जरा संभल के
कमल चोपड़ा
सजग की मौसी की लड़की की शादी थी। शादी में शामिल होने के लिये उसके बाबूजी को लखनऊ जाना था। पर दो दिन पहले बाबूजी बीमार हो गये। समस्या बन गई कि शादी में कौन जाये? माँ बाबूजी की देखभाल में लगी हुई थी। वह भी नहीं जा सकती थी। अंत में फैसला हुआ कि सजग अकेला ही लखनऊ चला जाये और शादी का रौनक मेला देख आये। सजग भी खुशी-खुशी लखनऊ जाने के लिये तैयार हो गया।शादी में शामिल होकर सजग को बहुत अच्छा लग रहा था। भव्य पंडाल, साज-सजावट, तरह-तरह के पकवान और इधर-उधर मौज-मस्ती करते दौड़ते-भागते बच्चे।खाना शुरू हुआ तो सजग ने देखा लोग प्लेटों में भर-भरकर खाना डाल रहे हैं। तभी सजग की नजर एक लड़के पर पड़ी। उसने भी अपनी थाली में काफी सारा खाना भर रखा था। उसने थोड़ा सा खाना खाया उसे अच्छा नहीं लगा। उसने मुँह बिचका कर पूरी थाली मेज के नीचे डस्टबिन में डाल दी। उसने दूसरी थाली उठाई। उसमें खाने की दूसरी चीजें भरीं। उसे मिर्ची लगी तो उसने झट से पूरी प्लेट डस्टबिन में डाल दी। जाकर पानी पिया और वापिस आकर फिर से एक नई प्लेट में खाना भरने लगा। सजग ने यह सबदेखा तो उसे बहुत गुस्सा आया। उसने उस लड़के से कहा, "खाना उतना ही प्लेट में भरो जितना खा सको। पहले अपनी पसंद का थोड़ा सा कुछ ले लो। खाकर देखो अच्छा लगे तो फिर से ले लो। इस तरह तुम तीन प्लेटें खराब कर चुके हो। पहले खाना तुम्हें अच्छा नहीं लगा। दूसरी में तुम्हें मिर्च लग गई बस तुमने भरी हुई प्लेट कूड़े में डाल दी और अब यह तीसरी ले रहे हो? पता है इस तरह तुमने कितना खाना बरबाद कर दिया। यह अनमोल खाना तीन-चार और लोगों का पेट भर सकता था। तुमने बरबाद कर दिया। इस तरह करके तुमने कितने लोगों के मुँह का निवाला छीन लिया। पता है इस अन्न को उपजाने में, किसानों की कितनी मेहनत लगी होगी। खाद-बीज-पानी पर खर्च किया होगा। रात-रात भर जाग कर फसल की रखवाली की होगी और तुमने...?"जो लोग वहाँ आस-पास मौजूद थे और लापरवाही से खाना खा कम और बरबाद ज्यादा कर रहे थे। वे भी सतर्क और सावधान हो गये। एक आदमी ने सजग से कहा, "अरे तुम तो भाई बहुत समझदार हो! किसने सिखाया तुम्हें यह सब।"सजग ने कहा, "हमारी टीचर सरला दीदी ने। हमारे स्कूल के एक फंक्शन में कुछ बच्चे इसी तरह खाना बरबाद कर रहे थे तब दीदी ने उन्हें टोका और समझाया था।"वाकई हम सब को यह सीख गाँठ बाँध लेनी चाहिये। वैसे भी हमारे धर्म में अन्न का अपमान करना अन्न देवता का अपमान माना गया है। सजग का लखनऊ में बहुत मन लग गया था। वह कुछ दिन और वहाँ रहना चाहता था। पर उसकी वापसी की टिकट रिवर्स थी। उसे लौटना ही था। नियत दिन वह समय से पहले रेलवे स्टेशन पहुँच गया। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। वह अपनी सीट ढूँढ़कर बैठ गया। उसे बीच वाली सीट मिली थी। खिड़की की तरफ एक बुजुर्ग बैठे थे और कोने वाली सीट की तरफ उसी की उम्र का एक लड़का बैठा था। कुछ देर बाद गाड़ी रवाना हुई तो सजग ने देखा रिजर्वेशन के बावजूद डिब्बा यात्रियों से खचाखच भर गया है। पास बैठे लड़के से बात करने पर पता चला, उसका नाम विक्की है और वह नौवीं कक्षा में पढ़ता है। गाड़ी तेज रफ्तार से दौड़ी जा रही थी। सजग और विक्की में अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी। दोनों एक-दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे।आधे से ज्यादा रास्ता गुजर चुका था। तभी एक आदमी विक्की के पास आकर खड़ा हो गया था। उसने अपने सर पर घुमा-घुमा कर बड़ी सी पीली पगड़ी बाँध रखी थी। उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें थीं। उसने राजस्थानी कपड़े पहने हुये थे। उसने एक बड़ी सी अटैची उठा रखी थी। यात्रियों की भीड़ की धक्का-मुक्की की वजह से उसे खड़ा होने में भी दिक्कत हो रही थी। कुछ देर योंही परेशान होने के बाद उसने विक्की से कहा, "अटैची के वजन की वजह से मुझे यहाँ खड़े होने में दिक्कत आ रही है। अगर आपको कोई ऐतराज न हो तो मैं यह अटैची आपकी सीट के नीचे रख दूँ?"विक्की ने कहा, "हाँ-हाँ, रख दो....।"उस आदमी ने हिफाजत से विक्की की सीट के नीचे अटैची रख दी। सजग ने देखा वह आदमी अब भी परेशान सा होकर इधर-उधर देख रहा था। उसने सोचा हो सकता है भीड़ की वजह से परेशान हो। कुछ देर बाद वह आदमी विक्की के कान के पास फुसफुसाया, "मैं जरा वाशरूम होकर आता हूँ। तुम मेरी अटैची का ध्यान रखना। इसमें कुछ कीमती सामान है। इधर-उधर घूम-घूम कर भी देखता हूँ, कहीं कोई सीट बैठने के लिये मिल जाये। इस डिब्बे में तो खड़े होने की भी जगह नहीं है। मैं बस अभी आया।" कह कर वह आदमी आगे बढ़ गया। काफी देर तक वह नहीं लौटा तो सजग का माथा ठनका। उसने विक्की से कहा—"मुझे तो वह आदमी कुछ गड़बड़ लगता है।""अरे नहीं, हो सकता है सीट की तलाश में वह अगले या पिछले किसी डिब्बे की तरफ निकल गया हो?""लेकिन कोई अपने कीमती सामान वाली अटैची किसी अनजान को सौंप कर ऐसे कैसे गुम हो सकता है।""अरे हमें क्या? अटैची उसकी। हम क्यों चिन्ता करें?"एक स्टेशन पर गाड़ी रुकी। दोनों ने बारी-बारी इधर-उधर जाकर उसे तलाशा भी पर वह आदमी उन्हें कहीं नहीं दिखा। वे इंतजार करते रह गये पर वह आदमी नहीं ही लौटा। उनका स्टेशन आ गया। सभी सवारियाँ उतरने लगीं। अपना-अपना सामान लेकर वे दोनों भी नीचे उतर आये थे। वह अटैची विक्की ने उठा रखी थी। उस आदमी की तलाश में दोनों प्लेटफार्म पर खड़े होकर इधर-उधर नजरें दौड़ा रहे थे। पर वह आदमी कहीं नजर नहीं आ रहा था।