parchhai in Hindi Short Stories by राजनारायण बोहरे books and stories PDF | परछाईं

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परछाईं

परछाइयाँ
असीर उस दिन चौके के कोने में बैठा थाली को ऐसे घूर रहा था जैसे उसमें रोटी नहीं, कोई सवाल रखा हो—जिसका जवाब उसके पास नहीं है। दाल की सतह पर जमी पतली-सी परत बार-बार काँप जाती, जैसे उसकी अपनी बेचैनी थाली में उतर आई हो।“खा क्यों नहीं रहे हो?” अब्बू ने सिलाई मशीन से नजर उठाए बिना पूछा। उनके पैर मशीन के पेडल पर वैसे ही चलते रहे—एक लय में, जैसे जिंदगी का पहिया, जो चाहे कुछ भी हो, रुकता नहीं।असीर ने कौर तोड़ने की कोशिश की, मगर हाथ वहीं ठिठक गया। “भूख नहीं है,” उसने धीमे से कहा।असल में भूख तो थी, पर उससे भी बड़ी एक खलिश थी—सफिया। वही सफिया, जिसके साथ कॉलेज के आखिरी दिनों में उसने अनगिनत ख्वाब बुने थे। अब वह दिल्ली जा रही थी—एमबीए करने। और असीर… असीर को लगा जैसे वह वहीं रह जाएगा, उसी छोटे-से कस्बे में, जहाँ सपनों की उड़ान अक्सर छत से टकरा कर लौट आती है।“अब्बू…” उसने हिम्मत करके कहा, “मैं भी दिल्ली जाना चाहता हूँ। एमबीए करने।”मशीन अचानक थम गई। जैसे किसी ने वक्त को पकड़कर रोक लिया हो।“क्यों?” अब्बू ने सिर उठाया। उनकी आँखों में सवाल कम, थकान ज्यादा थी।“अच्छा पैकेज मिलेगा… करियर बनेगा…” असीर ने वही जवाब दोहराया, जो उसने कई बार खुद से कहा था—और हर बार उसे थोड़ा और खोखला पाया था।अब्बू ने लंबी साँस ली। “बेटा, करियर बनाने के लिए पहले घर संभालना पड़ता है। मेरी हालत तुम जानते हो। यह दुकान… बस घर चलाने लायक है। दिल्ली का खर्च… हम नहीं उठा सकते।”यह ‘नहीं’ कोई साधारण शब्द नहीं था। यह जैसे एक दीवार थी—जिसके उस पार सफिया थी, और इस पार असीर।रात को देर तक वह छत पर लेटा रहा। आसमान में टिमटिमाते तारे उसे चिढ़ाते से लगे—जैसे हर तारा एक सपना हो, जो उसके हाथ से फिसल रहा हो।अगली सुबह वह बिना कुछ बताए गाँव की बस में बैठ गया—दादू के पास।गाँव की मिट्टी में एक अलग ही सुकून था। हवा में धूल जरूर थी, पर उसमें एक अपनापन भी था—जैसे हर कण उसे पहचानता हो।दादू आँगन में खाट पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। असीर को देखते ही उनकी आँखों में हल्की-सी चमक आई।“अरे, ये कौन मेहमान आ गया? बरखुरदार, रास्ता भूल आए क्या?” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।असीर ने झेंपते हुए उनके पैर छुए। “दादू… एक काम था…”“हूँ…” दादू ने गौर से उसे देखा। “काम है, तभी तो आए हो। वरना तो लाख बुलाओ, शहर से फुरसत कहाँ मिलती है तुम्हें।”असीर अब रुका नहीं। उसने एक साँस में सब कह डाला—दिल्ली, एमबीए, दोस्त, सफिया… सब।दादू चुपचाप सुनते रहे। उनके चेहरे पर न हैरानी थी, न गुस्सा—बस एक गहरी समझ थी, जो अनुभव से आती है।“तो तुम दिल्ली जाना चाहते हो…” उन्होंने धीरे से कहा।“हाँ दादू… आपके सहारे ही कहा है सबको…” असीर ने उम्मीद से उनकी तरफ देखा।दादू ने कुछ पल सोचा, फिर बोले—“ठीक है, पहले नहा-धो लो। फिर बैठकर बात करेंगे।”असीर के चेहरे पर जैसे रोशनी फैल गई। वह खुशी से अपना बैग उठाकर कुएँ की ओर भागा।