राजा विक्रमादित्य ने बेताल को पेड़ से उतार कर अपने कंधे पर डाल कर उस साधु के पास जाने के लिए निकल पड़े।
बेताल ने कहा, “राजा विक्रम, तुम बहुत साहसी हो, रास्ता काफी लंबा है इसलिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगा। पर तू बीच मैं कुछ मत बोलना है याद रख ये मेरी शर्त है तू कुछ भी बोला तो मैं वापस से आपने पेड़ पर लौट जाऊंगा। कहानी के अंत में मैं तुझे एक प्रश्न पूछूंगा अगर तुमने जवाब जानते हुए भी उतर नहीं दिया, तो मैं तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूंगा।”
विक्रम चुपचाप चलते रहे। बेताल ने कहानी शुरू की।
“एक नगर में एक राजा था, जिसकी एक सुंदर और बुद्धिमान पुत्री थी। उसके विवाह के लिए तीन राजकुमार आए। तीनों ही वीर, बुद्धिमान और योग्य थे। एक दिन अचानक उस राजकुमारी की मृत्यु हो गई। तीनों राजकुमार दुखी हो गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। पहला राजकुमार उसकी अस्थियां लेकर तीर्थ यात्रा पर चला गया। दूसरा उसकी राख को संभालकर श्मशान में बैठा रहा। तीसरा राजकुमार एक साधु से विद्या सीखकर ऐसी शक्ति लेकर आया, जिससे मृत व्यक्ति को जीवित किया जा सकता था।”
बेताल की आवाज और भी गहरी हो गई, “जब तीसरे राजकुमार ने उस विद्या से राजकुमारी को जीवित किया, तो तीनों के बीच विवाद हो गया कि राजकुमारी का असली पति कौन है।”
विक्रम चुपचाप चलते रहे, लेकिन बेताल ने कहा, “राजा, अगर तुम्हें उत्तर पता है और तुम नहीं बोलोगे, तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।”
विक्रम ने शांत स्वर में कहा, “जो राजकुमार अस्थियां लेकर गया, वह पुत्र के समान है। जिसने राख की रक्षा की, वह पिता के समान है। और जिसने उसे जीवित किया, वह सृजनकर्ता के समान है। इसलिए जो राजकुमार उसकी राख की रक्षा कर रहा था, वही उसका सच्चा पति कहलाएगा, क्योंकि उसने सबसे अधिक निष्ठा दिखाई।”
इतना सुनते ही बेताल जोर से हंसा और बोला, “राजा, तूने सही उतर दिया पर तू शर्त भूल गया तुमने फिर बोल दिया मैं जा रहा हु आपने पेड़ पर।” और वह शव फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका।
विक्रम बिना थके फिर से उस पेड़ की ओर बढ़ गए, क्योंकि उन्हें अपना वचन निभाना था। वो फिर बेताल के पेड़ से उतार कर चलने लगे और बेताल ने कहानी सुनना शुरू किया।
एक समय की बात है कि अंगदेश के चंपावती नगर में श्रीदत्त नाम का एक धनी और रूपवान राजकुमार रहता था उसी नगर में एक सुंदर रूपवती नाम की कन्या थी जिसके विवाह के लिए उसके पिता ने योग्य वर की तलाश शुरू की।
कुछ ही समय में तीन अत्यंत प्रतिभाशाली युवक आए जिनमें से पहला युवक शास्त्रों का प्रकांड पंडित था और मंत्र विद्या में निपुण था दूसरा युवक ऐसा असाधारण योद्धा था जो अकेले ही पूरी सेना का सामना कर सकता था और तीसरा युवक पशु-पक्षियों की भाषा समझने और भविष्य बताने की कला में माहिर था।
रूपवती के पिता धर्मसंकट में पड़ गए क्योंकि तीनों ही युवक अपनी-अपनी कला में सर्वश्रेष्ठ थे और कन्या किसी एक को ही दी जा सकती थी इसी बीच एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी और एक जहरीले साँप के काटने से रूपवती की मृत्यु हो गई तीनों युवक शोक में डूब गए।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी पहले युवक ने अपनी मंत्र शक्ति से रूपवती के शरीर को सुरक्षित रखा दूसरे युवक ने पाताल लोक जाकर अमृत प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की और तीसरा युवक अपनी विद्या से मार्ग बताता रहा अंततः तीनों के सम्मिलित प्रयासों से रूपवती जीवित हो उठी।
अब असली विवाद शुरू हुआ कि जीवित हुई कन्या पर किसका अधिकार है मंत्र पढ़ने वाले का अमृत लाने वाले का या मार्ग बताने वाला।
बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि हे राजन न्याय के अनुसार रूपवती का पति किसे होना चाहिए।
राजा विक्रम ने अपनी बुद्धि से उत्तर दिया कि “वह युवक जिसने अमृत लाकर उसे जीवन दिया वह उसके पिता के समान है क्योंकि उसने जन्मदाता जैसा कार्य किया, जिसने मार्ग बताया वह केवल मार्गदर्शक है लेकिन वह युवक जिसने मंत्रों के प्रभाव से उसके शरीर की रक्षा की और उस दौरान उसके साथ रहा वही उसका वास्तविक रक्षक और पति होने का अधिकारी है।”
राजा का सटीक उत्तर सुनते ही शर्त के अनुसार बेताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका।