2:30 Am in Hindi Short Stories by Neha kariyaal books and stories PDF | 2:30 Am

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2:30 Am

सब लोग है यहां बस मैं ही नहीं हूं क्योंकि हम human being कम और Deta points ज्यादा लगते हैं।

हम सबका अधिकतर समय screen पर गुजरता है, हम सब पास तो हैं पर साथ कोई नहीं। तो कभी कभी लगता है-  मेरी ज़िंदगी एक अजीब से डर से गुजर रही है जहां हर पल किसी से अलग होने का डर लगा रहता है, बहुत सवाल है भीतर, पर जवाब एक नहीं। मैं बैठी हूं और रात भी बहुत हो चुकी हैं कहीं कोई शोर नहीं आसमान में लाखों तारें है, पर मुझसे मिलो दूर।। मेरे पास ऐसा कोई नहीं जो मुझे समझ सके बोल सकें मैं हूँ यहीं!! अभी भी जब बैचेनी हद से ज्यादा हुई तो मैंने ठीक होने का दिखावा किया पर असल में मैं ठीक नहीं हूं!! सोचा तारों को बताऊं मैं अकेली हूं लेकिन तारों में भी मुझे एक प्रश्न चिह्न दिखा,, शायद मेरे सवालों का जवाब कहीं नहीं है।

जैसे जैसे रात गहरा रही है ठंड और बढ़ जाती है, आज थोड़ी तबियत भी खराब है पर मेरी बेचैनी के सामने कुछ भी नहीं।। आख़िर मेरा क्या कुसूर है, जो दुःख की हर वजह मेरे हिस्से में आई। सब को लगता है मैं बहादुर हूं या मुझे इस सबसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन मैं थक चुकीं हूं। कब तक और मुझे ये खुश रहने का मुखौटा पहनना होगा? क्या मैं इस दुख को छोड़ नहीं सकती, क्यों दूसरों को ये दिखाई नहीं देता। इस काली रात में सन्नाटा तो बहुत है पर अपने ही दिल की धड़कन मुझे डरा रही है। कभी कभी लगता है मेरे सिने पर एक बोझ है एक भारी सा पत्थर, जो उतरने का नाम नहीं लेता। सबकुछ ठीक करने की इस कोशिश में मैं अकेली हो गई हूं। बहुत बुरा लगता... जिन लोगों की परवाह में तुम सब पीछे छोड़ दो और जब वे ही हमारे सामने खुश ना रहे, वैसे न रह पाएं जैसे तुम चाहते हो!! तो सच में दिल पीड़ा से भर उठता है एक ऐसी असहनीय पीड़ा जो एक बड़े ज़ख़्म से भी ज्यादा बड़ी हो। घड़ी में अभी रात के 2:30 Am बजे है और नीद इन तारों के बीच खो गई।। मैंने कुछ लोगों को संभालकर रखा था कि मेरे मुश्किल समय में वो मेरा साथ देंगे,, पर यहां किसी को किसी की नहीं पड़ी। जरूरत पड़ने पर कोई साथ नहीं देता।

दिल की धडकनों पर काबू पाते हुए सोच रही हूं चलो अपनी कहानी इन तारों को सुनाऊं क्या पता कोई सुन ले।। सुनने में बचकाना लगता है... किसी फिल्म की तरह पर जब कोई न समझे ना सुने तो इन तारो से अच्छा दोस्त कौन हो सकता है जो न सवाल करते है और ना ज्ञान देते हैं और ना कोई झूठी तसल्ली ।। बस साथ बैठ जाते हैं। आज अगर मैं रो भी दूं तो मुझे कोई नहीं सुनेगा और कोई मजाक भी नही बनाएगा। ये रात इस बात की साक्षी है कि मैं अपने दुःख में हिम्मत से खड़ी रही, और जिन लोगों को मैंने बताना चाहा उन्हें कभी समझ नहीं आयेगा वो दर्द जो रोज चुभता है।

