नीरव आसरात के ठीक दो बजे थे। मोबाइल की तीखी घंटी ने सन्नाटे को ऐसे चीर दिया जैसे किसी शांत तालाब में अचानक पत्थर फेंक दिया गया हो। चंपा की नींद हड़बड़ा कर खुली। आँखें आधी खुली थीं, शरीर अभी नींद में डूबा हुआ, पर मन बेचैन हो उठा।“हेलो…” उसने उनींदी आवाज़ में कहा।उधर से यामिनी की आवाज़ आई—थकी हुई, बुझी हुई—“चंपा… कल का प्रोग्राम कैंसिल… तुम आराम से सो जाना… सुबह स्टेशन मत आना…”फोन कट गया।बस इतना ही।चंपा कुछ क्षण तक मोबाइल को देखती रह गई। जैसे शब्द उसके कानों तक तो पहुँचे, पर दिमाग ने उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर दिया हो। अभी कुछ देर पहले ही तो उसने अपनी अटैची बंद की थी। फिर सोचा—ऋषिकेश की यात्रा में अटैची कहाँ ढोएगी—तो पिट्ठू बैग में कपड़े जमा लिए थे। चार दिन की आज़ादी, चार दिन की मस्ती… महीनों की योजना… और अब—सब खत्म?वह झटके से उठ बैठी। कमरे की लाइट जलाई। दीवारें जैसे उसे घूर रही थीं। मन के भीतर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो।तभी फोन फिर बजा। इस बार चित्रा थी।“देखा? ये क्या तमाशा है!” चित्रा की आवाज़ में झुंझलाहट थी, “मैं तो कहती हूँ, गलती हमारी थी—दो बहनों को साथ ले लिया प्लान में! अब भुगतो…”चंपा चुप रही। चित्रा बोलती गई—“घरवालों से लड़कर छुट्टी ली, पैसे एडवांस दिए, सबको बता दिया… अब क्या मुँह दिखाएँगे?”कुछ देर तक दोनों तरफ से खामोशी रही। फिर चंपा ने धीमे से कहा—“सुबह चलते हैं… देखते हैं क्या हुआ है…”सुबह नौ बजे चंपा, यामिनी और कामिनी के घर पहुँची। दरवाज़ा खुला, तो भीतर का माहौल देखकर उसके कदम ठिठक गए। घर में अजीब-सी मुरदनी छाई थी। जैसे कोई अनहोनी घट चुकी हो।यामिनी सामने आई। आँखें सूजी हुई, चेहरा पीला। कामिनी पास ही खड़ी थी—चुप, पत्थर-सी।“क्या हुआ?” चंपा ने धीरे से पूछा।यामिनी ने भारी आवाज़ में कहा—“संतो जीजी… कल शाम… ससुराल से लौटा दी गईं… हालत ठीक नहीं है…”शब्द कम थे, पर उनके पीछे छुपा दर्द बहुत गहरा था।कुछ देर बाद तीनों सहेलियाँ उस कमरे में पहुँचीं, जहाँ संतो जीजी—संत्वना—बैठी थीं। उनकी माँ पास ही चुपचाप बैठी थीं। कमरे में अजीब-सी स्थिरता थी—जैसे समय ठहर गया हो।संतो जीजी की आँखें खाली थीं। वे अपनी माँ को देख रही थीं, और माँ उन्हें। दोनों के बीच जैसे अनकहा संवाद चल रहा था—दर्द का, टूटन का।चंपा कुछ क्षण चुप रही। फिर उसने अपनी आदत के अनुसार माहौल को हल्का करने की कोशिश की।“अरे जीजी… ये बाल तो आपके अभी भी वैसे ही हैं… याद है कॉलेज में सब आपसे जलते थे…” उसने मुस्कराते हुए कहा।कोई जवाब नहीं।वह फिर बोली—“और वो संस्कृत का डिबेट… जब आपने पूरे कॉलेज को चुप करा दिया था…”संतो जीजी की आँखों में हल्की-सी हरकत हुई।चंपा ने धीरे-धीरे पुराने दिनों की बातें छेड़ी—स्कूल, कॉलेज, हँसी-मज़ाक… बीते हुए समय के छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ती गई। लगभग बीस मिनट बाद, संतो जीजी के होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कान उभरी।