one sided love in Hindi Love Stories by ziya books and stories PDF | एक तरफ़ा मोहब्बत

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एक तरफ़ा मोहब्बत

एक तरफा मोहब्बत

(Unrequited Love)

शिमला के एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी आरोही। पच्चीस साल, सादी सलवार-कमीज़, सिर पर बिंदी, हाथ में चाक। उसकी आँखों में एक सपना था जो कभी पूरा नहीं हुआ—और वह सपना था, रेहान।

रेहान उसी स्कूल में फिजिक्स के टीचर थे। लंबे कद, गहरी आवाज़, और बातों में एक ठहराव। जब वह क्लास में न्यूटन के नियम समझाते, तो आरोही अपनी क्लास में बैठी उनकी आवाज़ सुनती रहती। उसे फिजिक्स से कुछ लेना-देना नहीं था, लेकिन रेहान की आवाज़ उसके दिल में उतर जाती थी।

तीन साल हो गए थे उसे यह प्यार किए। तीन साल, और उसने एक बार भी अपना दिल नहीं खोला था।

क्यों?

क्योंकि रेहान शादीशुदा था। उसकी पत्नी कविता, स्कूल की हिंदी टीचर थी—और आरोही की अच्छी दोस्त। कविता कोई बुरी इंसान नहीं थी। वह मीठी, सहज, हर किसी की मदद करने वाली। आरोही अक्सर उनके घर जाती, चाय पीती, कविता के साथ हँसती-बातें करती, और रेहान को देखती—बस देखती। उसकी आँखों में जो कुछ था, वह उसने अपने दिल में ही कैद रखा।

एक दिन स्कूल के वार्षिकोत्सव की तैयारी चल रही थी। आरोही और रेहान को एक साथ मंच सजाने का काम मिला। दोनों अकेले थे, हॉल में कोई नहीं। रेहान ऊँचाई पर बैनर लगा रहे थे, आरोही नीचे से पिन थमा रही थी।

"आरोही, वो लाल रंग का कपड़ा दे देना," रेहान ने कहा।

आरोही ने कपड़ा उठाया और ऊपर देखा। रेहान की नज़र उससे मिली। बस एक पल—और आरोही का दिल धक् से रुक गया। उसने तुरंत नज़र हटा ली, लेकिन उस पल ने उसकी रूह पर करंट सा छोड़ दिया था।

"तुम ठीक हो?" रेहान ने पूछा, नीचे उतरते हुए।

"हाँ, बस... थोड़ा चक्कर आया," उसने झूठ बोला।

रेहान ने उसका हाथ पकड़कर उसे बैठाया। उसका स्पर्श गर्म था, मुलायम। उसने पानी का गिलास बढ़ाया।

"आरोही, तुम बहुत काम कर लेती हो। आराम भी कर लिया करो," उसने कहा।

उसकी आवाज़ में सिर्फ दोस्ती थी, सिर्फ चिंता थी। उसमें वह नहीं था जो आरोही चाहती थी। और शायद यही सबसे दर्दनाक था—कि वह उसे कभी उस नज़र से नहीं देखेगा, जैसे वह उसे देखती थी।

आरोही ने पानी पिया, मुस्कुराई, और कहा, "मैं ठीक हूँ। आप काम कीजिए।"

उस रात वह अपने कमरे में अकेली रोई। उसने आईने में अपना चेहरा देखा—सादा, बिना शृंगार के, बिना किसी खासियत के। उसने सोचा—काश मैं कविता जैसी होती। काश मैं भी उसके लायक होती। लेकिन वह जानती थी, यह सिर्फ एक तरफा मोहब्बत है। और एक तरफा मोहब्बत का कोई अंजाम नहीं होता।

समय बीतता गया। आरोही ने अपने दिल को समझाने की कोशिश की—यह सिर्फ मोह है, यह गुज़र जाएगा। लेकिन हर सुबह जब रेहान स्कूल में आते, उसका दिल फिर से वही धड़कन धड़कने लगता। हर शाम जब वह उनके घर से चाय पीकर लौटती, वह अपने तकिए में मुँह छुपाकर रोती।

एक दिन कविता ने आरोही को अपने घर बुलाया। उसके चेहरे पर कोई खास चमक थी।

"आरोही, मुझे तुमसे कहना था," कविता ने हाथ पकड़ लिया। "मैं प्रेग्नेंट हूँ।"

आरोही के चेहरे पर मुस्कान आ गई—सच्ची मुस्कान। उसने कविता को गले लगा लिया।

"बहुत बधाई," उसने कहा, और उसकी आँखों में आँसू थे—खुशी के भी, और कुछ और के भी।

उसी शाम रेहान भी घर आया। उसने कविता को गोद में उठा लिया, खुशी से झूम उठा। आरोही ने वह दृश्य देखा—रेहान की आँखों में वह प्यार, वह खुशी, जो सिर्फ कविता के लिए थी। वह समझ गई—यह प्यार कभी उसका नहीं होगा। और यह जानते हुए भी, उसके दिल ने रेहान को जाने नहीं दिया।

रात को वह अपने घर लौटी तो उसने अपनी डायरी खोली। उसने लिखा—

"प्रिय रेहान,

तुम नहीं जानते कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ। और तुम नहीं जानोगे। क्योंकि यह प्यार सिर्फ मेरा है। इसे तुम पर बोझ नहीं बनाना चाहती। तुम खुश रहो, अपने घर में, अपने बच्चे के साथ। मैं बस दूर से देखती रहूँगी। यही मेरी मोहब्बत है—तुमसे दूर, तुम्हारे लिए।"

उसने डायरी बंद कर दी, और कभी वह पन्ना किसी को नहीं दिखाया।

महीने बीते। कविता का पेट बढ़ा। आरोही अक्सर उनके घर आती, कविता की देखभाल करती, बाज़ार से सामान लाती, रेहान को काम में हाथ बँटाती। वह जानती थी कि वह क्या कर रही है—वह रेहान के करीब रहना चाहती थी, भले ही वह सिर्फ एक दोस्त के रूप में हो।

एक दिन कविता ने आरोही से कहा, "तुम इतनी अच्छी हो। तुम्हारी शादी क्यों नहीं होती? मैं तुम्हारे लिए कोई अच्छा लड़का देखूँ?"

आरोही मुस्कुराई। "अभी नहीं। बाद में कभी।"

"कोई है क्या?" कविता ने शरारत से पूछा।

आरोही का दिल जोर से धड़का। "नहीं," उसने कहा, "कोई नहीं है।"

वह झूठ बोल रही थी। उसका कोई था, लेकिन वह कोई किसी और का था।

बच्चा हुआ—एक प्यारा सा बेटा। रेहान और कविता ने उसका नाम रखा—आरव। आरोही ने उस बच्चे को अपनी गोद में लिया तो उसे लगा जैसे उसके दिल का एक टुकड़ा शांत हो गया। उसने सोचा—शायद यही उसकी मोहब्बत का हिस्सा है। रेहान से प्यार करना, उसके बच्चे को प्यार करना, उसके घर को अपना घर समझना।

लेकिन दिल उससे ज्यादा चाहता था।

एक शाम, बारिश थी। आरोही स्कूल से लौट रही थी कि अचानक बस छूट गई। वह सड़क पर भीग रही थी, तभी एक कार आकर रुकी। रेहान अंदर थे।

"चढ़ो," उसने कहा।

आरोही चढ़ गई। कार में दोनों चुप थे। बारिश की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं था।

"आरोही," रेहान ने अचानक कहा, "तुम हमेशा इतनी चुप क्यों रहती हो?"

"मैं चुप नहीं हूँ," उसने कहा।

"हो। बहुत कुछ अंदर रख लेती हो। कभी-कभी लगता है, तुम्हारे दिल में कुछ है जो तुम बताना चाहती हो।"

आरोही की साँसें तेज़ हो गईं। उसने सोचा—बस एक बार कह दूँ? बस एक बार सच कह दूँ? लेकिन फिर उसने रेहान के हाथ में शादी की अंगूठी देखी। उसने अपनी जुबान रोक ली।

"कुछ नहीं," उसने कहा, "बस थकान होती है कभी-कभी।"

रेहान ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में सच्ची चिंता थी। "अगर कभी कुछ चाहिए, तो बताना। तुम हमारे लिए परिवार जैसी हो।"

परिवार जैसी। यही वो शब्द था जिसने आरोही का दिल तोड़ दिया। वह उसके लिए परिवार थी—बहन, दोस्त, कोई और नहीं।

उस रात आरोही ने फैसला किया। वह शिमला छोड़ देगी। दूर चली जाएगी, जहाँ रेहान न हो, कविता न हो, आरव न हो। जहाँ उसे हर दिन वह दर्द न सहना पड़े जो दिखावटी मुस्कान के पीछे छुपाना पड़ता है।