वो अकेलापन जो सिर्फ ये आसमान पहचानता है।  वैसे मुझे कोई शिकायत नहीं किसी से बस अफसोस है अपने आप पर अपनी सोच पर। तो आज भी यहीं सोच रही हूं क्या मैं सच् में इतनी बड़ी हो गई? क्या ये वही समय है जो मेरे भीतर की शक्ति को बाहर लाएगी? ये वही प्रश्न हैं जो तारों ने पूछने पर मजबूर किया।। एक लंबी सांस लेने के बाद में सोच रही हूं चलो अब सो जाती हूं पर नींद का अभी भी नहीं पता आंखें थक चुकी है फोन की स्क्रीन देखते देखते। और अभी मैंने  कुछ पंछियों की आवाज सुनी शायद ये भी जागे है मेरी तरह, देखने से लग रहा है दिन फैलने को है पर ऐसा नहीं है अभी तो रात 3:00 am बजे है और थकी आंखों को लगा दिन निकलने वाला है। वैसे ये डर का साया भी बड़े कमाल का है,, अच्छे अच्छों की नींदें उड़ा देता है, अब चाहे कोई कितना भी बहादुर हो, शेर दिल हो सबको भीगी बिल्ली बना देता है। खैर जाने दो सबका अपना दुःख है अपनी पीड़ा!! 

सोचने में कितना अजीब लगता है कि इसको रात ही मिली सोचने को ... और मैं कर भी क्या सकती हूँ मेरी नींद ही खो गई। चाह कर भी मैं सो नहीं पा रही हूं... इस समय मेरा मन बहुत जोर से चिल्लाने का है... और चिल्लाते हुए बोलूं.... "भाड़ में जाओ सब लोग" पर बोल नहीं सकती क्योंकि रात बहुत हो गई है और मेरे संस्कार इतने भी ख़राब नहीं। इन झिंगुरो की आवाज में मेरा दिल न जाने क्यों इतनी आवाज कर रहा हैं,, हां मैं मानती हूं थोड़ी परेशान हूँ और इसलिए तो तारों से बातें कर रही हूं ढूंढ रही हूं खोई हुईं नींद और बीते दिन का हिसाब।
पर मन को कौन समझाए सब ठीक हो जायेगा... हर चीज़ में वक्त लगता है,, अब मैंने तो यहीं सिखा है प्रकृति से तो यहीं ख़ुद को समझाती हूँ। लेकिन आज लगता इस सब से बात नहीं बनेगी। इसी लिए मैंने तारों को नाम दे दिये है,, हो सकता है इससे बात बन जाए। मन को पता है ये अपनो की बहुत परवाह करता है,, उनके दुख में दुःखी और उनकी खुशी में उनसे ज्यादा खुश होता है। जितना मैं अपने बारे में नहीं जानती... उससे कहीं अधिक मेरा अंतर्मन जनता है।।
समय के साथ साथ अब ठंड पहले से अधिक है तारें भी बादलों की ओढ़ में छिपने लगे। आंखों में नींद तो नहीं है पर थक गई हूं। खुद को समझाते समझाते।इसलिए सोना चाहती हूं। आख़िर कब तक यूँही तारों को देखती रहूंगी,, थोड़ी ही देर में दिन भी निकल जायेगा।
एक लंबी सांस लेने के बाद... ख़ुद से कहती हूँ चलो अब सो जाओ, सुबह उठना भी तो है। फ़िर से ख़ुद को तैयार भी तो करना है अगली परेशानी के लिए!! 
कमरे की ओर बढ़ते हुए मन में सोच रही हूं... आंखों को बंद कर उन तारों से प्रार्थना करूंगी कि वो मुझे मेरा सुकून वापस कर दे। मेरे दुःख का थोड़ा हिस्सा तो कम कर दें। जो चला गया उसका दुःख नहीं है मुझे लेकिन जो है उसे हमेशा मेरे पास रखें।
चलो अब सो जाती हूं बहुत देर हो गई है।
आँखें थक चुकीं हैं।।।