यामिनी और कामिनी ने एक-दूसरे की ओर देखा—आशा की एक किरण।धीरे-धीरे संतो जीजी भी कुछ बोलने लगीं। पहले छोटे वाक्य, फिर थोड़ी लंबी बातें। एक घंटे के भीतर वे पहले से काफी सामान्य लगने लगीं।और फिर—बातों का रुख धीरे-धीरे उनके जीवन की ओर मुड़ गया।“मैंने संस्कृत से एम.ए. किया था…” संतो जीजी ने धीमे स्वर में कहा, “स्कूल में पढ़ाती थी… बच्चे हमेशा टॉपर आते थे…”उनकी आँखों में एक क्षण के लिए पुरानी चमक लौटी—फिर बुझ गई।“पिताजी ने शादी तय कर दी… पुलिस दरोगा… बिना दहेज…”“आपने मना नहीं किया?” चंपा ने पूछा।“बहुत किया…” वे हल्के से हँसीं—एक कड़वी हँसी—“पर बेटियों की ज़िद कहाँ चलती है…”उन्होंने आगे कहना शुरू किया—“ससुराल पहुँची… अगले दिन से ही… गाय-गोसला… गोबर… कपड़े… सब काम…”उनकी आवाज़ काँपने लगी।“मैंने कहा—मुझे ये सब नहीं आता… तो सास ने कहा—‘हमको बहू नहीं, मजदूर चाहिए’…”कमरे में सन्नाटा गहरा गया।“एक दिन थककर बैठ गई… तो उन्होंने इतना सुनाया… और…” वे रुक गईं।कामिनी ने उनका हाथ पकड़ लिया—“और जीजी?”“और… उसने मारा…” उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, “ऐसे मारा… कि निशान भी न रहे…”चंपा के भीतर गुस्से की आग भड़क उठी।“दरोगा था न…” संतो जीजी ने जैसे खुद को समझाते हुए कहा, “जानता था कैसे मारना है…”धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कहानी खोलनी शुरू की—“वो अक्सर बाहर रहता… मैं अकेली… डरती रहती… हर समय लगता—मैं गलत हूँ… मैं ही बेकार हूँ…”उनकी आवाज़ टूटने लगी—“मैं अपनी डिग्री भूल गई… खुद को भूल गई…”कमरे में बैठे तीनों सहेलियाँ अब आँसुओं को रोक नहीं पा रही थीं।“फिर एक दिन…” संतो जीजी ने गहरी साँस ली, “पड़ोसन ने उसका फेसबुक दिखाया…”“वहाँ… उसकी दूसरी बीवी… बच्चे…”जैसे बिजली गिर गई हो।“मैंने माँ को फोन किया… सब बताया…” वे सिसकने लगीं, “तभी सास आ गई… बाल पकड़कर खींचा… कमरे में बंद कर दिया…”उनकी माँ रो पड़ीं।“फिर… गालियाँ… बहुत गालियाँ… और… कल… मुझे यहाँ छोड़ गए…”कमरे में अब सिर्फ सिसकियाँ थीं।कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर चंपा ने अपने आँसू पोंछे। उसकी आँखों में अब एक अलग चमक थी—दृढ़ता की।“बस… अब बहुत हुआ…” उसने धीरे लेकिन ठोस आवाज़ में कहा।चित्रा, जो अब तक चुप थी, बोली—“हमें कुछ करना होगा…”यामिनी ने सिर उठाया—“हाँ… जीजी को ऐसे नहीं छोड़ सकते…”तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उनके बीच एक मौन संकल्प जन्म ले चुका था।चंपा ने कहा—“अभी चलते हैं… वकील के पास…”यामिनी की माँ ने आश्चर्य से देखा—“अभी?”“हाँ, अभी…” चंपा ने दृढ़ स्वर में कहा, “अब चुप रहने का समय नहीं है…”तीनों सहेलियाँ उठ खड़ी हुईं।दरवाज़े से बाहर निकलते समय चंपा ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। संतो जीजी खिड़की के पास खड़ी थीं। उनके चेहरे पर हल्की-सी थकान थी, पर आँखों में—एक नई चमक।शायद यह उम्मीद की पहली किरण थी।शायद यह वही नीरव आस थी—जो बिना शोर किए, भीतर ही भीतर जन्म लेती है… और फिर एक दिन जीवन बदल देती है।