उसने स्कूल में रेजिग्नेशन दे दिया। कविता हैरान हुई, रेहान भी। "क्यों?" दोनों ने पूछा।

"बस... कुछ नया करना है," आरोही ने कहा, "दिल्ली में नौकरी लग गई है।"

जाने से पहले उसने एक आखिरी बार रेहान के घर जाने का मन बनाया। वहाँ गई तो कविता ने उसे रोक लिया। "आज रुक जाओ, आखिरी शाम है।"

आरोही रुक गई। रात को सब सो गए। आरव अपने पालने में सो रहा था। आरोही उसके पास गई, उसके माथे पर चूम लिया। फिर वह रेहान के कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी हो गई। अंदर से रेहान और कविता की धीमी बातों की आवाज़ आ रही थी—हँसी, शरारत, वह अपनापन जो सिर्फ उन दोनों के बीच था।

आरोही ने दरवाज़े पर हाथ रखा, लेकिन खटखटाया नहीं। उसने फुसफुसाते हुए कहा—"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, रेहान। बस इतना जान लो। या नहीं भी जानो, कोई फर्क नहीं पड़ता।"

फिर वह चुपके से घर से निकल गई।

अगली सुबह ट्रेन में बैठकर जब शिमला पीछे छूट रहा था, आरोही ने खिड़की से बाहर देखा। पहाड़, बादल, वह स्कूल जहाँ उसने तीन साल प्यार किया था बिना कोई उम्मीद रखे।

उसकी डायरी उसके बैग में थी। उसने आखिरी पन्ने पर लिखा—

"एक तरफा मोहब्बत का मतलब यह नहीं कि प्यार कम है। बल्कि यह कि प्यार इतना ज्यादा है कि दूसरे की खुशी अपनी खुशी से बड़ी लगती है। मैंने तुम्हें प्यार किया, रेहान। और मैं तुमसे प्यार करती रहूँगी। लेकिन अब दूर से। यही मेरी मोहब्बत है—तुम्हारे बिना, तुम्हारे लिए।"

दिल्ली में उसने नई जिंदगी शुरू की। नया स्कूल, नए बच्चे, नए चेहरे। उसने कभी शादी नहीं की। लोग पूछते—"क्यों?" तो वह मुस्कुराकर कहती—"मेरी मोहब्बत पहले ही किसी को दे दी है।"

साल बीतते गए। आरोही ने कभी शिमला वापस जाने की कोशिश नहीं की। लेकिन हर साल, रेहान के जन्मदिन पर, वह एक डायरी में लिखती—

"जन्मदिन मुबारक, रेहान। मैं ठीक हूँ। बस यही कहना था।"

एक बार कविता ने फोन किया। "आरोही, तुम कब आओगी? आरव बड़ा हो गया है, वह तुमसे मिलना चाहता है।"

आरोही की आँखों में आँसू आ गए। "कभी... जल्दी ही आऊँगी।"

लेकिन वह नहीं गई। वह जानती थी—अगर गई, तो वह सबकुछ फिर से शुरू हो जाएगा। वह दर्द जो धीरे-धीरे कम हुआ था, फिर से ताजा हो जाएगा।

और रेहान? वह कभी नहीं जान पाया। वह यह नहीं जानता था कि उसकी दोस्त, जो हमेशा मुस्कुराती थी, जो उसके घर आती थी, जो उसके बच्चे से प्यार करती थी—वह उससे प्यार करती थी। उसने कभी शक नहीं किया। क्योंकि आरोही ने अपनी मोहब्बत को इतनी खूबसूरती से छुपाया कि वह दोस्ती बनकर रह गई।

एक तरफा मोहब्बत का यही दर्द है—तुम सबकुछ देकर भी कुछ नहीं ले सकते। तुम अपना दिल उँडेलकर भी उसे सिर्फ दोस्त की नज़र से देख सकते हो। और फिर भी, तुम शिकायत नहीं कर सकते, क्योंकि तुमने खुद चुना—चुप रहना, दूर रहना, और प्यार करते रहना।

आरोही की डायरी में आखिरी पन्ने पर लिखा था—

"काश, वह जानता। लेकिन शायद यही अच्छा है कि वह न जाने। उसकी दुनिया में बिना बोझ बने, मैंने उसे प्यार किया। और यह प्यार अब भी है—एक तरफा, बेहिसाब, और बेइंतहा।"

समाप्त