दादू उठे और उसके खुले पड़े बैग की ओर बढ़े। तभी “टुन” की हल्की-सी आवाज आई—मोबाइल पर नोटिफिकेशन।उन्होंने यूँ ही मोबाइल उठा लिया। स्क्रीन पर एक मैसेज चमक रहा था—“अस्सू, बताओ… तुम अपने देहाती दादू को बेवकूफ बनाने में सफल हुए या नहीं?”दादू की आँखें सिकुड़ गईं।“देहाती…” उन्होंने बुदबुदाया। उनकी मूँछ हल्की-सी फड़क उठी।तो यह बात है… यह लड़की, जो शहर की चमक में डूबी है, उनके पोते को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है… और उन्हें—एक ‘देहाती’ समझ रही है।दादू ने मोबाइल धीरे से वापस रख दिया। उनके चेहरे पर अब एक अजीब-सी शांति थी—जैसे कोई अनुभवी खिलाड़ी अपनी चाल सोच चुका हो।दोपहर का खाना खाकर दोनों दालान में बैठे थे। हवा में खामोशी थी, पर वह बोझिल नहीं—गंभीर थी।“असीर,” दादू ने शुरुआत की, “यह बताओ, इस वक्त तुम्हारे घर की आमदनी का सहारा क्या है?”“अब्बू की टेलरिंग शॉप,” असीर ने तुरंत कहा।“और आजकल टेलरिंग का धंधा कैसा चल रहा है?”असीर चुप हो गया। उसने कभी इस सवाल पर गहराई से सोचा ही नहीं था।दादू ने खुद ही जवाब दिया—“धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। लोग अब रेडीमेड कपड़े खरीदते हैं—सस्ते भी, फैशनेबल भी।”“लेकिन अब्बू के ग्राहक तो…” असीर ने कहना चाहा।“वो रिश्ते निभा रहे हैं,” दादू ने बात काट दी। “पर रिश्ते पेट नहीं भरते, बेटा। जब सस्ता और अच्छा मिलेगा, तो लोग वहीं जाएंगे।”असीर के भीतर कुछ हिला। जैसे कोई परछाईं टूटने लगी हो।“सोचो,” दादू आगे बोले, “अगर कल दुकान बंद हो गई, तो क्या होगा? तुम्हारे अब्बू क्या करेंगे? घर कैसे चलेगा?”अब असीर के पास कोई जवाब नहीं था।“तुम दिल्ली जाओगे,” दादू ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “लाखों रुपये खर्च करोगे। और यहाँ… तुम्हारे अब्बू अकेले जूझते रहेंगे। यह पढ़ाई तुम्हें बड़ा बनाएगी या छोटा?”यह सवाल सीधा दिल में उतर गया।असीर को सफिया का चेहरा याद आया—उसकी मुस्कान, उसकी बातें… और फिर वह मैसेज, जो उसने नहीं देखा था, पर जैसे उसकी आत्मा ने पढ़ लिया हो।“दादू…” उसकी आवाज भर्रा गई, “क्या मैं गलत हूँ?”दादू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “गलत और सही का फैसला वक्त करता है। पर एक बात याद रखना—जो सपना तुम्हें अपने अपनों से दूर कर दे, वह सपना नहीं… परछाईं होता है।”शाम को जब असीर गाँव से वापस लौटा, तो उसके कदम हल्के थे—जैसे उसने कोई भारी बोझ उतार दिया हो।अब न उसके मन में दिल्ली जाने की हड़बड़ी थी, न सफिया के दूर जाने का डर।उसने तय कर लिया था—इस वक्त उसकी प्राथमिकता घर है, अब्बू हैं… उनकी मेहनत है।रात को उसने अब्बू के पास बैठकर कहा—“अब्बू, मैं आपकी दुकान संभालूँगा। और उसे नया रूप देंगे… रेडीमेड भी रखेंगे, ऑनलाइन भी बेचेंगे।”अब्बू ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में पहली बार उम्मीद की एक हल्की-सी चमक थी।असीर ने आसमान की तरफ देखा। तारे अब भी वही थे—पर आज वे दूर नहीं लगे।क्योंकि आज उसने समझ लिया था—हर चमकती चीज रोशनी नहीं होती… कुछ सिर्फ परछाइयाँ होती हैं।