ने कहीं फेंक, छुपाकर जगह को धो-धाकर साफ करवा दिया होगा ताकि दंगा ना हो सके। हिंसा ना भड़क सके।
अपने इरादों और मंसूबों पर पानी फिरता देखकर चौधरी शामनाथ को गुस्सा तो बड़ा आ रहा था पर वे कर कुछ नहीं पा रहे थे। वे खीज उठे, "क्यों झूठ बोल रहे हैं पुजारीजी? आप शायद असद को बचाना चाहते हैं।" आप जैसों की वजह से हमारा धर्म मार खा रहा है। हम कैसे मान लें कि आप जो कह रहे हैं वो सच है?"
"आप ही बताइए कैसे विश्वास होगा आपको?"
"ठीक है... आप भगवानजी की मूर्ति के सामने खड़े होकर कसम खाइए कि आप जो कह रहे हैं, वो सच है!"
शामनाथ चौधरी जानते थे कि पुजारीजी झूठ बोल रहे हैं—अब देखता हूँ कैसे खाते हैं ये झूठी कसम?
पुजारीजी धर्म संकट में पड़ गये थे। योंही झूठ बोलना और बात है, पर मन्दिर में भगवान के सामने खड़े होकर कसम खाना और बात है। कैसे खायें वो झूठी कसम? उनकी आत्मा तक काँप उठी थी। तो क्या बेकसूर और मासूमों को हिंसा की आग में धकेल दें। नहीं, मेरा धर्म हर हालत में हिंसा से लोगों को बचाने की शिक्षा देता है। मैं दंगा नही होने दूँगा। इसके लिए मुझे चाहे कुछ भी करना पड़े और पुजारीजी ने सबके सामने कसम खाकर हिंसा को भड़कने से रोक लिया।
मुँह की खाकर शामनाथ अपने घर की ओर लौटते हुए सोचने लगे थे। एक तो काम नहीं बन पाया ऊपर से मैंने गऊ माता के कान और पूँछ कटवा डाले, उलटा वो पाप मेरे सिर चढ़ गया। एक मैं हूँ जो... और एक वो पुजारीजी जिसने झूठी कसम खाकर इतना बड़ा फसाद होने से रोक लिया। लेकिन मैं शामनाथ इनसे मात खा लूँ...? जिस दिन कभी मौका मिला तब बताऊँगा इन्हें।
खतरा टल गया था। शाम तक सबकुछ शांत हो गया था पर गऊ माता के जख्म अब भी टीस रहे थे। असद और दूसरे लोगों के मन में पुजारीजी के लिए इज्जत और भी बढ़ गयी थी।
कई दिन बाद सुबह-सुबह जबकि शामनाथ चौधरी कोई नयी तगड़ी चाल चलकर पुराना हिसाब चुकाने की सोच रहे थे। असद गाय की एक नन्ही-सी बछड़ी को लिए हुए आ पहुँचा था। दुआ-सलाम के बाद असद ने कहा, "मालिक, हमारी गाय गायत्री ने बछड़ी दी थी। इसे मैं आपको भेंट देने आया हूँ।"
दूध जैसी सफेद नन्ही-सी बछड़ी को देखकर चौधरी की रूह तक जैसे खिल उठी थी। शर्म से पानी-पानी हो गये शामनाथ चौधरी। उन्हें लगा कि जैसे किसी ने थप्पड़ मार-मारकर उनके चेहरे को इतना बिगाड़ दिया है कि वे किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे हैं।