जिन्न की आशिकी
(The Love of a Jinn)
शहर से दूर, पहाड़ियों की गोद में बसा एक पुराना कस्बा था—मिर्जापुर। यहाँ की गलियाँ संकरी थीं, मकानों की छतें एक-दूसरे से मिली हुई थीं, और हर मोहल्ले में कोई न कोई कहानी ज़ुबान पर रहती थी। लेकिन सबसे अजीब कहानी थी उस हवेली की, जो कस्बे के आखिरी छोर पर खंडहर बनी पड़ी थी। लोग कहते थे कि उस हवेली में जिन्न रहते हैं। कोई वहाँ रात को नहीं जाता था, न ही कोई उसकी मिट्टी हाथ लगाता था।
उसी कस्बे में रहता था आयान। बीस साल का एक सादा-सा लड़का, जिसके माता-पिता नहीं थे। वह एक मस्जिद के पास छोटी-सी दुकान चलाता था—चाय-पानी, बिस्कुट, सिगरेट। उसकी आँखों में एक सपना था, जो उसने किसी से नहीं कहा था। वह शायद खुद भी नहीं जानता था कि वह सपना क्या है, लेकिन उसकी रूह कुछ ढूँढ़ रही थी।
एक शाम, जब अज़ान हुई और दुकान बंद करने का वक्त आया, आयान ने देखा कि हवेली की तरफ से एक अजीब सी रोशनी आ रही थी। हरी-सी, मद्धम, जैसे कोई दीया जल रहा हो। उसने सोचा—शायद कोई भटका हुआ बच्चा हो, या फिर कोई जानवर। वह हवेली की तरफ बढ़ चला।
दरवाज़ा टूटा हुआ था, अंदर अंधेरा था। उसने धीरे-से कदम रखा। पुराने पत्थरों की ठंडक उसके पैरों में उतर गई। वह रोशनी अब भी दिख रही थी, लेकिन वह कहीं से आ रही थी—आसमान से? ज़मीन से? उसे समझ नहीं आया।
तभी उसने एक आवाज़ सुनी। ऐसी आवाज़ जैसे किसी ने शीशे पर उँगली फेरी हो—मीठी, काँपती, दर्द भरी।
"तुम आ गए," आवाज़ ने कहा।
आयान ठिठक गया। उसने चारों तरफ देखा, कोई नहीं था।
"कौन?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैं," आवाज़ ने कहा, "वो जिसे सब भूल चुके हैं। मैं इस हवेली की रूह हूँ। लेकिन तुम मुझे देख नहीं सकते।"
आयान का दिल तेज़ धड़कने लगा। वह जानता था कि उसे वहाँ से भाग जाना चाहिए, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।
"तुम क्यों आए हो?" उसने पूछा।
"मैं हर शाम यहाँ आती हूँ," आवाज़ ने कहा, "और हर शाम कोई नहीं आता। लेकिन तुम आए। शायद इसलिए कि तुम्हारी रूह में भी वही अकेलापन है जो मुझमें है।"
आयान चुप रहा। उसे लगा जैसे कोई उसकी छाती में हाथ डालकर उसका दर्द छू रहा हो।
"तुम जिन्न हो?" उसने धीरे से पूछा।
"हाँ," आवाज़ ने कहा, "मेरा नाम नर्गिस है। मैं यहाँ सौ साल से अकेली हूँ। यह हवेली कभी मेरी थी, लेकिन अब यह मेरी कब्र है।"
आयान ने एक पत्थर पर बैठकर कहा, "मैं आयान हूँ। मेरे पास कोई नहीं है।"
"मेरे पास भी," नर्गिस ने कहा।
उस रात के बाद आयान रोज़ हवेली जाने लगा। लोगों ने देखा तो अजीब-अजीब बातें करने लगे—"आयान को जिन्न लग गया है," "वह पागल हो गया है," "हवेली में जाकर क्या करता है?" लेकिन आयान को किसी की परवाह नहीं थी। उसे अब वह सपना मिल गया था जो वह ढूँढ़ रहा था—एक रूह जो उसकी रूह से बात करती थी।
नर्गिस ने उसे अपनी कहानी सुनाई। वह एक अमीर परिवार की बेटी थी, सौ साल पहले। उसकी खूबसूरती के किस्से दूर-दूर तक मशहूर थे। एक दिन उसके घर एक सूफ़ी आया, जिसने उसकी आँखों में देखकर कहा—"इस लड़की में नूर है, लेकिन यह नूर दुनिया की रौशनी नहीं सहेगा।" उसके पिता ने बात को अनसुना कर दिया। लेकिन जल्द ही नर्गिस बीमार पड़ गई। कोई इलाज काम नहीं आया। एक दिन वह चुपचाप इसी हवेली के कमरे में सो गई और फिर नहीं उठी। लोगों ने कहा—"जिन्न ने उसे छू लिया था।" लेकिन सच यह था कि उसकी रूह खुद एक जिन्न बन गई थी—न आग से बनी, न हवा से, बल्कि अधूरी चाहत से।
"मैं न तो इंसान हूँ, न पूरी तरह जिन्न," नर्गिस ने कहा, "मैं सिर्फ याद हूँ।"
आयान को उससे प्यार हो गया। वह जानता था कि यह प्यार नामुमकिन है—एक इंसान और एक जिन्न का प्यार। लेकिन दिल तो अपनी ही भाषा समझता है, न शरीर की, न दुनिया की।
एक रात आयान ने कहा, "नर्गिस, मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।"
हवेली में सन्नाटा छा गया। फिर नर्गिस की आवाज़ आई—बहुत धीमी, बहुत दर्द भरी।
"आयान, यह नहीं हो सकता। मेरा कोई शरीर नहीं। मैं तुम्हें छू भी नहीं सकती।"
"लेकिन मैं तुम्हें महसूस करता हूँ," उसने कहा, "तेरी आवाज़ मेरे दिल में उतरती है। तेरी बातें मेरी रूह को सुकून देती हैं। यही तो प्यार है।"
नर्गिस कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, "अगर तुम सच में चाहते हो, तो एक रास्ता है। लेकिन वह बहुत मुश्किल है।"
"बताओ," आयान ने कहा।
"पुराने सूफ़ी की कब्र है, पहाड़ी के उस पार। उसके पास एक अमानत रखी है—एक दुआ, जो किसी जिन्न को इंसानी शक्ल दे सकती है। लेकिन वह दुआ सिर्फ एक बार काम करती है, और जो इंसान उसे पढ़ता है, उसकी उम्र का आधा हिस्सा उस जिन्न को चला जाता है।"
आयान ने बिना देर किए कहा, "मैं जाऊँगा।"
नर्गिस रोई—हालाँकि उसकी आँखों से कोई आँसू नहीं गिरा, लेकिन हवेली की दीवारें नम हो गईं।
अगले दिन आयान ने दुकान बंद की, कस्बे के लोगों से बिना मिले, पहाड़ी की तरफ निकल गया। रास्ता कठिन था—झाड़ियाँ, खड्ड, और रात को जंगली जानवरों की आवाज़ें। लेकिन उसके दिल में सिर्फ एक धड़कन थी—नर्गिस।
तीन दिन बाद वह सूफ़ी की कब्र पर पहुँचा। वहाँ एक बुज़ुर्ग बैठे थे, जिनकी दाढ़ी सफेद थी और आँखों में नूर।
"आयान," बुज़ुर्ग ने बिना पूछे नाम ले लिया, "मैं तुम्हारी राह देख रहा था।"
आयान ने सिर झुकाया। "मैं दुआ लेने आया हूँ।"
बुज़ुर्ग ने कहा, "जानता हूँ। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि इस दुआ की कीमत क्या है? तुम्हारी उम्र का आधा हिस्सा। तुम अब पचास साल के नहीं, पच्चीस साल के रह जाओगे। तुम बूढ़े होकर मरोगे, जबकि वह जिन्न इंसान बनकर जवान रहेगी।"
"मुझे पता है," आयान ने कहा।
"और यह भी जानते हो कि वह इंसान बनकर तुमसे प्यार करेगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। हो सकता है कि इंसानी जिस्म पाकर उसकी यादें बदल जाएँ।"
आयान ने अपनी आँखें उठाकर कहा, "मैं उससे प्यार करता हूँ। प्यार गारंटी नहीं माँगता।"
बुज़ुर्ग ने देर तक उसकी आँखों में देखा। फिर उन्होंने एक छोटा-सा कागज़ का टुकड़ा निकाला, जिस पर कुछ लिखा था।
"ले जा," उन्होंने कहा, "लेकिन याद रखना—यह दुआ आधी रात को पढ़ी जाती है, और उस वक्त तुम दोनों को हवेली के उसी कमरे में होना चाहिए जहाँ वह रूह बंधी है।"
आयान ने कागज़ लिया, बुज़ुर्ग के पैर छूए, और वापस लौट पड़ा।
जब वह कस्बे पहुँचा तो उसे लगा जैसे उसकी जान निकल रही हो। तीन दिन का सफर, बिना खाने-पिए। लेकिन वह सीधा हवेली गया।
"नर्गिस!" उसने पुकारा।
"आयान," आवाज़ आई, "तुम वापस आ गए। मैं डर गई थी कि तुम वापस नहीं आओगे।"
"मैं दुआ लेकर आया हूँ। आज रात, आधी रात को, तुम इंसान बन जाओगी।"
हवेली में सन्नाटा था। फिर नर्गिस बोली, "आयान, मैंने सोच लिया है। मैं यह नहीं चाहती।"
आयान चौंका। "क्यों?"
"क्योंकि तुम अपनी आधी उम्र मुझे दे दोगे। तुम जवानी में ही बूढ़े हो जाओगे। और मैं... मैं तुम्हें ऐसा करते नहीं देख सकती।"
आयान ने ज़ोर से कहा, "सुन, नर्गिस। मैं तेरे बिना जी नहीं सकता। अगर तू इंसान नहीं बनी, तो मैं यूँ ही मर जाऊँगा—हर रात यहाँ आता रहूँगा, तेरी आवाज़ सुनता रहूँगा, और कभी तुझे छू नहीं पाऊँगा। वह जीवन क्या जीवन? मुझे आधी उम्र भी पूरी जिंदगी से बेहतर है, अगर वह तेरे साथ हो।"
नर्गिस की आवाज़ फटी हुई थी। "तुम पागल हो, आयान।"
"हाँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारी आशिकी ने मुझे पागल कर दिया है।"
रात आई। कस्बे में सन्नाटा था। आयान हवेली के अंदर उस कमरे में गया, जहाँ नर्गिस की रूह सबसे ज़्यादा महसूस होती थी। उसने दुआ का कागज़ निकाला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"नर्गिस," उसने कहा, "तैयार हो?"
"हाँ," एक फुसफुसाहट आई, "लेकिन आयान... तुम्हारी उम्र..."
"चुप," उसने कहा, "अब बस दुआ पढ़ने दे।"
उसने कागज़ पर लिखे अक्षरों को पढ़ना शुरू किया। वह अरबी में थी, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे वह पढ़ता गया, उसे लगा जैसे उसके शरीर से कोई चीज़ निकल रही हो—उसकी जवानी, उसकी ऊर्जा, उसकी उम्र। उसके बाल सफेद होने लगे, उसके हाथों की मांसपेशियाँ ढीली पड़ गईं, उसकी कमर झुक गई।
लेकिन उसने पढ़ना जारी रखा।
आखिरी शब्द पढ़ते ही कमरे में तेज़ रोशनी हुई। हवा का एक झोंका आया, जैसे कोई सैकड़ों सालों से बंद दरवाज़ा खुल गया हो। फिर रोशनी धीरे-धीरे कम हुई, और सामने एक लड़की खड़ी थी।
नर्गिस।
उसकी आँखें काली थीं, बाल लंबे, चेहरा चाँद की तरह चमक रहा था। वह एक सफेद कुर्ते में थी, जैसे पुराने ज़माने की तस्वीरों से निकलकर आई हो। उसने अपने हाथों को देखा, अपने पैरों को, और फिर आयान की तरफ देखा।
आयान बूढ़ा हो चुका था। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, वह मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था।
नर्गिस उसके पास दौड़ी, उसने उसका हाथ पकड़ लिया—पहली बार, छूकर।
"आयान," वह रो पड़ी, "तुमने क्या कर दिया?"
आयान ने मुस्कुराने की कोशिश की। उसकी आवाज़ अब बूढ़ों जैसी थी—काँपती, धीमी।
"अब तू हकीकत है," उसने कहा, "मेरे हाथ में तेरा हाथ है। यही काफी है।"
नर्गिस ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वह रो रही थी, और उसके आँसू गर्म थे—पहली बार।
उस रात वे दोनों हवेली में बैठे रहे। नर्गिस ने आयान का सिर अपनी गोद में रखा। उसने उसके सफेद बालों को सहलाया, उसके चेहरे को देखा।
"अब क्या होगा?" उसने पूछा।
"अब हम जिएँगे," आयान ने कहा, "भले ही थोड़ा वक्त हो, लेकिन सच्ची जिंदगी जिएँगे।"
सुबह हुई। जब कस्बे के लोगों ने देखा कि हवेली से एक जवान लड़की एक बूढ़े आदमी का हाथ पकड़कर बाहर निकल रही है, तो सब हैरान रह गए। कोई कुछ समझ नहीं पाया।
आयान ने अपनी दुकान फिर से खोली। नर्गिस उसके साथ बैठती, चाय बनाती, लोगों को देखकर मुस्कुराती। धीरे-धीरे कस्बे ने उसे अपना लिया। कहानियाँ बन गईं—कुछ ने कहा वह कोई परी है, कुछ ने कहा वह आयान की बहन है, कुछ ने कहा वह उसकी पत्नी है। लेकिन सच कोई नहीं जानता था।
दो साल बाद आयान की तबीयत बिगड़ने लगी। उसकी उम्र तेज़ी से ढल रही थी। नर्गिस ने उसकी सेवा की, उसे दवा दिलाई, रात-रात भर उसके सिरहाने बैठी रही।
एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, आयान ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, "नर्गिस, मैं अब चलूँगा।"
"मत कहो ऐसा," उसने कहा।
"सुन," उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "मैंने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। लेकिन तुमसे एक वादा चाहता हूँ।"
"क्या?"
"जब मैं नहीं रहूँगा, तो तुम यहाँ मत रुकना। दुनिया में जाओ, जीओ। तुम इंसान हो अब। तुम्हें प्यार मिलेगा, शायद कोई और..."
नर्गिस ने उसका मुँह बंद कर दिया। "चुप," उसने कहा, "मुझे सिर्फ तुमसे प्यार है। तुम्हारे बिना मैं फिर से वही रूह बन जाऊँगी।"
आयान ने मुस्कुराकर कहा, "फिर तो मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगा।"
उस रात आयान की आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। नर्गिस ने उसके शरीर को हवेली के पास ही दफनाया, जहाँ वे पहली बार मिले थे।
लोगों ने सोचा कि अब नर्गिस कस्बा छोड़ देगी। लेकिन वह नहीं गई। वह दुकान चलाती रही, आयान की याद में वहीं रही। वह अब बूढ़ी नहीं हुई, जवान ही रही—सालों बीत गए, वह वैसी ही रही।
कस्बे के लोग उसे "जिन्नन" कहने लगे। लेकिन वह मुस्कुराकर कहती, "मैं जिन्न नहीं हूँ। मैं सिर्फ एक आशिक़ हूँ।"
और हर शाम, जब अज़ान होती, वह हवेली के पास आयान की कब्र पर बैठ जाती, उससे बातें करती—जैसे वह सुन रहा हो।
एक दिन एक बच्चे ने उससे पूछा, "नर्गिस चाची, आपको किससे प्यार है?"
नर्गिस ने हवेली की तरफ देखा, फिर कब्र की तरफ, और कहा—
"मुझे एक पागल से प्यार है। जिसने मुझे इंसान बनाया, अपनी आधी उम्र दे दी, और चला गया। लेकिन उसकी आशिकी अब भी यहाँ है—इस हवेली में, इस हवा में, मेरे दिल में।"
बच्चा कुछ समझ नहीं पाया, लेकिन नर्गिस की आँखों में वह रोशनी देखी जो सिर्फ सच्चे प्यार की होती है।
और कहते हैं कि आज भी, अगर कोई उस हवेली के पास रात को जाए, तो दो आवाज़ें सुन सकता है—एक लड़के की, एक लड़की की। हँसते हुए, बातें करते हुए, जैसे वक्त ने उनके लिए रुकना सीख लिया हो।
समाप्त